Sunday, 3 March 2013


नईदुनिया, 03.03.13 में प्रकाशित 

पर्यटन
                  वन का यानी पचमढ़ी
                                                          ओम वर्मा
                                                        om.varma17@gmail.com
चपन में हिंदी का ककहरा सीखते समय पढ़ा था - वन का। वन यानी जंगल। पुस्तक में वन के नाम पर बने थे आठ- दस पेड़ और कुछ पशु-पक्षी। तब से मन के किसी कोने में एक जिप्सी आकार लेने लगा था। जिप्सी यानी खानाबदोश लोग या जातियाँ, या कहें कि यायावर...।
     जैसे – जैसे समय बीतता गया...मैं नौन‌‌- तेल- लकड़ी के गणित में उलझता चला गया। मन में बैठा यायावर कब कहाँ समाधिस्थ हो गया, पता ही न चला। तभी एक शाम को दिल्ली बस चुके उस घनिष्ठ मित्र का फोन आया। मेरे हलो कहने पर उसने कुछ गरिमामय शब्दों का प्रयोग करते हुए लताड़ा-
      “अबे घर पर क्या कर रहा है ?”
      “छुट्टी का दिन है, मजे में सोया हूँ...! तू कहाँ है ?”
      “अबे मैं इस समय पचमढ़ी में जंगल में मंगल यानी स्वर्ग का मजा लूट रहा हूँ। तीन दिन का प्रोग्राम  है  और ऐसे शानदार जंगल, पहाड़, वाटरफाल मैंने आज तक नहीं देखे। तूने पचमढ़ी देखा कि नहीं...?”
     “नहीं देखा यार...!
     “अच्छा हुआ जो नहीं देखा...! यहाँ पर इतनी ट्रेकिंग है कि तेरे जैसा बुड्ढा आदमी...।“
    “अबे बुड्ढा होगा तेरा बाप...!” मैंने गुस्से में फोन रख दिया। तुरंत नेट पर पचमढ़ी के जंगल, पहाड़ियों और होटलों की जानकारी ली। पत्नी व बिटिया के साथ उपलब्ध तिथि पर आने-जाने के टिकट व होटल बुक करवाए। 
      निर्धारित तिथि पर हम पचमढ़ी में थे। भोपल से 185 कि.मी. की दूरी पर होशंगाबाद जिले का पिपरिया रेल्वे स्टेशन। यहाँ से 54 कि,मी. दूर सतपूड़ा पर्वतमाला की गोद में बसा है पचमढ़ी। हरियाली का पर्याय है पचमढ़ी। समुद्र सतह से 1100 मीटर ऊँचा। लगभग 13 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैला। कई पहाड़ियाँ, झरने, कुछेक गुफाएँ और व वन का की सार्थकता का अहसास कराने वाला गहन, बल्कि गहनतम जंगल।
     कभी पढ़ा था कि गर्मियों में म.प्र. की राजधानी हुआ करता थी पचमढ़ी। हालांकि पिछले कई वर्षों से यह परंपरा बंद है। हम एक गाइड की सेवा प्राप्त कर भ्रमण का कार्यक्रम तय करते हैं। गाइड के अनुसार यदि आप सचमुच घूमना चाहते हैं, सारे प्राकृतिक दृश्य- सनराइज, सनसेट, वाटरफाल, सारे मंदिर, प्रियदर्शिनी पॉइंट... वगैरह देखना है तो कम से कम एक सप्ताह का समय चाहिए।  मगर  तीन  दिन  बाद  रिटर्न रिज़र्वेशन होने के कारण हमने गाइड की अपील ठीक वैसे ही ठुकरा दी जैसे कभी कभी दो खास देशों की टीमों के बीच हो रहे क्रिकेट मैच में साफ-साफ दिखाई देते हुए भी कोई विशेष अंपायर एलबीडब्ल्यू देने के लिए ऊँगली नहीं उठाता।
     एक थे कैप्टन जेम्स फॉर्सिथ। बंगाल के अश्वारोही दस्ते के मुखिया और पहाड़ों पर  घूमने  के शौकीन। 1857 में ये सज्जन अपने घुड़सवार दस्ते के साथ खोज बैठे पचमढ़ी। इनके खोजे इस शिखर का श्रीमती इंदिरा गांधी के विजिट के बाद से नाम रखा गया प्रियदर्शिनी पॉइंट। सच देखा जाए तो पचमढ़ी का मजा वे ही लूट सकते हैं जिन्हें ट्रेकिंग यानी पर्वातारोहण का शौक हो और जो बीपी, मधुमेह, हृदय रोग या अस्थमा से मुक्त हों। क्योंकि किसी भी स्पॉट पर 200 से 500 मीटर तक की ढलान या चढ़ाई मामूली बात है। और डचेस फॉल... जहाँ 800 मीटर तक उतार-चढ़ाव वाले दुर्गम पहाड़ी रास्ते पर जाना और आना...!
      “इस स्थान का नाम आखिर पचमढ़ी कैसे पड़ा ?, पूछने पर गाइड ने अपने अंदाज़ में तुरंत फरमाया –
     “साब, ऐसा है कि पाण्डव लोग जब वनवास पर थे तो एक वर्ष का अज्ञातवास इधर पचमढ़ी में ही गुज़ारा होता था साब ! इसमें छिप के रहने को उन्होंने पाँच गुफाएँ बनाई थीं। गुफाएँ यानी मढ़ी। ये है हिस्ट्री और पुराण की बात। और आर्कियोलोजी वाले केते हैं के साहेब ये 9-10 वीं सदी के बीच बनाई गई हैं...।“
     गुफाएँ देखकर वास्तव में अहसास हुआ कि पाण्डवों ने यहाँ या जहाँ भी वनवास काटा था, कितना टफटाइम रहा होगा ! यहीं पाण्डवों ने नागराज वसु की
पुत्री से विवाह भी किया था। (यह जानकारी नहीं मिल पाई कि वसुकन्या भी द्रोपदी वाली स्थिति में थी या उसने पाँच में से किसी एक भाई का ही वरण किया था।) गुफाओं में भ्रमण करते समय मैं स्वयं को धनुर्धारी अर्जुन और पत्नी को द्रोपदी  समझने  लगा !  मगर  तुरंत ही स्वयं की हैसियत पाँच में से एक वाली लगी तो मेरा मन यथार्थ के धरातल पर लौट आया। बहरहाल, गुफाओं से नीचे बने पाण्डव उद्यान और आसपास की पहाड़ियों को देखना एक स्पिरिचुअल  एक्स्टेसी   यानी आध्यात्मिक  चरम आनंद की फीलिंग से भर  देता है।  
     शिव के मंदिरों के लिए भी जाना जाता है पचमढ़ी। एक मंदिर है नागद्वार में। नागपंचमी पर यहाँ विशाल मेला लगता है और महाराष्ट्र के लाखों श्रद्धालु  दर्शन करने यहाँ आते हैं। धूपगढ़ नामक चोटी से नागद्वार की 18 किमी की दुर्गम स्थल की यात्रा करना पड़ती है। ऐसा ही एक जटाशंकर मंदिर है जहाँ पहले सिर्फ रस्सियों के सहारे जाया जा सकता था। सन् 1930 के बाद वहाँ सिमेंट की सीढ़ी बना दी गई।
     ऐसा ही दुर्गम स्थान है चौरागढ़। यह स्थान इतना सुंदर है कि जो भी यहाँ पहली बार आता है, दूसरी बार आने का संकल्प अवश्य लेता है। दो अन्य मंदिर बड़े महादेवगुप्त महादेव भी हैं। पहाड़ियों के बीच बने इन शिव मंदिरों के पास ही एक गहरी खोह है जिसे हांडी खोह कहते हैं जहाँ ऊपर से देखने पर बड़े बड़े वृक्ष भी बौने प्रतीत होते हैं। 300 फीट गहरी खोह खड़ी चट्टान की ढलानदार बनावट और जल की कलकल ध्वनि से मंत्रमुग्ध कर देती है। हांडी नामक अंग्रेज ने यहाँ कूदकर आत्महत्या की थी। उसी के नाम पर इसका नाम खांडी खोह पड़ा।

     इन्हीं पहाड़ियों से गुजरकर 1250 सीढ़ियाँ चढ़कर चौरागढ़ की पहाड़ी पर स्थित शिव मंदिर पहुँचा जा सकता है। यहाँ श्रद्धालु भगवान शिव को फूल के साथ एक किलो से  लेकर  एक  क्विंटल  तक  वज़न के त्रिशूल भी चढ़ाते हैं। इसी मार्ग पर बड़े महादेव विराजित हैं जिनकी गुफा 25 फीट चौड़ी और 60 फीट लंबी है। गुफा में छतों से सतत टपकता जल मानों भगवान शिव का जलाभिषेक करता है। सामने ही एक पवित्र कुण्ड है जिसे भस्मासुर कुण्ड कहते हैं। भस्मासुर की कथा यहाँ के तीन धार्मिक स्थल- चौरागढ़, जटाशंकर, और महादेव गुफा से जुड़ी है।
     बड़े महादेव से करीब 400 मीटर दूर एक सँकरी सी गुफा है। गाइड के अनुसार यह गुप्त महादेव का निवास स्थल है। इस गुफा में एक बार में ज्यादा से ज्यादा आठ व्यक्ति प्रवेश कर सकते हैं। टॉर्च साथ न लाए हों तो वहीं किराए की भी मिलती है। अंदर रोशनी के नाम पर मात्र एक टिमटिमाता, लुपझुप करता बल्ब ही है। वापसी में राजेंद्रगिरि नामक स्पॉट से सूर्यास्त का अद्भुत दृश्य देखा जा सकता है।
     और अब बात वाटरफॉल्स की ! एक दिन में सारे जल-प्रपात देखना संभव नहीं है। पहले दिन दो फॉल्स देखे जा सकते हैं। पहला झरना सिल्वर फॉल पहाड़ों पर दूर से ही देखा जा सकता है। यही आगे जाकर बन जाता है जमुना-प्रपात जिसे मधुमक्खियों की बहुतायत के कारण बी फॉल नाम भी दिया गया है। इसकी खूबसूरती बयान करने के लिए मैं अपने शब्द सामर्थ्य को बड़ा क्षुद्र पाता हूँ। यहीं सबसे ज्यादा पर्यटक आते हैं। गाइड बड़े फख्र से बताते हैं कि यहाँ व कुछ अन्य स्पॉट्स  पर  शाहरुख  खान  की फिल्म अशोका की शूटिंग हुई थी। पचमढ़ी का
मुख्य जल स्रोत भी यही है। करीब 150 फीट की ऊँचाई से गिरती जलधारा को कितना भी देखो, जी नहीं भरता और धारा के नीचे नहाने का लोभ भी कोई संवरण नहीं कर पाता। दुर्गम पहाड़ी पथ पर पैदल चलने की कुछ थकान गिरती जलधारा को देखकर और कुछ उसमें  नहाने के बाद कम हो जाती है।
       तीसरे दिन जाते हैं धूपगढ़ और डचेस फॉल। पचमढ़ी से लगभग 12 किमी दूर है धूपगढ़। 4429 फीट ऊँचा धूपगढ़ पचमढ़ी का ही नहीं बल्कि पूरे म.प्र. का सर्वोच्च शिखर है। यहाँ बादल नीचे तैरते दिखाई देते हैं। इस कारण यहाँ सूर्य पहाड़ों के पीछे नहीं छुपता बल्कि ऐसा लगता है मानों बादलों से ही लुकाछिपी खेल रहा है। चारों और धुँध की चादर मन मोह लेती है।
      और अब चलते हैं पचमढ़ी के सबसे दुर्गम स्पॉट -डचेस फॉल”। यह स्पॉट सिर्फ ट्रेकिंग और एडवेंचर पसंद करने वालों के लिए ही है। इसके लिए बेहद कठिन और घुमावदार रास्तों से होकर गुज़रना पड़ता है। फॉल का मार्ग शुरू होने के करीब आधा किमी पहले रुककर हमें पैदल जाना होता है। फिर जंगल की सात-आठ सौ मीटर लंबी उतार-चढ़ाव वाले पथरीले मार्ग की यात्रा। फिर जबर्दस्त ढलान। आगे बढ़ने से पहले बोर्ड पर लिखी चेतावनी पढ़ता हूँ- “वृद्धजन तथा मधुमेह, बीपी, अस्थमा, व हृदय रोगी न जाएँ। मधुमेह, अस्थमा, व हृदय रोग मुझे नहीं है। बीपी की एक सामान्य गोली रोज ले लेता हूँ और वृद्ध शब्द पढ़ते ही मुझे मित्र को किया चैलेंज “बुद्धा होगा तेरा बाप...” याद आ जाता है। मैं चल पड़ता हूँ डचेस फॉल के लिए ! मगर जाते समय वर्षों पूर्व स्वर्गवासी हो चुकी नानी याद आने लगती  है,  और  वापसी  में  नानी  की भी नानी याद आ जाती है। घर लौटकर तीन दिन तक गुल्ले भरा जाने के कारण दर्द के मारे मेरी चाल कुछ ऐसी हो जाती है मानों काया का रोबोटीकरण हो गया है।
       यत्र-तत्र पहाड़ियों के लाल बरुआ पत्थर, शैलाश्रय और शैल चित्रकारी देख मन में आदिम युग की तस्वीर रंग भरने लगती है। 500‌ - 800 ई. के बीच की न मिटने वाली चित्रकारी... जिसमें किसी में स्त्री पुरुष को गिरफ्तार करते हुए दिखाई गई है तो किसी में भैंसा, तेंदुआ और कुत्ते के चित्र हैं। शुद्ध प्राकृतिक  रंग...जस के तस...! किसी किसी के बारे में पुरातत्व वालों का दावा कि वह 10,000 वर्ष पूर्व की है। सफेद और लाल रंग से दीवारों पर उकेरे गए योद्धाओं के चित्र...!
     अब चलें चर्च में। प्रोटेस्टेंट व कैथोलिक चर्च। ईसा मसीह व माँ मरियम की शानदार मूर्तियाँ। शानदार ग्लास पेंटिंग्स। इसे सिर्फ चर्च व्यस्थापक की अनुमति से ही देखा जा सकता है। और यह है पचमढ़ी झील जहाँ कई युगल पैडल बोटिंग करते देखे जा सकते हैं।
     अतिशयोक्ति नहीं होगी, अगर मैं कहूँ कि पचमढ़ी का हेंगओवर अभी भी नहीं उतर रहा है। प्रकृति कभी मानवी रूप लेकर मेरे सामने आ जाए तो पूछूँगा कि तूने पचमढ़ी में ही इतनी सारी सुंदरता एक साथ क्यों उड़ेल दी ?                  
           ***  

Thursday, 10 January 2013


व्यंग्य (पत्रिका, 01.01.13)
              शुभकामनाओं के बहाने !

                     ओम वर्मा om.varma17@gmail.com
मैंने उसे और उसने मुझे, दी नव वर्ष की शुभकामनाएँ ; हालांकि हम दोनों वर्ष भर एक दूसरे के कभी काम न आए !
     बहरहाल, देश की सारी अबोध बालिकाओं से लेकर वयस्क महिलाओं तक को मेरी नव वर्ष की शुभकामना ; प्रभु करे न हो कभी उनका बलात्कारी गेंग से कहीं भी सामना ! किसी प्रदेश की छह करोड़ जनता जिसे तीन बार मान चुकी हो अपना सिरमौर ; उसे कोई नव वर्ष में नहीं कहे बंदर, राक्षस या आदमखोर ! नए वर्ष में सब्सिडी वाले गैस सिलेंडरों की संख्या में हो जाए पर्याप्त वृद्धि ; मेरी सरकार को देना प्रभु ऐसी सद्बुद्धि ! नहीं हो अब किसी कन्या भ्रूण का गर्भ में ही    अंत ; नहीं  पैदा हो फिर कोई व्याभिचारी संत ! नहीं लगाए फर्रुखाबाद में अब कोई किसी के आने पर रोक ; नहीं बन सके इंडिया गेट कभी तहरीर चौक ! नहीं चढ़े होरी के सर पर कोई नया उधार ; देश की अर्थ व्यवस्था में कुछ ऐसा हो सुधार ! नए वर्ष में टूट जाए पापाजी का मौन ; वे पहचान सकें कलमाड़ी और राजा है कौन ! नहीं डुबाए सास का नाम कोई दामाद ; भ्रष्टाचार की जड़ों में नहीं लगे और खाद ! नहीं करे कोई नई - पुरानी पत्नी में भेद ; नहीं कर पाए कोई कसाब  सुरक्षा  व्यवस्था  में  छेद ! नहीं  लगे पेट्रोल डीज़ल की कीमतों में फिर  आग ; नहीं छीन सके गरीबों के मुँह का निवाला एफडीआई रूपी काग ! संसद के सत्र चलें बिना व्यवधान ; करना कुछ ऐसा करुणानिधान ! नहीं करे फिर कोई किसान आत्मोत्सर्ग ; तभी होगा नए वर्ष में देश मेरा स्वर्ग ! फेस बुक पर पोस्ट करने पर नहीं हो फिर से किसी लड़की की गिरफ्तारी ; तभी समझूँगा खत्म हुई नव वर्ष में सांप्रदायिकता की बीमारी ! बाबा रामदेव की काले धन की माँग नहीं रहे अधूरी ; सब मिलकर करें इसे नव वर्ष में पूरी। नहीं तड़पे कोई रोहित पाने को बाप का नाम ; नर होकर नारायण को कोई अब और न करे बदनाम ! सभी भूले भटके लक्ष्मण लौट आएं अपने राजा राम के द्वार ; ताकि दलबदल के कारण नहीं हो फिर से किसी के करियर का बण्टाधार ! नहीं खले कमी कभी सचिन की नए साल ; कोई नया सचिन आए और दिखाए वो कमाल ! फिर कोई भाई यदि करे गलती इस साल ; आए फिर कोई शर्मिष्ठा बन कर उसकी ढाल ! नहीं जाए व्यर्थ दामिनी की वो क़ुर्बानी ; नए साल में मर जाए उनकी आँख का पानी ! यदि नहीं मिलेगा पहली जनवरी को मुझे खून की स्याही से छपा अखबार ; तभी बनवाऊँगा तुम्हारे लिए
गत और तोरण का बंदनवार !
    और अंत में यही कि नहीं फिसले बार बार फिर नेताओं की जुबान ; नए वर्ष में सभी नेताओं को ऐसी सद्बुद्धि देना श्रीभगवान !
                        *** 
 100, रामनगर एक्स्टेंशन, देवास ,455001(म.प्र)     


व्यंग्य (नईदुनिया, 27.12.12)  
                       राज और नीति

                                                              ओम वर्मा          om.varma17@gmail.com
राजनीति में दो तरह के लोग होते हैं – एक वे जो सिर्फ राज करना चाहते हैं; या स्वयं  ऐसा समझते हैं कि वे सिर्फ राज करने के लिए ही बने हैं और चाहें तो रात के बारह बजे से राज करना शुरू कर सकते हैं। या फिर  “भियाजी लाओ-देश बचाओ ” के नारे सुन-सुनकर जब उनके कान कार्बाइड से पके फलों की तरह समय से पहले ही पकने लग जाएँ तो उनको “सती माता की जयजयकार “ के नारों के बीच पति की मृत्यु शैया पर सती होने को बाध्य कर दी गई सती माता की तरह मजबूर होकर उचित स्थान ग्रहण करना ही पड़ता है। इन लोगों ने अपनी आँखें खुलते ही परिजनों को सिर्फ लोगों के सलाम स्वीकार करते, गरजते-बरसते या कभी कभार लोगों या सभाओं को संबोधित करते भी देखा है। राजनीति का राज इनके लिए बाँहें फैलाए खड़ा होता है और नीतियाँ हमेशा इनकी अनुगामिनी होती हैं।
        राजनीति व्याकरण की दृष्टि से वह समास है जिसका पहला सामासिक पद राज कुछ गिने चुने लोग या घराने हथिया चुके हैं। बचा दूसरा पद नीति जिसे कुछ लोगों ने कुछ ऐसा जकड़ या पकड़ रखा है कि किसी क़ीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं हैं। ये लोग राजनीति में आए या आना चाहेंगे तो सिर्फ नीति के कारण। नीति ही इनका इश्क़ है, नीति ही इनका ईमान है। ये अपने जैसा दूसरों को भी बनाना चाहते हैं। नीति इनका साध्य है और धरना, घेराव, प्रदर्शन, पुतला-दहन या फिर सवाल-जवाब इनके साधन। कल गांधी और जेपी बनकर ये लोग पहले वालों की नाक में दम करते रहे और आज भी उनके कुछ वंशज हैं जो कुछ ऐसी ही छुट्पुट वारदात करते रहते हैं। ऐसे एक बाबाश्री ने योगाभ्यास से पहले देश का शारीरिक घोटाला उजागर किया, फिर काले धन की वापसी की माँग करके  आर्थिक घोटाले की खबर ली। मगर खानदानी लोगों से पंगा लेने के चक्कर में उन्हें भेस बदलकर गधे के सिर के सींग बनना पड़ा।
           राज करते हुए नीतियों की भोंगली बना कर दादाजी के जमाने में आने वाली चिट्ठियों की तरह दीवार के किसी छेद में खोंस कर रख देने वालों से भिड़ने एक और बाबा आए। इन बाबा की भी यही जिद कि सारे घर के बदल डालूँगा । उधर राज वाले हैं कि टस से मस होने का नाम नही ले रहे और उधर नीति वाले हैं कि उन्हें लाइन पर लाने के लिए अपनी नीतियों पर ही पुनर्विचार करने पर मजबूर हो गए है। इधर नीति अनुगामियों से अलग होकर एक चमत्कारी सज्जन ने जब इनकी पोल खोली तो उनके मन में लड्डू फूटने लगे और इन सज्जन में उन्हें वैतरणी पार करवाने वाली कामधेनु की अदृष्य पूँछ नज़र आने लगी। मगर कामधेनु यकायक ब्रम्होस मिसाइल में तब्दील होकर इन के बजाय उन का भी लक्ष्यभेद करने लगी तो सारे इन से लेकर उन तक को समझ में नहीं आया कि आखिर ये भिया हैं किनकी तरफ?
               आने वाला समय राज वालों का होगा कि नीति वालों का...यही देखेंगे, भुगतेंगे या सहन करेंगे हम लोग...!                                                                                                                                                                ***









        

Saturday, 29 December 2012



व्यंग्य , पत्रिका (28/12/12)
            लकीर पर चिंतन

         ओम वर्मा om.varma17@gmail.com

साँप निकल चुका था। चिंतन जारी था। सबके हाथों में बड़ी बड़ी लाठियाँ थीं। इतने धुरंधरों के होते साँप आखिर बच कर कैसे निकल गया। जवाब देना मुश्किल हो रहा था। माहौल कुछ ऐसा था कि सामूहिक बलात्कार पर बहस में भाग लेते समय भी जिनकी मुस्कराहट गायब नहीं होती थी आज उन्होंने भी गंभीरता औढ़ रखी थी। एक राज्य में तीसरी बार उनकी हार हुई थी और परंपरानुसार बिखरे दूध पर रोया जा रहा था। साँप की छोड़ी गई लकीर पर लाठियाँ भांजी जा रही थीं। हार का ठीकरा फोड़ने के लिए सही सिर तलाशा जा रहा था।
मैंने उसको बंदर कहा था पर शायद लोगों ने उसे हनुमान समझ लिया।एक चिंतक ने कहा।
मैंने तो उसे राक्षस कहा था पर ये लोग उसे राक्षस मानने को तैयार ही नहीं हो रहे हैं।दूसरे चिंतक ने दूर की कौड़ी पेश की।
मैडम ने पहले ही उसको आदमखोर बता दिया था, पर शायद लोगों ने माखनचोर सुन लिया होगा।सिर्फ अपने अद्भुत बयानों के कारण चर्चा में बने रहने वाले एक अन्य आधार स्तंभ ने यहाँ भी वफादारी प्रदर्शन का मौका नहीं छोड़ा।


हम भी उसके मुकाबले के लिए अपने युवराज को लाए थे...कहीं ऐसा तो नहीं कि अपने युवराज की एक्सेप्टिबिलिटी उनके मुकाबले पब्लिक में कम हो ?” एक कम चर्चित पार्टीमेन ने दबी जुबान से थोड़ी हिम्मत करके अंधों की बस्ती में आईने ले लो जैसी आवाज निकालने की कोशिश की।
ये कौन बद्तमीज़ घुस आया है..!एक भियाजी किस्म के कार्यकर्ता ने हाँक लगाई। इतने में बाकी लोगों ने युवराज की स्वीकार्यता पर शंका उठाने वाले ‘विद्रोही’ को अस्वीकार करते हुए टांगा-टोली कर सीधा वानप्रस्थ आश्रम दिखा दिया।
नहींहमारी हार का असली कारण ‘थ्री डी’ टेक्नॉलाजी है जिसके न होने से जहाँ हमारे युवराज एक बार में एक ही जगह दिखते थे वहीं वो किशन कन्हैया की तरह रास लीला में एक दो नहीं पूरे छब्बीस स्थानों पर  गोपियों को अपने अपने साथ नज़र आते थे।“
हार का ठीकरा फोड़ने के लिए सर की तलाश पूरी हुई। छ्ह करोड़ लोग आखिर क्या चाहते थेइस बारे में कभी बाद में सोचेंगे।
***
100, रामनगर एक्सटेंशनदेवास 455001(म.प्र.)
मो.
09302379199

शीत लहर-एक शब्द चित्र - मौसम का बिगड़ा मिज़ाज


व्यंग्य                                                                                        

     शीत लहर-एक शब्द चित्र
             
               
          मौसम का बिगड़ा मिज़ाज
थाशिल्पी प्रेमचंद की कहानी- पूस की रात...!
     ठण्ड से ठिठुरता हल्कू...और ताने मारती मुन्नी...! बार बार कोसती रहती है कि वह इफरात में खर्च न करे ताकि कुछ बचत हो सके और कम्मल खरीदा जा सके ताकि पूस-माघ ढंग से कट सकें।  
     अब परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं। कंबल हर घर में है। मगर फिर भी ये सर्दियाँ जानलेवा साबित हो रही हैं। मुन्नियाँ हल्कुओं को कोस रही हैं- “ठण्ड भगाने के लिए कुछ करो...कहा था कि रजाई भारी बनवाना...बनवा लाए चादरे जैसी...! रूम हीटर ही ले आते तो कमरा ही थोड़ा गर्म हो जाता !”
     अब इन मुन्नियों को कौन समझाए कि ठण्ड भगाने के लिए यदि रूम हीटर चलाए गए  तो  बाद  में  बिजली  का बिल देखकर दिमाग पर जो गर्मी चढ़ेगी, उसे उतारने के लिए किस्तों पर एयर कंडीशनर बेचने वाली दुकान ढूढ़ना पड़ेगी।
     आखिर मौसम का मिज़ाज इतना बिगड़ा हुआ क्यों है? क्यों न इन वैज्ञानिक महोदय से ही पूछ लिया जाए।  अरे  ये  क्या ! इन्होंने  तो  अपना हुलिया ही बदल डाला है। फ्रैंच कट दाड़ी गायब है...अंधत्व निवारण शिविर से थोक में ऑपरेशन करवा कर लौटे रोगी की तरह काला चश्मा लगा रखा है और सूट टाई पर शाल
 लपेटे घूम रहे हैं। लेकिन जनाब भले ही लाख पर्दों में छुप जाइएगा...नज़र आइएगा ...नज़र आइएगा...! तो आखिर अलाव तापते रँगे हाथों पकड़े ही गए !
     “कहिए जनाब ! ये शीत लहर आखिर कब तक चलती रहेगी ?”
     “ दरअसल ये ग्लोबल कूलिंग हो रहा है !”
     “लेकिन कल तक तो आप ग्लोबल वार्मिंग के नाम से डरा रहे थे और मुंबई जैसे तटवर्ती शहरों का डूबने का खतरा बता रहे थे...!”
     “मेरा मतलब यह नहीं था...वास्तव में मीडिया ने हमारे बयानों को गलत ढंग से प्रस्तुत किया था !” मेरे देखते ही देखते एक अच्छे खासे मनुष्य का गिरगिटीकरण होने लगा।
     अपने राम को न तो वैज्ञानिकों की बात समझ में आती है, और न ही ज्योतिषियों की। ज्वलंत विषयों पर दोनों वर्गों के लोग जो भविष्यवाणी करते हैं, वह प्रायः फेल हो जाती है। बाद में ये अपनी गणनाओं की त्रुटि का कारण बताने लगते हैं या फिर “हमारा मतलब यह नहीं था...” जैसी बेमतलब की लीपापोती करने लग जाते हैं।
     लाख टके की बात तो यह है कि आखिर इस जमा देने वाले जाड़े से निजात मिले तो कैसे ? अपने बयानों से आग लगाती रहने वाली फायर ब्राण्ड नेत्रियों और ऐसे ही कुछ अन्य बयानवीरों से मैंने पूछा तो उन्होंने मंजूर किया कि वे वैचारिक आग तो लगा सकते हैं मगर भौतिक रूप से गर्माहट नहीं उत्पन्न कर सकते !
  आज समाज में बहस, चिंता, या सफर में अपरिचितों के बीच बातचीत के मुद्दे बदल चुके हैं। कल तक जो लोग राह चलते को रोक कर पूछ लेते थे “भाई नया घोटाला कब सामने आ रहा है”, आज पूछते हैं कि “नए टोपे दुकानों पर आए या नहीं, या “ये स्वेटर कहाँ से लिया, या “आखिर ये ठण्ड कब खत्म होगी यार…?” हिंदी की प्रसिद्ध कहानी उसने कहा था मुझे याद आने लगती है—लहनासिंह के साथी ठण्ड से इतने परेशान हो गए हैं कि चाहते हैं कि जंग हो ताकि कुछ गर्मी ही आए !
     सुबह जिसे देखो वही कुछ कम हाइट वाला नज़र आता है। क्या लोगों की औसत ऊँचाई एक-दो इंच कम हो गई है ? जी नहीं। ध्यान से देखने पर समझ में आता है कि हर शख्स सिकुड़कर गुड़ी-मुड़ी होकर चल रहा है। मिलते ही तपाक से हाथ मिलाने वाला शख्स देखकर मुँह फेर रहा है कि कहीं गलती से जेब की गर्मी छोड़कर हाथ बाहर न निकालना पड़ जाए। गलती से अगर उन्हें हाथ मिलाना भी पड़ जाए तो बहुत देर तक हाथ छोड़ते ही नहीं, मानो उष्मा के परिवहन के सिद्धांत को आज ही सिद्ध करना चाहते हों।
     चौराहे पर देखता हूँ कि पुतलेनुमा किसी वस्तु पर आग लगाई जा रही है। शायद कोई विरोध प्रदर्शन है। मगर तुरंत ही मेरी सारी गलतफहमी दूर हो जाती है। देखता हूँ कि न तो कोई नारेबाज़ी हो रही है और न कहीं कोई झण्डा या बैनर दिखाई देता है। यह तो ठण्ड भगाने का इंतजाम है। जिन्हें मैं प्रदर्शनकारी समझे बैठा था वे और खाकी वर्दी पर चादर लपेटे दो पुलिस के जवान मिलकर हाथ सेंकने का उपक्रम करने लगते हैं।
     धर्म, जाति, और छोटे मोटे स्वार्थों के पीछे उलझ पड़ने वाले लोग या समूह फिलहाल कम से कम इस बात पर तो एकमत हैं कि अमेरिका जैसा देश चाहे मंदी की गिरफ्त में हो, हम इस समय ठण्डी की गिरफ्त में हैं। मुझे लगता है कि जैसे भोपाल के यूनियन कार्बाइड में किसी की गलती से मिक गैस के टैंक का वॉल्व खुल गया था, वैसा ही शायद ऊपर वाले के दरबार में कोई मौसम का स्विच चेंजओवर करना भूलकर गर्ल फ्रैण्ड से मोबाइल पर गप्पें लगाने चला गया है। नीचे वाले मरें तो मरें उसकी बला से !
     घर के कबाड़खाने से झाड़-पोंछकर अँगीठी ढूढ़ निकाली गई है। आखिरी समय में खोटा सिक्का ही तो काम आता है। लकड़ी के कोयले की टाल ढूढ़ ली गई है। शाम को टीवी के सामने इकट्ठे होने के बजाय अलाव के आसपास पंचायत जुड़ने लगी है।
     सुबह हो गई है। दरवाजे पर पेपर फेंकने की आवाज आ चुकी है। कोई भी भागकर पेपर झपटने को तैयार नहीं है। रजाई कौन छोड़े ! आज संडे है। किसकी हिम्मत जो आठ से पहले मुझे उठा सके। घर के वरिष्ठ नागरिक यानी पिताश्री अखबार के बगैर छटपटाने लगते हैं और शाल, टोपे और मौजों के जिरह बख्तर से लेस होकर अखबार उठाने चल देते हैं। बच्चे खुश हैं कि स्कूल का समय बढ़ा दिया गया है। श्रीमती जी कुढ़मुढ़ा रही हैं कि बाई आज भी आती दिखाई नहीं देती।
     सुबह सुबह स्कूलों में बच्चे मुँह से वाष्प छोड़कर धूम्रपान की नकल करने लगते हैं। क...क...किरण बोलने वाले इस शख्स को आप शाहरुख खान समझने की भूल न करें। दरअसल ठण्ड के मारे इसके दाँत किटकिटा रहे हैं। भियाजी बड़े खुश और गणित के पक्के हैं। पारा प्रतिदिन जितना नीचे जाने लगता है, उससे निपटने के लिए वे अंगूर की बेटी से उतनी ही निकटता बढ़ाने लगते हैं। ठण्ड से सबकी अपने अपने ढंग से जंग जारी है।       
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Wednesday, 19 December 2012



व्यंग्य , (पत्रिका, 19/12/12)
                 मन में लड्डू फूटा
                            ओम वर्मा   om.varma17@gmail.com
त्नी ने चाय का कप हाथ में देते हुए कहा,
      “तुम देश के प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन जाते...
      तुम्हारा दिमाग तो नहीं खराब हो गया?” मेरे हाथ से कप गिरते गिरते बचा। चाय तो खैर छलक ही गई थी।
      “अजीब बात है ! किसी को पीएम बनने के योग्य समझना या बताना क्या पागलपन या दिमाग खाराब होने वाली बात है ?” पत्नी के सुषमा स्वराजी स्वरूप का उमा भारतीकरण होने लगा।
       “नहीं, मेरा मतलब है कि मुझमें कहाँ हैं पीएम बनने के गुण...! मेरी तो घर में ही कोई नहीं सुनता…”
      “कोई बात नहीं...बिना कहे सुने भी काम चल सकता है...!”
      “अरे, मेरा मतलब है कि मैं अपने अड़ोस-पड़ोस वालों तक से अपने विवाद या मनमुटाव नहीं सुलझा पाया...।” मैंने चाय का लंबा सिप लिया। चाय बहुत अच्छी लगी।
    “अरे तुम तो पूरी तरह से क्वालीफाय करते जा रहे हो।“ यह सुनकर मेरे मन में लड्डू फूटा !
    “देखो मैंने तुम्हे लॉन्च करने की पूरी तैयारी कर ली है। एक अंग्रेजी अखबार  पैड न्यूज़ के बदले तुम्हें अपने अग्रलेख में पीएम के योग्य बताने के लिए तैयार है। इन दिनों लीक़ से हटकर बयान देने वाले या बयानों से धमाका करते रहने वाले राजा सा. को भी टच करके देख लेंगे। हो सकता है कि वो भी तुमको प्रमोट करके कम से कम नरेंद्रभाई से तो बढ़त दिला ही दें !” पत्नी, पत्नी न रही, किंग मेकर या कहें कि चेयरपर्सन बनने चली थीं।
        मेरे मन में दूसरा लड्डू फूटने लगा था। मैं उस युग की पैदाइश हूँ जिसमें पीएम यानी सिर्फ नेहरू ही होता था...। फिर कॉलेज में आया तो पीएम यानी इंदिरा गांधी जिन्हें बाद में इंडिया के पर्याय के रूप में भी परिचालित किया जाने लगा था...। मगर उसके बाद तो इतने पीएम बन चुके हैं या बनने के सपने देख चुके हैं या पीएम इन वेटिंग के रूप में वेटिंग हॉल में विराजित हैं कि हॉल छोटा पड़ने लगा है। मेरी पत्नी भी मुझे वहाँ देखना चाहती है तो क्या गलत है?
     मैं खुद को पीएम रेस का दावेदार घोषित करता हूँ।
          ***     100, रामनगर एक्सटेंशन , देवास 455001