Tuesday, 27 May 2014




  व्यंग्य              
             कच्ची व पक्की दीवार

                                           
  ओम वर्मा
                                       om.varma17@gmail.com
 
दीवारें दो तरह की होती हैं – कच्ची दीवार और पक्की दीवार। साहित्यिक भाषा में एक मूर्त और एक अमूर्त! कच्ची दीवार यानी वह मूर्त दीवार जो ईंट गारे या अन्य बिल्डिंग मटेरियल की बनी होती है व सारी दुनिया को दिखाई देती है... जैसे कि ग्रेट वाल ऑफ चाइना’, या दोनों जर्मनियों के पुनर्मिलन से पूर्व पैंतालीस वर्षों तक तनी रही ऐतिहासिक बर्लिन वाल। चीन की 6000 किमी लंबी दीवार के बारे में कभी यह भी पढ़ा था कि वह चाँद से भी दिखाई देती है। बहरहाल दीवार चाँद से भले ही दिखे या न दिखे, दो देशों को बाँटे या न बाँटे, वह होती बड़ी ही कच्ची है। आखिर दीवारें ही हैं कोई रेडक्लिफ लाइन नहीं कि हथौड़े, डायनामाइट या परमाणु बम से भी नहीं मिटाई जा सके। चीन की ग्रेट वाल को भी चीन या अन्य महाशक्तियाँ जब चाहें ध्वस्त कर सकती हैं। कई बार तो यूँ लगता है कि जैसे सारी दुनिया ही शीशे की है जहाँ कभी कोई सिरफिरा एक हवाई जहाज का अपहरण कर उसे टकरा दे तो ऊंची से ऊंची दीवार को ज़ीरो ग्राउंड में बदलने में पल भर न लगे। यानी मूर्त दीवारों को अच्छे या बुरे किसी भी प्रयोजन के लिए ध्वस्त किया जा सकता है। कहीं कोईभाई हुआ तो जमीन हथियाने के लिए  दीवारें जबरन खड़ी कर लेता है और घर पर पेटी बिस्तर तैयार रख नौकरी पर निकलने वाला कोई कलेक्टर या कमिश्नर हो तो जमींदोज़ भी कर सकता है।
   मगर जो अदृश्य व अमूर्त दीवारें होती हैं उनका लेखा जोखा या जवाब है किसी के पास? वो दीवार जिसे गुजरात और शेष भारत के बीच खड़ी करने की कोशिशें जारी हैं वो दीवार जो कश्मीरियत और हिंदुस्तानियत के बीच या देश के हर अलगू चौधरी और जुम्मन शेख के बीच तामीर की जा रही है और रोज उस पर नई नई परतें चढ़ाई जा रही हैं… वह दीवार जो एक पीएम को दूसरे पीएम की शपथ विधि में जाने में अवरोध खड़े करती है ,,,या  वह जो किसी लंगड़ को आज तक अदालत के फैसले की नकल लेने से रोक रही है...वह दीवार जो आज भी होरी को भूखा सोने या आत्महत्या करने पर विवश करती है... वह दीवार जो राँझे को हीर और मजनूँ को लैला से मिलने से आज भी रोके हुए है... वह कभी टूटेगी भी? और वह दीवार जिसके कि इस पार वाला उस पार वाले को सिर्फ पाँच साल में एक ही बार देख पाता है या वह जिसकी वजह से वंशवाद में सेंध लगाने के बारे में सोचना ही 1857 के विद्रोह के समान गदर मान लिया जाए, उस दीवार के लिए कोई बारूद या बुलडोजर अभी तक ईज़ाद क्यों नहीं हुआ? क्या मातृभूमि की रक्षा हेतु प्राण न्योछावर कर देने वाले शहीदों की शहादत की दीवार से उनकी मज़हबी पहचान की दीवार बड़ी हो सकती है?क्या टोपी और तिलक के बीच में दीवारें खड़ी की जाती रहेंगी? क्या हिंदी को संपूर्ण देश की राष्ट्रभाषा और संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनने में जो दीवार अवरोध बनकर खड़ी है उसे कोई ध्वस्त कर सकेगा? और लास्ट बट नॉट द लीस्ट कि अर्जुन को इक़बाल के साथ क्रिकेट खेलने से रोकने वाली या उनके बालमन में विषबेल सी खड़ी की जा रही दीवार को गिराने के लिए भी कोई महापुरुष कभी रथ यात्रा निकालेगा?  
   जाहिर है कि देश में दीवारें बहुत हैं। अगर इनमें से सही चुन ली जाएँ और उन पर सद्भाव की छतें ढाल दी जाएँ तो इतने मकान बल्कि घर बन जाएँ कि सभी को छत्रछाया मिल जाए!
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100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001(म.प्र.)      


दबंग दुनिया , 25.05.14 







Friday, 16 May 2014



व्यंग्य
        लकीर पर चिंतन
                            ओम वर्मा
                                    om.varma17@gmail.com 
साँप निकल गयालकीर पर चिंतन जारी है। सबके हाथों में बड़ी बड़ी लाठियाँ हैं। इतने धुरंधरों के होते साँप आखिर बच कर कैसे निकल गया। जवाब देना मुश्किल हो रहा है। माहौल कुछ ऐसा है कि सामूहिक बलात्कार पर बहस में भाग लेते समय भी जिनकी मुस्कराहट गायब नहीं होती थी आज उन्होंने भी गंभीरता ओढ़ रखी है। जिस लहर को उन्होंने झोंका भी नहीं समझा था वह तूफान बनकर उनकी साठ साल पुरानी बस्ती तहस नहस कर गई। परंपरानुसार बिखरे दूध पर रोया जा रहा है। जिसे साँप समझ कर छेड़ा जा रहा था वह सिंहासन पर जा बैठा है और उसकी छोड़ी गई लकीर पर अब  लाठियाँ भांजी जा रही हैं। हार का ठीकरा फोड़ने के लिए सही सिर तलाशा जा रहा है।
   
     “मैंने उसको राक्षस कहा था पर शायद लोगों ने उसकी बड़ी बड़ी आँखें देख कर शायद उसे देवदूत समझ लिया।” एक चिंतक ने कहा।
   
     “मैंने तो उसे गुण्डा कहा था पर लोगों ने उसे वाराणसी का पण्डा बना दिया।” दूसरे चिंतक ने दूर की कौड़ी पेश की।

    “मैडम ने पहले ही उसको आदमखोर बता दिया था, पर शायद लोगों ने माखनचोर सुन लिया होगा।” सिर्फ अपने अद्भुत बयानों के कारण चर्चा में बने रहने वाले एक अन्य आधार स्तंभ ने यहाँ भी वफादारी प्रदर्शन करने का मौका नहीं छोड़ा।
   
    “हम भी उसके मुकाबले के लिए अपने युवराज को लाए थे...कहीं ऐसा तो नहीं कि अपने युवराज की एक्सेप्टिबिलिटी उनके मुकाबले पब्लिक में कम हो ?” एक कम चर्चित पार्टीमेन ने दबी जुबान से थोड़ी हिम्मत करके अंधों की बस्ती में आईने ले लो जैसी आवाज निकालने की कोशिश की।

    “ये कौन बद्तमीज़ घुस आया है..लगता है गुजरात वालों का भेजा आदमी है!” एक भियाजी किस्म के कार्यकर्ता ने हाँक लगाई। इतने में बाकी लोगों ने युवराज की स्वीकार्यता पर शंका उठाने वाले ‘विद्रोही’ को अस्वीकार करते हुए टांगा-टोली कर सीधा मुख्य-द्वार दिखा दिया।

   “नहींहमारी हार का असली कारण ‘थ्री डी’ टेक्नॉलाजी है जिसके न होने से जहाँ हमारे युवराज एक बार में एक ही जगह दिखते थे वहीं वो किशन कन्हैया की तरह रास लीला में एक दो नहीं पूरे एक सौ आठ स्थानों पर हर गोपी को अपने अपने साथ नज़र आते थे।” पार्टी के एक सलाहकार ने अपना तकनीकी ज्ञान बघारा।

    “मैंने पहले ही कहा था कि 2012 में मनमोहनसिंह की जगह राहुलजी को पीएम बना दिया गया होता देश एक अलग ऊँचाई पर होता और आज परिणाम उलटा भी हो सकता था।एक स्व. प्रधानमंत्री के पुत्र जिसने सिर्फ अपने पिता की सफेद लट वाली हेयर स्टाइल अपनाई हैविचारधारा नहींने गहन मंथन से नवनीत निकालकर प्रस्तुत किया।

     “मैंने तो पहले ही बोटी बोटी उड़ा देने की बात कह दी थी...किसी कोने से यह आवाज भी सुनाई दी। 

    तो हार का ठीकरा फोड़ने के लिए सर की तलाश जारी है। क्या देश का मतदाता वंशवाद या एक ही परिवार का शासन जारी रखना चाहता है या नहीं… चुनाव में विकास जैसा भी कभी कोई मुद्दा था या नहीं... राष्ट्रकुल खेल घोटाले से लेकर कोयला खदान व टूजी स्पेक्ट्रम के आवंटन और रॉबर्ट वाड्रा की संपत्ति में हुई कल्पनातीत वृद्धि ...आदि आदि भी कोई मुद्दे थे या नहीं... जनता इनका जवाब चाहती थी। इस बारे में जब होगी फुरसत तो देखा जाएगा!                                                                                 ***
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100, रामनगर एक्सटेंशनदेवास 455001(म.प्र.)                                                   

Saturday, 10 May 2014

Thursday, 1 May 2014

व्यंग्य (नईदुनिया, 02.05.14) 
          
स्वर्ग में कवि सम्मेलन 

        
(सभी संबंधित कवियों से क्षमायाचना सहित)                                 

                         
ओम वर्मा
                                   
                     om.varma17@gmail.com
स्वर्ग में अप्सराओं के नृत्य देख देखकर देवतागण भी एक दिन आखिर बोर हो ही गए। अति सर्वत्र वर्जयेत! उन्हें मोनोटोनी से ग्रस्त देख वैद्य द्वय अश्विनीकुमारों ने सलाह दी कि अब ये आमोद प्रामोद छोडकर कुछ चैंज हो जाए। बात जब तीनों लोकों में विचरने वाले फ्री लांसर नारद जी को मालूम पड़ी तो उन्होंने नमो नमो, मेरा मतलब नारायण नारायण के उद्घोष के साथ खबर दी कि भारत भूमि पर इन दिनों आम चुनाव की धूम मची हुई है जिसमें जनता को वहाँ के नेताओं के बयानों व टीवी पर उनके बीच होने वाली  बहस देखने में जो मज़ा आ रहा है वैसा कुछ यहाँ भी होना चाहिए।
     संस्कृति विभाग देख रहे एक देवता ने सुझाव दिया कि सारे देवताओं के लिए स्वर्ग छोडकर एक साथ भारत भूमि पर चले जाना भले ही मुमकिन न हो, पर जब एक से एक धुरंधर कविगण स्वर्ग में स्थाई निवास बना चुके हैं तो क्यों न उन्हें ही आमंत्रित कर एक चुनावी कवि सम्मेलन करवा लिया जाए। विचार ने मूर्त रूप लिया और स्वर्ग में कवि सम्मेलन संपन्न हुआ। प्रस्तुत है सम्मेलन के संपादित अंश-
    सबसे पहले आमंत्रित किया गया युवावस्था में ही स्वर्ग पहुँच चुके कवि सुदामा पाण्डेय धूमिल को। धूमिलजी ने फरमाया-     
     एक आदमी
     दल बनाता है
     एक आदमी इसे तोडकर नया दल बनाता है
 
     एक तीसरा आदमी भी है
     जो न दल बनाता है न दल तोड़ता है
 
     वह पैराशूट से उतरता है और टिकट पा जाता है 
     मैं पूछता हूँ 
     यह तीसरा आदमी कौन है?
     मेरे देश की जनता मौन है!

 
   सभी कवियों सहित देवी देवताओं के मुख से वाह! वाह!! निकल पड़ी। फिर आए दुष्यंतकुमारजी। ये यहाँ भी पूरे समय अपने मित्र कमलेश्वरजी के साथ भारत भूमि पर आम आदमी की दुर्दशा पर चिंतन करते रहते हैं। उन्होंने अपने अंदाज़ में गजल पढ़ी- 

   हार की   संभावनाएँ   सामने   हैं।
  फिर भी संसद के किनारे घर बने हैं।
  सियासत में  ईमान की बात मत कर
,
  इन  दरख्तों के बहुत  नाजुक तने हैं।
  कुछ तो महँगाई की वजह से हैं खफा
,
  कुछ घोटालों की वजह से अनमने हैं।
  इलेक्शन  में जैसा चाहो तुम बजा लो
, 
  मुसलमां  उनके लिए बस झुनझुने हैं। 

   इन्होंने भी खूब दाद पाई। फिर बुलाया गया छायावादी व हालावादी श्रृंखला के अंतिम कवि डॉ हरिवंशराय बच्चन को। उनके आते ही देवताओं ने मधुशाला की श्रृंखला में कुछ नया सुनाने की फरमाइश कर डाली जिसे उन्होंने दो रुबाइयाँ  सुनाकर पूरी की  –

    अपना मत देने को घर से
    चलता मत देने वाला
    किसको दूँ
, क्यों दूँ, असमंजस
    में है अब भोला भाला
         ख्वाब दिखाते हैं सब ढेरों
,
         पर मैं सच बतलाता हूँ
    इसको दे या उसको दे तू
,
    सभी करेंगे घोटाला।
और दूसरी रुबाई-        पण्डितजी बोले दुनिया को
                      चला रहा मुरलीवाला
                      मुल्ला बोले क़ायनात को
                      चला रहे अल्लाताला
             लेकिन साथ रहे जब भी वे
             नहीं लड़े घोटालों में
                   वैर कराते मंदिर मस्जिद
                   मेल कराता घोटाला।

   और फिर आए दादा माखनलाल चतुर्वेदी जिन्होंने इस बार जूते की अभिलाषा का बखान किया-
 
   चाह नहीं मैं विश्व सुंदरी के पग में पहना जाऊँ
   चाह नहीं शादी में चोरी हो साली को ललचाऊँ
   चाह नहीं अब सम्राटों के चरणों में डाला जाऊँ
   चाह नहीं अब बड़े माल में बैठ भाग्य पर इठलाऊँ
   मुझे पैक करना तुम बढ़िया
, उसके मुँह पर देना फेंक
   चले शान से वोट माँगने आज बेच जो अपना देश !

           
फिर आए रघुवीर सहाय जिन्होंने आज की स्थिति देखकर अधिनायक कविता को यूँ पेश किया-
 राजनीति में भला कौन वह
 बदकिस्मत मतदाता है

 पाँच बरस होते ही जिसका
 गुण हर नेता गाता है


 खांसी, मफ़लर, टोपी, धरना 
 और कभी धमकी के साथ  
 अपने चमचों से नित अपनी
 जय-जय कौन कराता है


जब जब भी कोई आता है
राजनीति में केजरीवाल
बीच सड़क में उसके मुँह पर
थप्पड़ कौन लगाता है
कौन कौन है मेरे देश में
अधिनायक वह महाबली
कुछ लोगों को पाकिस्तान का
डर जो रोज दिखाता है

    देवतागण, जाहिर है कि एक यादगार शाम की याद लेकर लौटे और कई दिनों तक कविताओं की पंक्तियाँ गुनगुनाते रहे। कुछ दिनों के लिए उर्वशियों को भी आराम मिल गया था।                                       ***
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Wednesday, 30 April 2014

व्यंग्य       
              घोषणा पत्र की चोरी 
                                      ओम वर्मा
                              
ब सुबह से सिर्फ एक सामूहिक बलात्कार, दो छेड़खान,एक लड़की भगाने की व दो मामूली चोरियों की रपटें ही लिखवाने वाले आए तो हवलदार बलभद्रसिंह व इंस्पेक्टर सा. बुरी तरह से बोर हो गए। उन्हें लगा कि अब लोगों में उनकी  पुलिसगिरी कम और दूसरों की गांधीगिरी ज्यादा काम करने लगी है। दोनों यह सोच सोचकर हलाकान होने लगे कि क्या सचमुच में कहीं अच्छे दिन तो नहीं  आ गए हैं। मगर तभी धड़धड़ाते हुए कुछ लोगों ने झण्डों व पोस्टरों के साथ नारे लगाते हुए प्रवेश किया।
   “दारोगा जी चोरी हो गई हैरिपोर्ट लिखवाना है!”
   “क्या माल चोरी हुआ?” दारोगा जी ने खैनी की फंकी मारते हुए पूछा।
   “हमारा घोषणा पत्र चोरी हो गया है।“
   “कहाँ रखा था आपका घोषणा पत्र...हमारा मतलब है कि किस जगह से चोरी हुआ आपका वो...क्या बताया था...हाँ,घोषणा पत्र?”
   जी वो तो हमने सार्वजनिक रूप से घोषित कर रखा था, हमारा मतलब है छपवा कर पूरे देश की पब्लिक के सामने रखा था।“
   “तो फिर चोरी की रिपोर्ट लिखाने क्यों आए है? जब आप खुद ही कह रहे हैं कि आपका माल पब्लिक के लिए था, तो उसकी रक्षा भी आपको ही करनी चाहिए थी कि नहीं? फिर जब मामला पूरे देश का है तो क्या आपको यही थाना मिला था रपट लिखवाने के लिए?”
   “पर दारोगाजी हम सच कह रहे हैं कि उन लोगों ने इसे चुराया है!”
   “देखो यार एक तो चुनावों के चलते हमारा पहले ही भेजा फ्राई हो रहा है और ऊपर से आप लोग ये सड़ी सड़ी हगी-मूती बातें ले के आ जाते हो रपट लिखाने। एक तो तुमने तुम्हारा वो क्या नाम बताया था...पत्र वत्र, वो खुद तो सम्हाल कर रखा नहीं अब पुलिस उसमें क्या करे? फिर भी तुम नहीं मानते हो तो लिखाओ रपट ! हाँ तो बोलो कहाँ रखा था तुम्हारा घोषणा पत्र?”
   “नहीं दारोगाजी आप समझिए, वो रखने जैसी चीज नहीं है, वो तो कागज था...!”
   “अरे कागज भी था तो ये तो लिखना पड़ेगा कि कित्ता बड़ा था, किस रंग रूप का था, चोरी से पहले किसके पास था, तुमने उसे कहाँ से खरीदा था, उसकी कीमत क्या थी,उसका बिल विल है की नहीं ...?” दारोगाजी पुलिसगिरी दिखाने से खुद को बड़ी मुश्किल से रोक रहे थे।
   “उसकी कीमत आपको कैसे बताएँ वह तो हमारे लिए अमूल्य है, हमारा मतलब बहुत कीमती है।“
   “अगर बहुत कीमती है तो आपने उसे फिर बैंक लॉकर या पुलिस कस्टडी में क्यों नहीं रखा? खुद के गार्ड क्यों नहीं लगाए? फिर जिस चीज की तुम कीमत तक नहीं बता पा रहे हो उसकी चोरी जाने की रपट कैसे लिखूँगा और कौनसी धारा लगाऊँगा?”
    “अरे दारोगाजी हम आपसे पहले ही कह चुके हैं कि घोषणा पत्र सबके बीच पहुंचाने के लिए ही होता है, छिपाकर रखने के लिए नहीं।“
   “तो फिर कायकी रपट! तुम्हारा जो कागज दूसरों के लिए ही था और जिसे तुमने खुला रख छोड़ा था और जिसका कोई नकद मूल्य ही नहीं है, उसकी चोरी की रपट किस धारा में लिखूँ?”
   रपट लिखाने आए पार्टी के उत्साही व सीनियर लीडर्स दारोगाजी के आगे सिर पटक पटक कर रह गए मगर दारोगाजी की कानूनी परिभाषा में घोषणा पत्र की चोरीचोरी नहीं मानी जा सकती थी। इंस्पेक्टर के पास पहुँचे तो उन्होंने यह कहकर सबको झिड़क दिया कि चूँकि उन्होंने घोषणा पत्र पर सर्वाधिकार सुरक्षित होने या कॉपीराइट अपने पास होने की चेतावनी नहीं लिखी है लिहाजा चोरी का प्रकरण नहीं बन सकता !
    सुना है अब पार्टी चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाने जा रही है।      ***
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Monday, 21 April 2014

     
        चुनावी कुण्डलियाँ
         एक
       टिकटों  को  लेकर  मची, कैसी  हाहाकार।
       कोई  जिद पर है अड़ा
, किया  कहीं इनकार॥
       किया कहीं  इंकार
,  आप  देने को आतुर।
       रहे 'कमल' को थाम
, कई अब हाथ बहादुर
       कहे
ओम कविराय, हकालों उन नकटों को।
       बेच रहे ईमान
,  देखकर  जो  टिकटों  को॥
                
                   दो
       बिल्ली मासी ठीक हो, या कोई तकलीफ।
       सुना तुम्हारे लाल को
, आई थी कल छींक॥
       आई थी  कल छींक
, रहे  ना छींका खाली।
       लगा पूछने  श्वान
, देखकर  बिल्ली काली॥
       कहे
ओम तज पाप, चलें जब सब जन काशी।
       आए  आम  चुनाव
,  समझना बिल्ली मासी॥
            
                  
                  तीन
       उनके वादे घोषणा, कपट तंत्र हैं मात्र।
       जैसे उनके हाथ में
, लगा है अक्षयपात्र॥
       लगा है अक्षयपात्र
, कहाँ से आए पैसा।
       बंदर अब मत नाच
, मदारी चाहे वैसा॥
       कहे
ओम कविराय,समझ लो उधर इरादे।
       हैं शिकार के जाल
, आज सब उनके वादे॥
                         
            
                  चार
       परसों  उसकी थी सपा’, कल पंजे का साथ।
       अब लगता है  भाजपा
, के  बिन हुआ अनाथ॥
       के बिन हुआ अनाथ
, वहाँ कल दम था घुटता
       आज लगे वो पाक़
, जहाँ सब  कल था लुटता
       कहे
ओम कविराय, लाभ बिन क्यों तुम तरसो।         
       थामेंगे  कल 
हाथ’,  देखना  फिर कल परसों॥ 
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