Tuesday, 15 October 2013


व्यंग्य (पत्रिका,07.10.13)
                   थूक कर चाटना
                                                       
ओम वर्मा
“पापा, थूक कर चाटना क्या होता है ?” होम वर्क कर रहे बेटे ने एकाएक आराम की मुद्रा में बैठकर टीवी न्यूज़ देख रहे पिताश्री पर नेता प्रतिपक्ष की तरह सवाल दाग दिया।
     “चुपचाप पढ़ाई कर, ऊलजलूल सवाल मत कर।“ पिताश्री ने भी जवाबदेह मंत्री की तरह पल्ला झाड़ते हुए जवाब दिया।
      “पापा मैं होम वर्क ही कर रहा हूँ। हिंदी वाली मैडम ने कुछ मुहावरे दिए हैं जिनके वाक्यों में प्रयोग सहित अर्थ लिखकर ले जाना है।“ बेटे का जवाब सुनकर पिताश्री की हालत राहुल गांधी के बयान के बाद दागी सांसदों और विधायकों को बचाने वाले अध्यादेश की वापसी की पैरवी कर रहे मिलिंद देवड़ा और मीटिंग के बाद वापसी की सूचना दे रहे मनीष तिवारी जैसी हो गई।
     वे शहर की साहित्य समन्वय समिति के अध्यक्ष थे। समिति के सभी सदस्य वर्षों से न सिर्फ घर घर कवि गोष्ठियाँ आयोजित करते आए थे बल्कि सभी के घर शॉल और अभिनंदन पत्रों के ढेर भी लग चुके थे। इस नाते बेटे का हिंदी ज्ञान उनकी अस्मिता का प्रश्न बन चुका था। बेटे की काना मात्रा की गलतियों पर अक्सर उन्हें इसी कारण उलाहने भी सुनना पड़ते थे। आज फिर प्रश्न हिंदी विषय का था और कल सख्त मिजाज मैडम कहीं बेटे को फिर दंडित न कर दे या उनके नाम से फिर से उलाहना न दे दे यह सोचकर पापा ने हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग का रामचन्द्र वर्मा द्वारा संपादित मानक हिंदी कोश निकाला। कोश में दिया अर्थ बेटे को लिखाया-
     थूक कर चाटना’, इस मुहावरे के तीन अर्थ हैं- (क) कोई वचन देकर मुकर जाना, (ब) किसी को कोई वस्तु देकर बाद में फिर ले लेना, और (स) फिर कभी वैसा घृणित काम न करने की प्रतिज्ञा करना।“
     “ठीक है पापा। अब वाक्यों में प्रयोग करके भी बता दो।“
     “अब इतना तो तू खुद भी कर सकता है। कब तक बाप की ऊंगली पकड़ कर चलता रहेगा?” उन्होंने बेटे को पप्पू बने रहने से रोकते हुए कहा और टीवी की गर्मागर्म खबरों में खो गए। बेटे का ध्यान भी टीवी स्क्रीन पर चल रही गर्मागर्म बहस पर चला गया। बीच बीच में समय निकालकर कब उसने अपना होमवर्क भी पूरा कर लिया, उन्हें पता ही न चला।
     बेटे की कॉपी का उन्होंने औचक निरीक्षण किया तो चौंक गए। बेटे ने अन्य मुहावरों के साथ थूक कर चाटने पर लिखा था कि जब सरकार कोई अध्यादेश लाए उस पर लंबी लंबी बहसें चलें और फिर उसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाए और राष्ट्रपतिजी लौटाएँ उससे पूर्व ही उसे घर के ही बंदे द्वारा बकवास बताने पर वापस ले लिया जाए...इसे कहते हैं थूक कर चाटना...! उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि बेटे को शाबासी दें या हमेशा  की तरह इस बार भी प्रताड़ित करें!                                                        ***  

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Wednesday, 2 October 2013

व्यंग्य (नईदुनिया, 26.09.13)
                   बापू की जेल यात्रा
                               ओम वर्मा
                                   om.varma17@gmail.com      
“बापू की जेल यात्रा पर निबंध लिखो।“ गुरुजी ने उधम मचाते बच्चों को कुछ काम देने के उदेश्य से ब्लैक बोर्ड पर लिखा। लिखकर कुर्सी पर बैठे ही थे कि सारे विद्यार्थी खट से लिखने बैठ गए। गुरुजी को अपने शिष्यों पर गर्व हो आया। वर्ना शिक्षक बनने के बाद से हर साल गुरुः ब्रम्हा, गुरुः विष्णु ...” सुनते सुनते उनके कान पकने लग गए थे और शाल श्रीफल से घररने लग गया था।
     मगर जैसे चुनाव के बाद कोई दल वाले प्रारंभिक रुझान में स्पष्ट बहुमत आता दिखने पर टीवी टाक शो में दहाड़ना शुरू कर देते हैं और रुझान पलटते ही उनकी सारी खुशी काफ़ूर हो जाती है कुछ वैसे ही इन मास्टरजी की क्षणिक खुशियों पर भी तुषारापात हो गया। हुआ यूँ कि सारे बच्चों ने निबंध में जो लिखा था उसका लुब्बो-लुबाब कुछ यूँ है कि “एक फलां फलां बापूजी पर एक नाबालिग कन्या ने दुराचार का आरोप लगाया है जिस कारण वे कानून की फलां फलां धारा के तहत और नए नए पोस्को कानून के पहले शिकार के रूप में जोधपुर के बैकुंठधाम...आय मीन जेल में बंद हैं।“ हालांकि भाषा सबकी अलग अलग थी मगर मजमून लगभग एक जैसा था...जैसे किसी ने लिखा कि वे जोधपुर में ध्यानमग्न हैं, किसी ने लिखा एकांतवास पर हैं और किसी ने लिखा कि जोधपुर जेल में सत्संग करने गए हैं। किसी ने लिखा नारी जगत का कल्याण करने गए हैं और किसी ने लिखा कि किसी कन्या की प्रेत-बाधा दूर करने गए हैं। 
     बहरहाल बच्चों के शब्द गुरुजी के सामने राजधानी एक्सप्रेस की तरह गुजरने लगे और वे किसी पुल की तरह थरथराते हुए मुख से कभी नारायण नारायण और कभी हरिओम हरिओम बड़बड़ाने लगे। पेट्रोल- डीजल की कीमतों का विरोध करने वाले प्रदर्शनकारियों और मोदी के नाम पर बार बार उखड़ते रहने वाले  पितृ पुरुष आडवाणी की तरह गुरुजी का क्रोध भी शीघ्र ही शांत हो गया। गायब फाइलों का ठिकाना समझाते महामात्य की तरह फिर वे बोले, “अरे बच्चों, ये तुमने क्या लिख डाला ? मैंने तुम्हें बापू की जेल यात्रा ...
     बापू जी की जेल यात्रा पर ही तो लिखा है गुरुजी।“ एक तिलकधारी विद्यार्थी ने बीच में ही गुरुजी की बात काटते हुए कहा। गुरुजी ने अपना माथा ठोकते हुए कहा, अरे मूर्खों! मैंने तुम्हें गुजरात वाले बापू की जेल यात्रा पर लिखने को कहा था।“
     “अरे गुरुजी अपुन बी तो गुजरात वाले पेईSSज़ लिखेला है।“ एक टपोरीनुमा विद्यार्थी की इस बात पर गुरुजी का भेजा सचमुच में आउट हो गया। “अरे नालायकों... मैं तो उस महापुरुष की बात कर रहा हूँ जो पुणे की यरवड़ा जेल...”
     “तो सीधे सीधे बोलो ना कि संजय दत्त पे लिखना था ...!” एक पहलवान टाइप बच्चे ने फिर बात काटी। अब तो गुरुजी के सब्र की गांधीगिरी भी सेंसेक्स  की तरह धड़ाम से नीचे आ गिरी थी। उन्हें खुद अपने पढ़ाए उस पाठ पर शक़ होने लगा कि कहीं उस दिन महात्मा गांधी की जीवनी पढ़ाने में उनसे एक बापू की स्टोरी में दूसरे बापू की स्टोरी मिक्स करने जैसी कोई चूक तो नहीं हो गई।
     शीघ्र ही गुरुजी की समझ में सारी बात आ गई। उनके जहन में उनके द्वारा सत्य के प्रयोग में पढ़े गए और फिल्म डिवीज़न की न्यूज़ रील में देखे गए बापू थे जबकि बच्चों के दिमाग में हाल ही में टीवी चैनलों के प्राइम टाइम पर छाए रहे बापू थे। उन बापू की लीला अंग्रेज़ नहीं समझ पाए थे और इनकी लीला इनके भक्तों को समझने में भी दस बारह साल लग गए। 
     जय रामजी की बोलना पड़ेगा ! 
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Wednesday, 18 September 2013



व्यंग्य
            मालवप्रदेश बनाया जाए
                                ओम वर्मा om.varma17@gmail.com
ब समय आ गया है कि दाल-बाफले खा-खाकर आलसीपन का ठप्पा लगवा चुके, अपने भोलेपन से टेपे के रूप में पहचान बना चुके और एक पूर्वज द्वारा जिस डाली पर बैठे उसी को काटने के विद्वतापूर्ण परफ़ोर्मेंस के कारण नेठूई गेलिएगमने घोषित हो चुके मालवावासी जागें, उठें और अपने लिए अलग राज्य मालवप्रदेश मांगें...बल्कि छीनें!
     इस देश को संस्कृत नाटकों का विद्वान कालिदास हमने दिया; काल की गणना के लिए जंतर-मंतर और विक्रम संवत हमने दिया। दुनिया वाले फ्रैंड्शिप डे मनाना तो अब सीखे हैं और भले ही सिप्पी ने जय-वीरू को दोस्ती सिखा दी हो, मगर उज्जयिनी में कृष्ण और सुदामा सालों पहले वनों में ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे... गाते गाते ही लकड़ियाँ काटा करते थे। पत्नी से टूटकर प्रेम करना और फिर उसी से भिक्षा माँगना भी हमारे राजा भर्तृहरि ने ही लोगों को सिखाया है। विक्रमादित्य जैसा तुरंत, सही व न्यायपूर्ण निर्णय लेने वाला राजा और  न्याय के लिए पुत्र को दंडित करने वाली  अहल्याबाई जैसी रानी चाहिए जो मालव भूमि ही दे सकती है। आंदोलन कभी हमने किए नहीं। जिमे राम राजी उमें नंदराम राजी हमारा मोटो है।     यह सही है कि कभी हमारी मालव माटी गहन गंभीर हुआ करती थी जहाँ पग पग पर रोटी मिलती थी और डग डग पर नीर बहा करता था। मगर अब इसमें सेंधमारी शुरू हो चुकी है। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार स्व॰ श्रीनरेश मेहता अपने उपन्यास उत्तरकथा में रेलों के मामले में मालवा के पिछड़ेपन का उल्लेख कर ही चुके हैं। यहाँ एक राजा साँपों से मुक्ति पाने के लिए नागदहन यज्ञ भी कर चुके हैं। यानी किसी को झूठमूठ डराने के लिए अब हमारे पास साँप भी नहीं बचे! दिल्ली वालों को डराने के लिए हमारे पास न तो कोई फायर ब्रांड नेत्री है और न ही विशेष दर्ज़ा माँगने वाला कोई नया नया सेक्युलर घोषित हुआ नेता! अब तो हमारी लड़ाई हमें खुद ही लड़नी पड़ेगी। इसलिए उज्जैन, शाजापुर, इंदौर, देवास और आसपास के सभी मालवावासियों ! उठो, जागो, बहती गंगा में हाथ धो लो और मांगो अपना मालवा ! जहाँ सच न चले वहाँ झूठ सही और जहाँ हक़ न मिले वहाँ लूट सही !
    यदि गिरते रुपए को बचाने में लगी सरकार मालवप्रदेश न देना चाहे तो फिलहाल मालवा क्षेत्र को तत्काल विशेष दर्ज़ा प्रदान करे क्योंकि हमें ज्यादा का लालच नहीं होता, हम तो थोड़े में ही गुजारा करते आए हैं। इस हेतु मालवा एक्स्प्रेस में मालवावासियों को आजीवन फ्री पास’, मालवा के त्योहारों पर राष्ट्रीय अवकाश, दाल-बाफले को राष्ट्रीय पकवान, पोहा-जलेबी को राष्ट्रीय नाश्ता, मीठी-कडक चाय को राष्ट्रीय पेय और किसी को भी कभी भी, कहीं भी बीड़ी पीने की छूट और उज्जैन में होने वाले गधों के मेले को अंतरराष्ट्रीय मान्यता... आदि की तत्काल घोषणा की जाए ! गांधीगिरी चलाने वाले या तो मौन धारण कर लेते हैं या यरवड़ा से बैठे बैठे पुलिसगिरी चलाने की कोशिश करने लगते हैं। मगर मालवप्रदेश में सिर्फ और सिर्फ टेपागिरी ही चलेगी !
                                                               ***

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व्यंग्य       
           माँग और आपूर्ति की उलटबाँसी
                                                        ओम वर्मा
ढ़ाई तो मैंने विज्ञान विषयों की ही करी थी मगर उसका उपयोग आस पड़ोस के बच्चों को कभी निबंध लिखकर देने के लिए तो कभी बॉस के बच्चों को विज्ञान प्रदर्शनी में मॉडल बना कर देने, कभी वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में पॉइंट्स लिखकर देने और कभी अपने बच्चों का होम वर्क पूरा करवाने में होता रहा। यानी गर्व करने के लिए मैं कह सकता हूँ कि मेरी शिक्षा कहीं किसी के कुछ काम तो आई ! कभी कभी अपनी इस बुद्धिमत्ता और चतुराई पर मन को बड़ा गर्व होने लगता है कि मैंने अर्थशास्त्र की पढ़ाई नहीं की वर्ना किस काम आती ! अगर किसी बड़े स्थान पर होता तो मुझे भी बड़े बड़े अर्थशास्त्रियों की तरह रुपए के लुढ़कने और रसातल में जाती अर्थव्यवस्था का जवाब देने के लिए मुँह छुपाना पड़ जाता। और क्या पता कल को गिरते रुपए, घड़े को फोड़कर बाहर निकलते भ्रष्टाचार और सुरसामुख से भी ज्यादा विराट रूप ले चुकी महँगाई के लिए मुझे भी दोषी या चोर ठहरा दिया जाता। अंततः मैं भी तो उसी व्यवस्था का ही अंग हूँ।
     बहरहाल, जैसे हिंसा को जस्टिफ़ाइ करने के लिए हमें कभी बड़े पेड़ों के गिरने पर छोटे-मोटों को होने वाली हानि या क्रिया की प्रतिक्रिया के नियमों का बिना भाषाशास्त्रियों या बिना न्यूटन का आभार माने सहारा लेना ही पड़ता है कुछ उसी तरह अर्थशास्त्री किसी भी लोचे में माँग और आपूर्ति के नियम में अपनी सद्गति ढूढ़ने की पुरजोर कोशिश करने लगते हैं। इस नियम के अनुसार माँग ज्यादा और आपूर्ति कम होने पर वस्तु महँगी तथा सरप्लस होने पर सस्ती हो जाती है। लेकिन अर्थशास्त्र तो ठीक, जीवन के सभी क्षेत्रों में यह नियम दम तोड़ता नज़र आता है। जैसे हमें पढ़ाया गया था कि हमें नेता नहीं नागरिक चाहिए! यानी नेताओं की माँग नहीं है। इधर हम देख रहे हैं कि नेताओं की तादाद दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती जा रही है। यानी माँग कम, मगर आपूर्ति ज्यादा ! अब आपूर्ति ज्यादा होने से नेताओं के भाव अपने आप कम होने थे। मगर ऐसा नहीं हुआ। हर नेता का अपना भाव। मूल्य सूचकांक व ग्राफ के अक्षों (axis) को लांघता भाव !
     बाज़ार में अनाज की आसमान छूती कीमतों को देखकर अभी अभी  केंब्रिज का गाउन टाँग कर बैठे कुछ मित्र माँग और आपूर्ति वाला ज्ञान बघारते हुए फरमाने लगते हैं कि इस बार फ़स्ल की पैदावार कम होने से आपूर्ति कम हुई, जिस कारण अनाज महँगा हुआ है ! मगर पैदावार के सरकारी आँकड़े बताते हैं कि इस बार जैसी पैदावार तो कभी हुई ही नहीं ! इतनी पैदावार कि रखने की जगह नहीं...माँग की आवाज को आपूर्ति का शस्त्र बनाकर कुचलने से पूर्व बाहर पड़े पड़े बारिश में भीगने और सढ़ने को तैयार पड़ा अनाज...! अनाज भी भरपूर मगर भाव उससे भी ज्यादा भरपूर !
     धर्मों-संप्रदायों और संत-बाबाओं का देश ! इतने बाबा कि पैरों तले आने लगे। आश्रमों से लेकर जेलों तक और सियासी शिविरों से लेकर टीवी चैनलों तक उपदेश देते, ज़मीनों पर कब्जा जमाते, कृपा से लेकर क्रोध तक बरसाते बाबा, दवा देकर शरीर की स्पर्श चिकित्सा से नाबालिग अहल्याओं का उद्धार करते बाबा...! माँग से कई गुना ज्यादा बाबा होने पर भी एक भी बाबा को न तो बिना अपाइंटमेंट मिलने या प्रवचन देने की फुरसत है और न ही गिरफ्तारी आदेश को तामील करने की जल्दी ! यानी माँग से ज्यादा आपूर्ति होने पर भी बाबाओं का इकबाल भी बुलंद है
     आज देश में बाबागिरी गांधीगिरी पर भारी पड़ रही है।

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व्यंग्य
              
              बापू की डायरी के अंश
              ओम वर्मा 
                                                                                    
बापू यहाँ भी डायरी लिखते थे और स्वर्ग में भी लिखते हैं। स्वर्ग की नियमित प्रेस ब्रीफिंग में उनके जन्म दिवस के अवसर पर उसके कुछ अंश जारी किए गए हैं जो आपके सामने रख रहा हूँ :-
      मुझे नाथूराम गोड़से (जिन्हें कि आज यदि कोई विशिष्ट राजनेता श्री नाथूरामजी गोड़से साहब भी कह दें तो आश्चर्य न करें) ने पैंसठ साल पहले एक बार मारा जरूर था लेकिन उसके बाद भी मैं अब रोज रोज मर रहा हूँ..! भारत में जब भी किसी ‘होरी’ ने आत्महत्या की हैमैं एक बार फिर मरा हूँ। उधर एक पूर्वोत्तर राज्य में एक महिला एक्टिविस्ट शर्मीला कई वर्षों से भूख हड़ताल पर बैठी है व नाक से दिए जा रहे भोजन पर जिंदा है। मैं उस आंदोलनरत युवती की आत्मा का ही हिस्सा हूँ...उसके साथ रोज तिल तिल कर मर रहा हूँ। गत 16 दिसंबर की रात दिल्ली में जो हुआ था तब मैंने स्वयं को यरवड़ा जेल में किए गए अनशन के दौरान उठाई गई तकलीफों और दक्षिणी अफ्रीका में रेलगाड़ी से टीटी द्वारा बाहर निकाल दिए जाने पर हुए कष्ट से भी ज्यादा आहत महसूस किया था। मुझे पहले जब राष्ट्रपिता की उपाधि दी गई और बाद में नोटों पर जब मेरी तस्वीर लगाई गई तो मैंने समझा था कि ये लोग मेरे विचार जन जन तक पहुँचा कर रहेंगे। मगर जब जब भी मेरी तस्वीर वाली गड्डियाँ जोशियों के बिस्तरों से मिलींकोयले खदान की नीलामी वालों की या कर्णाटक की खदान वालों की जेबों में गईंमुझे फिर आहत होना पड़ा है।
     देशवासियों ने हर शहर में मेरे नाम पर मार्ग का नाम रखकर मुझे ‘अमर’ बनाना चाहामगर उस मार्ग पर खुली गांधी साहित्य से लेकर चरखे तक की और खादी से लेकर सारी स्वदेशी वस्तुओं तक की दुकानें धीरे धीरे रेडियो की तरह लुप्त होती जा रही हैं। खादी पर मेरी जयंति पर जितनी छूट मिलती है उससे ज्यादा छूट शराब के ठेकों पर 31 मार्च से पूर्व स्टॉक क्लीयरेंस के नाम पर मिल जाती है। गांधी साहित्य की दुकानों पर सन्नाटा और शराब की दुकानों पर राष्ट्रीय त्योहारों की पूर्व संध्या पर मेरी प्रार्थना सभाओं जैसी भीड़ देखकर मैं एक बार फिर ‘हे राम !’ कहने को विवश हो जाता हूँ।
     इन दिनों हर नेता के अशिष्ट बयानों से मैं आहत हुआ हूँ। हर नेता ने अपने कक्ष में मेरी लाठी लेकर चलने वाली तस्वीर लगा जरूर रखी हैपर सभी ने मेरे विचारों को तिलांजली देकर महज़ लाठी को अपना शस्त्र बना रखा है। मैं अपने सीने में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार एवं वस्त्रों की होली की आँच अभी भी महसूस कर रहा हूँमगर मेरे नाम से वोटों की फसल काटने वाले मेरे मित्र न सिर्फ अपना उपचार विदेश में करवा लेते हैं बल्कि उनके लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए पलक पाँवड़े भी बिछाए बैठे हैं। पता नहीं मुझे और कब तक मारना चाहेंगे ! हे राम !    
ओम वर्मा100रामनगर एक्सटेंशन. देवास 455001  
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Wednesday, 26 June 2013


--  जनवरी' 2013 में पाकिस्तान क्रिकेट टीम ने  भारत  को  2-0 से शिकस्त दी। इस पर लिखा  'सिंह खोकर गढ़ जीता' शीर्षक से लिखा गया व्यंग्य जो  'पत्रिका', इंदौर  में 14.01.2013 को 'क्रिकेट में हार जीत' शीर्षक से प्रकाशित हुआ । 
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              सिंह खोकर गढ़ जीता
                 ओम वर्मा
                                                                                        
नके पास लड़की पटाने के नुस्खे तो हैं, पर सीरीज जीतने के नहीं । वे खाद्य पदार्थ में होने वाली मिलावट के खिलाफ जितने एकजुट खड़े नज़र आते हैं उतने प्रतिद्वंद्वी टीम के स्कोर के खिलाफ नहीं। उन्हें उनके मोबाइल पर अपनी माँ की पुकार तो सुना जाती है पर सौ करोड़ लालों की माँ की पुकार सुनने में वे असमर्थ हैं।
     वे जो एक देड़ वर्ष पहले तक शोले और दीवार के अमिताभ की तरह खेल के एंग्री यंगमेन थे,आज पा के अमिताभ होकर रह गए हैं। कभी वे बल्लेबाजी में हर गेंद पर कार्यक्रमों के कुशल मंच संचालकों की हाजिरजवाबी सी चपलता दिखाया करते थे और आज...आज कार्यक्रमों की अध्यक्षता कर रहे सम्मानीय बुज़र्गों की तरह खामोश होकर रह गए हैं। जिस तरह गठबंधन से चल रही सरकारें कई अच्छे कार्यक्रम या योजनाएं होते हुए भी इंप्लिमेंट नहीं कर पाती हैं उसी तरह इनके पास शॉट्स तो कई हैं पर वे मैदान में लगा नहीं पा रहे हैं। हमारी वर्ल्ड चैंपियन क्रिकेट टीम को अब राजकपूर की तरहज्यादा का लालच नहीं रहा, क्योंकि अब वे थोड़े में गुज़ारा करने लग गए हैं इसलिए सीरीज़ का गढ़’ हारकर मैच का सिंह जीत जाते हैं। चूँकि मेहमां जो हमारा होता है, वो जान से प्यारा होता है इसलिए हम उसे हराकर एक गाल पर चपत पड़ने पर दूसरा गाल भी आगे करने की परंपरा वाले देश में इंसल्ट,कैसे कर सकते हैं !
           लेकिन क्या सारे उसूल क़ायदे या नीति शिक्षा सिर्फ हमारे ही लिए हैं ? क्या मेहमानों का कोई फर्ज़ नहीं बनता ? वे यह क्यों भूल जाते हैं कि हमने उनके एक लाड़ले सपूत को बिरियानी खिला खिलाकर अपने घर से भी ज्यादा महफूज़ रखा। हमने उनकी आस्तीन में पल रहे विषधर को भी नाम के आगे श्री लगाकर गौरवान्वित किया। उनके एक खिलाड़ी से हमारी एक लाड़ली लक्ष्मी का ब्याह कर उन्हें दसवें ग्रह जैसा सम्मान दिया और अमेरिका से लेकर भारत तक के मोस्ट वांटेड आतंकी के समधी को वीज़ा प्रदान कर गांधीगिरी की उच्चतम मिसाल पेश की...और तुम हो कि आउट होने का नाम ही नहीं लेते हो !
      यह मत भूलो कि तुम हमारा ही हिस्सा हो और इस नाते रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप ही हुए ना ! और बाप की क्रिकेट में शहंशाहत बनी रहे इसके लिए तुम्हारा भी तो कुछ फर्ज़ बनता है कि नहीं !
     बेहतर होगा कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की तरह तुम हमें मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्ज़ा    दो  ताकि आइसीसी  अपने  नियमों  में संशोधन  कर  हमारी  टीम  को  कु अतिरिक्त छूट जैसे ग्यारह की जगह बारह या तेरह खिलाड़ी देना, हमें पचास की जगह साठ ओवर देना, और हर बेट्समेन को केबीसी की तरह डबल डिप यानी एक बार आउट होने पर उस गेंद को निरस्त कर फिर से डलवाना...। हमारी सद्भावना का आखिर कुछ तो खयाल करो भाई !
                      ***
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Sunday, 3 March 2013


व्यंग्य / पत्रिका, 01.02.13 में प्रकाशित  
                  आम आदमी – एक चिंतन
                                 ओम वर्मा om.varma17@gmail.com
“पापा ये आम आदमी क्या होता है ?” बच्चे ने बाप से यक्ष प्रश्न कर डाला । 
     “आम आदमी ...आम आदमी मतलब कि आम आदमी...।”
     “वही तो पूछ रहा हूँ कि ये आम आदमी का मतलब क्या होता है ?” बेटे का पूरक प्रश्न।
     “आम आदमी मतलब कॉमन मेन।” पिताश्री ने बेटे को तुष्टिकरण करने जैसा जवाब दिया।
     “तो कॉमन मेन का ही मतलब बता दीजिए !” बेटे ने भी बाबा रामदेव द्वारा की जा रही काले की वापसी जैसी असंभव माँग सामने रख दी।
     “कॉमन मेन मतलब वो आदमी जो सीधा-साधा हो…गरीब हो जिसके पास ज्यादा महँगी चीजें जैसे फ्रिज, टीवी वगैरह न हो...”
     “क्या बात करते हो पापा ! टीवी, फ्रिज और मोबाइल तो झुग्गी-झोंपड़ियों तक में है... ।” दूसरा बेटा नितिन गड़करी को बचाने के लिए दिए जा रहे ठोस तर्कों की तरह बीच में हस्तक्षेप करता हुआ बोल पड़ा।
     “नहीं मेरा मतलब वो नहीं... आम आदमी जैसे मज़दूर या किसान। यही सच्चे आम आदमी होते हैं।” पिताश्री की आवाज कुछ कुछ तलत मेहमूद जैसी लरजने लगी थी।
     “मतलब कोई आम आदमी की बात करे या उसके साथ अपना हाथ होने का दावा करे या उसके नाम से अपनी पार्टी बनाए तो क्या वो सिर्फ इनके लिए काम करेगा ?” बेटे ने बिना कोई विकल्प दिए पाँच करोड़ का सवाल पूछ डाला।
     पिताश्री ने अकस्मात कान पर जनेऊ चढ़ाई और हमेशा की तरह मेनफ्रेम से क्विट कर गए...! आम आदमी को लेकर ऐसी बहस कमलेश्वर के सारिका के संपादक बनने से लेकर आज तक जारी हैं। मुद्दा अभी भी जेरे-बहस है कि आम आदमी आखिर है कौन ? क्या सिर्फ मज़दूर या किसान ही आम आदमी हैं ? क्या किसानों के लिए खाद बीज उपलब्ध करवाने वाले या इसके लिए सतत वैज्ञानिक अनुसंधान करने वाले वैज्ञानिक आम आदमी की परिभाषा में नहीं आते ? क्या खेलों में पदकों के लिए पसीना बहाने वाले या सीमाओं पर परिजनों से दूर रहकर जान की बाज़ी लगा देने वाले सैन्यकर्मी इन दलों के लिए अवांछनीय हैं? क्या अपने उद्यमों के माध्यम से देश-विदेश में लाखों लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाने वाले टाटा, बिड़ला, अंबानी, नारायण मूर्ति या प्रेमजी के बिना देश के आर्थिक विकास की कल्पना की जा सकती है ? अगर पार्टी के लिए एक करोड़ का चंदा देने की औकात रखने वाला भी आम आदमी है तो फिर देश में कोई भी खास नहीं, हर शख्स आम है।                                                  ***
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