Monday, 25 August 2014





 व्यंग्य (नईदुनिया, 25.08.2014)
           आरटीओ की शहादत
                                    ओम वर्मा 
                                          om.varma17@gmail.com
 क फोन काल क्या आया, पूरे घर में कोहराम मच गया। 
   अनोखीलालजी की होने वाली बहू के पिता बदामीलालजी अपनी बेटी का रिश्ता तोड़ रहे हैं। न तो वे कोई कारण बता रहे थे और न ही आगे कुछ बात करने को तैयार थे। छह महीने पहले ही उन्होंने बेटे का रिश्ता तय किया था। दहेज में बीस लाख रुपय्ये नकद गिनकर देने की बात हुई थी। अगले महीने लगन था। लड़का उनका था तो सिर्फ बी.ए. पासमगर उसकी नौकरी बड़ी मलाईदार थी। आरटीओ में क्लर्क जो था।
   लेकिन आज बदामीलालजी बदाम के नरम बीज से यकायक अखरोट के कठोर छिलकों में बदल गए थे। अपनी घबराहट पर काबू पाने के लिए उन्होंने अखबार में नजरें गढ़ा दीं। जैसे दो अपरिचित लोग मौसम या बरसात को लेकर कभी भी और कहीं भी बातचीत का सूत्र पकड़ सकते हैं वैसे ही उन्होंने अखबार में कोई सांत्वना सूत्र तलाशने का प्रयास किया। एक खबर पर नजर पड़ते ही उनके हाथ से पेपर और पैरों तले जमीन खिसक गई! खबर थी की सरकार देश के सारे आरटीओ बंद करने का मन बना रही है। जिस मलाईदार महकमे में बेटे की जुगाड़ जमाने के लिए उन्होंने दस लाख का इनवेस्टमेंटकिया था, जिसके बदले विवाह की मण्डी में वे बेटे पर बीस लाख रु. का 'प्राइस टैगलगाने में सफल हुए थे, और जिस कारण बी.ए.पास लड़के को बी.ई. पास लड़की मिल रही थी वह भी नोटों की  गड्डियों के साथ, उनका वही 'कीमती सामान' यकायक रिडक्शन सेल में तब्दील हो गया था।
   उन्हें लगा आरटीओ पदस्थ पुत्र के कारण कल तक सारी बिरादरी में उनकी नाक जो शूर्पणखा की नाक से भी बड़ी हुआ करती थी, उसे लक्ष्मण रूपी परिवहन मंत्री ने एक झटके में क्षत-विक्षत कर दिया है।
   यह दुखड़ा एक अकेले अनोखीलाल का नहीं है। देश में ऐसे कई अनोखीलाल हैं जिनका दाना-पानी आरटीओ से बँधा है। माना कि सरकार सारे आरटीओ वालों को कहीं न कहीं एडजस्ट कर उनकी दालरोटी का इंतजाम तो कर ही देगी। लेकिन आरटीओ कर्मी चाहे वह अधिकारी हों या चपरासी, एक स्वर में यही कहेंगे कि "सरकार हमें क्यों उल्लू बनाविंग! उल्लू बनाविंग!!” सीधी-सी बात है बंधु, दाल-रोटी बस स्टैंड के रामसखा भोजनालय में भी मिलती है और फाइव स्टार होटल में भी। और जाहिर है कि अन्य सरकारी विभागों की दाल रोटी बस स्टैंड के भोजनालय की दाल रोटी होती है जबकि एक आरटीओ कर्मी की दाल रोटी फाइव स्टार होटल का  शाही टुकड़ा होती है। 
   आज चाहे 'कफ़न' और 'गोदान' के घीसू- माधौ और होरीराम हों या 'राग दरबारी' का लंग्गड़, सब जानते हैं कि आरटीओ जैसी समाजवादी व्यवस्था अन्यत्र दुर्लभ है। यहाँ एक बाबू अपने एक या दो एवजियों से काम करवाकर बेरोजगारी हल करने की दिशा में प्रशंसनीय कार्य करता है। और ये जो हर आरटीओ ऑफिस के बाहर ढेर सारे एजेंट, कर सलाहकार कच्ची पक्की गुमटियाँ बनाकर बैठे हैं क्या ये अपने जमे जमाए कारोबार को आसानी से छोड़ देंगे? आरटीओ के दलाल सिर्फ खिलाने की कला जानते हैं, ये कोई तरला दलाल नहीं हैं जिन्हें पकाने का भी शौक हो।
   सच तो यह है कि एजेंट के माध्यम से बिना ट्रायल के पर्मार्नेंट लायसंस बनवा चुके लोग भी आज आरटीओ की वर्तमान कार्यप्रणाली के इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि वे इसे अब भ्रष्टाचार नहीं, एक स्वाभिक प्रक्रिया मानने लगे हैं। और दिल्ली वालों को यह कौन समझाए, जो 'सारे घर के बदल डालूँगा' की नादानी में लगे हुए हैं।                                          ***
--------------------------------------------------------------------------------
100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 4565001

Tuesday, 29 July 2014

व्यंग्य कथा - कफन -2

व्यंग्य  कथा 

कफ़न -2

ओम वर्मा
बर गणेश की मूर्तियों के दुग्धपान की तरह पूरे देश मेँ फैल गई कि पिता-पुत्र घीसू और माधव बुधिया की अंत्येष्टि सामग्री के पैसों से शराब पी गए हैं और नशे मेँ बदमस्त होकर पास्कल के अड्डे पर औंधे मुँह पड़े हुए हैं।
हुआ कुछ यूँ था कि उस दिन शहर की उस अवैध बस्ती के उस अवैध कच्चे मकान के अगले कमरे मेँ बैठे माधव व घीसू बिजली के खंबे से अवैध रूप से तार की हेकड़ी डालकर लिए गए कनेक्शन वाले बिजली के हीटर पर आलू भून कर खा रहे थे। घर मेँ आटा-दाल और पैसा कौड़ी नदारद था। बचे थे तो सिर्फ आलू। बस्ती मेँ ही कालू दादा की शराब भट्टी से उधार में लाए गए पाव का भी साथ साथ मज़ा लेते जा रहे थे। अंदर के कमरे मेँ माधव की पत्नी बुधिया प्रसव पीड़ा के मारे तड़प रही थी।
मालूम होता है कि अस्पताल वालों का जेब भरे बिना मानेगी नहीं। सारा दिन हो गया दौड़ते भागते और इसकी चिल्लाचोंट सुनते सुनते। जा, देख तो आ, और तेरे मोबाइल से वो क्या केते हैं उसकू वो जननी गाड़ी वालों को फोन तो लगा”, घीसू ने जननी एक्सप्रेस बुलाने का कहना चाहा।
“मैं क्यों लगाऊँ ? बहू तुम्हारी है। तुम लगाओ अपने मोबाइल से। मेरे पास बैलेंस नहीं है।“ माधव ने चिढ़कर जवाब दिया। दरअसल वह अपना कीमती समय ऐसे फालतू काम मेँ गँवाना नहीं चाहता था। उसे भय था कि उधर वह बात करे उतनी देर मेँ बापू कहीं सारे आलू और उसका ठर्रे का पाव भी खत्म न कर दे।
उस तंग बस्ती का यह कुनबा सारे कस्बे मेँ बदनाम था। मनरेगा के तहत घीसू एक दिन काम करता तो तीन दिन आराम। माधव इतना कामचोर था कि हर आधे घण्टे मेँ कभी बीड़ी पीने भागता तो कभी एक दक्षिणी राज्य के विधायकों की तरह कुछ खास विडियो क्लिप देखने लग जाता जो उसने अपने मोबाइल मेँ जुगाड़मेंट से फिरी – फोकट मेँ डलवा रखी थी। बीच बीच मेँ जब चाहे तब कभी भूरिया की घरवाली को मोबाइल लगा देता तो कभी राधिया की बहिन को मुस्काल (मिस्ड काल) मार देता। हालांकि मेहनती आदमी के लिए पचासों काम थे मगर इन दोनों को जो एक बार बुला लेता वह वैसे ही पछताता जैसे लोग चुनावों मेँ अपनी पसंद के उम्मीदवार के लिए अपनी ऊँगली रँगवाने के बाद पूरे पाँच साल तक पछताते रहते हैं। इसलिए इनसे तो सब दूर से राम राम करने मेँ ही अपनी भलाई समझते थे। कभी कभी जब किसी का काम अटक जाए या खेतों मेँ पकी फसल खड़ी हो, मावठे का डर सता रहा हो और मजदूर भी न मिल रहे हों, तब लोगों को इन्हें भी सहना पड़ता था। मगर तब उनके पास दोनों से एक का काम पाकर भी संतोष कर लेने के सिवा कोई चारा न होता। सोयाबीन और गेंहू की फसल कटाई के वक़्त तो दोनों दुगुनी मज़दूरी माँगते। दोनों फटे चिथड़ों से अपनी नग्नता को ढाँके हुए, क़र्ज़े से लदे हुए, जब अल्लाह दे खाने को तो कौन जाए कमाने कोवाले सिद्धांत का अक्षरशः अनुसरण करते हुए मस्त जिंदगी जीने मेँ विश्वास रखते थे। घीसू अपने इसी बादशाही अंदाज़ से उम्र के साठ साल काट चुका था और माधव भी अपने ही भक्तों के तिरस्कार के पात्र बने संत पिता के संत पुत्र की तरह बाप का नाम और उजागर कर रहा था।
माधव का ब्याह पिछले साल ही हुआ था। जब से यह गृहलक्ष्मी घर मेँ  आई थी, दोनों को कुछ ऐसी राहत मिल गई थी मानों पड़ोसी मुल्क को आतंकी गतिविधियों के चलते भी अंकल सैम से करोड़ों डालर का पैकेज या जैसे अन्ना हज़ारे के आंदोलन और भूख हड़ताल से कुछ राजनीतिक दलों को बैठे बैठे ही चुनाव जीतने या लोकपाल बिल पटल पर रखने का लाभ मिल गया हो। कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि पाँच-छह घरों का झाड़ू पोंछे और बर्तन का काम करके उसी ने खानदान मेँ न सिर्फ व्यवस्था की नींव डाली, बल्कि दोनों को कई बार भूखा सोने से भी बचाया था। जब से वह आई, यह दोनों और भी आलसी और आरामतलब तो हो ही गए थे और मुट्ठी भर विधायकों या सांसदों के दम पर सरकार बनाने का दम रखने वाले पार्टी लीडर की तरह कुछ कुछ अकड़ने भी लगे थे। वही औरत आज प्रसव वेदना से मर रही थी तो दोनों भुने आलू और कच्ची दारू का मज़ा छोड़कर जननी एक्सप्रेस वाहन के लिए मोबाइल करने को भी तैयार नहीं थे।
माधव आशंकित था कि अगर उसने अंदर जाकर घरवाली की दशा देखने की सौजन्यता दिखाई तो घीसू आलूओं का बड़ा भाग साफ कर देगा। इसी आशंका के तहत घीसू भी बहू का उघड़ा बदन न देख सकने के बहाने आलू भक्षण का लोभ न छोड़ पा रहा था। आलू खाकर दोनों ने अपने अपने पाव खत्म किए और हीटर का जुगाड़ अलग कर वहीं ढेर हो गए।
सुबह माधव ने अंदर जाकर देखा कि बुधिया के प्राण पखेरू उड़ चुके हैं। मुँह पर मँडराती मक्खियाँ, पति के इंतज़ार मेँ पथरा चुकी आँखें, धूल से लथपथ देह और पेट मेँ मरा बच्चा। बाप बेटों ने जबर्दस्त स्यापा शुरू कर दिया। शीघ्र ही आस पड़ोस के लोग इकट्ठे हो गए और इन अभागों को सांत्वना प्रकट कर समझाने लगे। बिना उपचार के एक गर्भवती स्त्री और वह भी दलित वर्ग की, मरी पड़ी थी। कुछ ही देर मेँ हमेशा सबसे पहले हमने दिखाया का दावा करने वाले टीवी चैनल वाले अपनी अपनी भूमिकाओं का मंचन प्रारंभ कर चुके थे।
“पत्नी के निधन पर आप कैसा महसूस कर रहे हैं ?” नए नए नियुक्त हुए टीवी पत्रकार ने प्रशिक्षण मेँ सीखे अपने ज्ञान का परिचय देते हुए प्रश्न किया।

     “हे भगवान! गरीबों की तो कोई सुनने वाला ही नहीं है रे!” सामने कैमरा देख माधव और ज़ोर से पछाड़ खाने लगा और कुछ इस तरह विलाप करने लगा जैसे सीता अपहरण के बाद प्रभु श्रीराम वन मेँ कर रहे थे।
     “मेरे घर से तो लछमी ही चली गई है भगवान!” घीसू भी छाती माथा कूटने लगा।
     “देखिए यहाँ पर एक दलित की गर्भवती पत्नी ने समय पर उपचार न मिल पाने के कारण तड़प तड़प कर जान दे दी है और सरकार के कानों पर जूँ तक नहीं रेंग रही है। यहाँ न तो कोई जनप्रतिनिधि अभी तक आया है न ही प्रतिपक्ष का कोई नेता !... माधव और घीसू के घर से कैमरामेन विनोदकुमार के साथ, मैं दीपक मनबसिया, अभी तक के लिए...!” खबरिया चैनलों की जुगाली शुरू हो चुकी थी।
तभी वहाँ सत्ता दल व प्रमुख विपक्षी दल के राजनीतिक कार्यकर्ता भी अवतरित हो गए।
“यह विपक्ष की चाल है !...हमने जननी सुरक्षा वाहन यहाँ भिजवाया था मगर उसे गलत पता बताकर यहाँ से अपोजिशन वालों ने लौटा दिया।“ अभी अभी सांत्वना प्रकट करने आए नेताजी ने चैनल वालों द्वारा घेरे जाने पर पान मसाले की खपत का प्रमाण दे रही बत्तीसी दिखाते हुए जवाब दिया।
“ये सरकार हर मुद्दे पर फेल है। जो एक गर्भवती दलित औरत की जिंदगी नहीं बचा सकते उनको सरकार मेँ बने रहने का कोई हक़ नहीं है। मुख्यमंत्री को तत्काल इस्तीफा दे देना चाहिए।“ प्रतिपक्ष का नेता था वह... जलती चिता पर हाथ सेंकने मेँ माहिर! आज का अवसर भला क्यों हाथ से जाने देता!
अब मृतक को तो वापस जिंदा नहीं किया जा सकता पर मैं शासन की ओर से अंतिम क्रिया करम के लिए पाँच सौ रु॰ की धनराशि प्रदान करता हूँ।“ नेताजी ने घोषणा कुछ इस अंदाज़ मेँ की मानों भामाशाह ने महाराणा प्रताप के सामने फिर से युद्ध लड़ने के लिए अपना खज़ाना रख दिया हो। शर्माशर्मी मेँ अपोजिशन वाले भी अपनी अपनी इच्छा और टीवी वालों के सामने मिल रहे कवरेज़ के मद्देनजर अपनी सहयोग राशि भी क्रियाकर्म फण्ड में दे देकर चलते बने। दो साँड़ों को मुक्त विचरण के लिए पूरी चरागाह मिल गई थी। करीब हजारेक रुपए हाथ लग गए थे जिसे दोनों ने जेबों के हवाले किए और क्रियाकर्म का सामान लेने चल दिए ताकि बुधिया की मिट्टी खराब न हो।
जुआरी के हाथ मेँ पैसे आते ही जैसे खुजली चलने लगती है और किसी  नेता को जनता के सामने शोक सभा मेँ भी भाषण सूझने लगता हैवैसे ही पैसे हाथ मेँ आते ही दोनों के नथुने पुलिस के कुत्तों की तरह शराब की गंध खोजने को बेचैन होने लगे। बाज़ार मेँ उनके पैर स्वतः ही उन्हें पास्कल के दारू के अड्डे पर खींच ले गए।
“दादा, लोग हमसे पूछेंगे कि क्रियाकर्म के पैसे कहाँ गए तो हम क्या जवाब देंगे ?” लगभग आधी बोतल खाली करने के बाद माधव को अचानक ज़िम्मेदारी का इल्हाम हुआ।  नशे में भी आदमी के मुँह से कभी कभी आत्मा की आवाज निकल ही आती है।
घीसू हँसा, “अबे कह देंगे कि जेब फटी थी और रुपए उसमें से खिसक गए। बहुत ढूँढ़ा, मिले नहीं। लोगों को विश्वास तो न आएगा लेकिन फिर वही हमें रुपए देंगे। और कोई न दे तो वो भोत सारे एनजीओ वाले कहाँ जाएँगे। हाँ तब रुपए हमारे हाथ न आएँगे। फिर स्वर्गवासी बहू के सम्मान मेँ शोक संदेश जारी करने जैसी मुद्रा में कहने लगा, “कितनी भली औरत थी बेचारी जो जाते जाते भी हमारा गला तर कर गई!”
पास्कल की इस अवैध मधुशाला की रौनक अंधेरे के साथ साथ बढ़ती जा रही थी। शराब का नशा बेसुरे से बेसुरे आदमी को सुरीला होने का गुमान पैदा कर देता है और अँग्रेजी में हमेशा फेल होते रहने वाले को धाराप्रवाह बोलने की प्रेरणा भी दे देता है। वहाँ भी कोई गाने लग जाता तो कोई अंग्रेज़ी झाड़ने लग जाता। कोई कोई देश मेँ रोज रोज उजागर हो रहे घोटालों पर घोटालेबाज़ों को गाली बकने लग जाता था। समझना मुश्किल था कि यह मात्र शराब का असर था या सबके मुख से देश व समाज की आज की सही तस्वीर सामने आ रही थी।   
     “कुछ भी कहो दादा, वह बैकुण्ठ मेँ जाएगी, वह बैकुण्ठ की रानी बनेगी।“ माधव ने मछली का एक बड़ा टुकड़ा मुँह मेँ डालते हुए कहा।
     “हाँ बेटा
, जरूर बैकुण्ठ मेँ जाएगी। इतने दुःख देखने के बाद भी जिसके मुख से कभी किसी के लिए बुरा न निकला वह बैकुण्ठ नहीं जाएगी तो क्या वो बैकुण्ठ जाएंगे जो मुल्क को बेचने पर तुले हैं? क्या वो बैकुण्ठ जाएंगे जो हमारी गाय भैंसों का चारा खा गए हैं...या क्या वे बैकुण्ठ जाएंगे जिन्होंने माँओं के सामने बेटों के कत्ल कर दिए है?,,,नहीं नहीं माधव...तेरी बुधिया जरूर बैकुण्ठ जाएगी।“ घीसू भी आखिर बिलख ही उठा।
और माधव खड़ा होकर गाने लगे-
बुधिया बदनाम हुईSSS माधव तेरे लिए...!
घीसू भी सुर मेँ सुर मिलाने लगा-
“बुधिया की जान गईSSS माधव तेरे लिए...!”
फिर दोनों शादियों मेँ नाच रहे अधेड़ों की तरह नाचने लगे। चुनावों की रैलियों मेँ पैसे लेकर शामिल हुए कार्यकर्ताओं की तरह कभी उछलने, कभी कूदने और कभी मटकने भी लगे। और जैसा कि अधिकतर शराबियों के साथ होता है, अंत मेँ नशे से बदमस्त होकर वहीं धड़ाम से गिर पड़े।
सरकार ने आनन फानन में एक जाँच आयोग बैठा दिया है।
(प्रेमचंद जी से क्षमायाचना सहित)
                         ***
-------------------------------------------------------------------------
 100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001 (म॰प्र)

Wednesday, 23 July 2014



व्यंग्य               
                          
नारद, अंगद और वैदिक

                                         ओम वर्मा
                                                                         om.varma@gmail.com
र्म ग्रंथों में अक्सर दो दूत, मध्यस्थ या वार्ताकारों का उल्लेख आता है- अंगद और महर्षि नारद ! अंगद अपने दूत-कर्म के लाइफ टाइम अचीवमेंट वाले परफॉर्मेंस के कारण जाना जाता है जिसे राम ने रावण के पास युद्ध टालने के अंतिम प्रयास हेतु एक राजनयिक दूत बनाकर भेजा था। धार्मिक लोग अंगद को इस डिप्लोमेटिक मिशन के कारण जानते हैं और कुछ चतुर लोग उसकी खूबियों को कुछ ऐसी आत्मीयता से आत्मसात कर चुके हैं कि मलाईदार जगह पर ऐसे पैर जमाते हैं कि बरसों उन्हें कोई हिला भी नहीं पाता। 
   जिस रावण ने पड़ोसी राजा की बहू व भावी महारानी का अपहरण कर लिया हो उसका अपराध आज के पटरियाँ उखाड़ने वाले या 9/11 के ट्विन टॉवर्स, या 26/11 के ताज होटल के विध्वंसकारियों से कम तो कतई नहीं माना जा सकता! जाहिर है कि अयोध्या के लिए रावण की छवि वही थी जो अमेरिका के लिए कल ओसामा की या भारत के लिए आज हाफ़िज़ सईद की है। रावण प्रभु श्रीराम से अधिक शक्तिशाली भले ही नहीं था फिर भी उसने प्रभु का सुख चैन तो छीन ही लिया था। इसी तरह हाफ़िज़ सईद की ताकत भी भारत से भले ही बहुत कम हो, तब भी भारत के लिए वह उतना ही अवांछित है जितना त्रेतायुग में राम के लिए रावण था। दूसरे दूत नारद दरअसल एक फ्री-लांसर किस्म के दूत थे जिन्हें मुक्त भ्रमण के लिए कभी भी किसी लोक ने वीज़ा जारी करने में कोई अमेरिकाना हरकत नहीं की थी। उनके कदम जहाँ भी पड़ते वहाँ कलह का बीजारोपण अपने आप हो जाता था।
   लेकिन अब एक और दूत हैं डॉ. वेदप्रताप वेदिक, जिसके उल्लेख के बिना दूतों का इतिहास कभी पूर्ण नहीं कहा जा सकेगा। यह अभी तक एक गूढ़ रहस्य ही बना हुआ है कि वैदिक नारद की तरह स्वयं स्वतंत्र विचरण करते हुए शत्रु के खेमे में गए थे या अंगद की तरह उन्हें वहाँ अच्छे दिनों की खोज में भेजा गया था। भले ही वे किसी गुप्त मिशन के तहत भेजे गए अंगद हों, पर वे दोनों मुल्कों के सियासी हल्कों में खलबली मचाकर नारद तो साबित हो ही चुके हैं। इंटरव्यू की पूरी क्लिपिंग में वे कहीं भी अंगद की तरह अपने राम के सामर्थ्य का बखान करते या अपना पैर जमाकर हिला भर देने की चुनौती देते तो नज़र नहीं आते, अलबत्ता वे इतमीनान से सोफ़े पर बैठे अवश्य नज़र आते हैं। अंगद ने हनुमान जी के साथ मिलकर वानर सेना गठित की थी। मगर ये अपने राम के लिए कोई टास्क फोर्स गठन करते या कोई हेल्पिंग हैण्ड बढ़ाते उससे पहले ही अयोध्या के दरबारियों ने उनसे पल्ला अवश्य झाड़ लिया है। आज के ये अंगद न सिर्फ पूरी तरह अलग थलग पड़ गए हैं,बल्कि उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाने तक की बात हवा में उछाली जा रही है। अंगद के साथ तो उसकी माँ तारा जो तत्कालीन पंचकन्याओं में से एक थी, भी राम-रावण प्रसंग में साथ थी। इधर आज देश की प्रभावशाली पंचकन्याओं में से एक सुषमाजी इस अंगद से कई योजन की दूरी बना चुकी हैं।
  
   बहरहाल, जाने अनजाने वैदिकजी जनता व अच्छे दिनों के बीच दीवार बन ही चुके हैं! 
                                                                
                                                         ***  
-----------------------------------------------------------------------


100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001(म.प्र.)     

Wednesday, 16 July 2014



सामयिक व्यंग्य
               सोया है उसे मत छेड़ो
                                      ओम वर्मा

                                   om.varma17@gmail.com

न्म लेते ही बच्चा दो काम करता है –रोना और सोना। नवजात का रोना यानी जीवन का प्रतीक! यह और बात है कि बड़े होकर भी कुछ लोग जिंदगी भर रोते रहते हैं और कुछ दूसरों को रुलाते रहते है। एक लुप्त होती नस्ल उन लोगों की भी है जो यदा कदा रोतों को हँसाने जैसा काम भी कर लिया करते हैं।
   लेकिन शयन तो मानव मात्र की मूल प्रवृत्ति व जन्मसिद्ध अधिकार है। मनुष्य  नवजात अवस्था में चौबीस में से बीस-बाईस घण्टे और बाल्यावस्था से किशोरावस्था तक बारह से चौदह घण्टे सोता है। बाद में नींद तो सिर्फ किस्मत वालों को ही नसीब होती है। वर्ना कई लोगों को कभी स्लीपिंग पिल्स तो कभी भाँति भाँति के योगासन लगाकर “नींद न मुझको आए...” या “आजा री निंदिया...” गाते हुए तो कभी “करवटें बदलते रहे सारी रात हम...” कहते हुए दिल को समझाना पड़ता है। लेकिन नींद जिन्हें आना है उन्हें कहीं भी आ सकती है। इसराइली सैनिक गोला बारूद के बक्सों पर तो भीष्म पितामह शर शैया पर सो सकते हैं और तीर के ही सिरहाने की माँग भी कर बैठते हैं। हठयोगी अग्नि के आगे तो कभी काँटों की सेज़ पर शयन कर लेते हैं तो कोई खड़ेश्वरी बाबा खड़े खड़े और कोई समाधिस्थ होकर सो सकते हैं। राकेश शर्मा और सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष में सो सकते हैं और तंग बस्तियों में बच्चे बड़े बड़े पाइपों में या असहनीय दुर्गंध के बीच भी घोड़े बेचकर सो सकते हैं। ऐसे में सदन में अगर कोई सांसद या राष्ट्रीय पार्टी का उपाध्यक्ष अगर बीच सत्र में शयनासन लगा बैठे तो हंगामा क्यों बरपा है? वे कोई लक्ष्मण थोड़े ही हैं जो उनके चौदह वर्षीय जागरण की तर्ज़ पर सदन में पूरे पाँच साल तक निर्निमेष रहें। हो सकता है कि वे समाधिस्थ हो पाँच साल बाद के मुद्दों की तलाश पर चिंतन कर रहे होंगे। या उन बाईस हज़ार लोगों के भविष्य को लेकर चिंतन कर रहे हों जिनकी हाल के चुनाव में अपने प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार के पीएम बन जाने पर कत्ल कर दिए जाने की वे भविष्यवाणी कर चुके थे। या उनका चिंतन अपने राजनीतिक गुरु की उस चिंता को लेकर हो जिसमें उन्होंने उनकी नेतृत्व क्षमता पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया है।
   चिंतन हमेशा सकारात्मक रखें। यह सच है कि उनके पिताश्री के नानाश्री ने कभी आराम को हराम बताया था मगर तब से अब तक दरियाओं में अनंत लीटर पानी बह चुका है और कई पुण्यसलिलाएँ नालों में तब्दील हो चुकी हैं। यह क्या कम है कि कुछ अन्य मान्यवरों की तरह सिर्फ हंगामा खड़ा कर देना भर उनका मकसद नहीं था। उन्हें सोना ही होता तो वे तबीयत खराब होने का बहाना कर घर जाकर भी सो सकते थे। मगर उन्होंने सदन में अपने मुट्ठी भर अनुयाइयों के बीच  अपनी गरिमामयी उपस्थिति देना ज्यादा जरूरी समझा।            
   सो जाना हमेशा बुरा नहीं होता। अगर झपकी नहीं लगती तो रसायन विज्ञानी केकुले को ख्वाब में मुँह में अपनी पूँछ दाबे साँप कहाँ से दिखता और एरोमेटिक ऑरगनिक केमेस्ट्री के आधारभूत रसायन बेन्जीन का क्लोज्ड रिंग संरचना सूत्र कैसे सामने आता? हमारे ग्रंथ पुराण ऐसे अनेक प्रसंगों से भरे पड़े हैं जिनमें अलौकिक शक्तियाँ कथानायक का जो कि अक्सर गरीब ब्राह्मण हुआ करता था, स्वप्न में आकर मार्ग प्रशस्त कर दिया करती थीं। और सर्वविदित है कि स्वप्न की पहली जरूरत नींद होती है। मत भूलिए कि लंका के पतन का कारण सीताहरण था न कि कुंभकरण का छह माही शयन। वैसे भी खाते हुए और सोते हुए व्यक्ति को डिस्टर्ब न करना हमारी प्राचीन और अब राष्ट्रीय परंपरा है।     ***
100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001 (म.प्र.)

Monday, 23 June 2014

Saturday, 7 June 2014




-  व्यंग्य        
    बाईस हजार हत्याओं की भविष्यवाणी  
                                       
                       ओम वर्मा              
                                 
om.varma17@gmail.com
या तो वे कोई त्रिकालदर्शी हैं या अतींद्रिय शक्तियों के स्वामी! सच देखा जाए तो आज देश व समाज को उनके जैसे विचारक व स्वपनदृष्टा की जरूरत है। आज भले ही सामान हमारे पास सौ बरस का हो पर खबर पल भर की भी नहीं होती। ऐसे में सभी सर्वे व ओपिनियन पोल्स में आगे चल रहे या संवैधानिक प्रक्रिया से अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के निर्वाचित हो सकने की आशंका पर उन्होंने जो पूर्वानुमान, भविष्य कथन, चेतावनी याधमकी दी थी  उसे मैं अगर सदी की सबसे बड़ी भविष्यवाणी कहूँ तो शायद स्वर्ग पहुँच चुकी मानव कंप्युटर शकुंतलादेवी या जानदार मेरा मतलब बेजान दारूवाला को भी कोई आपत्ति नहीं होगी। उनकी भविष्यवाणी है कि अगर मतदाताओं ने उनके प्रतिद्वंद्वी को पीएम बनाया तो बाईस हजार लोगों की हत्या हो जाएगी। यानी गुप्त संदेश यह है कि अगर देश की जनता ने अपने इस पवित्र व सबसे बड़े लोकतांत्रिक अधिकार का उपयोग उनके अनुसार नहीं करके निर्भीकता से किया तो बाईस हजार लोगों को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।
     एक राष्ट्रीय दल की अध्यक्ष का बेटा और उपाध्यक्ष जब इतनी बड़ी भविष्यवाणी करता है तो उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। मैं अपना ज्ञान बघारूँ या कथित विशेषज्ञों से बात करूँ इससे बेहतर मैंने यह समझा कि क्यों न उक्त त्रिकालदर्शी नेताजी से ही बात की जाए।
     “सर उनके पीएम बनने पर बाईस हजार लोगों की हत्या की बात आपने किस आधार पर कही?”
     “हम कोई भी बात हवा में नहीं करते। राजनीति के हमारे अनुभव हमारे कार्यकर्ताओं की रिपोर्ट, हमारे बहुत सारे सीनियर लीडर्स के निष्कर्ष और अपने लेपटॉप में दर्ज़ आँकड़ों के आधार पर मैंने यह बात कही थी।”
     “मैं नहीं समझ पा रहा हूँ, थोड़ा स्पष्ट करें।”
     “हमारे एक वरिष्ठ साथी ने हमें बताया था कि बारह वर्ष पहले उनके राज्य में दंगों में 1300 लोग मारे गए थे। अब आप खुद जोड़ के देख लो कि पूरे देश का क्षेत्रफल गुजरात के क्षेत्रफल का सत्रह गुना है। तेरह सौ इन टु(गुणित) सत्रह = बाईस हजार एक सौ। मैंने सौ कम करके बाईस हजार बताया तो क्या बुरा किया? रेशो प्रपोर्शन का बड़ा ही सिंपल सा गणित! एक और गणित देखें। किसी ने दंगों में मरने वालों की संख्या ग्यारह सौ बताई। आप उसको पॉपुलेशन से रिलेट करके देख लो। देश की पॉपुलेशन, गुजरात की पॉपुलेशन से बीस गुना ज्यादा है। अब ग्यारह सौ में बीस का गुणा करके देख लो। वही बाईस हजार फिर आ जाएगा।” आँकड़ेबाजी में वे मुझे योगेन्द्र यादव व योजना आयोग वालों से भी भारी नज़र आ रहे थे।
     “अगर लोग आपकी बात न मानें तो आप क्या करेंगे?”
     “देखिए जैसे हम गुजरात में पिछले बारह वर्षों से उनका विरोध करते आए हैं
, अगले पाँच वर्ष तक इन बाईस हजार हत्याओं के लिए भी करेंगे और इस भारी मुद्दे के आधार पर अगले चुनाव में हम उनका नमो नमो का नारा रागा रागा में बदल देंगे।” 
   जनादेश, विकास के मुद्दे और अदालतों की क्लीन चिटें, मुझे कोने में सिसकते नज़र आने  लगे। आइए, अपने अपने ढंग से हम प्रार्थना करें कि राहुलजी की 12 व्यक्ति प्रतिदिन के इस संभावित नरसँहार की यह आशंका निर्मूल साबित हो...आमीन!  ***
-----------------------------------------------------------------------------------------
100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001(म.प्र.)

Friday, 6 June 2014



   
 विचार
       चायवाले का उभरना या वंशवाद का गिरना! 
            ओम वर्मा                                om.varma17@gmail.com 
सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस की जो गत हुई है उसकी कल्पना किसी कांग्रेसी या जी हुज़ूरी के शोर में डूबे गांधी परिवार ने शायद ही कभी की होगी। गांधी परिवार को लेकर कांग्रेसियों की सोच कुछ ऐसी है कि तेरे नाम से शुरू, तेरे नाम पे खतम’! पार्टी अध्यक्ष से लेकर उपाध्यक्ष और संसदीय दल की अध्यक्ष तक गांधी ही गांधी...! 1999 में  शरद पवार संगमा व तारीक अनवर के साथ मिलकर सोनिया गांधी के विदेशी मूल के आधार पर अलग होकर भी साथ ही चलते रहे हैं। एनडीए ने नरेंद्र मोदी को पीएम उम्मीदवार के रूप में सामने रखा तो यूपीए सिर्फ संवैधानिक प्रावधान की दुहाई देता रह गया कि पीएम सांसदों के द्वारा चुना जाता है। मगर वे यह भूल गए कि किसी को पीएम उम्मीदवार घोषित करके चुनाव लड़ने पर कोई कानूनी रोक भी तो नहीं है। यह भी सभी जानते थे कि जयपुर सम्मेलन में राहुल गांधी की पार्टी उपाध्यक्ष के रूप में नियुक्ति ही इसलिए की गई थी कि भविष्य में उनका राजतिलक किया जा सके। जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी को पीएम पद का दावेदार घोषित कर दिया तब यह कहने की हिम्मत किसी कांग्रेसी में नहीं थी कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ राहुल गांधी को लाना ‘निर्बल से लड़ाई बलवान की ’ वाली बात साबित हो जाएगी। और तो और राहुल की तुलना में प्रियंका को लाना शायद ज्यादा फलदायी हो सकता थायह भी कोई कांग्रेसी न समझ सका न समझा सका। समझाता भी कैसेमनु सिंघवी सरीखे बड़े वफादार जब यह स्थापित करने पर तुले थे कि राहुल तो जन्मजात नेता हैं वहीं कुछ लोग सोनियाजी के एक इशारे पर झाड़ू तक लगाने के लिए तैयार बैठे थे।
     नरेंद्रभाई एण्ड कं. अपनी सभाओं मेंमीडिया में और सभी सोशल साइट्स पर घोटालों व भ्रष्टाचार के मुद्दों को उठाने व भुनाने में सफल रहेवहीं यूपीए वाले गुजरात के 2002 एपिसोड से कभी आगे ही नहीं बढ़े। रुझान बदलने वाली सबसे महत्वपूर्ण घटनाएँ थीं दो महत्वपूर्ण टीवी इंटरव्यू – टाइम्स पर राहुल गांधी और इंडिया टीवी पर नरेंद्र मोदी। जहाँ राहुल गांधी की बार बार सूई अटक जाती थी वहीं नरेंद्र मोदी चुनाव खर्च के सवाल पर जब यह बोले कि सरकार उनकीचुनाव आयोग उनकासीबीआई उनकी... फिर आनंद शर्मा शिकायत क्यों नहीं करते या  जाँच क्यों नहीं करवाते?”  दंगों के आरोप व क्षमा याचना की माँग पर सुप्रीम कोर्ट की क्लीन चिट का उल्लेख करते हुए उनका कहना था कि किसी भी अदालत या किसी भी आयोग से इसकी जाँच करवा ली जाएअगर मैं हत्याओं का दोषी पाया जाता हूँ मुझे चौराहे पर सरेआम फाँसी दे दी जाए। और टोपी विवाद पर जब मौलाना मदनी ने यह कहा कि जिस तरह मुझे कोई तिलक लगाने को बाध्य नहीं कर सकता उसी तरह किसी को टोपी पहनने को बाध्य नहीं किया जा सकता। ये सब वे बातें हैं जो किसी तटस्थ मतदाता की दृष्टि में मोदी को आरोपमुक्त करती है। अधिकांश जनता की नज़र में मोदी चुनावी रणभूमि में घिरे उस अभिमन्यु की तरह थे जिसे कई परस्पर विपरीत विचारधारा वाले शत्रुओं ने घेर लिया था फिर भी वे चक्रव्यूह भेदने में सफल रहे। कभी उन्हें राक्षस,कभी गुण्डा, कभी नपुंसक  तो कभी दंगा बाबू जैसे अलंकरणों से नवाज़ा गया। मगर ये सभी वार बूमरेंग की तरह आक्रमणकर्ताओं का ही नुकसान करते रहे। जसोदाबेन के प्रकरण में यह तीर कि जो अपनी पत्नी को नहीं सम्हाल सका वह देश क्या सम्हालेगाहवा का बुलबुला साबित हुआ। अगर मोदी ने दूसरा विवाह किया होता या उनका कोई बाहरी प्रेम प्रसंग सामने आता या जसोदाबेन के परिजनों ने कभी कोई शिकायत की होती तो जरूर शर्मिंदगी या परेशानी का सबब बन सकता था। पत्नी परित्याग किसी फिल्म या ‘साकेत’ जैसे महाकाव्य का विषय तो बन सकता है पर उसमें राजनीतिक माइलेज़ लेने जैसा कुछ नहीं था। इसी तरहकुत्ते के पिल्ले वाले कथन में विदेशी साक्षातकारकर्ता ने स्वयं ट्वीट कर खण्डन किया व संदर्भ से काटकर देखे जाने की बात कही। वहीं अटलजी की राजधर्म निभाने की बात भी पूरा भाषण देखने पर संदर्भ से काटी गई प्रतीत होती है क्योंकि अटलजी आगे यह भी कहते हैं कि मोदीजी ने राजधर्म निभाया है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि दिग्विजय - अमृता राय प्रकरण में मोदी ने कोई बदजुबानी नहीं की।
     मोदी पर पुस्तकें आनाविदेशी अखबारों में उनके राज्य के विकास की प्रशंसा होना और तभी मनमोहनसिंह को कमजोर पीएम बताने वाली दो किताबें आना व अमेरिका केवाल स्ट्रीट जर्नल’ में रॉबर्ट वाड्रा के मायाजाल का खुलासा होना आदि कई ठोस मुद्दों की मानों बरसात हो गई। भाजपा की हालत स्टेशन पर खड़ी उस ट्रेन की तरह हो गई थी जो उत्तर दिशा की ओर जाने वाली है मगर उसमें वो यात्री भी खड़े खड़े यात्रा करने के लिए तैयार हैं जिनके पास किसी अन्य स्टेशन के टिकट हैं। वैसे ‘नीच राजनीति ’ वाले एक साधारण से जुमले को वे नहीं छेड़ते तो ज्यादा अच्छा रहता।
     भाजपा को दिग्विजयसिंहबेनीप्रसाद वर्मासलमान खुर्शीदइमरान मसूदममतादी और नीतीशकुमार व उन सभी का भी आभार व्यक्त करना चाहिए जिनकी हैरतअंगेज़ बयानबाजी से मोदी को बैठे बिठाए एडवांटेज मिलता गया। मोदी को उन लोगों का भी अभारी होना चाहिए जिन्होंने प्रवीण तोगड़िया के मुसलमानों को मकान न देनेगिरिराजसिंह का मोदी विरोधियों को पाकिस्तान भेजने व बाबा रामदेव के राहुल गांधी के दलितों के घर हनीमून मनाने जैसे अद्भुत बयानों से नाराज होने के बजाय उनके सुशासन व सबको साथ लेकर चलने के दावे को तवज्जो दी। इस विश्वास पर वे तभी खरे उतर सकते हैं जब उनके कार्यकाल में जसवंतसिंह की ससम्मान वापसी हो और 75+ वालों को दूर रखने का फॉर्मूला लागू करने के नाम पर आडवाणीजी व सुमित्रा महाजन जैसे पुराने चावलों को शोभा की वस्तु बनाकर न रख लिया जाए। मुस्लिम समाज ने जो जबर्दस्त विश्वास भाजपा में दिखाया है उसे सिर्फ संपूर्ण समुदाय में सुरक्षा का भाव जागृत करके ही रिसिप्रोकेट किया जा सकेगा।                              ***
                       
 
100रामनगर एक्सटेंशनदेवास 455001