Tuesday, 28 January 2014
व्यंग्य
मौसम का बिगड़ा मिजाज़
ओम वर्मा
कथाशिल्पी प्रेमचंद की
कहानी ‘पूस की रात’…!
ठण्ड
से ठिठुरता हलकू और मुन्नी...! मुन्नी हलकू को बार बार कोसती रहती है कि वह
इफ़रात में खर्च न करे ताकि कुछ बचत हो सके
और ‘कम्मल’ (कंबल) खरीदा
जा सके जिससे ‘पोस-माघ’ ढंग से कट
सकें!
आज भले ही हलकू हलकप्रसाद और मुन्नी मुन्नी
मैडम में बदल गई हो मगर कुछ नहीं बदला तो वह है माघ पूस की रातें। कंबल हर घर में
है मगर फिर भी सर्दियाँ हैं कि जान लेवा साबित हो रही हैं। आज मुन्नियाँ हलकुओं को
कोस रही हैं- “इस मुई ठण्ड का क्या करूँ...कहा था कि रजाई भारी बनवाना... बनवा लाए चादरे जैसी...! रूम
हीटर ही ले आते तो कमरा ही थोड़ा गर्म हो जाता...! अब इन मुन्नियों को कौन समझाए कि
यदि रूम हीटर चलाए गए तो बाद में बिजली का बिल देख कर दिमाग पर जो गर्मी चढ़ेगी उसे
उतारने के लिए या तो केजरीवाल को धरने पर या संजय निरूपम को भूख हड़ताल पर बैठाना
पड़ेगा।
मौसम विज्ञानी दाड़ी बढ़ाकर अंधत्व निवारण
शिविर से ऑपरेशन करवा कर लौटे रोगी या दक्षिण के अभिनेता से नेता बने राजनेता की
तरह काला चश्मा लगा कर सूट टाई पर भी शॉल लपेटे छिपते फिर रहे हैं। एक श्रीमान अलाव
तापते गरम हाथों, यानी रँगे
हाथों पकड़ा ही गए। कल तक जो ग्लोबल वार्मिंग के नाम से डरा डरा कर मुंबई जैसे
तटवर्ती शहरों के डूब जाने का खतरा बता रहे थे वे आज ग्लोबल कूलिंग की बात करते
फिर रहे हैं।
अपने राम को न तो वैज्ञानिकों की बात समझ
में आती है और न ही ज्योतिषियों की। ज्वलंत विषयों पर दोनों वर्गों के लोग जो
भविष्यवाणी करते हैं,वह प्रायः फेल
हो जाती है। बाद में ये अपनी गणनाओं की त्रुटि का कारण बताने लगते हैं या फिर
“हमारा मतलब यह नहीं था...” जैसी बेमतलब की लीपापोती करने लग जाते है।
लाख टके की बात यह है कि आखिर इस जमा देने
वाले जाड़े से निज़ात मिले तो कैसे? कुछ ‘फायर ब्राण्ड’ बयानवीर अपने बयानों से सियासी आग भले
ही लगा दें, मगर भौतिक रूप से गर्मी उत्पन्न नहीं कर सकते!
इसी तरह कल तक जो मुझे राह रोक रोक कर पूछा करते थे कि अगले चुनाव में ऊँट किस
करवट बैठेगा, वे आज पूछते हैं कि नए टोपे बाज़ार में आए या
नहीं, या ये स्वेटर कहाँ से लिया, या
यह कि आखिर ये ठण्ड कब खत्म होगी यार...! हिन्दी की प्रसिद्ध कहानी ‘उसने कहा था’ का वह दृश्य रह रह कर कौंध जाता है
जिसमें लहनासिंह के साथी ठण्ड से परेशान हैं और चाहते हैं कि ‘जंग’ हो ताकि कुछ गर्मी आए।
इन दिनों जिसे देखो वही कुछ ठिगना नज़र आ रहा
है। क्या लोगों की औसत ऊँचाई एक दो इंच कम हो गई है। ध्यान से देखने पर समझ में
आता है कि हर शख्स सिकुड़कर गुड़ी-मुड़ी होकर चल रहा है। मिलते ही तपाक से हाथ मिलाने
वाला शख्स देखते ही मुँह फेर रहा है कि कहीं गलती से जेब की गर्मी छोडकर हाथ बाहर
न निकालना पड़ जाएँ। गलती से अगर उन्हें हाथ मिलाना भी पड़े तो सामने वाले से एक
बत्ती कनेक्शन वाले की तरह ज्यादा से ज्यादा एनर्जी खींचने की कोशिश करने लगते
हैं। इधर चौराहे पर जो आग जल रही है वह कोई विरोध प्रदर्शन या पुतला दहन नहीं है। यह
तो ठण्ड भगाने का इंतजाम है। जिन्हें मैं प्रदर्शनकारी समझ बैठा था वे और दो पुलिस
के जवान अलाव ताप रहे हैं।
मोदी के पक्ष में चाहे लहर हो या न हो, शीत के पक्ष में लहर है यह सभी एकमत से
स्वीकार रहे हैं। भोपाल के यूनियन कार्बाइड में जैसे किसी की गलती से ‘मिक’ गैस के टेंक का वॉल्व खुल गया था, वैसे ही शायद ऊपर वाले के दरबार में कोई मौसम का स्विच चेंजओवर करना
भूलकर आराम से बीड़ी पीने चला गया है। नीचे वाले मरें तो मरें, उसकी बला से!
सुबह हो गई है...दरवाजे पर पेपर फेंकने की
आवाज आ चुकी है। कोई भी पेपर उठा कर लाने को तैयार नहीं है। रज़ाई कौन छोड़े! आज
संडे है। किसकी हिम्मत जो मुझे जल्दी उठा सके। घर के अस्सी वर्षीय वरिष्ठ नागरिक
अखबार के बिना छटपटाने लगते हैं, और शॉल, टोपे, मोजे के जिरहबख्तर में क़ैद होकर जाकर उठा
लाते हैं। श्रीमतीजी कुढ़मुढ़ा रही हैं कि ‘बाई’ आज भी आती दिखाई नहीं देती।
सुबह सुबह
स्कूलों में बच्चे मुँह से वाष्प छोडकर ध्रूमपान की नकल करने लगते हैं।
क...क...किरण बोलने वाले इस शख्स को आप शाहरुख खान समझने की भूल न करें। दरअसल
ठण्ड के मारे इसके दाँत किटकिटा रहे हैं। पारा जितना नीचे होने लगता है, ‘भियाजी’ की लाल रंग की ‘दवा’ का डोज़ भी
उसी अनुपात में बढ़ जाता है। ठण्ड से अपने अपने ढंग से सबकी जंग जारी है। ***
संपर्क
: 100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001
मेल ID om.varma17@gmail.com
Sunday, 15 December 2013
व्यंग्य (नईदुनिया, 06.04.13)
इनकी दाड़ियाँ आखिर कब कटेंगी ?ओम वर्मा om.varma17@gmail.com
उन तीनों में अलगू चौधरी और जुम्मन शेख से भी गाढ़ी मित्रता थी। तीनों को अक्सर राष्ट्रहित, जनहित, विश्व शांति व मानवता को प्रभावित कर सकने वाले हर ज्वलंत मुद्दे पर बहस- चिंतन करते देखा जा सकता था।
तीनों की संत फक़ीरों की तरह बढ़ी हुई दाड़ियाँ देखकर मैं थोड़ा चौंका। पांचाली के केश खुले रखने, चाणक्य द्वारा चोंटी पर गाँठ बाँधने और इंदिरा गाँधी को चुनाव में हराने वाले राजनारायण जी द्वारा दाड़ी बढ़ाने के पीछे जाहिर है कि समय की धारा को मोड़ देने जैसे कोई संकल्प हुआ करते थे जिनके पूरे होने पर केश विन्यास हुए, गाँठें खोली ग्ईं और समारोहपूर्वक दाड़ी बनवाई गई। तीनों ने अपने संकल्पों के बारे में कुछ इस तरह बताया-
रामलाल दिल्ली रेप काण्ड के बाद से पूरे देशवसियों की तरह व्यथित थे। स्त्री की अवमानना तो द्वापर और त्रेता युग में भी हुई थी। मगर आजकल अवमानना का स्थान हर दूसरे – तीसरे दिन होने वाले सामूहिक उत्पीड़न व बलात्कार (मीडिया की भाषा में ‘गेंग रेप’ )ने ले लिया। लिहाजा रामलाल ने भी केश खुले रखने की तर्ज पर दाड़ी न बनाने की शपथ ली है। उनका संकल्प है कि जब तक लगातार पूरे सात दिन बिना ‘गेंग रेप’ की खबर वाले अखबार एकत्र न कर लें, दाड़ी नहीं बनाएँगे। उनके बैग में ऐसे ‘सामूहिक अभियानों’ की ढेर सारी कतरनें भी थीं।
दूसरे मित्र मुहम्मद भाई से दाड़ी न कटवाने का राज पूछा तो वे कुछ इस अंदाज़ में बोले – “मैं अपने मुल्क में हो रहे नित घोटालों से हैरान-परेशान हूँ। विपक्ष वाले एक के पीछे हंगामा करें, धरने में लगे टेंट वाले की उधारी चुकाने वाले को ढूढ़ें उसकी पहले ही अगला घोटाला उजागर ! मैंने भी प्रण किया है कि अखबारों में जिस दिन भी घोटाले की खबरों में कम से कम एक सप्ताह का अंतर होगा तभी अपनी दाड़ी बनवाऊँगा। कतरनें इनके पास भी कुछ कम न थीं।
तीसरे मित्र डिसूजा ने अपनी दाड़ी बढ़ाने का भी कुछ ऐसा ही ठोस कारण बताते हुआ कहा, “जिस दिन अखबार में देश व प्रदेश की राजधानियों में नेता द्वारा गाली गलौच की भाषा वाला या एक दूसरे को साँप बिच्छू व दीमक की उपाधि देने वाला, एक दूसरे के निजी जीवन या चरित्र पर लांछन लगाने वाला बयान या किसी के विवाह करने या न करने पर कोई अमर्यादित टिप्पणी नहीं मिलेगी, उस दिन ही दाड़ी बनवाऊँगा। इनके पास भी रामलाल व मुहम्मद की तरह कतरनों का ढेर था। जब तक दुष्कर्मी, घोटालेबाज़ और बयानवीर अपना‘कर्म’ नहीं छोड़ते तब तक भाई राम, मुहम्मद और डिसूजा, अपना संकल्प नहीं छोड़ने वाले!
मुझे उम्मीद है कि मैं अपने जीवनकाल में एक बार इन तीनों को क्लीन शेव देख पाऊँगा।
आमीन !
***
Saturday, 14 December 2013
विचार
तीन भारत रत्न, नरेंद्र मोदी और
साहित्यकार
ओम वर्मा
‘उनके साम्राज्य मेँ सूर्य कभी अस्त नहीं होता।‘ सुगम संगीत की इस साम्राज्ञी के लिए कहे गए इस कथन से बेहतर कोई दूसरी उक्ति हो ही नहीं सकती। वे कई दशकों से फिल्म संगीत मेँ, हर हिंदुस्तानी के दिल मेँ और माँ सरस्वती के आँचल तले बसी हुई हैं। कृतज्ञ राष्ट्र ने इसके लिए उन्हें भारत-रत्न जैसे सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित कर एक तरह से इसी भावना या विचार का अनुमोदन ही तो किया है।
लता मंगेशकर वह शख्सियत हैं जो धर्म, जातीयता और राजनीतिक विचारधारा से कहीं ऊपर
हैं। राज्य सभा के कांग्रेसी सांसद सचिन तेंडुलकर को वे अपने पुत्रवत और भाजपा के
पितृ-पुरुष आडवाणी जी को वे आदरवश दादा बोलती हैं। यानी उनके प्रशंसक इस दल से उस
दल तक या कहें कि चतुर्दिक फैले हुए हैं। उनकी इस सर्वस्वीकृत छवि के आगे राजनीतिक
छवि या किसी दल विशेष के व्यक्ति की छवि की तुलना की जाए तो वामन और विराट वाली
स्थिति बनती है। तटस्थता के प्रति इसी प्रतिबद्धता मेँ अपनी आस्था व्यक्त करने के
लिए कई बार देश के तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपतियों ने मतदान का अधिकार त्यागा
भी है।
इस परिप्रेक्ष्य में यह प्रश्न विचारणीय है कि क्या लता जी को अपनी यह इच्छा कि ‘नरेंद्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनना चाहिए’ सार्वजनिक मंच पर व्यक्त करनी चाहिए? इस देश की नागरिक होने के नाते उन्हें अपनी पसंद के उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करने का पूरा अधिकार है और सार्वजनिक मंच पर अपनी राय व्यक्त करने से भी इस देश का कानून उन्हें रोक नहीं सकता। लेकिन कानूनी अधिकार और नैतिकता को एक पलड़े पर नहीं तोला जा सकता। राहुल गांधी और उनके दल या यहाँ कहें कि यूपीए परिवार में भी उनके प्रशंसक लाखों में ही होंगे। क्या वे इस सरस्वतीकन्या के आशीर्वाद के पात्र नहीं हैं? ईश्वर की स्तुति या आराधना कर कोई भक्त आशीर्वाद माँगता है तो वह प्रतिद्वंद्वी के लिए आराधना व कृपा के द्वार बंद नहीं कर रहा होता है। मगर भारतीय जनमानस में देवीय आसान ग्रहण कर चुकी स्वर साम्राज्ञी जब नरेंद्र मोदी को पीएम के रूप में देखने की इच्छा व्यक्त करती हैं तो उसका निहितार्थ नरेंद्र मोदी के किसी भी प्रतिद्वंद्वी के लिए पराजय की कामना भी तो है। यानी प्रतिद्वंद्वी के लिए उनके पास आशीर्वाद और शुभकामनाओं का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। लता जी ने मोदी को लेकर जो मनोकामना व्यक्त की इस बात को लेकर उनके पक्ष या विरोध मेँ तर्क दिए जा सकते हैं पर उनसे ‘भारत रत्न’ वापस लिए जाने की माँग निर्विवाद रूप से निहायत ही घटियापन है। यही दुविधा एक अन्य ‘भारत रत्न’ अमर्त्य सेन को लेकर सामने आती है। मोदी के नाम पर उन्होंने अपने विचार कुछ ऐसे व्यक्त किए मानो मोदी राजनीति के क्षेत्र मेँ ही नहीं बल्कि देश के लिए भी अस्पृश्य और अवांछित व्यक्ति हों। क्या उनके ये विचार उन्हें दिए गए ‘भारत रत्न’ अलंकरण का रिटर्न गिफ्ट’ नहीं माने जाने चाहिए? अब यदि कल मोदी पीएम बन जाएँ तो क्या वे विरोध स्वरूप ‘भारत रत्न’ अलंकरण वापस लौटाएंगे?
इस परिप्रेक्ष्य में यह प्रश्न विचारणीय है कि क्या लता जी को अपनी यह इच्छा कि ‘नरेंद्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनना चाहिए’ सार्वजनिक मंच पर व्यक्त करनी चाहिए? इस देश की नागरिक होने के नाते उन्हें अपनी पसंद के उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करने का पूरा अधिकार है और सार्वजनिक मंच पर अपनी राय व्यक्त करने से भी इस देश का कानून उन्हें रोक नहीं सकता। लेकिन कानूनी अधिकार और नैतिकता को एक पलड़े पर नहीं तोला जा सकता। राहुल गांधी और उनके दल या यहाँ कहें कि यूपीए परिवार में भी उनके प्रशंसक लाखों में ही होंगे। क्या वे इस सरस्वतीकन्या के आशीर्वाद के पात्र नहीं हैं? ईश्वर की स्तुति या आराधना कर कोई भक्त आशीर्वाद माँगता है तो वह प्रतिद्वंद्वी के लिए आराधना व कृपा के द्वार बंद नहीं कर रहा होता है। मगर भारतीय जनमानस में देवीय आसान ग्रहण कर चुकी स्वर साम्राज्ञी जब नरेंद्र मोदी को पीएम के रूप में देखने की इच्छा व्यक्त करती हैं तो उसका निहितार्थ नरेंद्र मोदी के किसी भी प्रतिद्वंद्वी के लिए पराजय की कामना भी तो है। यानी प्रतिद्वंद्वी के लिए उनके पास आशीर्वाद और शुभकामनाओं का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। लता जी ने मोदी को लेकर जो मनोकामना व्यक्त की इस बात को लेकर उनके पक्ष या विरोध मेँ तर्क दिए जा सकते हैं पर उनसे ‘भारत रत्न’ वापस लिए जाने की माँग निर्विवाद रूप से निहायत ही घटियापन है। यही दुविधा एक अन्य ‘भारत रत्न’ अमर्त्य सेन को लेकर सामने आती है। मोदी के नाम पर उन्होंने अपने विचार कुछ ऐसे व्यक्त किए मानो मोदी राजनीति के क्षेत्र मेँ ही नहीं बल्कि देश के लिए भी अस्पृश्य और अवांछित व्यक्ति हों। क्या उनके ये विचार उन्हें दिए गए ‘भारत रत्न’ अलंकरण का रिटर्न गिफ्ट’ नहीं माने जाने चाहिए? अब यदि कल मोदी पीएम बन जाएँ तो क्या वे विरोध स्वरूप ‘भारत रत्न’ अलंकरण वापस लौटाएंगे?
यहाँ हाल ही मेँ ‘भारत रत्न’ से नवाजे
गए सचिन तेंडुलकर का उदाहरण सामने आता है। वे राज्य सभा में यूपीए सरकार के मनोनीत
सांसद हैं। उनका क्रिकेट प्रेमियों के बीच वही स्थान है जो संगीत प्रेमियों के बीच
लता जी का। शासक दल की ओर से उनसे कांग्रेस का चुनाव प्रचार करने का आग्रह किया
गया तो उन्होंने विनम्रतापूर्वक इंकार करके अपना कद और भी बढ़ा लिया। सचिन पूरे देश
का वह रत्न है जिसकी बिदाई की तुलना अमेरिकी अखबार द्वारा गांधीजी की बिदाई से की गई, ब्रिटिश संसद द्वारा जिसे बधाई दी गई और जिसके सारे रेकॉर्ड्स स्वयं उसकी
महानता की कहानी कह रहे हैं। ऐसे सचिन अगर
किसी दल विशेष का प्रचार करते तो क्या वे अपने आभा मण्डल को सीमित नहीं कर रहे होते? क्या तब उनके लिए वानखेड़े मेँ लग रही ‘सचिन सचिन’ की एक सुर मेँ लगाई जा रही पुकार बीच मेँ किसी भी पल ‘मोदी मोदी’ मेँ नहीं बदल जाती!
कुछ ऐसा ही चमत्कार दो साहित्यकारों ने कर
दिखाया। कन्नड़ साहित्यकार अनंतमूर्ति ने मोदी को लेकर जो बयानबाजी की वह किसी भी
साहित्यकार के लिए सर्वथा अशोभनीय है। जिसे जनता ने तीन बार चुना हो और जब गुजरात
दंगों की सर्वोच्च अदालत के मार्गदर्शन मेँ हुई जाँचों मेँ भी इस बात के कोई सबूत
नहीं पाए गए कि दंगों के लिए मोदी स्वयं किसी भी प्रकार से जिम्मेदार थे, उसके लिए अन्य राज्य के साहित्यकार द्वारा
विरोध करना क्या गुजरात की जनता का अपमान नहीं है? गुजरात के
दंगों मेँ मोदी द्वारा समय पर नियंत्रण न कर पाने और ’84 के
सिख नरसँहार मेँ तत्कालीन दिल्ली सरकार द्वारा न कर पाने को अलग अलग चश्मे से
देखने वाले शंका के घेरे मेँ आने से नहीं बच सकते। इससे बेहतर होता कि अनंतमूर्ति
नरेंद्र मोदी के विचारों का तार्किक भाषणों या लेखों के माध्यम से जवाब देते।
ऐसी ही एक अप्रिय व फूहड़ स्थिति मेरे शहर
(देवास) मेँ अभी कुछ माह पूर्व एक पुस्तक विमोचन के कार्यक्रम मेँ बनी। कार्यक्रम
मेँ पधारे एक कवि की कविता का विषय ‘उनमें व नरेंद्र मोदी के नाम मेँ समानता’ को लेकर
था। लोकतांत्रिक पद्धति से निर्वाचित किसी राजनीतिक शख्सियत को कविता के बहाने भी
गालियाँ दी जा सकती हैं यह पहली बार देखा था। इस दौरान कुछ श्रोताओं को असहज होते
व बाद मेँ अधिकांश को तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भी देखा गया। कवि को अपने
नाम ‘नरेंद्र’ (विदिशा के नरेंद्र जैन)
होने पर तो अफसोस था पर उन्हें शायद यह पता नहीं है कि नरेंद्र नाम आचार्य नरेंद्र
देव व स्वामी विवेकानंद का भी था।
अब समय आ गया है कि राजनीति के धरातल से ऊपर
स्थापित किए जा चुके सेलेब्रिटीज़ तय करें कि वे राष्ट्र की धरोहर हैं, न कि किसी राजनीतिक दल की। उनकी
प्रतिबद्धता शोषित, आमजन व अंततः वतन के प्रति ही होनी चाहिए, किसी दल या राजनीतिक व्यक्तित्व के लिए नहीं। इसी तरह साहित्यकारों मेँ
सियासती छद्म का थाह लेने की सूक्ष्म दृष्टि होनी चाहिए। उन्हें अपनी लेखनी को
वैमनस्य फैलाने का माध्यम हरगिज़ नहीं बनने देना चाहिए।
***
100, रामनगर एक्सटेंशन,
देवास 455001 (म.प्र.)
Friday, 13 December 2013
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भारत एक त्योहारों का देश है। यकीन न हो तो आप कोई भी कैलेंडर उठाकर देख लें। हर दिन किसी न किसी धर्म, जाति, संप्रदाय, खाप या कबीले का त्योहार या उसके किसी 'महापुरुष' की जन्म या निर्वाण तिथि मिलेगी। उस दिन भी इनमें से कोई बड़ा त्योहार ही था।
हर त्योहार की तरह उस दिन उमंग-उल्लास देखते ही बनता था। सुबह के बाद थोड़ा समय सुख-चैन से बीता ही था कि दोपहर तक उमंग और उल्लास उन्माद में बदलने लगा। आठ-दस डीजे साउंड एवं 'उभरते' नेताओं के आदमकद पोस्टरों से सजे-सँवरे वाहन शहर में घूमने लगे।
ND
देखते ही देखते शहर का कोना-कोना कानफोड़ू संगीत के शोर-शराबे में डूब गया। बीमार अपने-अपने इष्ट देवता का स्मरण करने लगे। कुछ लोगों की नजरों में, घर में बोझ समझे जाने वाले वरिष्ठ नागरिक अपनी बेकाबू धड़कनों को थामने की नाकामयाब कोशिशें करने लगे।
आखिर हिम्मत करके एक कबीरनुमा सज्जन ने चौराहे पर जाकर एक अति उत्साही कार्यकर्ता को समझाने यानी भैंस के आगे बीन बजाने का प्रयास करते हुए कहा, 'भाई! थोड़ा कम आवाज में बजाओ। इतनी तेज आवाज से बच्चे, बूढ़े और बीमार सभी को तकलीफ होती है।'
इस पर धर्मप्रेमी सज्जन ने जवाब दिया, 'क्यों, हमको तो मनाकर रिये हो, पर जब 'उनके' त्योहार पर वे जोर से बजाते हैं तब उनको क्यों नहीं रोकते! जाहिर है कि कबीर निरुत्तर हो गए थे।
कुछ दिन बाद दूसरे संप्रदाय का त्योहार आया। फिर वही कानफोड़ू डीजे साउंड...शोर-शराबा, नारों से गूँजता और झंडियों से पटा शहर...!" बदला था तो सिर्फ लोगों के दुपट्टों, टोपियों और झंडियों का रंग। इस कबीर की फिर वही पीड़ा थी। इसने फिर वही हिमाकत की। और जाहिर है कि फिर वही उत्तर पाया, 'क्यों हमको तो मना कर रिये हो पर...।'
ND
कबीर का यह वंशज तब से अब तक दोनों समुदायों के बीच अपने प्रश्नों का उत्तर खोज रहा है। तय नहीं हो पा रहा है कि यह घातक ध्वनि प्रदूषण आखिर किस धर्म, मजहब या समुदाय के अनुयायी फैला रहे हैं? बच्चों, बुजुर्गों और बीमारों की शांति पर डाका आखिर कौन डाल रहे हैं? ये इसलिए चिल्ला रहे हैं कि कल वो चिल्ला रहे थे...! कल वो इसलिए चिल्लाएँगे कि आज इन्होंने नाक में दम कर रखा है।
ऐसी कई श्रृंखलाएँ अनवरत जारी हैं। आज ये संसद इसलिए ठप कर रहे हैं कि कल उन्होंने की थी। या अगली बार सत्ता में ये आ गए तो कल वे करेंगे। सीधी सी बात है कि मुर्गी क्यों है? क्योंकि अंडा है। वही अंडा जो किसी मुर्गी ने ही दिया है। पहले किसे खत्म किया जाए ताकि दूसरा भी न रहे, यह चिंतन आज और भी प्रासंगिक हो गया है।
मुर्गी पक्ष वाले और अंडा पक्ष वाले दोनों यह कब समझेंगे कि उदरस्थ तो दोनों को ही किया जा रहा है। और पहले आप-पहले आप में हमारी 'शांति एक्सप्रेस' छूटी जा रही है। ***
ओम वर्मा
नईदुनिया, इंदौर ने अपने कुछ गिने चुने उत्कृष्ट व्यंग्य अपने वेब- पोर्टल 'वेबदुनिया' पर अपलोड कर रखे हैं। उनमें जनवरी'2011 में प्रकाशित मेरा यह प्रिय व्यंग्य भी है।
भारत एक त्योहारों का देश है। यकीन न हो तो आप कोई भी कैलेंडर उठाकर देख लें। हर दिन किसी न किसी धर्म, जाति, संप्रदाय, खाप या कबीले का त्योहार या उसके किसी 'महापुरुष' की जन्म या निर्वाण तिथि मिलेगी। उस दिन भी इनमें से कोई बड़ा त्योहार ही था।
हर त्योहार की तरह उस दिन उमंग-उल्लास देखते ही बनता था। सुबह के बाद थोड़ा समय सुख-चैन से बीता ही था कि दोपहर तक उमंग और उल्लास उन्माद में बदलने लगा। आठ-दस डीजे साउंड एवं 'उभरते' नेताओं के आदमकद पोस्टरों से सजे-सँवरे वाहन शहर में घूमने लगे।
आखिर हिम्मत करके एक कबीरनुमा सज्जन ने चौराहे पर जाकर एक अति उत्साही कार्यकर्ता को समझाने यानी भैंस के आगे बीन बजाने का प्रयास करते हुए कहा, 'भाई! थोड़ा कम आवाज में बजाओ। इतनी तेज आवाज से बच्चे, बूढ़े और बीमार सभी को तकलीफ होती है।'
इस पर धर्मप्रेमी सज्जन ने जवाब दिया, 'क्यों, हमको तो मनाकर रिये हो, पर जब 'उनके' त्योहार पर वे जोर से बजाते हैं तब उनको क्यों नहीं रोकते! जाहिर है कि कबीर निरुत्तर हो गए थे।
कुछ दिन बाद दूसरे संप्रदाय का त्योहार आया। फिर वही कानफोड़ू डीजे साउंड...शोर-शराबा, नारों से गूँजता और झंडियों से पटा शहर...!" बदला था तो सिर्फ लोगों के दुपट्टों, टोपियों और झंडियों का रंग। इस कबीर की फिर वही पीड़ा थी। इसने फिर वही हिमाकत की। और जाहिर है कि फिर वही उत्तर पाया, 'क्यों हमको तो मना कर रिये हो पर...।'
ऐसी कई श्रृंखलाएँ अनवरत जारी हैं। आज ये संसद इसलिए ठप कर रहे हैं कि कल उन्होंने की थी। या अगली बार सत्ता में ये आ गए तो कल वे करेंगे। सीधी सी बात है कि मुर्गी क्यों है? क्योंकि अंडा है। वही अंडा जो किसी मुर्गी ने ही दिया है। पहले किसे खत्म किया जाए ताकि दूसरा भी न रहे, यह चिंतन आज और भी प्रासंगिक हो गया है।
मुर्गी पक्ष वाले और अंडा पक्ष वाले दोनों यह कब समझेंगे कि उदरस्थ तो दोनों को ही किया जा रहा है। और पहले आप-पहले आप में हमारी 'शांति एक्सप्रेस' छूटी जा रही है। ***
Wednesday, 4 December 2013
एक सपने की मौत
ओम वर्मा om.varma17@gmail.com
जब पहली बार उससे मेरी आँखे चार हुईं तो
मैं हतप्रभ रह गया। सोचता रह गया कि ये आँखें मैंने पहले कहाँ देखी हैं ! दिमाग पर
ज्यादा देर तक जोर नहीं डालना पड़ा। अभी कुछ दिन पूर्व ही मुंबई के जीजाबाई उद्यान
में स्थित चिड़ियाघर में अपनी छह वर्षीया भतीजी को घुमाने ले गया
था। वहाँ देखा था एक मृगशावक जिसकी आँखें मैं निर्निमेष देखता रह गया था ! मुझे
लगा था कि ऊपर वाले की वर्कशॉप में पूरे छह दिन यानी सोमवार से शनिवार तक बाकी
सारे जीव बनाए जाते होंगे और मृग सिर्फ संडे को। मगर उस मृगशावक को देखकर मेरा
संडे वाला भ्रम भी टूट गया था। उस शावक को संडे को बनाने के बाद ईश्वर की वर्कशॉप
के सारे मिस्त्री शायद हड़ताल पर चले गए थे और शावक की आँखे बनाना रह गई थीं। फिर
ईश्वर ने स्वयं अपने हाथों से दो तीन दिन का समय लिया और उस मृग शावक की आँखें
तैयार की। शायद वे आँखें वहाँ से निकलकर या उड़कर इसके चेहरे पर लग गई हैं...या
शायद इसने चुरा ली हैं।
घर पर मेनगेट से प्रवेश करते ही पहले नज़र गलियारे में लगे नल और बरतन
माँजने के स्थान पर पड़ती है। उस दिन शाम को ऑफिस से जैसे ही घर लौटा और बरतन माँजती उस ‘मृगनयनी’ से मेरी आँखें चार
हुईं कि मुझे हिप्नोटाइज़ होने में देर नहीं लगी। पत्नी ने द्वार खोला और मुझे उस
बारह- तेरह वर्षीया मृगलोचनी की आँखों के मोहपाश से मुक्त कराते हुए कहा,
“यह सपना है, आज से इसको रखा है
झाड़ू पोंछा और बरतन के लिए...!”
उसका पूरा चेहरा रक्ताभ था। ड्राइंग रूम में आने के बाद ‘सुनयना’ की आँखों व जंगली
फूल जैसे सौंदर्य के मोहपाश की मनःस्थिति से पति होने की अहंकारी मनःस्थिति में
लौटते हुए मैंने पत्नी से पूछा,
“तुमने इसको काम पर क्यों रखा ? इतनी छोटी लड़की क्या काम कर पाएगी ! और जरा उसका रंग-रूप देखो ! कल से
उसके साथ दिल्ली जैसा कुछ उल्टा-पुल्टा हो जाए तो हम कहाँ भागते फिरेंगे !”
“मैंने इसे नहीं इसकी माँ को रखा था,” पत्नी ने सरकारी किस्म का जवाब देकर मुझे संतुष्ट करने का प्रयास किया, “पर माँ ने काम और
पैसा तय करके हमारे यहाँ अपनी लड़की को रखवा दिया और खुद पीछे वाली ठाकुर भाभी के
यहाँ काम करने चली गई।“
तो यह बात है। मुझे इन काम वाली बाइयों पर कोफ्त होने लगी। काम ढेर सारा ले
लेती हैं और नहीं बनता तो बच्चों को उलझा लेती हैं।
अपनी बिटिया से मैंने स्कूल होमवर्क और पढ़ाई की जानकारी ली। मुझे यह सोचकर
आत्मसंतुष्टि हुई कि मैं पढ़ा-लिखा हूँ और परिवार का निर्वाहन करने में सक्षम हूँ...बच्चों को पढ़ा-लिखा कर इस
लायक तो बना ही सकता हूँ कि मेरे बच्चों को कहीं ‘छोटू’ या ‘बारीक़’ नहीं बनना पड़ेगा, और न ही कहीं बेटी
को बरतन साफ करना पड़ेंगे।
सपना की आँखें धीरे-धीरे मेरे दिल का कमरा ‘ऑक्युपाइ’ करने लगीं। एक दिन मुझसे रहा नहीं गया और उससे आखिर
पूछ ही बैठा,
“क्यों सपना, तू सिर्फ काम ही
करती है या स्कूल भी जाती है ?”
“स्कूल तो जाती थी अंकलजी...पर इस साल माँ ने तीसरी क्लास से पढ़ना छुड़ा
दिया।“
“क्यों ?” मैं चौंका।
“वो माँ से इत्ते घरों का काम नी संभलता था तो मेरे को और मेरी छोटी बेन
संगीता को दो-दो घर दिला दिए।“
यानी उसकी एक छोटी बहिन भी है। मेरी जानकारी में इजाफा हुआ। मैंने पूछा,
“छोटी बहिन कहाँ जाती है, और तुम कितने भाई बहिन हो ?”
“छोटी बहिन संगीता मोती बंगले में एक साब के घर रख छोड़ी है और तीन छोटी
बहनें और भी हैं। “मतलब....”
“हम कुल पाँच बहिनें हैं और मैं सबमेँ बड़ी
हूँ।“
“तुम्हारे पापा क्या करते हैं ?”
“मेरा बाप बेलदारी का काम करता है।”
बेलदारी का मतलब उसने बताया कि छत भरने की
यानी आर.सी.सी. भरने की मजदूरी को निमाड़ी लोग बेलदारी कहते हैं। निमाड़ से काम के
वास्ते यहाँ आए थे वे लोग। बाप कभी कभार ठेकेदार के पास छत भरने की मजदूरी करता है
और माँ कई घरों में बरतन – पोंछे का काम कर लेती है। लेकिन मेरी यह समझ में नहीं
आया कि जब दोनो ‘मनक’ कमा रहे
हैं तो फिर बच्चों से काम क्यों करवाते हैं। मेरे पूछने पर सपना ने यह भी बताया कि
शहर में शिवानी नर्सिंग होम और इंकम टैक्स ऑफिस के बीच की जगह में झाबुआ और निमाड़
से आए कुछ लोग झुग्गियाँ बनाकर रहते हैं वहीं इनका भी ‘घर’ है। सरकारी स्कूल में वो पढ़ती थी जहाँ फीस भी नहीं लगती थी और खाना भी
मिलता था। एक दिन उस मृगनयनी से मैं आखिर पूछ ही बैठा-
“सपना तू काम छोड़ दे और स्कूल जाया कर !
नहीं पढ़ेगी तो जिंदगी भर बरतन ही माँजेगी और पढ़ लिख लेगी तो अच्छे घर जाएगी।“
इस पर सपना ने जो जवाब दिया वह मेरा कलेजा
हिला देने को काफी था-
“अंकलजी मैं स्कूल जाना तो चाहती हूँ, पर स्कूल जाऊँगी तो ‘घर’
(जहाँ काम करती है) छूट
जाएँगे...और घर छूटने पर बाप रोज माँ को और हम सब बहिनों को ज्यादा मारेगा। बाप को
तो रोज दारू ‘चईये’... चाहे हमको खाने
को मिले या न मिले...!”
आगे की सारी कहानी मेरी समझ में आ गई थी।
माँ और दो बेटियों को मिलकर रोजाना कमाकर घर भी चलाना है और मार भी खाते रहना है।
लेकिन मैं एक होनहार बचपन को काम के बोझ में
लुप्त होते नहीं देखना चाहता था। मैंने पूछा-
“तेरे पास स्कूल की कॉपी किताब या जो भी
सामान हो, लेकर कल से रोज मेरे पास पढ़ने बैठ जाया कर। तेरा काम भी हो जाएगा और मैं
रोज पढ़ा भी दिया करूँगा।“ कम से कम पाँचवी क्लास तक तो वो पढ़ ही ले, ऐसी मेरी दिली इच्छा थी।
“ठीक है, ले आऊँगी अंकलजी
!”
अगले दिन उसके काम के बाद मैंने उसका ज्ञान
टटोला। उसे सौ तक गिनती और पाँच तक पहाड़े याद थे। इतना तो काफी है आगे सीखने के
लिए।
उसने रोजाना मुझसे पढ़ना शुरु किया। एक दो
दिन तक पत्नी को मेरी बात एक सनक सी लगी। लेकिन फिर वह भी अक्षरदान की पुण्य सलिला
में अपना अर्ध्य देने लगी। आठ दस दिन तक यह सिलसिला चला तो मुझे लगा कि पैसेंजर
गाड़ी किसी दिन एक्सप्रेस में बदल जाएगी । लेकिन तभी अचानक सिगनल लाल हो गया।
“वो अंकलजी...बात ये है कि मैं आज से अब नी
पढ़ूँगी...।“
“क्यों...!” मैं चौंका !
“वो पढ़ने में मेरा जो टेम जाता है उससे मेरे
दो घर का काम छूट जाता है और माँ नाराज़ होती है...बोलती है कि काम मत छोड़। वो मोती
बंगले वाले साब के यहाँ काम पे नी पोंचेगी तो वो दूसरी बाई रख लेंगे और तू पैसे नी
लाएगी तो बाप मारेगा।”
मैंने उसकी माँ से बात करी। उसने हमें
समझाया कि लड़की का काम पर जाना जरूरी है, नहीं पढ़ेगी तो
चलेगा पर पैसे नहीं मिले और इसके बाप को दारू नी मिली तो वो हम माँ-बेटी को और
ज्यादा माराकूटी करेगा।
“तुम लोग पुलिस में रिपोर्ट क्यों नहीं कर
देते...”, मैंने किसी ‘डेंटेड-पैंटेड’
सोशलाइट की तरह उसे समझाया।
“पुलिस आदमी को माराकूटी करके बंद कर देगी...फिर छुड़ाने तो हमको ही जाना
पड़ेगा। हमारा घर-बार और पेट तो हमको ही भरना है...।“
“तुम सपना को रात को भेज दिया करो...।“
“तुम सपना को रात को भेज दिया करो...।”
“रात को भेजेंगे तो वो और लड़ेगा झगड़ेगा।”
उसने यह भी बताया कि वो टी टी आपरेशन भी नी करवाने देता।
उसको
लड़का चइए...वो अब फिर से
माँ भी बनने वाली है।
मेरी दिलो-जान से इच्छा थी कि सपना उस नर्क
से मुक्ति पा जाए और थोड़ा बहुत पढ़ लिख सके। मैं स्वयं समय निकालकर उसे पढ़ाना चाहता
था, मगर समय सपना के पास नहीं था। बाल श्रम करवाने के पाप से पूरे समाज की
तरह मैं भी नहीं बच सका। मेरी सपना के प्रति सहानुभूति दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही
थी। मुझे उसमें व अपनी बेटी में कोई फर्क़ ही नज़र नहीं आता था। मैं जान बूझकर
बर्तनों को कुछ इस तरह से उपयोग में लाता कि एक दो जूठे बर्तन कम निकलते। ऐसा करके
मुझे यह एहसास बना रहता कि मैं उसका श्रम व समय बचा रहा हूँ...और इससे शायद उसे
पढ़ने के लिए प्रेरणा मिले, ऊर्जा बची रहे।
लेकिन मैं भी हवा को गले लगाए था और पारे की
बूँद को पकड़ना चाहता था। सपना को आगे नहीं पढ़ना था… सपना को
मुझसे नहीं पढ़ना था...सपना को मेरी बेटी की तरह माता-पिता का प्यार नहीं पाना था
सो नहीं मिला। सपना को एक कमाऊ पूत की तरह घर चलाने में सहयोग देना था और बाप की
दारू का इंतजाम करना था और बदले में रात को माँ को पिटते भी देखना था, खुद भी मार खानी थी , बहिनों को पिटते देखना
था...सो वह कर रही है।
सपना की माँ ने एक और ‘समझदारी’ का काम किया। उसकी बेटी की पढ़ाई और ज़िंदगी
को लेकर मुझे बार बार झुँझलाते, दुबलाते और पूछताछ करते देख
आखिर उससे हमारा घर ही छुड़वा दिया। अब वह किसी और घर में बर्तन पोंछा कर रही होगी
जहाँ कम से कम पढ़ने लिखने को लेकर कोई उसके पीछे नहीं पड़ता होगा।
एक मासूम बालमन की कम से कम मेरे सामने तो
हत्या नहीं हो रही है...मैं यही सोचकर खुद को संतुष्ट करने का प्रयास कर रहा
हूँ।
***
ओम वर्मा, 100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001
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