Wednesday, 23 July 2014



व्यंग्य               
                          
नारद, अंगद और वैदिक

                                         ओम वर्मा
                                                                         om.varma@gmail.com
र्म ग्रंथों में अक्सर दो दूत, मध्यस्थ या वार्ताकारों का उल्लेख आता है- अंगद और महर्षि नारद ! अंगद अपने दूत-कर्म के लाइफ टाइम अचीवमेंट वाले परफॉर्मेंस के कारण जाना जाता है जिसे राम ने रावण के पास युद्ध टालने के अंतिम प्रयास हेतु एक राजनयिक दूत बनाकर भेजा था। धार्मिक लोग अंगद को इस डिप्लोमेटिक मिशन के कारण जानते हैं और कुछ चतुर लोग उसकी खूबियों को कुछ ऐसी आत्मीयता से आत्मसात कर चुके हैं कि मलाईदार जगह पर ऐसे पैर जमाते हैं कि बरसों उन्हें कोई हिला भी नहीं पाता। 
   जिस रावण ने पड़ोसी राजा की बहू व भावी महारानी का अपहरण कर लिया हो उसका अपराध आज के पटरियाँ उखाड़ने वाले या 9/11 के ट्विन टॉवर्स, या 26/11 के ताज होटल के विध्वंसकारियों से कम तो कतई नहीं माना जा सकता! जाहिर है कि अयोध्या के लिए रावण की छवि वही थी जो अमेरिका के लिए कल ओसामा की या भारत के लिए आज हाफ़िज़ सईद की है। रावण प्रभु श्रीराम से अधिक शक्तिशाली भले ही नहीं था फिर भी उसने प्रभु का सुख चैन तो छीन ही लिया था। इसी तरह हाफ़िज़ सईद की ताकत भी भारत से भले ही बहुत कम हो, तब भी भारत के लिए वह उतना ही अवांछित है जितना त्रेतायुग में राम के लिए रावण था। दूसरे दूत नारद दरअसल एक फ्री-लांसर किस्म के दूत थे जिन्हें मुक्त भ्रमण के लिए कभी भी किसी लोक ने वीज़ा जारी करने में कोई अमेरिकाना हरकत नहीं की थी। उनके कदम जहाँ भी पड़ते वहाँ कलह का बीजारोपण अपने आप हो जाता था।
   लेकिन अब एक और दूत हैं डॉ. वेदप्रताप वेदिक, जिसके उल्लेख के बिना दूतों का इतिहास कभी पूर्ण नहीं कहा जा सकेगा। यह अभी तक एक गूढ़ रहस्य ही बना हुआ है कि वैदिक नारद की तरह स्वयं स्वतंत्र विचरण करते हुए शत्रु के खेमे में गए थे या अंगद की तरह उन्हें वहाँ अच्छे दिनों की खोज में भेजा गया था। भले ही वे किसी गुप्त मिशन के तहत भेजे गए अंगद हों, पर वे दोनों मुल्कों के सियासी हल्कों में खलबली मचाकर नारद तो साबित हो ही चुके हैं। इंटरव्यू की पूरी क्लिपिंग में वे कहीं भी अंगद की तरह अपने राम के सामर्थ्य का बखान करते या अपना पैर जमाकर हिला भर देने की चुनौती देते तो नज़र नहीं आते, अलबत्ता वे इतमीनान से सोफ़े पर बैठे अवश्य नज़र आते हैं। अंगद ने हनुमान जी के साथ मिलकर वानर सेना गठित की थी। मगर ये अपने राम के लिए कोई टास्क फोर्स गठन करते या कोई हेल्पिंग हैण्ड बढ़ाते उससे पहले ही अयोध्या के दरबारियों ने उनसे पल्ला अवश्य झाड़ लिया है। आज के ये अंगद न सिर्फ पूरी तरह अलग थलग पड़ गए हैं,बल्कि उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाने तक की बात हवा में उछाली जा रही है। अंगद के साथ तो उसकी माँ तारा जो तत्कालीन पंचकन्याओं में से एक थी, भी राम-रावण प्रसंग में साथ थी। इधर आज देश की प्रभावशाली पंचकन्याओं में से एक सुषमाजी इस अंगद से कई योजन की दूरी बना चुकी हैं।
  
   बहरहाल, जाने अनजाने वैदिकजी जनता व अच्छे दिनों के बीच दीवार बन ही चुके हैं! 
                                                                
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Wednesday, 16 July 2014



सामयिक व्यंग्य
               सोया है उसे मत छेड़ो
                                      ओम वर्मा

                                   om.varma17@gmail.com

न्म लेते ही बच्चा दो काम करता है –रोना और सोना। नवजात का रोना यानी जीवन का प्रतीक! यह और बात है कि बड़े होकर भी कुछ लोग जिंदगी भर रोते रहते हैं और कुछ दूसरों को रुलाते रहते है। एक लुप्त होती नस्ल उन लोगों की भी है जो यदा कदा रोतों को हँसाने जैसा काम भी कर लिया करते हैं।
   लेकिन शयन तो मानव मात्र की मूल प्रवृत्ति व जन्मसिद्ध अधिकार है। मनुष्य  नवजात अवस्था में चौबीस में से बीस-बाईस घण्टे और बाल्यावस्था से किशोरावस्था तक बारह से चौदह घण्टे सोता है। बाद में नींद तो सिर्फ किस्मत वालों को ही नसीब होती है। वर्ना कई लोगों को कभी स्लीपिंग पिल्स तो कभी भाँति भाँति के योगासन लगाकर “नींद न मुझको आए...” या “आजा री निंदिया...” गाते हुए तो कभी “करवटें बदलते रहे सारी रात हम...” कहते हुए दिल को समझाना पड़ता है। लेकिन नींद जिन्हें आना है उन्हें कहीं भी आ सकती है। इसराइली सैनिक गोला बारूद के बक्सों पर तो भीष्म पितामह शर शैया पर सो सकते हैं और तीर के ही सिरहाने की माँग भी कर बैठते हैं। हठयोगी अग्नि के आगे तो कभी काँटों की सेज़ पर शयन कर लेते हैं तो कोई खड़ेश्वरी बाबा खड़े खड़े और कोई समाधिस्थ होकर सो सकते हैं। राकेश शर्मा और सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष में सो सकते हैं और तंग बस्तियों में बच्चे बड़े बड़े पाइपों में या असहनीय दुर्गंध के बीच भी घोड़े बेचकर सो सकते हैं। ऐसे में सदन में अगर कोई सांसद या राष्ट्रीय पार्टी का उपाध्यक्ष अगर बीच सत्र में शयनासन लगा बैठे तो हंगामा क्यों बरपा है? वे कोई लक्ष्मण थोड़े ही हैं जो उनके चौदह वर्षीय जागरण की तर्ज़ पर सदन में पूरे पाँच साल तक निर्निमेष रहें। हो सकता है कि वे समाधिस्थ हो पाँच साल बाद के मुद्दों की तलाश पर चिंतन कर रहे होंगे। या उन बाईस हज़ार लोगों के भविष्य को लेकर चिंतन कर रहे हों जिनकी हाल के चुनाव में अपने प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार के पीएम बन जाने पर कत्ल कर दिए जाने की वे भविष्यवाणी कर चुके थे। या उनका चिंतन अपने राजनीतिक गुरु की उस चिंता को लेकर हो जिसमें उन्होंने उनकी नेतृत्व क्षमता पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया है।
   चिंतन हमेशा सकारात्मक रखें। यह सच है कि उनके पिताश्री के नानाश्री ने कभी आराम को हराम बताया था मगर तब से अब तक दरियाओं में अनंत लीटर पानी बह चुका है और कई पुण्यसलिलाएँ नालों में तब्दील हो चुकी हैं। यह क्या कम है कि कुछ अन्य मान्यवरों की तरह सिर्फ हंगामा खड़ा कर देना भर उनका मकसद नहीं था। उन्हें सोना ही होता तो वे तबीयत खराब होने का बहाना कर घर जाकर भी सो सकते थे। मगर उन्होंने सदन में अपने मुट्ठी भर अनुयाइयों के बीच  अपनी गरिमामयी उपस्थिति देना ज्यादा जरूरी समझा।            
   सो जाना हमेशा बुरा नहीं होता। अगर झपकी नहीं लगती तो रसायन विज्ञानी केकुले को ख्वाब में मुँह में अपनी पूँछ दाबे साँप कहाँ से दिखता और एरोमेटिक ऑरगनिक केमेस्ट्री के आधारभूत रसायन बेन्जीन का क्लोज्ड रिंग संरचना सूत्र कैसे सामने आता? हमारे ग्रंथ पुराण ऐसे अनेक प्रसंगों से भरे पड़े हैं जिनमें अलौकिक शक्तियाँ कथानायक का जो कि अक्सर गरीब ब्राह्मण हुआ करता था, स्वप्न में आकर मार्ग प्रशस्त कर दिया करती थीं। और सर्वविदित है कि स्वप्न की पहली जरूरत नींद होती है। मत भूलिए कि लंका के पतन का कारण सीताहरण था न कि कुंभकरण का छह माही शयन। वैसे भी खाते हुए और सोते हुए व्यक्ति को डिस्टर्ब न करना हमारी प्राचीन और अब राष्ट्रीय परंपरा है।     ***
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Monday, 23 June 2014

Saturday, 7 June 2014




-  व्यंग्य        
    बाईस हजार हत्याओं की भविष्यवाणी  
                                       
                       ओम वर्मा              
                                 
om.varma17@gmail.com
या तो वे कोई त्रिकालदर्शी हैं या अतींद्रिय शक्तियों के स्वामी! सच देखा जाए तो आज देश व समाज को उनके जैसे विचारक व स्वपनदृष्टा की जरूरत है। आज भले ही सामान हमारे पास सौ बरस का हो पर खबर पल भर की भी नहीं होती। ऐसे में सभी सर्वे व ओपिनियन पोल्स में आगे चल रहे या संवैधानिक प्रक्रिया से अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के निर्वाचित हो सकने की आशंका पर उन्होंने जो पूर्वानुमान, भविष्य कथन, चेतावनी याधमकी दी थी  उसे मैं अगर सदी की सबसे बड़ी भविष्यवाणी कहूँ तो शायद स्वर्ग पहुँच चुकी मानव कंप्युटर शकुंतलादेवी या जानदार मेरा मतलब बेजान दारूवाला को भी कोई आपत्ति नहीं होगी। उनकी भविष्यवाणी है कि अगर मतदाताओं ने उनके प्रतिद्वंद्वी को पीएम बनाया तो बाईस हजार लोगों की हत्या हो जाएगी। यानी गुप्त संदेश यह है कि अगर देश की जनता ने अपने इस पवित्र व सबसे बड़े लोकतांत्रिक अधिकार का उपयोग उनके अनुसार नहीं करके निर्भीकता से किया तो बाईस हजार लोगों को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।
     एक राष्ट्रीय दल की अध्यक्ष का बेटा और उपाध्यक्ष जब इतनी बड़ी भविष्यवाणी करता है तो उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। मैं अपना ज्ञान बघारूँ या कथित विशेषज्ञों से बात करूँ इससे बेहतर मैंने यह समझा कि क्यों न उक्त त्रिकालदर्शी नेताजी से ही बात की जाए।
     “सर उनके पीएम बनने पर बाईस हजार लोगों की हत्या की बात आपने किस आधार पर कही?”
     “हम कोई भी बात हवा में नहीं करते। राजनीति के हमारे अनुभव हमारे कार्यकर्ताओं की रिपोर्ट, हमारे बहुत सारे सीनियर लीडर्स के निष्कर्ष और अपने लेपटॉप में दर्ज़ आँकड़ों के आधार पर मैंने यह बात कही थी।”
     “मैं नहीं समझ पा रहा हूँ, थोड़ा स्पष्ट करें।”
     “हमारे एक वरिष्ठ साथी ने हमें बताया था कि बारह वर्ष पहले उनके राज्य में दंगों में 1300 लोग मारे गए थे। अब आप खुद जोड़ के देख लो कि पूरे देश का क्षेत्रफल गुजरात के क्षेत्रफल का सत्रह गुना है। तेरह सौ इन टु(गुणित) सत्रह = बाईस हजार एक सौ। मैंने सौ कम करके बाईस हजार बताया तो क्या बुरा किया? रेशो प्रपोर्शन का बड़ा ही सिंपल सा गणित! एक और गणित देखें। किसी ने दंगों में मरने वालों की संख्या ग्यारह सौ बताई। आप उसको पॉपुलेशन से रिलेट करके देख लो। देश की पॉपुलेशन, गुजरात की पॉपुलेशन से बीस गुना ज्यादा है। अब ग्यारह सौ में बीस का गुणा करके देख लो। वही बाईस हजार फिर आ जाएगा।” आँकड़ेबाजी में वे मुझे योगेन्द्र यादव व योजना आयोग वालों से भी भारी नज़र आ रहे थे।
     “अगर लोग आपकी बात न मानें तो आप क्या करेंगे?”
     “देखिए जैसे हम गुजरात में पिछले बारह वर्षों से उनका विरोध करते आए हैं
, अगले पाँच वर्ष तक इन बाईस हजार हत्याओं के लिए भी करेंगे और इस भारी मुद्दे के आधार पर अगले चुनाव में हम उनका नमो नमो का नारा रागा रागा में बदल देंगे।” 
   जनादेश, विकास के मुद्दे और अदालतों की क्लीन चिटें, मुझे कोने में सिसकते नज़र आने  लगे। आइए, अपने अपने ढंग से हम प्रार्थना करें कि राहुलजी की 12 व्यक्ति प्रतिदिन के इस संभावित नरसँहार की यह आशंका निर्मूल साबित हो...आमीन!  ***
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Friday, 6 June 2014



   
 विचार
       चायवाले का उभरना या वंशवाद का गिरना! 
            ओम वर्मा                                om.varma17@gmail.com 
सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस की जो गत हुई है उसकी कल्पना किसी कांग्रेसी या जी हुज़ूरी के शोर में डूबे गांधी परिवार ने शायद ही कभी की होगी। गांधी परिवार को लेकर कांग्रेसियों की सोच कुछ ऐसी है कि तेरे नाम से शुरू, तेरे नाम पे खतम’! पार्टी अध्यक्ष से लेकर उपाध्यक्ष और संसदीय दल की अध्यक्ष तक गांधी ही गांधी...! 1999 में  शरद पवार संगमा व तारीक अनवर के साथ मिलकर सोनिया गांधी के विदेशी मूल के आधार पर अलग होकर भी साथ ही चलते रहे हैं। एनडीए ने नरेंद्र मोदी को पीएम उम्मीदवार के रूप में सामने रखा तो यूपीए सिर्फ संवैधानिक प्रावधान की दुहाई देता रह गया कि पीएम सांसदों के द्वारा चुना जाता है। मगर वे यह भूल गए कि किसी को पीएम उम्मीदवार घोषित करके चुनाव लड़ने पर कोई कानूनी रोक भी तो नहीं है। यह भी सभी जानते थे कि जयपुर सम्मेलन में राहुल गांधी की पार्टी उपाध्यक्ष के रूप में नियुक्ति ही इसलिए की गई थी कि भविष्य में उनका राजतिलक किया जा सके। जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी को पीएम पद का दावेदार घोषित कर दिया तब यह कहने की हिम्मत किसी कांग्रेसी में नहीं थी कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ राहुल गांधी को लाना ‘निर्बल से लड़ाई बलवान की ’ वाली बात साबित हो जाएगी। और तो और राहुल की तुलना में प्रियंका को लाना शायद ज्यादा फलदायी हो सकता थायह भी कोई कांग्रेसी न समझ सका न समझा सका। समझाता भी कैसेमनु सिंघवी सरीखे बड़े वफादार जब यह स्थापित करने पर तुले थे कि राहुल तो जन्मजात नेता हैं वहीं कुछ लोग सोनियाजी के एक इशारे पर झाड़ू तक लगाने के लिए तैयार बैठे थे।
     नरेंद्रभाई एण्ड कं. अपनी सभाओं मेंमीडिया में और सभी सोशल साइट्स पर घोटालों व भ्रष्टाचार के मुद्दों को उठाने व भुनाने में सफल रहेवहीं यूपीए वाले गुजरात के 2002 एपिसोड से कभी आगे ही नहीं बढ़े। रुझान बदलने वाली सबसे महत्वपूर्ण घटनाएँ थीं दो महत्वपूर्ण टीवी इंटरव्यू – टाइम्स पर राहुल गांधी और इंडिया टीवी पर नरेंद्र मोदी। जहाँ राहुल गांधी की बार बार सूई अटक जाती थी वहीं नरेंद्र मोदी चुनाव खर्च के सवाल पर जब यह बोले कि सरकार उनकीचुनाव आयोग उनकासीबीआई उनकी... फिर आनंद शर्मा शिकायत क्यों नहीं करते या  जाँच क्यों नहीं करवाते?”  दंगों के आरोप व क्षमा याचना की माँग पर सुप्रीम कोर्ट की क्लीन चिट का उल्लेख करते हुए उनका कहना था कि किसी भी अदालत या किसी भी आयोग से इसकी जाँच करवा ली जाएअगर मैं हत्याओं का दोषी पाया जाता हूँ मुझे चौराहे पर सरेआम फाँसी दे दी जाए। और टोपी विवाद पर जब मौलाना मदनी ने यह कहा कि जिस तरह मुझे कोई तिलक लगाने को बाध्य नहीं कर सकता उसी तरह किसी को टोपी पहनने को बाध्य नहीं किया जा सकता। ये सब वे बातें हैं जो किसी तटस्थ मतदाता की दृष्टि में मोदी को आरोपमुक्त करती है। अधिकांश जनता की नज़र में मोदी चुनावी रणभूमि में घिरे उस अभिमन्यु की तरह थे जिसे कई परस्पर विपरीत विचारधारा वाले शत्रुओं ने घेर लिया था फिर भी वे चक्रव्यूह भेदने में सफल रहे। कभी उन्हें राक्षस,कभी गुण्डा, कभी नपुंसक  तो कभी दंगा बाबू जैसे अलंकरणों से नवाज़ा गया। मगर ये सभी वार बूमरेंग की तरह आक्रमणकर्ताओं का ही नुकसान करते रहे। जसोदाबेन के प्रकरण में यह तीर कि जो अपनी पत्नी को नहीं सम्हाल सका वह देश क्या सम्हालेगाहवा का बुलबुला साबित हुआ। अगर मोदी ने दूसरा विवाह किया होता या उनका कोई बाहरी प्रेम प्रसंग सामने आता या जसोदाबेन के परिजनों ने कभी कोई शिकायत की होती तो जरूर शर्मिंदगी या परेशानी का सबब बन सकता था। पत्नी परित्याग किसी फिल्म या ‘साकेत’ जैसे महाकाव्य का विषय तो बन सकता है पर उसमें राजनीतिक माइलेज़ लेने जैसा कुछ नहीं था। इसी तरहकुत्ते के पिल्ले वाले कथन में विदेशी साक्षातकारकर्ता ने स्वयं ट्वीट कर खण्डन किया व संदर्भ से काटकर देखे जाने की बात कही। वहीं अटलजी की राजधर्म निभाने की बात भी पूरा भाषण देखने पर संदर्भ से काटी गई प्रतीत होती है क्योंकि अटलजी आगे यह भी कहते हैं कि मोदीजी ने राजधर्म निभाया है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि दिग्विजय - अमृता राय प्रकरण में मोदी ने कोई बदजुबानी नहीं की।
     मोदी पर पुस्तकें आनाविदेशी अखबारों में उनके राज्य के विकास की प्रशंसा होना और तभी मनमोहनसिंह को कमजोर पीएम बताने वाली दो किताबें आना व अमेरिका केवाल स्ट्रीट जर्नल’ में रॉबर्ट वाड्रा के मायाजाल का खुलासा होना आदि कई ठोस मुद्दों की मानों बरसात हो गई। भाजपा की हालत स्टेशन पर खड़ी उस ट्रेन की तरह हो गई थी जो उत्तर दिशा की ओर जाने वाली है मगर उसमें वो यात्री भी खड़े खड़े यात्रा करने के लिए तैयार हैं जिनके पास किसी अन्य स्टेशन के टिकट हैं। वैसे ‘नीच राजनीति ’ वाले एक साधारण से जुमले को वे नहीं छेड़ते तो ज्यादा अच्छा रहता।
     भाजपा को दिग्विजयसिंहबेनीप्रसाद वर्मासलमान खुर्शीदइमरान मसूदममतादी और नीतीशकुमार व उन सभी का भी आभार व्यक्त करना चाहिए जिनकी हैरतअंगेज़ बयानबाजी से मोदी को बैठे बिठाए एडवांटेज मिलता गया। मोदी को उन लोगों का भी अभारी होना चाहिए जिन्होंने प्रवीण तोगड़िया के मुसलमानों को मकान न देनेगिरिराजसिंह का मोदी विरोधियों को पाकिस्तान भेजने व बाबा रामदेव के राहुल गांधी के दलितों के घर हनीमून मनाने जैसे अद्भुत बयानों से नाराज होने के बजाय उनके सुशासन व सबको साथ लेकर चलने के दावे को तवज्जो दी। इस विश्वास पर वे तभी खरे उतर सकते हैं जब उनके कार्यकाल में जसवंतसिंह की ससम्मान वापसी हो और 75+ वालों को दूर रखने का फॉर्मूला लागू करने के नाम पर आडवाणीजी व सुमित्रा महाजन जैसे पुराने चावलों को शोभा की वस्तु बनाकर न रख लिया जाए। मुस्लिम समाज ने जो जबर्दस्त विश्वास भाजपा में दिखाया है उसे सिर्फ संपूर्ण समुदाय में सुरक्षा का भाव जागृत करके ही रिसिप्रोकेट किया जा सकेगा।                              ***
                       
 
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Saturday, 31 May 2014


     बुलावा जो नहीं आया!
                               ओम वर्मा
                          om.varma17@gmail.com 
रा ही आहटें होती थीं तो ये लगता था कि कहीं ये वो तो नहीं! मगर जब भी उन्हें लगता कि चले आ रहे हैं वे नज़रें उठाए, तो वह हर बार उनकी नज़रों का धोखा ही साबित हुआ। बाद में तो वे सीधे ड्राइंग रूम में जाकर सोफ़े की उस कुर्सी पर जाकर बैठ गए जहाँ से मुख्यद्वार पर सीधी नजर रखी जा सकती थी। दरवाजे को भी उन्होंने अटका कर रखा था जिसके कि जरा सा हिलते ही उन्हें लगने लगता था कि उन्हें दिल्ली से मंत्रीमण्डल में शामिल होने का बुलावा आया है। मगर दरवाजे तक पहुँचते ही असलम साबरी उनके कानों में दहाड़ते प्रतीत होते थे -कोई आया है न कोई यहाँ आया होगा, मेरा दरवाजा हवाओं ने हिलाया होगा...।  रात अपने टेलीफोन व मोबाइल की घण्टी फुल कर वे सिरहाने रख कर ही सोए थे। जब भी घण्टी बजती, वे रिसीवर या मोबाइल कुछ इस अंदाज़ में उठाते जैसे बिल्ली चूहे को झपटती है। मगर नतीजा भारत-पाक वार्ताओं की तरह फिर ढाक के तीन पात होकर रह जाता था।
     हालांकि कद्र तो उनकी उस पार्टी में भी कोई कम नहीं थी। अपने विद्यार्थी जीवन से ही उन्हें लट्ठ-भारती में अच्छी ख़ासी महारत हासिल हो गई थी। इसी कारण उन्हें तब पार्टी की जिला शाखा का अध्यक्ष बना दिया गया था। इन चुनावों में जब पार्टी को उम्मीदवार ढूंढ़े नहीं मिल रहे थे तब वे अपने क्षेत्र से चुनाव लड़ने को तैयार हुए थे। मगर उधर दूसरी पार्टी के भियाजी के तूफानी दौरे और सभाओं की दिनोदिन बढ़ती भीड़ देख अकस्मात उनकी छठी इंद्रिय जागृत हुई और जैसे कोई हवा उनके कानों में सरगोशी सी कर गई कि “हे मूरख प्राणी! तेरी जेब में जिस ट्रेन का टिकट है वह प्लेटफॉर्म नं. 1 पर खड़ी है और खड़ी ही रहेगी। इस बार सिग्नल प्लेटफॉर्म नं. 2 पर खड़ी ट्रेन को मिलने वाला है। जा यह टिकट लौटा और उसका टिकट ले ले...!” इससे पहले कि खिड़की बंद होती, 2 नं. पर खड़ी ट्रेन का टिकट उनकी जेब में था। इधर यह ट्रेन पहले से ही फुल हो चली थी। मगर येन केन प्रकारेण वे जगह व अंततः मंजिल पाने में कामयाब हो ही गए।

     हाँ तो परिणाम के दिन वही हुआ जिसकी की कई चाणक्यों को उम्मीद थी। उनकी पार्टी को छप्पर फाड़ बहुमत हासिल हुआ। लहर को तूफान में बदलते देख मौसम विशेषज्ञ भी भौंचक रह गए थे। जैसे ज्वार आने पर समुद्र का बहुत सारा कचरा किनारे पर लग जाता है वैसे ही लहर उन्हें भी पार लगा चुकी थी। मगर परिणाम के बाद शपथ समारोह तक उनके दिन वैसे ही कटे जैसे म.प्र. के उस पीएमटी प्रत्याशी के कटे होंगे जो व्यापम वालों को सेट कर कॉपी ब्लेंक छोड़कर चला आया था। ये मंत्री बनाए जाने के लिए उतने ही कॉन्फिडेंट थे जितने वे डॉक्टर बनने के। उधर पीएमटी वालों को बीच कोर्स में से खदेड़ दिया गया है और इधर ये लहर के सवार किनारे पर पड़े जरूर हैं मगर अपना बारहवीं उत्तीर्ण होने का प्रमाण पत्र लहरा लहरा कर उन जहाज वालों का ध्यान खींचने की बेकार कोशिश कर रहे हैं जो नया मंत्रीमण्डल लेकर उनसे दूर, और दूर होता चला जा रहा है।                                  ***

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Tuesday, 27 May 2014




  व्यंग्य              
             कच्ची व पक्की दीवार

                                           
  ओम वर्मा
                                       om.varma17@gmail.com
 
दीवारें दो तरह की होती हैं – कच्ची दीवार और पक्की दीवार। साहित्यिक भाषा में एक मूर्त और एक अमूर्त! कच्ची दीवार यानी वह मूर्त दीवार जो ईंट गारे या अन्य बिल्डिंग मटेरियल की बनी होती है व सारी दुनिया को दिखाई देती है... जैसे कि ग्रेट वाल ऑफ चाइना’, या दोनों जर्मनियों के पुनर्मिलन से पूर्व पैंतालीस वर्षों तक तनी रही ऐतिहासिक बर्लिन वाल। चीन की 6000 किमी लंबी दीवार के बारे में कभी यह भी पढ़ा था कि वह चाँद से भी दिखाई देती है। बहरहाल दीवार चाँद से भले ही दिखे या न दिखे, दो देशों को बाँटे या न बाँटे, वह होती बड़ी ही कच्ची है। आखिर दीवारें ही हैं कोई रेडक्लिफ लाइन नहीं कि हथौड़े, डायनामाइट या परमाणु बम से भी नहीं मिटाई जा सके। चीन की ग्रेट वाल को भी चीन या अन्य महाशक्तियाँ जब चाहें ध्वस्त कर सकती हैं। कई बार तो यूँ लगता है कि जैसे सारी दुनिया ही शीशे की है जहाँ कभी कोई सिरफिरा एक हवाई जहाज का अपहरण कर उसे टकरा दे तो ऊंची से ऊंची दीवार को ज़ीरो ग्राउंड में बदलने में पल भर न लगे। यानी मूर्त दीवारों को अच्छे या बुरे किसी भी प्रयोजन के लिए ध्वस्त किया जा सकता है। कहीं कोईभाई हुआ तो जमीन हथियाने के लिए  दीवारें जबरन खड़ी कर लेता है और घर पर पेटी बिस्तर तैयार रख नौकरी पर निकलने वाला कोई कलेक्टर या कमिश्नर हो तो जमींदोज़ भी कर सकता है।
   मगर जो अदृश्य व अमूर्त दीवारें होती हैं उनका लेखा जोखा या जवाब है किसी के पास? वो दीवार जिसे गुजरात और शेष भारत के बीच खड़ी करने की कोशिशें जारी हैं वो दीवार जो कश्मीरियत और हिंदुस्तानियत के बीच या देश के हर अलगू चौधरी और जुम्मन शेख के बीच तामीर की जा रही है और रोज उस पर नई नई परतें चढ़ाई जा रही हैं… वह दीवार जो एक पीएम को दूसरे पीएम की शपथ विधि में जाने में अवरोध खड़े करती है ,,,या  वह जो किसी लंगड़ को आज तक अदालत के फैसले की नकल लेने से रोक रही है...वह दीवार जो आज भी होरी को भूखा सोने या आत्महत्या करने पर विवश करती है... वह दीवार जो राँझे को हीर और मजनूँ को लैला से मिलने से आज भी रोके हुए है... वह कभी टूटेगी भी? और वह दीवार जिसके कि इस पार वाला उस पार वाले को सिर्फ पाँच साल में एक ही बार देख पाता है या वह जिसकी वजह से वंशवाद में सेंध लगाने के बारे में सोचना ही 1857 के विद्रोह के समान गदर मान लिया जाए, उस दीवार के लिए कोई बारूद या बुलडोजर अभी तक ईज़ाद क्यों नहीं हुआ? क्या मातृभूमि की रक्षा हेतु प्राण न्योछावर कर देने वाले शहीदों की शहादत की दीवार से उनकी मज़हबी पहचान की दीवार बड़ी हो सकती है?क्या टोपी और तिलक के बीच में दीवारें खड़ी की जाती रहेंगी? क्या हिंदी को संपूर्ण देश की राष्ट्रभाषा और संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनने में जो दीवार अवरोध बनकर खड़ी है उसे कोई ध्वस्त कर सकेगा? और लास्ट बट नॉट द लीस्ट कि अर्जुन को इक़बाल के साथ क्रिकेट खेलने से रोकने वाली या उनके बालमन में विषबेल सी खड़ी की जा रही दीवार को गिराने के लिए भी कोई महापुरुष कभी रथ यात्रा निकालेगा?  
   जाहिर है कि देश में दीवारें बहुत हैं। अगर इनमें से सही चुन ली जाएँ और उन पर सद्भाव की छतें ढाल दी जाएँ तो इतने मकान बल्कि घर बन जाएँ कि सभी को छत्रछाया मिल जाए!
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