नईदुनिया, 02.05.14.. |
Thursday, 1 May 2014
व्यंग्य (नईदुनिया,
02.05.14)
स्वर्ग में कवि सम्मेलन
स्वर्ग में कवि सम्मेलन
(सभी संबंधित कवियों से क्षमायाचना सहित)
ओम वर्मा
om.varma17@gmail.com
स्वर्ग
में अप्सराओं के नृत्य देख देखकर देवतागण भी एक दिन आखिर बोर हो ही गए। अति
सर्वत्र वर्जयेत! उन्हें मोनोटोनी से ग्रस्त देख वैद्य द्वय अश्विनीकुमारों ने
सलाह दी कि अब ये आमोद प्रामोद छोडकर कुछ चैंज हो जाए। बात जब तीनों लोकों में
विचरने वाले फ्री लांसर नारद जी को मालूम पड़ी तो उन्होंने ‘नमो
नमो’,
मेरा मतलब ‘नारायण नारायण’ के
उद्घोष के साथ खबर दी कि भारत भूमि पर इन दिनों आम चुनाव की धूम मची हुई है जिसमें
जनता को वहाँ के नेताओं के बयानों व टीवी पर उनके बीच होने वाली बहस देखने में जो मज़ा आ रहा है वैसा कुछ यहाँ
भी होना चाहिए।
संस्कृति विभाग देख रहे एक देवता ने सुझाव
दिया कि सारे देवताओं के लिए स्वर्ग छोडकर एक साथ भारत भूमि पर चले जाना भले ही
मुमकिन न हो, पर जब एक से एक धुरंधर कविगण
स्वर्ग में स्थाई निवास बना चुके हैं तो क्यों न उन्हें ही आमंत्रित कर एक चुनावी
कवि सम्मेलन करवा लिया जाए। विचार ने मूर्त रूप लिया और स्वर्ग में कवि सम्मेलन
संपन्न हुआ। प्रस्तुत है सम्मेलन के संपादित अंश-
सबसे पहले आमंत्रित किया गया युवावस्था में
ही स्वर्ग पहुँच चुके कवि सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’
को। धूमिलजी ने फरमाया-
एक आदमी
दल बनाता है
एक आदमी इसे तोडकर नया दल बनाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न दल बनाता है न दल तोड़ता है
वह पैराशूट से उतरता है और टिकट पा जाता है
मैं पूछता हूँ
यह तीसरा आदमी कौन है?
मेरे देश की जनता मौन है!
दल बनाता है
एक आदमी इसे तोडकर नया दल बनाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न दल बनाता है न दल तोड़ता है
वह पैराशूट से उतरता है और टिकट पा जाता है
मैं पूछता हूँ
यह तीसरा आदमी कौन है?
मेरे देश की जनता मौन है!
सभी कवियों सहित देवी देवताओं के मुख से ‘वाह! वाह!!’ निकल पड़ी। फिर आए दुष्यंतकुमारजी। ये यहाँ भी पूरे समय अपने मित्र
कमलेश्वरजी के साथ भारत भूमि पर आम आदमी की दुर्दशा पर चिंतन करते रहते हैं।
उन्होंने अपने अंदाज़ में गजल पढ़ी-
हार की संभावनाएँ सामने
हैं।
फिर भी संसद के किनारे घर बने हैं।
सियासत में ईमान की बात मत कर,
इन दरख्तों के बहुत नाजुक तने हैं।
कुछ तो महँगाई की वजह से हैं खफा,
कुछ घोटालों की वजह से अनमने हैं।
इलेक्शन में जैसा चाहो तुम बजा लो,
मुसलमां उनके लिए बस झुनझुने हैं।
फिर भी संसद के किनारे घर बने हैं।
सियासत में ईमान की बात मत कर,
इन दरख्तों के बहुत नाजुक तने हैं।
कुछ तो महँगाई की वजह से हैं खफा,
कुछ घोटालों की वजह से अनमने हैं।
इलेक्शन में जैसा चाहो तुम बजा लो,
मुसलमां उनके लिए बस झुनझुने हैं।
इन्होंने भी खूब दाद पाई। फिर
बुलाया गया छायावादी व हालावादी श्रृंखला के अंतिम कवि डॉ हरिवंशराय बच्चन को। उनके आते ही
देवताओं ने मधुशाला की श्रृंखला में कुछ नया
सुनाने की फरमाइश कर डाली जिसे उन्होंने दो रुबाइयाँ सुनाकर पूरी की –
अपना मत देने को घर से
चलता मत देने वाला
किसको दूँ, क्यों दूँ, असमंजस
में है अब भोला भाला
ख्वाब दिखाते हैं सब ढेरों,
पर मैं सच बतलाता हूँ
इसको दे या उसको दे तू,
सभी करेंगे घोटाला।
और दूसरी रुबाई- पण्डितजी बोले दुनिया को
चला रहा मुरलीवाला
मुल्ला बोले क़ायनात को
चला रहे अल्लाताला
लेकिन साथ रहे जब भी वे
नहीं लड़े घोटालों में
वैर कराते मंदिर मस्जिद
मेल कराता घोटाला।
और फिर आए दादा माखनलाल चतुर्वेदी जिन्होंने इस बार जूते की अभिलाषा का बखान किया-
चला रहा मुरलीवाला
मुल्ला बोले क़ायनात को
चला रहे अल्लाताला
लेकिन साथ रहे जब भी वे
नहीं लड़े घोटालों में
वैर कराते मंदिर मस्जिद
मेल कराता घोटाला।
और फिर आए दादा माखनलाल चतुर्वेदी जिन्होंने इस बार जूते की अभिलाषा का बखान किया-
चाह
नहीं मैं विश्व सुंदरी के पग में पहना जाऊँ
चाह नहीं शादी में चोरी हो साली को ललचाऊँ
चाह नहीं अब सम्राटों के चरणों में डाला जाऊँ
चाह नहीं अब बड़े माल में बैठ भाग्य पर इठलाऊँ
मुझे पैक करना तुम बढ़िया, उसके मुँह पर देना फेंक
चले शान से वोट माँगने आज बेच जो अपना देश !
फिर आए रघुवीर सहाय जिन्होंने आज की स्थिति देखकर अधिनायक कविता को यूँ पेश किया-
चाह नहीं शादी में चोरी हो साली को ललचाऊँ
चाह नहीं अब सम्राटों के चरणों में डाला जाऊँ
चाह नहीं अब बड़े माल में बैठ भाग्य पर इठलाऊँ
मुझे पैक करना तुम बढ़िया, उसके मुँह पर देना फेंक
चले शान से वोट माँगने आज बेच जो अपना देश !
फिर आए रघुवीर सहाय जिन्होंने आज की स्थिति देखकर अधिनायक कविता को यूँ पेश किया-
राजनीति में
भला कौन वह
बदकिस्मत मतदाता है
पाँच बरस होते ही जिसका
गुण हर नेता गाता है
खांसी, मफ़लर, टोपी, धरना
और कभी धमकी के साथ
अपने चमचों से नित अपनी
जय-जय कौन कराता है
जब जब भी कोई आता है
राजनीति में केजरीवाल
बीच सड़क में उसके मुँह पर
थप्पड़ कौन लगाता है
कौन कौन है मेरे देश मेंबदकिस्मत मतदाता है
पाँच बरस होते ही जिसका
गुण हर नेता गाता है
खांसी, मफ़लर, टोपी, धरना
और कभी धमकी के साथ
अपने चमचों से नित अपनी
जय-जय कौन कराता है
जब जब भी कोई आता है
राजनीति में केजरीवाल
बीच सड़क में उसके मुँह पर
थप्पड़ कौन लगाता है
अधिनायक वह महाबली
कुछ लोगों को पाकिस्तान का
डर जो रोज दिखाता है
देवतागण, जाहिर है कि एक यादगार शाम की याद लेकर लौटे और कई दिनों तक कविताओं की पंक्तियाँ गुनगुनाते रहे। कुछ दिनों के लिए उर्वशियों को भी आराम मिल गया था। ***
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Wednesday, 30 April 2014
व्यंग्य
घोषणा पत्र की चोरी
ओम वर्मा
जब सुबह से सिर्फ एक सामूहिक बलात्कार, दो छेड़खान,एक लड़की भगाने की व दो मामूली चोरियों की रपटें ही लिखवाने वाले आए तो हवलदार बलभद्रसिंह व इंस्पेक्टर सा. बुरी तरह से बोर हो गए। उन्हें लगा कि अब लोगों में उनकी पुलिसगिरी कम और दूसरों की गांधीगिरी ज्यादा काम करने लगी है। दोनों यह सोच सोचकर हलाकान होने लगे कि क्या सचमुच में कहीं ‘अच्छे दिन’ तो नहीं आ गए हैं। मगर तभी धड़धड़ाते हुए कुछ लोगों ने झण्डों व पोस्टरों के साथ नारे लगाते हुए प्रवेश किया।
“दारोगा जी चोरी हो गई है…रिपोर्ट लिखवाना है!”
“क्या माल चोरी हुआ?” दारोगा जी ने खैनी की फंकी मारते हुए पूछा।
“हमारा घोषणा पत्र चोरी हो गया है।“
“कहाँ रखा था आपका घोषणा पत्र...हमारा मतलब है कि किस जगह से चोरी हुआ आपका वो...क्या बताया था...हाँ,घोषणा पत्र?”
“जी वो तो हमने सार्वजनिक रूप से घोषित कर रखा था, हमारा मतलब है छपवा कर पूरे देश की पब्लिक के सामने रखा था।“
“तो फिर चोरी की रिपोर्ट लिखाने क्यों आए है? जब आप खुद ही कह रहे हैं कि आपका माल पब्लिक के लिए था, तो उसकी रक्षा भी आपको ही करनी चाहिए थी कि नहीं? फिर जब मामला पूरे देश का है तो क्या आपको यही थाना मिला था रपट लिखवाने के लिए?”
“पर दारोगाजी हम सच कह रहे हैं कि उन लोगों ने इसे चुराया है!”
“देखो यार एक तो चुनावों के चलते हमारा पहले ही भेजा फ्राई हो रहा है और ऊपर से आप लोग ये सड़ी सड़ी हगी-मूती बातें ले के आ जाते हो रपट लिखाने। एक तो तुमने तुम्हारा वो क्या नाम बताया था...पत्र वत्र, वो खुद तो सम्हाल कर रखा नहीं अब पुलिस उसमें क्या करे? फिर भी तुम नहीं मानते हो तो लिखाओ रपट ! हाँ तो बोलो कहाँ रखा था तुम्हारा घोषणा पत्र?”
“नहीं दारोगाजी आप समझिए, वो रखने जैसी चीज नहीं है, वो तो कागज था...!”
“अरे कागज भी था तो ये तो लिखना पड़ेगा कि कित्ता बड़ा था, किस रंग रूप का था, चोरी से पहले किसके पास था, तुमने उसे कहाँ से खरीदा था, उसकी कीमत क्या थी,उसका बिल विल है की नहीं ...?” दारोगाजी पुलिसगिरी दिखाने से खुद को बड़ी मुश्किल से रोक रहे थे।
“उसकी कीमत आपको कैसे बताएँ वह तो हमारे लिए अमूल्य है, हमारा मतलब बहुत कीमती है।“
“अगर बहुत कीमती है तो आपने उसे फिर बैंक लॉकर या पुलिस कस्टडी में क्यों नहीं रखा? खुद के गार्ड क्यों नहीं लगाए? फिर जिस चीज की तुम कीमत तक नहीं बता पा रहे हो उसकी चोरी जाने की रपट कैसे लिखूँगा और कौनसी धारा लगाऊँगा?”
“अरे दारोगाजी हम आपसे पहले ही कह चुके हैं कि घोषणा पत्र सबके बीच पहुंचाने के लिए ही होता है, छिपाकर रखने के लिए नहीं।“
“तो फिर कायकी रपट! तुम्हारा जो कागज दूसरों के लिए ही था और जिसे तुमने खुला रख छोड़ा था और जिसका कोई नकद मूल्य ही नहीं है, उसकी चोरी की रपट किस धारा में लिखूँ?”
रपट लिखाने आए पार्टी के उत्साही व सीनियर लीडर्स दारोगाजी के आगे सिर पटक पटक कर रह गए मगर दारोगाजी की कानूनी परिभाषा में घोषणा पत्र की ‘चोरी’चोरी नहीं मानी जा सकती थी। इंस्पेक्टर के पास पहुँचे तो उन्होंने यह कहकर सबको झिड़क दिया कि चूँकि उन्होंने घोषणा पत्र पर ‘सर्वाधिकार सुरक्षित’ होने या कॉपीराइट अपने पास होने की चेतावनी नहीं लिखी है लिहाजा चोरी का प्रकरण नहीं बन सकता !
सुना है अब पार्टी चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाने जा रही है। ***
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Monday, 21 April 2014
चुनावी कुण्डलियाँ
एक
टिकटों को लेकर
मची, कैसी हाहाकार।
कोई जिद पर है अड़ा, किया कहीं इनकार॥
किया कहीं इंकार, ‘आप’ देने को आतुर।
रहे 'कमल' को थाम, कई अब ‘हाथ बहादुर’॥
कहे ‘ओम’ कविराय, हकालों उन नकटों को।
बेच रहे ईमान, देखकर जो टिकटों को॥
कोई जिद पर है अड़ा, किया कहीं इनकार॥
किया कहीं इंकार, ‘आप’ देने को आतुर।
रहे 'कमल' को थाम, कई अब ‘हाथ बहादुर’॥
कहे ‘ओम’ कविराय, हकालों उन नकटों को।
बेच रहे ईमान, देखकर जो टिकटों को॥
दो
बिल्ली
मासी ठीक हो, या कोई
तकलीफ।
सुना तुम्हारे लाल को, आई थी कल छींक॥
आई थी कल छींक, रहे ना छींका खाली।
लगा पूछने श्वान, देखकर बिल्ली काली॥
कहे ‘ओम’ तज पाप, चलें जब सब जन काशी।
आए आम चुनाव, समझना बिल्ली मासी॥
सुना तुम्हारे लाल को, आई थी कल छींक॥
आई थी कल छींक, रहे ना छींका खाली।
लगा पूछने श्वान, देखकर बिल्ली काली॥
कहे ‘ओम’ तज पाप, चलें जब सब जन काशी।
आए आम चुनाव, समझना बिल्ली मासी॥
तीन
उनके वादे घोषणा, कपट तंत्र हैं मात्र।
जैसे उनके हाथ में, लगा है अक्षयपात्र॥
लगा है अक्षयपात्र, कहाँ से आए पैसा।
बंदर अब मत नाच, मदारी चाहे वैसा॥
कहे ‘ओम’ कविराय,समझ लो उधर इरादे।
हैं शिकार के जाल, आज सब उनके वादे॥
जैसे उनके हाथ में, लगा है अक्षयपात्र॥
लगा है अक्षयपात्र, कहाँ से आए पैसा।
बंदर अब मत नाच, मदारी चाहे वैसा॥
कहे ‘ओम’ कविराय,समझ लो उधर इरादे।
हैं शिकार के जाल, आज सब उनके वादे॥
चार
परसों उसकी
थी ‘सपा’, कल पंजे
का साथ। अब लगता है भाजपा, के बिन हुआ अनाथ॥
के बिन हुआ अनाथ, वहाँ कल दम था ‘घुटता’।
आज लगे वो पाक़, जहाँ सब कल था ‘लुटता’॥
कहे ‘ओम’ कविराय, लाभ बिन क्यों तुम तरसो।
थामेंगे कल ‘हाथ’, देखना फिर कल परसों॥
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Sunday, 6 April 2014
Tuesday, 18 March 2014
रंग भरे दोहे दनादन
– ओम वर्मा
om.varma17@gmail.com
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डॉ. मनमोहनसिंह अगर
कहेंगी सोनिया, तो खेलूँगा रंग ।
यूँ बोले सरदारजी, करो न मुझको तंग ॥ 01
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सोनिया गांधी इटली मेरा मायका, भारत है ससुराल ।
भौजाई हूँ आपकी , डालो रंग गुलाल ।। 02
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लालकृष्ण आडवानी निकले रथ पर बैठकर, खेल रहे हैं फाग ।
इस शालीन बुज़ुर्ग की, किस्मत अब तो जाग।। 03
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नरेंद्र मोदी खेलूँगा होली तभी, दिल्ली लूँ जब जीत ।
कुछ ऐसे इस फाग में, गाओ मंगल गीत ॥ 04
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यूँ बोले सरदारजी, करो न मुझको तंग ॥ 01
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सोनिया गांधी इटली मेरा मायका, भारत है ससुराल ।
भौजाई हूँ आपकी , डालो रंग गुलाल ।। 02
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लालकृष्ण आडवानी निकले रथ पर बैठकर, खेल रहे हैं फाग ।
इस शालीन बुज़ुर्ग की, किस्मत अब तो जाग।। 03
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नरेंद्र मोदी खेलूँगा होली तभी, दिल्ली लूँ जब जीत ।
कुछ ऐसे इस फाग में, गाओ मंगल गीत ॥ 04
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राहुल गांधी राहुल होली खेलने , निकले हैं इस बार
।
रँगवाएँगे मुख वहीं, जहाँ दलित का
द्वार ॥ 05
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सुशीलकुमार शिंदे
इक ‘येड़े’ को छोडकर, बाकी सबको छूट। ----------------------------------------------------------------------------------
मेला है यह फाग का, लूट सके तो लूट॥ 06
----------------------------------------------------------------------------------सुषमा स्वराज होली खेलें जब कभी, बीजेपी के लोग।
उन उन पर ही ना करें, सारे रंग प्रयोग॥ 07
--------------------------------------------------------------------------------राजनाथसिंह मान रहे अरविंद का, राजनाथ आभार।
फिर दिल्ली में मिल गया, होली का आधार।।08
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ममता बेनर्जी बस अन्ना के संग ही, खेलेगा बंगाल।
इस होली में इस तरह, होगा रंग गुलाल॥ 09
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लालूजी चारे की कुटिया बना, बैठे खटिया डाल ।
अब कोई तो डाल दे, आकर रंग गुलाल ॥ 10
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सुमित्रा महाजन हो भाई का साथ तो, जीतूँगी हर जंग।
यह कह वे कैलाश पर, लगीं डालने रंग॥ 11
---------------------------------------------------------------------------------नीतीशकुमार खेल रहे नीतीशजी, गुपचुप गुपचुप रंग ।
मोदी आकर बीच में, करें नहीं रसभंग॥ 12
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नितिन गड़करी काया से भी ‘मर्द’ हैं, माया से भी ‘मर्द’।
रंग देखकर ‘आप’ के, शुरू हो गया दर्द ॥ 13
----------------------------------------------------------------------------------शिवराजसिंह चौहान सुन लें सारी लाड़ली, हैं मामा शिवराज ।
रंग डालकर नेग लो, नहीं छोड़ना आज ॥ 14
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अरविंद केजरीवाल किस पर कैसे रंग की, करना है बरसात ।
अब जनता की राय से, तय होगी यह बात॥15
----------------------------------------------------------------------------------
अन्ना हजारे पहले पूरी जो करे, मेरी सत्रह माँग।
गाऊँ उसके राग में, मैं होली का ‘सांग’॥ 16
----------------------------------------------------------------------------------
सलमान खुर्शीद खेलूँ ना होली कभी, नपुंसकों के संग।
जाचूँगा मर्दानगी, वरना होगी जंग॥ 17
----------------------------------------------------------------------------------
शरद पवार दिन में होली खेलने, पहुंचे जनपथधाम।
मोदी के घर रात में, किया मगर विश्राम॥18
----------------------------------------------------------------------------------
दिग्विजयसिंह जिस दिन राहुल बन गए, अगले पंतप्रधान।
उस दिन से हर दिन यहाँ, होगा फागुनगान॥19
----------------------------------------------------------------------------------
रामविलास पासवान मोदी का मुँह रँग दिया, फिर बोले ये राम।
हम पंछी उस डाल के, जहाँ पके हों आम॥20
----------------------------------------------------------------------------------
श्रीप्रकाश जायसवाल ये जूनी पिचकारियाँ, करती हैं रसभंग।
लेकर आओगे नई, तो खेलूँगा रंग॥ 21
----------------------------------------------------------------------------------अखिलेश यादव जिस पिचकारी पर बनी, पापा की तस्वीर ।
रंग उसी से डालना, हाकिम हो कि वज़ीर॥ 22
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आजम खान पहले मेरी भैंस से, जो खेलेगा रंग।
अब खेलूँगा मैं सदा, होली उसके संग॥ 23
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राज ठाकरे आओ सिर्फ मराठियों, मैं खेलूँगा रंग।
चुंगी नाकों पर खड़े, बोले एक दबंग॥ 24
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अमिताभ बच्चन कुछ दिन तो गुजरात में, होली खेलो यार।
किसी दूसरे राज्य में, होगी अगली बार॥ 25
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संजय दत्त सुन सर्किट इस टैंक में, रंग ढेर सा घोल।
अब होली के नाम पर, माँगूँगा पेरोल॥ 26
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राखी सावंत राखीजी को इन दिनों, भाया मोदी रंग।
बाँट रहीं हैं मुफ्त ही, ले पिचकारी संग॥ 27
--------------------------------------------------------------------------------सुरेश कलमाड़ी कलमाड़ी से खेलना, चाह रहे जो लोग।
पहले आधे रंग का, देना होगा भोग॥ 28
----------------------------------------------------------------------------------बाल कटवाता नेता भाई मेरे यह बता, कितने मेरे बाल।
कटने को हैं जान लो, क्या होना है हाल॥ 29
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नेताओं पर रंग डलता तुमने उन पर रंग क्यूँ, दिया व्यर्थ में डाल।
देखकर आम आदमी खूनी होली खेलते, रहते वे हर साल॥ 30
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जयललिता व करुणानिधि देखें किसके गाल पर, मोदी मलें गुलाल।
करुणानिधिजी औ’ जया, आतुर लेकर गाल॥31
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मायावती मनुवादी को छोडकर, बाकी सबके साथ।
खेलेंगी मायावती, लाख टके की बात॥ 32
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आम आदमी पार्टी सब लाए पिचकारियाँ, झाड़ू इनके पास।
देखें किनका रंग अब, आता इनको रास॥ 33
----------------------------------------------------------------------------------भागीरथ प्रसाद राहुल जी की जेब से, लेकर रंग गुलाल।
मोदीजी को रँग दिया, सरजी किया कमाल॥ 34
----------------------------------------------------------------------------------योगेंद्र यादव डाली कुछ ने स्याहियाँ, कुछ ने डाले रंग।
खुशियाँ और विरोध के, सबके अपने ढंग॥ 35
Saturday, 8 March 2014
व्यंग्य जनवाणी, मेरठ,
08.03.14
जूते की अभिलाषा
ओम वर्मा
om.varma17@gmail.com
सत्ता केंद्र के प्रति विरोध प्रकट करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। राजमहलों में राजा के प्रति रानियों के गरिमामय विरोध के लिए कोपभवन तक का प्रावधान रखना पड़ता था। गांधीजी इसे असहयोग और सत्याग्रह से प्रारंभ कर अनशन तक लाए जिसे बाद में निर्वाचित मुख्यमंत्री समर्थन देने वालों के खिलाफ ही धरने के नाम से आजमाने लग गए! लेकिन कई बार ये उपकरण फेल होते भी देखे गए तथा अखबारों की तलवार से भी तेज मानी जाने वाली कलम की स्याही भी फीकी पड़ने लगी। लिहाजा फास्ट फूड के जमाने में विरोध प्रदर्शन का तरीका भी कैसे अछूता रह सकता था? अब नेक काम के लिए लोगों ने जूते का प्रयोग शुरू कर उसे सम्मानजनक स्थान पर बैठा दिया है।
सत्ता केंद्र के प्रति विरोध प्रकट करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। राजमहलों में राजा के प्रति रानियों के गरिमामय विरोध के लिए कोपभवन तक का प्रावधान रखना पड़ता था। गांधीजी इसे असहयोग और सत्याग्रह से प्रारंभ कर अनशन तक लाए जिसे बाद में निर्वाचित मुख्यमंत्री समर्थन देने वालों के खिलाफ ही धरने के नाम से आजमाने लग गए! लेकिन कई बार ये उपकरण फेल होते भी देखे गए तथा अखबारों की तलवार से भी तेज मानी जाने वाली कलम की स्याही भी फीकी पड़ने लगी। लिहाजा फास्ट फूड के जमाने में विरोध प्रदर्शन का तरीका भी कैसे अछूता रह सकता था? अब नेक काम के लिए लोगों ने जूते का प्रयोग शुरू कर उसे सम्मानजनक स्थान पर बैठा दिया है।
लिहाज़ा अब समय आ गया है कि प्रजातांत्रिक
देशों के राजनीतिक दल अपने चुनावी घोषणा पत्र, अपनी कार्य पद्धति या अपने अभ्यास सत्रों में विरोध प्रकट करने की इस नई
तकनीक पर चिंतन मनन करें। अब यह स्पष्ट घोषणा होनी चाहिए कि सत्ता में आने पर उनका
दल या उम्मीदवार कम से कम कितने जूते फेंके जाने या खाने के बाद ही किसी की बात
सुनेगा! यह भी स्पष्ट हो कि क्या सिर्फ जूता दिखाना भर पर्याप्त होगा आखिर उनके
कानों पर कम से कम कितने जूते खाने के बाद जूँ रेंगना प्रारंभ करेगी? यह भी हो सकता है कि कल से जूता फेकने वाले की ही बात हर हाल में मान ली
जाए या फिर जूता फेंकने वाले की हर हाल में अच्छी तरह से ‘खबर’ ले ली जाए! वैसे प्रहारक पर विभिन्न कानूनी धाराओं के तहत कार्रवाई भी की
जा सकती है। जैसे बिल प्रस्तुत न करने वाले विद्रोही पर उन्हें मंदिर या मस्जिद से
चुराए जाने का आरोप लगाया जा सकता है। प्रहारक ‘क’ संप्रदाय का हो और लक्ष्य ‘ख’
संप्रदाय का, तो सांप्रदायिकता फैलाने का आरोप, और हमारे देश में जैसा कि अक्सर होता आया है,
प्रहारक सवर्ण हो और लक्ष्य दलित वर्ग का, तो दलित उत्पीड़न
का प्रकरण! जूता यदि प्लास्टिक का था, तो पर्यावरण
एक्टिविस्ट आगे आ सकते हैं कि इससे पर्यावरण का क्षरण हुआ है, या कि जूते का मटेरियल ‘ईको फ्रैंडली’ नहीं है। चमड़े के जूते हों तो ‘पेटा’ वाले जीव उत्पीड़न का मामला बनाकर मैदान में कूद सकते हैं।
आशावादी अँधेरे में भी उजाले की किरण खोज़ लेता है। तो क्यों न जूता फेंकने वालों में
से ‘सही’ निशाना लगा पाने
वाले को चुनकर आगामी ओलिंपिक खेलों के लिए निशानेबाजी की तैयारी के लिए चुन लिया
जाए! आने वाले चुनाव में सभा या प्रेस वार्ता में उम्मीदवार राजनीतिक लाभ
लेने के लिए ‘पेड़
न्यूज़’ की तर्ज़ पर अपने ही आदमियों से भी यह काम करवा सकते
हैं। बहरहाल इतना तो तय है कि जॉर्ज बुश और ज़रदारी से लेकर भूपिंदरसिंह हुड्डा तक, जूतों को अस्त्र बनाने का कार्य यदि इसी रफ्तार से चलता रहा तो हो सकता
है कि भविष्य में चौथा विश्व युद्ध जूतों से ही लड़ा जाए! बाहुबलियों के परिवारों
में शस्त्र पूजन की तर्ज़ पर जूता पूजन भी शुरू हो सकता है! ओपिनियन पोल जैसी
विवादास्पद प्रक्रिया का स्थान जूता ले सकता है। जितने जूते,
उतने ‘लाइक्स’ या ‘अनलाइक्स’! एक जूता यानी दस सीट की बढ़त या दस का
नुकसान! वैसे जूते की अभिलाषा तो मात्र इतनी है कि वह न तो सम्राटों के पैरों की
शोभा बढ़ाना चाहता है, वह किसी बड़े शॉपिंग माल के शो केस में
बैठ कर अपने भाग्य पर इठलाना भी नहीं चाहता ...उसकी अभिलाषा तो मात्र इतनी है कि
उसे उसके मुँह पर मार दिया जाए जो देश को खाने या बेचने की राह पर चल पड़ा हो!
***
100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास
455001 (म.प्र.)
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