Sunday, 25 November 2012
Wednesday, 14 November 2012
व्यंग्य (नईदुनिया,14/11/12)
फटाके बीनने वाले ‘छोटू’और‘बारीक’
लक्ष्मी जी कल रात
अपना परंपरागत दीपावली भ्रमण पूर्ण कर पुनः कमल पर विराज गई हैं। इस बार की
आतिशबाज़ी और बाज़ार की रौनक देखकर उन्हें भी लगा कि इस जंबूद्वीप में बहुत समृद्धि
आ चुकी है। उन्हें आगे से शायद और दौरों की जरूरत नहीं
पड़ेगी। अब यहाँ आगे से कोई लेखक अपनी कृति का ‘जहाँ लक्ष्मी
क़ैद है’’ जैसा शीर्षक नहीं दे पाएगा और ‘बरोबर करने का धंधा करने वाले चोचलिस्ट’ (‘जिस देश में गंगा बहती है’ में राजकपूर का डाकुओं के
लिए कथन ) कोई और कारोबार करने पर मजबूर हो जाएँगे।
माते शयन प्रारंभ करने ही वाली थीं कि उनकी
नज़र तीन-चार बच्चों पर पड़ गई। बच्चों के तन पर दीवाली मना चुके बच्चों की तरह ‘ड्रेस’ नहीं, कपड़े थे; कंधों पर ‘बेग’ नहीं, थैलियाँ थीं, और पैरों में शूज़ नहीं बल्कि लूज़
चप्पलें थीं जिनका प्रायोजक ज़ाहिर है कि कोई और था। उनके कपड़ों से मुझे बचपन में
रामदुलारे सर की बेंत की मार याद आ गई जो श्रुत लेख में ‘मैली-कुचेली’ के स्थान पर ‘मेली-कुचेली’ लिख देने के कारण पड़ी थी। उनके सिर के बाल किसी रॉक स्टार या अलबर्ट
आइंस्टीन के बालों की तरह थे। वे प्रसिद्ध आर्कियोलाजिस्ट स्व. श्री वाकणकर की तरह
भूमि पर कुछ खोज रहे थे। अकस्मात एक लड़के को कुछ हाथ लगा जिसे लेकर पहले तो वह आर्किमिडिज़
के ‘यूरेका-यूरेका’ की तर्ज़ पर पारदर्शिता
के सिद्धांत का समर्थन कर रही रिक्त स्थान युक्त व ‘यूपीए’ की तरह अनेक थिगड़ों से निर्मित चड्डी की परवाह किए बिना ‘मिल गया-मिल गया’ चिल्लाता हुआ भागा, फिर उसे अपनी जेब में डाला। उसके हाथ एक बगैर फुस्स हुआ फटाका जो लग गया
था।
देश में ऐसे कई ‘छोटू’ और ‘बारीक’ हैं जो ‘दीवार’ फिल्म
की स्टाइल में भले ही आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाते हों मगर जिनके लिए दीवाली
का मतलब आज भी फेंके हुए या न चल पाए फटाके उठाना ही है। कचरा इनके लिए सचमुच
लक्ष्मी जी द्वारा भेजी गई कृपा ही है जिसके लिए उन्हें किसी भी बाबा के किसी भी
बैंक खाते में कोई शुल्क जमा नहीं करना पड़ता ! कचरे में से भी “सार सार को गही
लेय, थोथा देय उड़ाय...”
सूक्ति को चरितार्थ करते ये आशावादी बच्चे बत्तीस रु. रोज की गरीबी की सीमा रेखा
को भी ठेंगा दिखाते हुए अमावस्या को भले ही न मना पाए हों,
पर आज इन्हें दीवाली मनाने से वर्तमान व पिछली सरकार को जेब में रखने का दावा करने
वाला कोई अरबपति भी नहीं रोक पाएगा।
बच्चों के चेहरों पर जिस परमानंद की प्राप्ति
के भाव लक्ष्मी माता ने देखे वैसे रात्रि भ्रमण में उन्हें कहीं नहीं दिखाई दिए
थे। कुछ पल उन्हें निहारने के बाद उनके
हौसले को असीसती हुई आखिर वे कमलासन की ओर प्रस्थान कर ही गईं।
शुक्र है कि खुशी के कुछ पल चुरा लेने के
लिए थोड़ी स्पेस कुदरत ने आखिर इनके लिए भी तो छोड़ी है।
***
100,रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001(म प्र )
व्यंग्य(पत्रिका 14/11/12)
व्यंग्य
हाथी और चींटी
वे खुद को या कहें कि अपनी टोली को ‘हाथी’ मानते हैं और उनकी नाक में दम करने
वाले एक ‘सड़क छाप’ शख्स को ‘चींटी’ ...! चींटी है कि जरा भी डरने को
तैयार नहीं ! हाथी और उसके महावत को तो यही समझ में नहीं आ रहा है कि ये कम्बख्त
चींटी आखिर चाहती क्या है । हाथी चींटी को मसल के रख देने की बात या सीधे
शब्दों में कहें तो मारने की धौंस देता ज़रूर है, पर जितना वह चींटी पर धौंस जमाने की
कोशिश करता है,उतना ही अपना हाथीपना खोता जा रहा है
। हो सकता है कि किसी रोज हाथी हाथी न रहे और ‘सफेद हाथी’ बनकर रह जाए जिनकी देश में पहले ही
कोई कमी नहीं है ।
वो हाथी हाथी ही क्या जो मद में न आए ! और वो
चींटी चींटी ही क्या जिसके पर न निकल आएं ! फर्क़ सिर्फ इतना है कि हाथी जब मद में
आता है तो इतना विध्वंसक हो जाता है कि मार दिया जाता है, जबकि चींटी में पर आने का मतलब जीवनकाल पूर्ण होना भर है । खुद
को हाथी घोषित करने वाले सज्जन और उनके साथियों में जाहिर है कि मदमाने के लक्षण
बढ़ते जा रहे हैं।
हाथियों के साथ
दिक्कत यह है कि वे खाते भी जमकर हैं और उजाड़ते भी बहुत हैं । अपने वज़न से आधा वज़न
भी बड़ी मुश्किल से ढो पाते हैं । और खुद तो भरपूर जगह घेरते ही हैं दूसरों के लिए
कभी ‘स्पेस’रखना ही
नहीं जानते । वहीं चींटी अपने वज़न से कई गुना अधिक वज़न ढो सकती है । चींटियाँ ‘इकिडना’(Echidna)या ‘स्पाइनी एंट ईटर’ जैसे ऑस्ट्रेलियन स्तनपाई प्राणी के आहार के काम भी आती हैं । हाथियों का उजाड़ करने
में विश्वास है जबकि चींटी समाजिक सह जीवन की शिक्षा देती हैं ।
यह सही है कि किसी युग में एक हाथी के बच्चे ने
अपना शीश देकर भगवान श्री गणेश को नवजीवन दिया था । मगर आज के हाथी खुले आम दूसरों
के शीश काट लेने की धौंस देने लग गए हैं । मेनका गांधी के ‘जीव-दया’ आंदोलन से पूर्व हाथी सर्कसों के भी अनिवार्य अंग हुआ करते थे
जिसकी पूर्ति इन स्वयंभू हाथियों ने पिछले दिनों सर्कसों सी कलाबाज़ियाँ
दिखा-दिखाकर कर दी है। वे हाथी सचमुच किसी के साथी भी हुआ करते थे जबकि ये हाथी
फौज़ के उन पगलाए हाथियों की तरह हैं जिनसे खुद अपनी ही फौज़ के मारे-कुचले जाने का
अंदेशा बना हुआ है ।
हे प्रभु ! चींटियों से इन हाथियों की रक्षा करना
! मैंने सुना है कि अगर चींटी कान के रास्ते अगर हाथी की नाक में प्रवेश कर जाए तो
झूम-झूमकर चलने वाले गजराज को 'सड़क छाप' बनते देर नहीं लगती ।
Friday, 9 November 2012
दबंग दुनिया, 09/11/12
दो ग़ज़लें ओम वर्मा
एक
जिस तरह थामे कोई गिरती हुई दीवार को |
तसल्लियाँ वे दे रहे गिरती हुई सरकार को |
माना कि पैसे नहीं लगते किसी भी पेड़ पर,
फिर काटते क्यों नहीं खेतों की खरपतवार को |
यह तो हुई कुछ इस तरह की बात मेरे दोस्तों,
नाव में ही छेद हैं और दोष दें पतवार को |
बाहरी रंग-रूप घर का फिर सजाने के लिए ,
आज निकले हैं 'भियाजी' बेचने घरबार को |
हर शहर हर गाँव से आवाज आती है यही,
क्या हुआ है आज 'बूढ़े शेर' की ललकार को
***
दो
होते हैं घोटाले कितने |
छापें या कि उछालें कितने |
हमने अपनी आस्तीन में,
किंग कोबरे पाले कितने |
बेटों में खलबली, बाप अब
खाने लगा निवाले कितने |
देते हो हमको जो सिक्के,
खर्चें और बचालें कितने |
बात बात में लग जाते हैं,
हर पल मिर्च मसाले कितने|
इश्को-मुश्क और घोटाले ,
छुपे नहीं, हों ताले कितने |
ओम वर्मा <om.varma17@gmail.com>
100, रामनगर एक्सटेंशन , देवास 455001(म.प्र.)
Monday, 5 November 2012
व्यंग्य (पत्रिका, 05/11/12)
मंत्रीमण्डल में फेरबदल
ओम वर्मा
सारे घर में कोहराम
मचा हुआ था। रोज़ रोज़ आलू-गोभी और भटे की सब्ज़ी। बहू बेचारी करे तो क्या करे! कभी ससुर
नाराज़ तो कभी सास, कभी ननद नाराज़ तो कभी भौजाई...। पति ने तो आज
थाली उठाकर ही फेंक दी। यानी पत्नी पर इतना ज्यादा दबाव पड़ चुका था कि उसे सब्ज़ी
बदलने के बारे में गंभीरता से विचार करना पड़ गया। घबराई पत्नी ने अपनी माँ से राय
ली। माँ की सलाह पर बहू ने ससुराल में सब्ज़ी के मेनू में प्रस्तावित भारी फेरबदल
कर ही दिया। क्या था आखिर वो भारी फेरबदल? आलू-गोभी और भटे के
बजाय आलू-भटे और गोभी, और एक बार गोभी-भटे-आलू, किसी दिन भटे-आलू-गोभी, किसी दिन सूखे आलू-भटे-गोभी, किसी दिन गीले आलू-भटे-गोभी…।
कुछ ऐसा ही फेरबदल दिल्ली
में हुआ है। रामलाल को श्यामलाल की जगह, श्यामलाल को
पन्नालाल की जगह, और पन्नालाल को रामलाल की जगह...एण्ड सो
ऑन...! क्या ममता दी की धौंस का जादू है ये फेरबदल...या सलमान खुर्शीद की ऐतिहासिक
प्रेस कॉन्फ्रेंस का प्रतिफल..। या शायद प्रधानमंत्री जी प्रकाश जायसवाल की ‘पुरानी पत्नी के मज़ा नहीं दे पाने’ की शिक्षाप्रद
सीख से प्रभावित हो गए हों और इस कारण उन्हें अब पुराने मंत्रीमण्डल में मज़ा नहीं
आ रहा हो। वैसे भी ‘कोयला’ ‘महँगाई’ ;एफडीआई’ या ऐसे ही बार-बार उछाले जा रहे मुद्दों से जनता अब बोर हो चुकी है। नए
लोग होंगे तो कुछ नई बातें सामने आ सकती हैं। सलमान जी जब देश की कानून व्यस्था के मंत्री थे तब
उन्होंने खिलाफ बोलने पर आईएसी वालों को अपने इलाके में आए तो वापस न जाने देने की
अपनी शैली में धमकी दी थी। अब वे विदेशमंत्री हैं। मान लो
विदेश में किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कोई नया केजरीवाल सामने आ जाए और कुछ वैसे ही
खतरनाक सवाल पूछ बैठे, तब क्या उन्हें भारत से वापस न जा
पाने की धमकी दी जाएगी?
किसी भी सरकार के फेरबदल पर
विपक्ष वाले ये अवश्य कहते हैं कि नई बोतल में पुरानी शराब भर दी गई है। मगर आप यह
न भूलें कि बाकी सारी पुरानी चीजों को कुछ लोग भले ही बेमज़ा समझ लें, मगर रिंदों के अनुसार शराब जितनी पुरानी होगी उतनी ही ‘अच्छी’ या महँगी मानी जाती है।
नए मंत्रीमण्डल के सभी महानुभावों से निवेदन है
कि इतने भी ईमानदार मत बन जाना कि विपक्ष वाले, अखबारों में
व्यंग्य लिखने और आईएसी वाले हाथ पर हाथ
धरे बैठे ही रह जाएँ।
***
100,
रामनगर एक्सटेंशन, देवास
455001
Thursday, 25 October 2012
व्यंग्य (नईदुनिया, 25/10/12)
फर्रुखाबाद का
अघोषित वन-वे
ओम वर्मा
उनका दावा है कि हमारे यहाँ आकर
तो देखिए, जा नहीं पाओगे । कुछ लोग इस सीधी सादी बात पर 'हत्या की धमकी' की धारा में वाद लगाने की बात
कर रहे हैं तो कुछ इसे महज गीदड़ भपकी मान रहे हैं । कुछ इसे ऐसे वरिष्ठ सत्ताधारी की
बौखलाहट मान रहे हैं जो खुद तो किसी से कुछ भी पूछ सकता है या बोल सकता है, मगर आपकी किसी भी
बात का जवाब देना जिसके उसूओं के ख़िलाफ़ है । पता नहीं लोग क्यों हर बात में कुछ 'बोफोर्स' ढूढ़ने की कोशिश
करने लगते हैं और क्यों उनको दाल में पड़ा हर पदार्थ 'काला' ही नज़र आता
है । हर वक़्त काँटे ही काँटे क्यों देखे जाएं ... एक बार फूल का
जिक्र भी तो हो । मरुभूमि पर भी मेघ खोजा जा सकता है ।
कुछ जगहों व कुछ
लोगों में इतना आकर्षण होता है कि वहाँ गए व्यक्ति की वापस लौटने की कभी इच्छा ही
नहीं होती । जैसे अँगरेज एक बार जब भारत आए तो उन्हें यहाँ की आबो-हवा और यहाँ की
जनता कुछ ऐसी रास आई कि उन्हें वापस लौटने की याद ही नहीं आई । हो सकता है कि कुछ
ऐसी ही खासियत फर्रुखाबाद की मिट्टी में भी हो ।वहाँ के तो आलू भी बड़े प्रसिद्ध
हैं । और आलू स्वयं सामाजिक समरसता का ज्वलंत उदाहरण है । किसी में भी मिलने को
तैयार । या फिर यह भी हो सकता है कि फर्रुखाबाद की शानो-शौकत देखकर कोई 'सड़क छाप' व्यक्ति वहीँ रचने
बसने के लिए मजबूर हो जाए ।
वे आलाकमान के लिए
जान देने को तैयार बैठे हैं । धर्मों के अनुसार जान लेना या देना दोनों ही कर्म
हिंसा के पैमाने पर एक समान हैं । मैं आत्महत्या करूं तो ब्रह्महत्या और यदि
हत्या करूं तो भी ब्रह्महत्या । शायद उनका भी कुछ ऐसा ही नेक विचार हो । हो सकता
है कि उनके व्यक्तित्व और उनकी वाणी में कुछ ऐसा सम्मोहन हो कि वहाँ जाकर हम भी
वहीँ किसी'विकलांग' व्यक्ति का भला करने लग जाएं !
कहीं जाकर वापस न
आना तो एक प्राचीन परंपरा है । कृष्ण जब द्वारका गए तो वहीँ के होकर रह गए । इन
हज़रत का भी शायद कुछ ऐसा ही आशय हो कि उनका फर्रुखाबाद ऐसी पाक़ जगह है जहाँ जाने वाले
को अपने मूल स्थान,
दोस्त-अहबाब व माया मोह के बंधनों से
मुक्ति मिल जाएगी या दिला दी जाएगी और ऐसे में उसकी वापसी की क्या जरूरत !
फर्रुखाबाद आखिर को शहर ही है,
कोई राजनीतिक दल तो नहीं जहाँ आयाराम जी जब चाहें आएं और
गयाराम जी जब और जहाँ चाहें चले जाएं ! फर्रुखाबाद के सारे रास्ते अघोषित रूप से 'वन-वे' हैं जहाँ सिर्फ
अपनी मर्ज़ी से पहुँचा तो जा सकता है मगर वापसी का कोड सिर्फ 'उनके ' पास है ।
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100,रामनगर एक्सटेंशन , देवास 455001
Monday, 22 October 2012
व्यंग्य/ पत्रिका (22/10/12)
सलमान जी के पक्ष में
ओम वर्मा ये हमारे केजरीवाल जी को आखिर हुआ क्या है ? पंगा और वो भी क़ानून मंत्री से ! क़ानून जिनकी रग रग में है, जिन्होंने क़ानून की ऊँगली पकड़कर चलना सीखा, और जो बॉस के लिए जान देने का जज्बा रखते हों...उनकी टोपी उछालकर आपने अच्छा नहीं किया अरविंद भाई ! पूरा का पूरा आइएसी एक मासूम व निरपराध के हाथ धोकर पीछे पड़ गया है ! सलमान जी, उनकी बेगम साहिबा या उनके ट्रस्ट ने जो काम करके दिखाया है वह वाकई 'उत्तर आधुनिक' सोच वाला काम है । हमारे समाज में मृतक की स्मृति में कोई प्याऊ खुलवाता है तो कहीं अन्नदान करने का रिवाज़ है । उन्होंने किसी को मरणोपरांत 'हियरिंग एड' दिलवाया है तो क्या गुनाह किया ? इसे उनके द्वारा मृतक के पिंडदान या श्राद्धपक्ष में दिए जाने वाले 'ब्राह्मंण भोज' की तरह ही लिया जाना चाहिए !
अब वक़्त आ गया है कि इन घोटाले और जाँच के मुद्दों को महँगाई के मूल्य सूचकांक की तरह घोटालों के मूल्य सूचकांक से जोड़ें । यानी घोटालों का मूल्यांकन पर्सेंटाइल पद्धति से किया जाना चाहिए । जैसे भारतीय इतिहास के कोयला खदान घोटाले को जो कि पत्रकार संतोष भारतीय के अनुसार छब्बीस लाख करोड़ का बैठता है, उसे एक स्टैण्डर्ड या 100 प्रतिशत मूल्य का माना जाए । बाकी सारे घोटालों का प्रतिशत इसे आधार मान कर जोड़ा जाए । यानी परसेंटेज़ के बजाय हम पर्सेंटाइल की भाषा में बात करें । जाहिर है कि 71 लाख का घपला पर्सेंटाइल की इस स्केल पर अपनी औकात ढूढता नज़र आएगा । इतने कम पर्सेंटाइल पर सलमान खुर्शीद या मोहतरमा लुईस को भारतीय राजनीति के प्रतिष्ठित 'घोटाला महाविद्यालय' में प्रवेश हरगिज़ नहीं दिया जा सकता ।
हैदराबाद के निजाम जहाँ खड़े हो जाते हैं, अमीरी की ऊपर से नीचे की तरफ जाने वाली लाइन वहीँ से शुरू होती है । कुछ ऐसे ही फ़ॉर्मेट में यदि घोटालों का सूचीकरण किया जाए तो सलमान दंपति या उनका ट्रस्ट इत्यादि- इत्यादि तक ही सिमटकर रह जाएगा । हमारे बेनी बाबू ने कितने सहज ढंग से यह बात कही है कि सलमान जी लाखों का घोटाला कर ही नहीं सकते ...कभी करोड़ों में करते तो कुछ सोचा भी जा सकता था । रबर की तरह ढीली ढाली या घुमाने फिराने वाली बात न कहकर इस्पात मंत्री जी ने इस्पात की तरह ठोस इशारा किया है कि खबरों के जिन हिस्सों पर पचास लाख से तीन साल में तीन सौ करोड़ बनाने वाले दामाद जी का हक़ बनता है, वहाँ आप 71 लाख वालों पर क्यों फुटेज़ बर्बाद कर रहे हैं ?
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