Friday, 20 July 2012

दबंग दुनिया , 20/07/2012
व्यंग्य 


           नोट पर गांधी के विकल्प की तलाश 
                                                             -ओम वर्मा      

  हन चिंतन जारी था | चिंतकों में देश को चलाने वाले, या चलाते हुए   

दिखने वाले ...देश की राह में फूल बिछाने वाले से लेकर काँटे बिछाने वाले...यानी सभी तरह के लोग थे | चिंता का,या श्रेष्ठि वर्ग की भाषा में कहूँ  तो  'बहस'  का विषय था -'भारतीय करेंसी नोटों  पर महात्मा गांधी  के स्थान पर आखिर किसका फोटो छापा जाए !' मीडिया रिपोर्ट के अनुसार भारतीय मुद्रा पर महात्मा गांधी का एकाधिकार जल्द ही छिनने वाला है | यह भी खबर है कि करेंसी नोटों पर गांधी की जगह अन्य राष्ट्रीय नेताओं के फोटो देने के बारे में आरबीआई को कई सुझाव मिल चुके हैं और इस पर विचार भी कर रहे हैं | समझना मुश्किल है कि परेशानी आखिर किससे  है...  गांधी के नाम से; गांधी के विचार से या कि गांधी के नाम को भुनाने वालों से ...| गांधी के सिर्फ नोटों वाले फोटो हटाना है या गांधीवाद हटाना है ; या कि गांधी का नामो-निशान ही मिटाना है...|
              मैंने सोचा कि राष्ट्र का जिम्मेदार नागरिक होने के नाते इस मुद्दे पर मैं भी अपना कुछ योगदान दूँ | इसलिए मैंने कुछ विशिष्ट महानुभाओं से चर्चा की | सभी से मेरा यही प्रश्न था कि, "आपके अनुसार भारतीय करेंसी पर किसका फोटो होना चाहिए?" 
                सर्वप्रथम मैंने राजा सा. से संपर्क किया | मुँह पर ताला जड़ा होने के कारण राजाजी ने पहले तो कुछ भी कहने से इंकार कर दिया | मगर मैं भी कहाँ हार  मानने वाला था | मैंने कहा, "ताला आपके मुँह पर लगा है, हाथ और कलम पर तो नहीं ! आप अपनी राय लिखकर तो दे ही  सकते हैं |"
               "मैं भारतीय करेंसी पर सिर्फ और सिर्फ गांधी की तस्वीर चाहता हूँ |"  उन्होंने कहा...आय मीन... लिखा |
               "लेकिन गांधी जी की तस्वीर तो नोटों पर पहले से ही है |"
               "गांधी से मेरा तात्पर्य सोनिया गांधी जी से है | और हाँ, मैं जीवन में एक बार नोटों पर राहुल गांधी जी की तस्वीर भी देखना चाहता हूँ |"  उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी के पुष्प की तरह अपनी एकमात्र अभिलाषा व्यक्त की |  
          फिर मैंने बहिन जी को खोजा | प्रश्न सुनते ही उन्होंने पार्क में उनके  द्वारा  स्थापित  एक  संगमरमरी  हाथी की  पीठ पर बैठे-बैठे फरमाया, "मेरी और माननीय कांशीराम जी की फोटो तथा बीच में हाथी होना चाहिए |"
                "मगर बहिन जी, हाथी तो आपका चुनाव चिन्ह है इसलिए चुनाव आयोग  इसकी अनुमति नहीं देगा |"
 प्रतिप्रश्न  न सुनने की आदी बहिन जी को मैंने टोका |
                "नहीं, इसे चुनाव चिन्ह से मत जोडिए | करेंसी नोट यानी लक्ष्मी ! और लक्ष्मी जी के हर चित्र में आपको गजराज अवश्य दिखाई देंगे | मैं भी उन्हीं गजराज की बात कर रही हूँ | और इस पर भी यदि आपत्ति हो तो आम्बेडकर जी के चित्र पर विचार किया जा सकता है |"
              मैंने बहिन जी व पार्क में लगी सभी मूर्तियों को प्रणाम किया | दूसरी बहिन जी, क्षमा करें, दीदी को 'पोक' किया | दीदी ने प्रश्न सुनते ही आक्रामक अंदाज़ में कहा, "करेंसी नोट पर सिर्फ गुरुदेव  रोबिन्द्रोनाथ जी का चित्र होना चाहिए | उनका  नहीं  दे  सकते  तो  किसी भी गैर कांग्रेसी बंगाली का चित्र चलेगा |"
              मेरे ठाकरे परिवार से संपर्क करने पर आवाज आई कि किसी भी मराठी भाषी या मुंबईकर की तस्वीर लगाई जानी चाहिए | गड़करी जी ने गुरु गोवलकर जी की तस्वीर लगाने का सुझाव दिया |  नीतीशकुमार जी को भारतीय मुद्रा पर नरेंद्र मोदी को छोड़कर किसी की भी फोटो स्वीकार थी | कुछ 'कृपापात्र' भक्तों ने समागम में कृपादान करने वाले बाबा की तस्वीर लगाने की बात कही | आरक्षण के कोटे में 4.5 प्रतिशत उप कोटा देने की वकालात करने वाले एक महानुभाव ने  तो ने मुहम्मद अली जिन्ना का नाम भी सुझा डाला |
              चिंतन पर चिंतन और बहसों पर बहसें  जारी हैं | देश की जनता को सर्वसम्मत निर्णय की प्रतीक्षा है | 
                                ***
                                                                                                                                                                    

Tuesday, 10 July 2012


पत्रिका , इंदौर 10/07/2012
      व्यंग्य                       साहित्यिक समागम 
                                                        ---ओम वर्मा  
 "बाबाजी को कोटि कोटि प्रणाम ! बाबा मैं पिछले दस साल से कविता  
 लिख रहा हूँ | अखबार वाले मेरी कविता छापने का नाम ही नहीं लेते |
 खेद व क्षमा के साथ वापस लौटा देते हैं | आपकी कृपा मुझ तक पहुँचे 
 तो काम बन जाए !"
             "आप कविताएँ कैसे भेजते हैं ?" बाबा ने रत्नजड़ित सिंहासन
 पर बैठे-बैठे फ़रमाया |
            "मैं अपने हाथ से लिखकर डाक से भेजता हूँ |" समागम में सभी 
 की तरह इक्यावन सौ रु. शुल्क देकर आए भक्त ने करबद्ध मुद्रा में उत्तर 
 दिया |"
         "किस रंग की स्याही से लिखते हैं ?" बाबा ने बाबानुमा प्रश्न दागा |
         " नीली स्याही से बाबा |"
         "बस यही गड़बड़ है | आप आज ही अपना नीली स्याही का पेन तोड़ 
  दें और पिंक कलर की स्याही से लिखना शुरू कर दें | आप तक कृपा पहुँच 
 जाएगी |" जाहिर है कि भक्त गदगद हो चुका था |
        यह संघर्षशील या कहें कि नवोदित रचनाकारों का समागम था | बाबा
 का इस फील्ड में सिर्फ इतना तज़ुर्बा  था कि पत्रकारिता व राजनीति  में पैर
 जमाने के लिए खुद का एक अधपन्ने का अखबार निकाला था  और खुद की 
 प्रेस भी खोल ली थी | सभी जगह असफल रहने के बाद उन्होंने 'कृपा' का 
 कारोबार शुरू किया, जिसमें जाहिर है कि चाँदी ही चाँदी थी | संपादकों की 
 कृपा से वंचित सारे उदीयमान रचनाकार शुल्क भुगतान,सुरक्षा जांच एवं 
 कृपा हो जाने पर दसबंध यानी टेन परसेंट का शपथपत्र भरकर अंदर आए थे |
             "बाबा , मैं अपने चुटकुले कई अखबारों में भेज चुका हूँ | एक भी नहीं 
 छपा !" चुटकलों को साहित्य समझने वाले तथा बढ़ी हुई दाड़ी व  लंबा कुर्ता
 पहने एक साहित्य प्रेमी ने पूछा |
              "आप कुर्ता कितने मीटर कपड़े का सिलवाते हैं ?" बाबा ने अपने 
 ज्ञान के खज़ाने से फिर एक तिलस्मी प्रश्न दागा |
             "जी बाबाजी, तीन मीटर कपड़े का !" भक्त ने अभिभूत होने की मुद्रा 
 में उत्तर दिया |
             "आप चार -चार मीटर कपड़े के कुर्ते सिलवाएँ...खुद भी पहनें और 
 दस कुर्ते गरीबों में भी बाँट दें | आप तक कृपा दौड़ी चली आएगी |" बाबाजी 
 ने फिर लालबुझक्कड़ शैली में एक चमत्कारी उपाय बताया |
            ऐसे ही जब एक अन्य रचनाकार ने अपनी असफलता का रोना रोया
 तो बाबाजी ने उसका नाम पूछा | उसके द्वारा नाम  गोपाल बताए जाने पर 
 बाबा  उवाच-
         "आपके नाम पर कृपा नहीं जाएगी | आप अपना नाम 'कुमार गोपाल'
 रख लें | कुमारों पर कृपा जल्दी पहुँचती है |" ऐसे ही किसी नवोदित रचनाकार 
 को  सफ़ेद कागज  पर काली स्याही से तो किसी को पीले कागज़ पर लाल स्याही 
 से लिखने की; किसी को रचना भेजने के लिए कूरियर कंपनी बदलने की तो किसी 
 को अपना मेल आइ डी बदलने की सलाह दी | कुछ नवोदित लेखिकाओं ने भी 
 संपादकीय कृपा न होने के एकता कपूरी आँसू बहाए ! बाबा ने किसी को अपना
  नाम 'शीला' तो किसी को 'मुन्नी' रखने का मंत्र दिया | कृपादान के कारोबार से 
  बाबा पर लक्ष्मी मैया की अटूट कृपा बरसने लगी | मगर समागम के तीन माह 
  बाद भी जब किसी की कोई रचना नहीं छपी तो सृजन में काम आ सकने वाली 
  प्रसव पीड़ा आक्रोष में बदल गई | कुछ ने पुलिस में रिपोर्ट की तो कुछ ने अदालती 
  कारवाई   कर दी | 
         बाबा फरार हैं और नवोदित रचनाकारों को किसी नए कृपादानी गुरू का 
 इंतज़ार है | 
                                                   *** 

Sunday, 1 January 2012

दोहे, नईदुनिया (04/12/11)

व्यंग्य


                   सर जी की ईमानदारी 
                                             -ओम वर्मा 
ज़ब के ईमानदार हैं हमारे सर जी ! वे जहाँ खड़े हो जाते हैं, ईमानदारी वहीं से शुरू होती है | उनकी ईमानदारी पर भगवान सत्यनारायण सहित सारे देवी-देवता, यक्ष, किन्नर, गांधर्व सभी इतने खुश हैं कि आकाश से लगातार पुष्प वर्षा  कर रहे हैं | न तो उन्होंने कल पैसा  खाया था , न वे आज खाते हैं और हर देशवासी को भरोसा है कि न ही कल खाएंगे | वे हमारे बॉस जो हैं ! चूंकि उन्होंने आज तक कभी नौकर तक को नहीं डांटा, तो आख़िरी वक़्त में किसी से क्यों बुरे बनें ? "राम की चिड़िया राम का खेत, खाओ री चिड़िया भर भर पेट" उनके जीवन का शुरू से ही मूलमंत्र है इसलिए वे ईसा मसीह की तरह हर वक़्त ईश्वर से सिर्फ यही प्रार्थना करते रहते हैं कि "हे ईश्वर ! इन खाने वालों को क्षमा करना ! ये नहीं जानते कि ये क्या खा रहे हैं !"

वे ईमानदारी के विश्वामित्र हैं और बेईमानी की मेनका उनकी तपस्या भंग नहीं कर सकती | वे ईमानदार हैं और ईमानदारी उनकी परिणीता है | ईमानदारी की सावित्री को ईमानदारी के सत्यवान से कोई यमराज भी जुदा नहीं कर सकता | उन्हें ईमानदार सत्यवान की तरह चिंता है तो सिर्फ ईमानदारी की मूर्ति...अपनी सावित्री की | अपने ईमानदार प्रभा मंडल पर वे ग्रीक देवता नार्सिसस   की तरह आत्म मुग्ध हैं | सर जी जो कि एक पूरे मुल्क के राजा  हैं, उन पर चढ़ा ईमानदारी का आवरण  इतना सख्त व ओपेक (opaque) यानी अल्पपारदर्शक है कि उसके पार प्रजा का हाल  देख पाने में वे अभी असमर्थ हैं |

ईमानदार तो वे इतने अधिक हैं कि पिछले दो युद्धों में उनसे पराजित हो चुके सेनापति भी उन्हें ढीला-ढाला राजा कहने की हिम्मत तो कर लेते हैं, पर उनकी ईमानदारी पर उँगली उठाने की हिम्मत कभी नहीं कर पाए | बल्कि विपक्षी खेमों के सारे सेनापति भी अपने बच्चों, नाती-पोतों को उनकी ईमानदारी की कहानियाँ सुनाते हुए नहीं अघाते | 

वे ईमानदार हैं उस 'बाबा ' की तरह जिसने ब्रह्मचर्य व्रत  ले रखा है और जो स्त्री की छाया से भी कोसों दूर भागता है | उनका कोई संगी-साथी उनके ही सामने किसी अबला का चीरहरण कर रहा है और वे निस्पृह व शांतचित्त बैठे हैं | वे दुराचारी का वध करने में समर्थ हैं, पर इसका जोखिम वे इसलिए नहीं उठाना चाहते कि इस चक्कर में स्त्री स्पर्श से कहीं उनका ब्रह्मचर्य न टूट जाए !

वे ईमानदार हैं 'शोले' के ठाकुर की तरह जिसके हाथ दुराचारी गब्बर ने काट रखे हैं और दुर्भाग्य से इस ठाकुर की सहायता के लिए न जय मिल रहा है न वीरू ! हर कोई पूरे पाँच साल बसंती को कांच के टुकड़ों पर नचाना चाहता है | ईमानदारी के मामले में तो जनाब यदि थोड़ी गहराई से देखा जाए तो सर जी राजा हरीशचंद्र हैं, वो हरीशचंद्र जिनके सामने उनकी तारामती गिड़गिड़ा रही है, रोहित की मिट्टी खराब हो रही है, मगर ईमानदार हरीशचंद्र अपने फर्ज़ के आगे मजबूर हैं | वे हेमलेट की तरह 'टू बी ऑर नॉट टू बी ' के द्वंद्व में फंसे ईमानदार राजकुमार हैं जिसे मालूम है कि बाप का हत्यारा सामने है मगर मासूम प्रिंस हाथ बाँधे खड़ा है |
'जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन वैसी' की तर्ज पर वे ईमानदार हैं इसलिए वे स्टाफ और सारे सहयोगियों  में भी ईमानदार की छवि ही देखते हैं | जैसे भीष्म ने आजीवन अविवाहित रहने की प्रतिज्ञा की  थी, वैसे ही हमारे सर जी ने भी आजीवन किसी पर 'कार्रवाई ' न करने की शपथ ले रखी है | वे धृतराष्ट्र की तरह ईमानदार हैं जिन्होंने 'कुछ भी होते ' अपनी आँखों से देखा ही नहीं है तो किसी को दोषी कैसे मानें ? वे उस ईमानदार वणिक की तरह हैं जिसके लिए नौकाओं में भरा हुआ सारा माल-असबाब महज़ 'लता-पत्र ' ही है | कोई 'राजा बेटा ' या कोई 'दाड़ी वाला ' उसमें सेंध लगा भी दे तो क्या फर्क पड़ता है ?

वे इतने इमानदार हैं कि उनकी ही व्यवस्था के  विरोध में अनशन  करने वाले को भी वे फूल भेजना नहीं भूलते , भले ही उनका ही कोई सिपहसालार अनशनकारी को सिर से पैर तक भ्रष्टाचार में लिप्त घोषित कर चुका हो |
   
कल  उनकी  ईमानदारी के किस्से आल्हा-उदल की तरह राजघाट से लेकर जंतर-मंतर तक  गाए जाएंगे | जनपदों में  माताएं अपनी बेटियों को बिदाई पर उनकी तरह ईमानदार बने रहने की सीख देंगी | नैतिक शिक्षा की किताबों में उनकी ईमानदारी की कहानियाँ पढ़ाई जाएंगी ! लोग नत्थूलाल की मूंछ एक बार भूल जाएंगे पर हमेशा कहेंगे कि ईमानदार हो तो हमारे सर जी जैसा ...!                                                                                                           
                                                          ***

                       - ओम वर्मा
                                   100, रामनगर एक्सटेंशन
                                                              देवास
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Saturday, 8 October 2011

व्यंग्य - गरीबी रेखा के उस पार

                                                 (पत्रिका 04/10/2011)

-- व्यंग्य                
                                                      गरीबी रेखा के उस पार 
  वे सचमुच बड़े महान हैं | उन्हें देश की जनता का बार-बार प्रणाम है | उनमें कई पी.सी.सरकारों की आत्माएं प्रवेश कर गईं हैं | वे इतने मायावी हैं कि उन्होंने देश से एक झटके में गरीबी दूर कर दी है | वही गरीबी जिसके नाम पर कई चुनाव लड़े गए,वही गरीबी जिसको हटाते हटाते कई सरकारें हट गईं ...वही गरीबी अब सदन में दिए गए एक बयान के बाद एक झटके में ख़त्म हो गई है |
         गरीब यानी वह शख्स जो गरीबी की रेखा के नीचे गुजर बसर करता है ...लेकिन गरीब है कौन ? इस जटिल प्रश्न का हल फ्रांसीसी गणितज्ञ फर्मेट (Fermat) के उस अंतिम व  जटिल प्रमेय (Theorem) की तरह था जो वर्षों तक अनुत्तरित रहा | मगर योजना आयोग ने यह बताकर कि जो शख्स शहर में रहकर 32 रु. और गाँव में रहकर 26 रु. प्रतिदिन खर्च कर सकता है, वह गरीबी रेखा से ऊपर है.. यानी बीपीएल या गरीब नहीं है , वर्षों से चले आ रहे अनुत्तरित प्रश्न का हल आखिर खोज ही लिया है | 
         हमारे देश में कुछ लोगों को गरीब कहलाने या गरीब दिखने का कुछ ज्यादा ही शौक़ है | गरीबों की जमात में शामिल होकर ये लोग बिला वजह सरकार व योजनाकारों के लिए परेशानी पैदा करते रहे हैं | आज बत्तीस रु. तो बड़े शहरों का भिखारी भी कमा लेता है | तो देश में कहाँ बचा कोई गरीब ! सारे सुदामा एक झटके में गरीबी रेखा को पार कर गए हैं ! योजना आयोग ने कृष्ण सा मायावी रूप धारण कर उनके लिए महल न भी खड़े किए हों तो भी कम से कम एक मूल्य सूची पूरे भोजन मीनू के साथ जारी कर दी है | खबरदार ! कोई इधर से उधर हुआ तो ...136 ग्रा.चावल 3 रु....85 मिली. दूध 2  रु.30 पै.,90 ग्रा.प्याज, 180 ग्रा. आलू या कद्दू 1 रु.60 पै. में उपलब्ध हैं ( इन दुकानों को ढूढ़ने का थोड़ा परिश्रम आपको भी करना होगा ) ...जो इससे ज्यादा भाव लेगा उसके खिलाफ आतंकवाद के खिलाफ़ उठाए जा रहे कदमों जैसे 'ठोस' कदम उठाए जाएंगे |
        जिस योजना आयोग में दो महान अर्थशास्त्री मौजूद हैं उसकी बात पर हमें विश्वास करना ही होगा | अगर 32 रु. में  निर्वाह करने में किसी को जरा भी कठिनाई आएगी तो हर घर में कुंती के अक्षयपात्र की तरह  योजना आयोग के बयान या मूल्य सूची की एक-एक प्रति रखवा दी जाएगी ,  जिससे  की  अन्न का सिर्फ एक दाना ही सभी को मनचाहा सुख प्रदान कर देगा | सभी रचनाकर्मियों से भी अनुरोध है कि वे अब गरीब और गरीबी को बार बार भुनाना छोड़ दें | या गरीब के बारे में लिखने से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि उसकी आय सचमुच 32 रु. या ग्रामीण हो तो 26 रु. प्रतिदिन से कम ही है | इससे अधिक खर्च करने वालों पर आयकर का शिकंजा भी कसा जाना चाहिए | जैसे 32 रु.खर्च करने वालों के दिन फिरे , ऐसे दुनिया में  सबके फिरें...|    
                                                                                                                                                                                                                                                
                       - ओम वर्मा
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Tuesday, 20 September 2011

व्यंग्य सफल उड़ान पर तालियाँ

व्यंग्य 
                                    सफल उड़ान पर तालियाँ  

फ्रें कफर्ट से उड़ान भर कर 9 घंटे बाद हमारे  विमान ने  जैसे ही अमेरिकी समय के अनुसार शाम 3 .30  बजे वाशिंगटन के डलेस एयरपोर्ट की भूमि को छुआ कि विमान में मौजूद अमेरिकी यात्री ताली बजाने लगे | बाकी सब को सिर्फ उतरने कि चिंता थी | अंतर्राष्ट्रीय उड़ान का यह मेरा पहला अवसर था इसलिए मैं चौंका | बेटे ने बताया कि अमेरिका वासी प्रायः सफल लैंडिंग के लिए पायलट दल का इसी प्रकार आभार व्यक्त करते हैं | इसी प्रकार यहाँ  जब भी सिटी बस में यात्रा की तो देखा कि हर उतरने वाला यात्री ड्राईवर को 'थेंक्यु ' कहना नहीं भूलता |
            अच्छे आचरण का कहीं से भी अनुसरण किया जाना चाहिए | हम भी इसे अपनाएं तो क्या हर्ज है? जैसे रेलों में ही लें | हम कहीं से रेल में बैठें, और रास्ते में बिना लेट हुए, बिना पटरी से उतरे , बिना आगजनी या बिना  लूटपाट के या बिना नक्सली वारदात के अगर गंतव्य तक पहुँच जाते हैं तो क्या रेल विभाग वाले तालियों के हक़दार नहीं बन जाते ? बरसात के दिनों में जब नदी-नाले उफान पर हों,जमीन कहीं दिखाई न दे रही हो  ऐसे में अपनी जान जोखिम में डालकर पानी के प्रवाह में बस चालक सिर पर कफ़न बांधकर निकल पड़ता है | वह कोई कृष्ण नहीं है कि कोई नाग उसके ऊपर छत्रछाया कर देगा | बस उसे तो बस  पार लगाना है...यात्रियों के लिए नहीं बल्कि मालिक को हिसाब देने के लिए या दूसरी बस पहुँचे उससे पहले अपनी बस को लाइन  पर लगाना है | ऐसे में यात्रियों का भी फर्ज़ बनता है कि वे ड्राईवर-कंडक्टर का भरपूर तालियों से आभार मानें |
              कल जब  दिल्ली में लड़की घर से पढ़ने या काम पर जाने के बाद शाम या रात को सुरक्षित घर लौट आएगी तो माता-पिता समाज की 'विशिष्ट' शक्तियों का आभार मानने के लिए निश्चित ही तालियाँ बजाएंगे | जब भी किसान कहीं आंदोलन करें और उन पर पुलिस गोली न चलाए तो किसान जाने से पहले पुलिस का तालियों से शुक्रिया अदा करके ही जाएंगे |  कॉलेज के युवा पातालपानी या शीतलामाता फाल पर पिकनिक मनाने  जितने जाएं उतने ही वापस आ जाएं तो कॉलेज स्टाफ और परिजन  इन दिनों उनका तालियों   से ही स्वागत करते हैं | आटोरिक्शा चालक ढेर सारे बच्चों को स्कूल लेकर गया था, सकुशल वापस भी लाया है, उसके स्वागत में भी तालियाँ...! हमारी वायुसेवा के वे पायलट भाई जो नकली दस्तावेज के बल पर नौकरी पा गए हैं , फिर भी सफल लैंडिंग करते आ रहे हैं, उनके लिए तो यात्रियों को पूरी उड़ान के दौरान तालियाँ  बजाते रहना  चाहिए |
                   हमारे कुछ विशिष्ट राजनेता अपने 'अदभुत' बयानों से हर वक़्त हमारा मनोरंजन करते रहते हैं | कभी-कभार उनके लिए भी तालियाँ होनी चाहिए | सूत्रों के अनुसार दिल्ली में अफज़ल और मुंबई में कसाब हर शाम हमारी सरकार का करतल ध्वनि से ही आभार व्यक्त करते आ रहे हैं | सुना है कि  डायन महँगाई के होते भी लोग जिंदा हैं तो प्रतिदिन उनके लिए तालियाँ बजाने के लिए नई दिल्ली में बाकायदा एक नया विभाग कायम किया जा रहा है |   
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                       - ओम वर्मा
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Saturday, 4 June 2011

व्यंग्य ,पत्रिका (04 .06 .2011 )

मुंबई के मच्छर
बेहद परेशान हैं इन दिनों मुंबई के मच्छर !

           प्रेस व मीडिया को बार-बार सफाई देते फिर रहे हैं बेचारे | मुंबई  के  कुछ बड़े लोगों के अनुसार वहाँ मलेरिया बाहरी लोग, खासकर उत्तर- भारतीयों के कारण फेल  रहा है | यानी वहाँ के मच्छर 'काटने' में भेदभाव कर रहे हैं | जब उन्हें यकीन हो जाता है कि 'टार्गेट' मुंबईकर ही है तब ही वे उसे काटते हैं | परिणाम यह कि मलेरिया यदि होता है तो सिर्फ मुंबईकर को ही, बाहरी व्यक्ति को नहीं |
          ''मच्छर भाऊ! मैं तुमसे हिंदी में कुछ बात करूँ  तो तुम्हे कोई आपत्ति तो नहीं?'' गेटवे ऑफ़ इंडिया पर टहल रहे एक मच्छर से मैंने पूछा|
           ''भाषा तो आपने बनाई  है यजमान, हमने नहीं | आप जैसे चाहें बोलें | परजीवी कि क्या औकात जो अपनी भाषा होस्ट पर थोप  सके |''
          मच्छर परजीवी है व मनुष्य होस्ट | लिहाज़ा उसने मुझे यजमान कहकर  'होस्ट-पेरासाइट  रिलेशनशिप ' को गौरवान्वित किया और  भाषा का विकल्प अपने अन्नदाता पर छोड़ दिया|

          ''हाँ तो मैं जानना चाहता हूँ कि आपकी  वजह  से   सिर्फ मुंबई वालो को ही  मलेरिया क्यों होता है, या सिर्फ बाहरी लोगों द्वारा फैलाई जा रही गंदगी पर ही क्यों बसते-पलते हो ?''
          मच्छर भाई तिलमिला उठे |  "साहेब! जब से हम दुनिया में आए हैं तब से लेकर आज तक हम पर ऐसा घिनोना आरोप किसी ने नहीं लगाया कि हम भेदभाव करते हैं | चौबीस घंटो में हम आपसे एक-दो बूँद खून ही तो मांगते हैं | हमारा तो एक-सूत्री कार्यक्रम ही है 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें  मलेरिया दूंगा!" इतना कहकर वह कुछ पल रुका| फिर उड़ता हुआ एक भारतीय पर्यटक के पास गया, उसे काटा, लौटकर फिर मुझसे मुखातिब हुआ, "यह नारा हम हर नागरिक के आगे दोहराते हैं..., चाहे वह एनडीए का हो या यूपीए का, करूणानिधि का हो या जयललिता का, माओवादी हो या लोहियावादी, वाईब्रेंट गुजरात का हो या 'अविकसित'  बिहार का, धधकते कश्मीर का हो या शांत पड़े मध्यप्रदेश का !''
         मैं मच्छर की बुद्धिमत्ता पर चकित था| उसे प्रकृति ने जैसा बनाया वैसा ही आचरण कर रहा था | मच्छर चाहे महाराष्ट्र का हो या बिहार का, वह सिर्फ  'भिन...भिन...भिन' की ही भाषा जानता है | लिहाज़ा उसके इलाके में भाषाई विवाद का प्रश्न ही नहीं उत्पन्न होता | दो बूँद मानव रक्त यानी  उसके लिए 'दो बूँद ज़िन्दगी की'...! किसी मुग़ल सम्राट के बारे में मैंने पढ़ा था कि वह मलेरिया, यानी मच्छर की मेहरबानी से ही इस फ़ानी दुनिया से कूच कर गया था | सारे साक्ष्य यह चीख-चीखकर कह रहे थे कि उसका शिकार चाहे मराठी-मानुस हो या बिहारी-मिसिरवा, उसने सबको समभाव से देखा है| जो दंश का प्रतिरोध कर गया वह बच गया, जो नहीं कर पाया वह 'क्विट' कर
गया |
        मच्छर तो भैया कल भी थे, आज भी हैं...और कल भी रहेंगे | कोई भी गान्धर्व या किन्नर उनकी सत्ता को चुनौती नहीं दे पाया है | वे देशकाल की सीमा से परे हैं |