Wednesday, 4 December 2013



       

 कहानी
 (नईदुनिया, 01.12.13)
 http://naiduniaepaper.jagran.com/Details.aspx?id=606683&boxid=29120442          
              एक सपने की मौत
                      ओम वर्मा om.varma17@gmail.com
ब पहली बार उससे मेरी आँखे चार हुईं तो मैं हतप्रभ रह गया। सोचता रह गया कि ये आँखें मैंने पहले कहाँ देखी हैं ! दिमाग पर ज्यादा देर तक जोर नहीं डालना पड़ा। अभी कुछ दिन पूर्व ही मुंबई के जीजाबाई उद्यान में स्थित चिड़ियाघर में अपनी छह वर्षीया भतीजी को घुमाने ले गया था। वहाँ देखा था एक मृगशावक जिसकी आँखें मैं निर्निमेष देखता रह गया था ! मुझे लगा था कि ऊपर वाले की वर्कशॉप में पूरे छह दिन यानी सोमवार से शनिवार तक बाकी सारे जीव बनाए जाते होंगे और मृग सिर्फ संडे को। मगर उस मृगशावक को देखकर मेरा संडे वाला भ्रम भी टूट गया था। उस शावक को संडे को बनाने के बाद ईश्वर की वर्कशॉप के सारे मिस्त्री शायद हड़ताल पर चले गए थे और शावक की आँखे बनाना रह गई थीं। फिर ईश्वर ने स्वयं अपने हाथों से दो तीन दिन का समय लिया और उस मृग शावक की आँखें तैयार की। शायद वे आँखें वहाँ से निकलकर या उड़कर इसके चेहरे पर लग गई हैं...या शायद इसने चुरा ली हैं।
     घर पर मेनगेट से प्रवेश करते ही पहले नज़र गलियारे में लगे नल और बरतन माँजने के स्थान पर पड़ती है। उस दिन शाम को ऑफिस से जैसे ही घर लौटा और बरतन माँजती उस मृगनयनी से मेरी आँखें चार हुईं कि मुझे हिप्नोटाइज़ होने में देर नहीं लगी। पत्नी ने द्वार खोला और मुझे उस बारह- तेरह वर्षीया मृगलोचनी की आँखों के मोहपाश से मुक्त कराते हुए कहा,
      “यह सपना है, आज से इसको रखा है झाड़ू पोंछा और बरतन के लिए...!”                                                   
       उसका पूरा चेहरा रक्ताभ था। ड्राइंग रूम में आने के बाद सुनयना की आँखों व जंगली फूल जैसे सौंदर्य के मोहपाश की मनःस्थिति से पति होने की अहंकारी मनःस्थिति में लौटते हुए मैंने पत्नी से पूछा,
     “तुमने इसको काम पर क्यों रखा ? इतनी छोटी लड़की क्या काम कर पाएगी ! और जरा उसका रंग-रूप देखो ! कल से उसके साथ दिल्ली जैसा कुछ उल्टा-पुल्टा हो जाए तो हम कहाँ भागते फिरेंगे !”
     “मैंने इसे नहीं इसकी माँ को रखा था,” पत्नी ने सरकारी किस्म का जवाब देकर मुझे संतुष्ट करने का प्रयास किया, “पर माँ ने काम और पैसा तय करके हमारे यहाँ अपनी लड़की को रखवा दिया और खुद पीछे वाली ठाकुर भाभी के यहाँ काम करने चली गई।“
     तो यह बात है। मुझे इन काम वाली बाइयों पर कोफ्त होने लगी। काम ढेर सारा ले लेती हैं और नहीं बनता तो बच्चों को उलझा लेती हैं।
     अपनी बिटिया से मैंने स्कूल होमवर्क और पढ़ाई की जानकारी ली। मुझे यह सोचकर आत्मसंतुष्टि हुई कि मैं पढ़ा-लिखा हूँ और परिवार का निर्वाहन करने में सक्षम हूँ...बच्चों को पढ़ा-लिखा कर इस लायक तो बना ही सकता हूँ कि मेरे बच्चों को कहीं छोटू या बारीक़ नहीं बनना पड़ेगा, और न ही कहीं बेटी को बरतन साफ करना पड़ेंगे।
     सपना की आँखें धीरे-धीरे मेरे दिल का कमरा ऑक्युपाइ करने लगीं। एक दिन मुझसे रहा नहीं गया और उससे आखिर पूछ ही बैठा,
     “क्यों सपना, तू सिर्फ काम ही करती है या स्कूल भी जाती है ?”  
     “स्कूल तो जाती थी अंकलजी...पर इस साल माँ ने तीसरी क्लास से पढ़ना छुड़ा दिया।“
     “क्यों ?” मैं चौंका।
     “वो माँ से इत्ते घरों का काम नी संभलता था तो मेरे को और मेरी छोटी बेन संगीता को दो-दो घर दिला दिए।“
     यानी उसकी एक छोटी बहिन भी है। मेरी जानकारी में इजाफा हुआ। मैंने पूछा,
     “छोटी बहिन कहाँ जाती है, और तुम कितने भाई बहिन हो ?”
     “छोटी बहिन संगीता मोती बंगले में एक साब के घर रख छोड़ी है और तीन छोटी बहनें और भी हैं।                                                 “मतलब....”
          “हम कुल पाँच बहिनें हैं और मैं सबमेँ बड़ी हूँ।“
      “तुम्हारे पापा क्या करते हैं ?”
      “मेरा बाप बेलदारी का काम करता है।”
      बेलदारी का मतलब उसने बताया कि छत भरने की यानी आर.सी.सी. भरने की मजदूरी को निमाड़ी लोग बेलदारी कहते हैं। निमाड़ से काम के वास्ते यहाँ आए थे वे लोग। बाप कभी कभार ठेकेदार के पास छत भरने की मजदूरी करता है और माँ कई घरों में बरतन – पोंछे का काम कर लेती है। लेकिन मेरी यह समझ में नहीं आया कि जब दोनो मनक कमा रहे हैं तो फिर बच्चों से काम क्यों करवाते हैं। मेरे पूछने पर सपना ने यह भी बताया कि शहर में शिवानी नर्सिंग होम और इंकम टैक्स ऑफिस के बीच की जगह में झाबुआ और निमाड़ से आए कुछ लोग झुग्गियाँ बनाकर रहते हैं वहीं इनका भी घर है। सरकारी स्कूल में वो पढ़ती थी जहाँ फीस भी नहीं लगती थी और खाना भी मिलता था। एक दिन उस मृगनयनी से मैं आखिर पूछ ही बैठा-
     “सपना तू काम छोड़ दे और स्कूल जाया कर ! नहीं पढ़ेगी तो जिंदगी भर बरतन ही माँजेगी और पढ़ लिख लेगी तो अच्छे घर जाएगी।“
     इस पर सपना ने जो जवाब दिया वह मेरा कलेजा हिला देने को काफी था-
     “अंकलजी मैं स्कूल जाना तो चाहती हूँ, पर स्कूल जाऊँगी तो घर (जहाँ काम करती है) छूट जाएँगे...और घर छूटने पर बाप रोज माँ को और हम सब बहिनों को ज्यादा मारेगा। बाप को तो रोज दारू चईये... चाहे हमको खाने को मिले या न मिले...!”
     आगे की सारी कहानी मेरी समझ में आ गई थी। माँ और दो बेटियों को मिलकर रोजाना कमाकर घर भी चलाना है और मार भी खाते रहना है।
     लेकिन मैं एक होनहार बचपन को काम के बोझ में लुप्त होते नहीं देखना चाहता था। मैंने पूछा-
     “तेरे पास स्कूल की कॉपी किताब या जो भी सामान हो, लेकर कल से रोज मेरे पास पढ़ने बैठ जाया कर। तेरा काम भी हो जाएगा और मैं रोज पढ़ा भी दिया करूँगा।“ कम से कम पाँचवी क्लास तक तो वो पढ़ ही ले, ऐसी मेरी दिली इच्छा थी। 
     “ठीक है, ले आऊँगी अंकलजी !” 
     अगले दिन उसके काम के बाद मैंने उसका ज्ञान टटोला। उसे सौ तक गिनती और पाँच तक पहाड़े याद थे। इतना तो काफी है आगे सीखने के लिए।
     उसने रोजाना मुझसे पढ़ना शुरु किया। एक दो दिन तक पत्नी को मेरी बात एक सनक सी लगी। लेकिन फिर वह भी अक्षरदान की पुण्य सलिला में अपना अर्ध्य देने लगी। आठ दस दिन तक यह सिलसिला चला तो मुझे लगा कि पैसेंजर गाड़ी किसी दिन एक्सप्रेस में बदल जाएगी । लेकिन तभी अचानक सिगनल लाल हो गया।
     “वो अंकलजी...बात ये है कि मैं आज से अब नी पढ़ूँगी...।“ 
     “क्यों...!” मैं चौंका !
     “वो पढ़ने में मेरा जो टेम जाता है उससे मेरे दो घर का काम छूट जाता है और माँ नाराज़ होती है...बोलती है कि काम मत छोड़। वो मोती बंगले वाले साब के यहाँ काम पे नी पोंचेगी तो वो दूसरी बाई रख लेंगे और तू पैसे नी लाएगी तो बाप मारेगा।”
     मैंने उसकी माँ से बात करी। उसने हमें समझाया कि लड़की का काम पर जाना जरूरी है, नहीं पढ़ेगी तो चलेगा पर पैसे नहीं मिले और इसके बाप को दारू नी मिली तो वो हम माँ-बेटी को और ज्यादा माराकूटी करेगा।
    “तुम लोग पुलिस में रिपोर्ट क्यों नहीं कर देते...”, मैंने किसी डेंटेड-पैंटेड सोशलाइट की तरह उसे समझाया।       
     “पुलिस आदमी को माराकूटी करके बंद कर देगी...फिर छुड़ाने तो हमको ही जाना पड़ेगा। हमारा घर-बार और पेट तो हमको ही भरना है...।“
     “तुम सपना को रात को भेज दिया करो...।“
     “तुम सपना को रात को भेज दिया करो...।”
     “रात को भेजेंगे तो वो और लड़ेगा झगड़ेगा।”
     उसने  यह  भी  बताया कि वो टी टी आपरेशन भी नी करवाने देता। उसको
लड़का चइए...वो अब फिर से माँ भी बनने वाली है।
     मेरी दिलो-जान से इच्छा थी कि सपना उस नर्क से मुक्ति पा जाए और थोड़ा बहुत पढ़ लिख सके। मैं स्वयं समय निकालकर उसे पढ़ाना चाहता था, मगर समय सपना के पास नहीं था। बाल श्रम करवाने के पाप से पूरे समाज की तरह मैं भी नहीं बच सका। मेरी सपना के प्रति सहानुभूति दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही थी। मुझे उसमें व अपनी बेटी में कोई फर्क़ ही नज़र नहीं आता था। मैं जान बूझकर बर्तनों को कुछ इस तरह से उपयोग में लाता कि एक दो जूठे बर्तन कम निकलते। ऐसा करके मुझे यह एहसास बना रहता कि मैं उसका श्रम व समय बचा रहा हूँ...और इससे शायद उसे पढ़ने के लिए प्रेरणा मिले, ऊर्जा बची रहे।
     लेकिन मैं भी हवा को गले लगाए था और पारे की बूँद को पकड़ना चाहता था। सपना को आगे नहीं पढ़ना था सपना को मुझसे नहीं पढ़ना था...सपना को मेरी बेटी की तरह माता-पिता का प्यार नहीं पाना था सो नहीं मिला। सपना को एक कमाऊ पूत की तरह घर चलाने में सहयोग देना था और बाप की दारू का इंतजाम करना था और बदले में रात को माँ को पिटते भी देखना था, खुद भी मार खानी थी , बहिनों को पिटते देखना था...सो वह कर रही है।
     सपना की माँ ने एक और समझदारी का काम किया। उसकी बेटी की पढ़ाई और ज़िंदगी को लेकर मुझे बार बार झुँझलाते, दुबलाते और पूछताछ करते देख आखिर उससे हमारा घर ही छुड़वा दिया। अब वह किसी और घर में बर्तन पोंछा कर रही होगी जहाँ कम से कम पढ़ने लिखने को लेकर कोई उसके पीछे नहीं पड़ता होगा।
     एक मासूम बालमन की कम से कम मेरे सामने तो हत्या नहीं हो रही है...मैं यही सोचकर खुद को संतुष्ट करने का प्रयास कर रहा हूँ।  
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ओम वर्मा, 100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001  

Thursday, 21 November 2013

  व्यंग्य (नईदुनिया, 18.11.13)
बापू के चरखे की नीलामी 
                                                         ओम वर्मा                                            om.varma17@gmail.com     
त्य, अहिंसा, धोती, सत्याग्रह और चरखे को मिलाओ तो गांधी बनता है ! बरुआ जी से क्षमा याचना कर करना चाहूँगा कि गांधी इज़ चरखा; चरखा इज़ गांधीसागौन की लकड़ी से बना यह पोर्टेबल चरखा यरवड़ा जेल में भी गांधी के व्यक्तित्व और दिनचर्या का अविभाज्य अंग था। 1933 में रिहा होने के बाद उन्होंने इसे वर्धा की एक मिशनरी के रेवरेण्ड डॉ. फ्लायड ए. पफ़र  (1888-1965) तथा उनकी पत्नी को भेंट कर दिया था। और इसी करामाती चरखे को गत 5 नवं. को लंदन के मलस्क्स आक्शन हाउस में एक लाख दस हजार पौंड मेँ नीलाम कर दिया गया। नीलामी की खबर से सभी दलदलों, आयमीन राजनीतिक दलों मेँ खलबली मच गई।
     “ये बापू आखिर चरखा क्यों चलाते थे? क्या इसका सूत और उससे बना कपड़ा चीन के सूत या कपड़े से भी सस्ता था?” एक कार्यकर्ता ने सवाल किया।   
     “इससे तो अच्छा होता कि चुनाव जीतने या कट्टे तमंचे बनाने के गुर सिखाकर जाते.. अब चरखे को चाटेंगे क्या
?” मंत्रीजी के एक लट्ठ-भारती विशेषज्ञ पट्ठे ने मूंछों पर ताव देते हुए अपनी जिज्ञासा सामने रखी।
     “मेरे ख्याल से वो चरखा हमें ही खरीद लेना था।“ एक और चुनावी झाँकी विशेषज्ञ ने सुझाव दिया।
     “क्या चरखे टाइप बात कर रहे हो यार! ब्रिटिश पौंड आज सौ रु. का है। एक करोड़ के चरखे पर एक करोड़ तो कस्टम वाले ही ले लेते। दो करोड़ से भी ज्यादा का चरखा लेकर अचार डालेंगे क्या?” पार्टी के चुनावी फण्ड के लिए चंदा वसूलने मेँ माहिर होने के कारण इन्हें बजट के समय चैनल चौपालों पर भी कुछ इसी तरह दहाड़ते हुए देखा जाता था। आज भी इस ‘अर्थशास्त्री’ कार्यकर्ता ने बापू को कुछ इसी तरह श्रद्धांजलि दी।
     “सोचो अगर बापू का चरखा हमारे पास आ जाता तो हम पटेल के स्टेचू ऑफ यूनिटीसे भी बड़ा मुद्दा जनता के सामने रख सकते थे और लोगों की व प्रेस वालों की इसगलतफहमी को भी दूर कर सकते थे कि हम गांधी को सिर्फ दो अक्तूबर और वो जनवरी मेँ कौन सी तारीख थी यार...हाँ वो तीस को ही याद करते हैं।“ इस जोरदार विचार पर कुछ ने ताली बजाई तो कुछ नंगे सिर होते हुए भी हेट्स ऑफ! हेट्स ऑफ !! चिल्लाने लगे।
     “मैं कहता हूँ अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है। क्यों न हम किसी बड़े साधू से यह बयान दिलवा दें कि उसे सपना आया है कि फलाने फलाने किसी दलित व्यक्ति के यहाँ रखा चरखा ही बापू का असली चरखा है। फिर वहाँ हमारे बड़े सर एक रात रुकें, मुँह जूठा कर लें, कुछ मच्छरों को रक्तदान कर दें और चरखा लेकर राष्ट्र को समर्पित भी कर दें। इससे ये दलित लोग भी खुश हो जाएंगे, मच्छरों का भी टेस्ट चेंज हो जाएगा और वो यूपी के साइकिल वाले बाप-बेटों का मुँह भी बंद हो जाएगा। फिर उसी चरखे से काते गए सूत मेँ से एकाध धागा लेकर बाकी सिंथेटिक सूत मिलाकर उससे बनी साड़ियाँ देश की तमाम मातृशक्ति मेँ बँटवाने की घोषणा कर दी जाए। चरखे की हिफाजत भी हो जाएगी, खादी का प्रचार भी हो जाएगा और गांधीगिरी वाला मुद्दा भी हमारे पलड़े में आ जाएगा।“ स्वयं को पार्टी का थिंक टेंक समझने व बुद्धिजीवीनुमा गेट-अप वाले वरिष्ठ नेताजी ने कहा।
       चरखा कहीं प्याज़ की तरह ले न डूबे इसलिए कुछ सुझाव आए कि मेनोफेस्टो मेँ उसे वापस लाने की घोषणा हो; या एम.जी. रोड की तरह हर  मोहल्ले मेँ एक एक चरखा केंद्र खुलवा कर  सूत कताई का साप्ताहिक आयोजन हो। और यह भी कि आचार संहिता को ठोकर मारते हुए जगह जगह चरखे के कट आउट्स लगा दिए जाएँ!     
        चरखे पर गांधीगिरी जारी है।
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100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001 (म.प्र.)
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Thursday, 7 November 2013


व्यंग्य
 ओपिनियन पोल – एक प्राचीन परंपरा
                                                  ओम वर्मा
                                                       om.varma17@gmail.com
चौदह वर्ष का वनवास काट कर प्रभु श्रीराम अयोध्या पहुँचे। इधर बिना स्वप्न आधारित या बिना पुरातत्वीय खुदाई के अपनी मातृभूमि को स्वर्णनगरी मेँ बदल देने वाले त्रिलोकपति लेकिन महाअहंकारी दशानन का वध कर जब प्रभु श्रीराम अयोध्या लौटे तो इतिहास का पहला ओपिनियन पोल उनकी राह देख रहा था ।
     बाहरी व्यक्ति द्वारा अपहृत पत्नी को वापस उचित स्थान दिए जाने का अपराध करने पर हो रही लोकनिंदा व कानाफूसी से जब रामजी  तंग आ गए तो उन्होंने स्वयं छद्म भेष धारण कर दलित के घर रात गुजारने वाली स्टाइल मेँ एक लॉन्ड्री वाले के यहाँ व कुछ अन्य अड्डों पर कुछ समय व्यतीत कर आम नागरिकों की राजा के आचरण पर प्रतिक्रिया जानी। हर अयोध्यावासी से मिलना उनके लिए संभव नहीं था। जाहिर है कि त्रेता युग के इस महान  शासक ने किसी संस्था से फिक्स्ड सर्वे करवाने के बजाय स्वयं एक सेंपल सर्वे कर पहले ओपिनियन पोल की विधिवत शुरुआत कर दी थी।
     मगर इतिहास मेँ एक और ओपिनियन पोल का उल्लेख मिलता है जो इससे थोड़ा भिन्न है। हुआ यूँ कि एक दिन बादशाह अकबर भरमा बैंगन की शानदार सब्जी खाकर मस्त हो गए थे और उसका स्वाद मुँह मेँ देर तक बना रहा। सभासदों के बीच मेँ उन्होंने सबसे पहले इसका जिक्र किया तो बीरबल ने तुरंत राजनीति के अनुशासित सिपाही की तरह बयान जारी किया, “हुज़ूर बैंगन तो सब्जियों का राजा है। उसका रंग शानदार, सर पर बादशाहों जैसा ताज! जहांपनाह का हुक्म हो तो बैंगन को राजकीय सब्जी घोषित कर दिया जाए!”
     बैंगन को राजकीय सब्जी घोषित करने की प्रक्रिया चल ही रही थी कि एक दिन बादशाह अकबर ने फिर वही मसालेदार सब्जी और ज्यादा खा ली। उन दिनों वहाँ न तो कोई जयराम रमेश थे और न कोई नरेंद्र मोदी, तब भी उन्हें शौचालय की महत्ता समझ मेँ आ गई। अगले दिन उन्होंने दरबार मेँ बैंगन की सब्जी को कोसते हुए जैसे ही अपनी हालत के बारे मेँ बताया कि चतुर सुजान बीरबल ने तुरंत नीतीशकुमार द्वारा मोदी के बारे मेँ बदली गई राय की तरह बैंगन के बारे मेँ अपनी राय बदली, जी आलमपनाह! बैंगन भी कोई सब्जी है...काला कलूटा ...सिर पर काँटों भरा ताज...कोई गोल तो कोई लंबा...! मेरी मानें तो हुज़ूर इसकी खेती पर ही पाबंदी लगा दें ताकि कल कोई इसमें नस्लीय बदलाव (जेनेटिक रूपान्तरण) न कर सके।“
     प्रभु श्रीराम चक्रवर्ती सम्राट व कानूनी तौर पर एक राज्य के राजा थे। राजतंत्र मेँ भी उन्हें ओपिनियन पोल जैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था मेँ विश्वास था। मगर लोकतंत्र मेँ चौदह वर्ष से राजनीतिक वनवास काट रहे राजा का ओपिनियन पोल के बारे मेँ स्वयं का ओपिनियन सर्वथा भिन्न है। वे शायद बीरबल द्वारा बादशाह की स्तुति जैसा राजतंत्री ओपिनियन पोल चाहते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि बैंगन प्रकरण मेँ अपनी नीति परिवर्तन पर बीरबल ने बादशाह सलामत को डिप्लोमेटिक जवाब देते हुए यह भी तो कहा था-
   “हुज़ूर गुलाम नमक आपका खाता है न कि बैंगन का!”   
   आज के बादशाहों को कौन समझाए कि जनता तो अपनी ही गाढ़ी कमाई से खरीदा नमक खा रही है हुज़ूर!  
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100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001 (म॰प्र॰)

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Tuesday, 15 October 2013


विचार
     चुनाव प्रचार मेँ बदलाव जरूरी
      
  
                             
                                          ओम वर्मा
                                    
                   om.varma17@gmail.com
पाँच राज्यों की विधान सभाओं के लिए चुनावों की घोषणा हो गई है और इनमें नई सरकारों के काम संभालते संभालते ही अगली लोकसभा के चुनावों का बिगुल भी जाएगा। चुनाव आयोग ने भले ही एक उम्मीदवार के चुनाव प्रचार की सीमा लोकसभा के लिए चालीस लाख व विधान सभा के लिए सोलह लाख रु॰ निर्धारित कर दी हो पर सच यह है कि वास्तविक व्यय इससे कई गुना ज्यादा होता है जिसमें काले धन की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। विजयी उम्मीदवार के लिए यह वह निवेश है जो उसे लाभांश प्राप्त करने के लिए पूरे पाँच वर्ष प्रेरित करता रहता है। और जिन एजेंसियों/व्यक्तियों  ने चुनावी अभियान को प्रायोजित किया है क्या वे किसी भी नीति या निर्णय को अपने अनुकूल बनवाना या लागू करवाना नहीं चाहेंगे ? इसका दूसरा पहलू यह भी है कि धनबल और बाहुबल के इस युद्ध में कभी भी अधिक बेहतर या योग्य विकल्प उभरकर सामने आ ही नहीं सकता।
     और फिर चुनाव प्रचार ! झंडे
, रैलियाँ, कानफोड़ू डीजे साउंड वाली तेज आवाज में प्रचार करते व धूल-धुएँ से पर्यावरण को प्रदूषित करते वाहन ! प्रचार – विज्ञापन में लगने वाला कई टन कागज ! किसी भी अनुत्पादक कार्य में जो पैसा लगेगा वह जाहिर है कि सिर्फ महँगाई ही बढ़ाएगा। कागज जितना अधिक प्रयुक्त होगा उतना ही अधिक पर्यावरण का विनाश...! जब हम एक टन कागज इस्तेमाल करते हैं तब हम 17 पेड़, 2103 ली. तेल, 4077 कि.वा. ऊर्जा, 31587 ली. पानी, और 266 कि.ग्रा. हवा को  प्रदूषित तथा भूमि का 2.33 घनमीटर हिस्सा 'लैण्ड फिल' यानी बंजर बना रहे होते हैं |
   
 लाख टके का सवाल य है कि आखिर चुनाव प्रचार के इस विकृत स्वरूप को कैसे बदला जाए ? इसका एकमात्र तरीका य हो सकता है कि पोस्टर, बैनर, झण्डे आदि पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिए जाएँ व चुनाव प्रचार सिर्फ टीवी के माध्यम से हो। प्रतिदिन कुछ समय उम्मीदवार के लिए व कुछ दल के अन्य नेता या वक्ता के लिए हो। पार्टी के अलग अलग स्तर के वक्ता के लिए उसके पद के अनुसार समय निर्धारित किया जा सकता है। उम्मीदवारों की आमने सामने चर्चा, बहस या परिसंवाद करवाया जा सकता है। अब प्रश्न यह आता है कि क्या इलेक्ट्रानिक मीडिया के माध्यम से रखी गई बात मतदाताओं तक पहुँचेगी या क्या आम जन इसे अपने संज्ञान में लेगा। तो जवाब यह है कि आज टीवी घर घर मेँ, झुग्गी झोंपड़ियों तक पहुँच चुका है और आम आदमी की जरूरत बन चुका है। अगर बहस को रोचक ढंग से प्रस्तुत किया जाए तो दर्शक अवश्य रुचि लेंगे। किसी भी स्थापित पद्धति को हटाने या बदलने पर पहले लोगों मेँ कुछ झिझक और विरोध होता ही है मगर धीरे धीरे उसे अपना लिया जाता है। वोटिंग मशीन (ईवीएम), कंप्यूटर, रंगीन टीवी आदि सभी चीजों का भी पहले विरोध ही हुआ था, मगर आज ये सब हमारी  जीवन पद्धति मेँ समाहित हो चुकी हैं। इसे स्थापित करने के लिए रविवार के दिन अधिक समय व प्राइम टाइम मेँ प्रतिदिन कुछ समय निर्धारित किया जा सकता है। अब समय आ गया है कि मतदान अनिवार्य करने की दिशा मेँ भी सोचा जाना चाहिए। इसके लिए मतदान करने वाले के बैंक खाते मेँ तत्काल कुछ प्रोत्साहन राशि या मानदेय जमा किया जा सकता है। यह राशि चुनावों में होने वाले खर्च और पर्यावरण को होने वाली क्षति से तो निश्चित ही कम होगी। शासकीय कर्मचारी को अगली वेतनवृद्धि मतदान प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करने पर ही दी जाए। गैस सब्सिडी या अन्य किसी भी शासकीय सुविधा या राजसहायता के लिए भी मतदान प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य किया जा सकता है। यथासंभव पूरे देश में लोकसभा व विधानसभा के चुनाव एकसाथ करवाकर भी पर्यावरण संरक्षण व चुनावी खर्च बचाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकते हैं।       
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100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001 

व्यंग्य (नईदुनिया,15.10.13)
       मात्रा और तादाद          
                                                         ओम वर्मा
                                           om.varma17@gmail.com
वे दोनों आज के महानायक हैं। एक फिल्मों के तो एक राजनीति के। फिल्मी महानायक तो जहाँ भी खड़े हो जाते हैं लाइन वहीं से शुरू होती ही है और राजनीति के महानायक जिस निर्वाचन क्षेत्र या कार्यकर्ता समागम में चले जाते हैं वहाँ या तो  आस्थाएँ बदलने लगती हैं या वहाँ के मुख्यमंत्री के अनुसार डेंगू फैलने लगता है। यह भी जाहिर है कि लोग अपने अपने महानायकों  की अदाओं, उनकी भाव भंगिमाओं और कभी कभी उनकी बातों या भाषा का अनुसरण भी करते हैं। इलाहाबादियों की हिंदी तो वैसे भी बहुत नफीस होती ही है उस पर भी यदि कोई शख्स डॉ हरिवंशराय बच्चन का पुत्र हो तो उससे अपेक्षा और भी बढ़ जाती है। तो ये महानायक जब केबीसी जैसे लोकप्रिय कार्यक्रम का संचालन करते है तो उनसे दर्शकों का भाषाई शुद्धता का आग्रह रखना कतई अनुचित नहीं होगा। इस कार्यक्रम के पिछले सीजन में उनके मुख से एक बार कृपया करके व इस बार फास्टेस्ट फिंगर फ़र्स्ट के प्रतियोगी के लिए अधिक मात्रा में अंक व एक एपिसोड में सिक्किम द्वारा सबसे कम मात्रा में सांसद भेजे जाने की बात सुनकर मेरे हिंदी प्रेमी मन को कुछ वैसा ही झटका लगा जैसे दागियों के चुनाव लड़ने की पात्रता देने वाले अपनी ही पार्टी के अध्यादेश पर कागज फाड़ू क्रांति से यूपीए -3 का ख्वाब देख रहे राहुल गांधी के प्रलाप को देखकर सारे दागियों को लगा था।
     यही स्थिति एक बार तब भी बनी जब गूगल सर्च में सबको पीछे छोड़ने वाले व चुनावों से पहले ही दक्षिण के साहित्यकार अनंतमूर्ति का ब्लड प्रेशर बढ़ाने  वाले आज के चर्चित राजनीतिज्ञ या सियासी महानायक ने पीएम की उम्मीदवारी की घोषणा के बाद रेवाड़ी में पूर्व सैनिकों के बीच उनके भारी मात्रा में उपस्थित होने का जिक्र किया। दोनों प्रकरणों ने मेरे दिमाग में भारी तादाद में खलबली मचा दी। मेरे ख्याल में अमिताभ सर ने भारी मात्रा में फिल्में की हैं। फिल्मों से उन्होंने भारी तादाद में धन कमाया है और देश में उनके प्रशंसक भी भारी मात्रा में हैं। मैं उनसे ज्यादा उनके पिताश्री का प्रशंसक हूँ जिन्होंने भारी मात्रा में उत्कृष्ट साहित्य रचा है और जिन्हें सुनने के लिए भारी मात्रा में श्रोता एकत्र हुआ करते थे। उनके कार्यक्रम केबीसी के तो क्या कहने ! बहुत कम मात्रा में कुछ (मात्र 15) आसान सवालों के जवाब देकर हम सात करोड़ रु॰ की भारी तादादवाली धनराशि जीत सकते हैं। इस देश में नौजवान मतदाताओं की मात्रा बहुत ज्यादा है। इनमें टेलेंट भी बहुत ज्यादा तादाद में है। जैसे जैसे देश में गरीब लोगों की मात्राबढ़ती जा रही है, वैसे वैसे सरकार की चिंता की तादादभी बढ़ती जा रही है।
     बड़ी ही गड्डमड्ड स्थिति है। दोनों महानायक तादादको मात्रासे कुछ इस अंदाज़ में प्रतिस्थापित कर रहे हैं मानों भारत निर्माण की तर्ज़ पर हो रहा भाषा निर्माण उनका नारा हो। दरअसल मात्रा और तादाद की गड्डमड्ड का यह घालमेल इस समय पूरे देश में जारी है क्योंकि कई क्षेत्रों में मात्रा व तादाद एक दूसरे के समानुपाती साबित हो रहे हैं। जैसे देश में कोयले की मात्रा बढ़ी तो लुटेरों की तादाद भी बढ़ी। इसी तरह ज्यों ज्यों सियासी महानायक को आदमखोर और फेंकू जैसी उपाधियाँ दी गईं त्यों त्यों उनकी लोकप्रियता की मात्रा और और उसी अनुपात में प्रशंसकों की तादाद भी बढ़ती गई। इधर ज्यों ज्यों  फिल्मी महानायक की फिल्मों और प्रशंसकों की तादाद बढ़ी, त्यों त्यों केबीसी में उनकी माँग और लोकप्रियता की मात्रा भी बढ़ी। सभी जगह मात्रा और तादाद भक्त और भगवान की तरह कुछ यूं एकाकार हो गए हैं कि दोनों महानायकों के मुख से भी तादाद की जगह बार बार अब मात्रा मात्रा ..... निकल जाता है।
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100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001 मो.09302379199 

                                       

व्यंग्य, 

दबंग दुनिया , 30/11/12
        

         मोर की दिखावटी पूँछ और मंत्रिमण्डल

                                     
                                                                ओम वर्मा
(om.varma17@gmail.com)
लिज़ाबेद काल के प्रसिद्ध अँगरेजी निबंधकार सर फ्राँसिस बेकन ने अपने एक निबंध ऑव फालोअर्स एण्ड फ्रेंड्स (Of followers and friends)  में लिखा है कि “शासक या बड़े व्यक्ति को अनुगामियों या मुसाहिबानों की अधिकता से हमेशा बचना चाहिए क्योंकि उनकी अधिकता उनके रखरखाव को बहुत खर्चीला बना देती है" अपने दरबारियों पर जरूरत से ज्यादा खर्च करने वाले शासक की तुलना मोर से करते हुए वे लिखते हैं- "मोर की पूँछ के दिखावटी पंख जितने ज्यादा बड़े होते
 हैं, उसकी उड़ान में वे उतने ही ज्यादा बाधक भी होते हैं। उनकी साज-सजावट पर 
उसे अतिरिक्त ध्यान देना पड़ता है सो अलग ।"
         बेकन के कथन से कम से कम यह तो जाहिर होता ही है कि मंत्रिमण्डल में ज्यादा मंत्री रखने यानी सफेद हाथी पालने की समस्या कल भी थी और आज भी है; पश्चिम में भी थी और पूर्व में भी  है।
       लेकिन बेकन ने जो कहा उसे हम भी मानें यह जरूरी तो नहीं! सूत्रात्मक (aphoristic)शैली में लिखे अपने निबंधों में बेकन ने ऐसी कई बातें कही हैं जिनका पालन खुद उन्होंने नहीं किया। बेकन एक अन्य विचारक एलेक्ज़ेंडर पोप के शब्दों में चतुरतम के साथ-साथ क्षुद्रतम(wisest and meanest of mankind) भी थे। उन्हें राज्य द्वारा दंडित भी किया गया था। तो फिर हम ही क्यों मानें उनकी बात? हम बात भले ही करें पूरे हिंदुस्तान की पर सुनते हैं सिर्फ आलाकमान की।
     अधिवेषणों में गांधी के नाम पर पहने जाने वाली खद्दर की टोपी को पहने गांधी जी का कोई चित्र मैंने तो आज तक कहीं नहीं देखा। तो फिर हमारे मनमोहन जी से ही क्यों अपेक्षा रखी जाए कि वे 79 मंत्रियों वाला जंबो मंत्रिमण्डल का बोझ देश की जनता पर न डालें। जो जनता टू जी से लेकर कोयला खदान के घोटाले तक और महँगे पेट्रोल से लेकर हिमालयीन जड़ी-बूटियों की तरह दुर्लभ होते जा रहे गैस सिलेंडरों की कीमतों के बोझ को सह कर भी जिंदा है वह क्या बाईस नए मंत्रियों का बोझ नहीं सहन कर सकती !
       मंत्रियों की तादाद और दर्ज़े का संबंध अब राज्य की आबादी से जुड़ा मुद्दा भी है। चाहें तो चीन का उदाहरण देख लें जहाँ हर सांसद उपमंत्री के दर्ज़े का होता है। मोरारजीभाई के प्रधानमंत्री काल में चरणसिंह उपप्रधानमंत्री थे। एक बार म.प्र. में दो उपमुख्यमंत्री थे। विद्रोहियों व असंतुष्टों का स्वागत करने की हमारी प्राचीन परंपरा रही है। विभीषण ने लंकेश से विद्रोह किया, पुरस्कार में पाया लंका का राज सिंहासन ! म.प्र. में अर्जुनसिंह के समय कुछ विधायक असंतुष्ट हुए और पाया निगमों व मण्डलों का अध्यक्ष पद ! अब राजनीति में आए हैं, लाखों रुपए खर्च कर चुनाव लड़ा है, तो क्या खाली-पीली सांसद या विधायक बने रहने के लिए ! फिर जिंदा क़ोमें तो वैसे भी पाँच साल इंतजार नहीं कर सकतीं !      
      मैं डॉ. मनमोहनसिंह के मनमोहक मंत्रिमण्डल के विराट स्वरूप के आगे नतमस्तक हूँ !                                            ***    

                               
                             100, रामनगर एक्स्टेंशन, देवास
455001