Sunday, 19 October 2014

          
              कच्ची व पक्की दीवार
                                 ओम वर्मा
                                  om.varma17@gmail.com
दीवारें दो तरह की होती हैं कच्ची दीवार और पक्की दीवार। साहित्यिक भाषा में एक मूर्त और एक अमूर्त! कच्ची दीवार यानी वह मूर्त दीवार जो ईंट गारे या अन्य बिल्डिंग मटेरियल की बनी होती है व सारी दुनिया को दिखाई देती है... जैसे कि ग्रेट वाल ऑफ चाइना’, या दोनों जर्मनियों के पुनर्मिलन से पूर्व पैंतालीस वर्षों तक तनी रही ऐतिहासिक बर्लिन वाल। चीन की 6000 किमी लंबी दीवार तो  चाँद से भी दिखाई देती है। बहरहाल दीवार चाँद से भले ही दिखे या न दिखे, दो देशों को बाँटे या न बाँटे, वह होती बड़ी ही कच्ची है। आखिर दीवार ही तो है कोई रेडक्लिफ लाइन नहीं कि हथौड़े, डायनामाइट या परमाणु बम से भी नहीं मिटाई जा सके। कई बार तो यूँ लगता है कि जैसे सारी दुनिया ही शीशे की है जहाँ कभी कोई सिरफिरा एक हवाई जहाज का अपहरण कर उसे टकरा दे तो ऊँची से ऊँची दीवार को ज़ीरो ग्राउंड में बदलने में पल भर न लगे। यानी मूर्त दीवारों को अच्छे या बुरे किसी भी प्रयोजन के लिए ध्वस्त किया जा सकता है। कहीं कोई दबंग  जमीन हथियाने के लिए  दीवारें जबरन भी खड़ी कर लेता है। घर पर पेटी बिस्तर तैयार रखकर नौकरी पर जाने वाला दबंग अफसर ऐसी दीवारों को एक झटके में जमींदोज़ भी कर सकता है।
   मगर जो अदृश्य व अमूर्त दीवारें होती हैं उनका लेखा जोखा या जवाब है किसी के पास? वो दीवार जिसे गुजरात और शेष भारत के बीच खड़ी करने की कोशिशें जारी हैं, वो दीवार जो कश्मीरियत और हिंदुस्तानियत के बीच या पूर्वोत्तर राज्यों के देशवासियों व शेष देशवासियों के बीच व हर अलगू चौधरी और जुम्मन शेख के बीच तामीर की जा रही है और रोज उस पर नई नई परतें चढ़ाई जा रही हैंवह दीवार जो एक नेता और वीज़ा के बीच में आड़े आ जाती है मगर उसके पीएम बनते ही एक झटके में ढह जाती है, या वह जो किसी लंगड़ को आज तक अदालत के फैसले की नकल लेने से रोक रही है...वह दीवार जो आज भी होरी को भूखा सोने या आत्महत्या करने पर विवश करती है... वह दीवार जो राँझे को हीर और मजनूँ को लैला से मिलने से आज भी रोके हुए है... वह कभी टूटेगी भी? और वह दीवार जिसके कि इस पार वाला उस पार वाले को सिर्फ पाँच साल में एक ही बार देख पाता है या वह जिसकी वजह से वंशवाद में सेंध लगाने के बारे में सोचना ही 1857 के विद्रोह के समान गदर मान लिया जाए, उस दीवार के लिए कोई बारूद या बुलडोजर अभी तक ईज़ाद क्यों नहीं हुआ? क्या मातृभूमि की रक्षा हेतु प्राण न्योछावर कर देने वाले शहीदों की शहादत की स्वर्णिम दीवार से उनकी मज़हबी पहचान की दीवार बड़ी हो सकती है? क्या टोपी और तिलक के बीच में दीवारें खड़ी की जाती रहेंगी? क्या हिंदी को संपूर्ण देश की राष्ट्रभाषा और संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनने में जो दीवार अवरोध बनकर खड़ी है उसे कोई ध्वस्त कर सकेगा? और लास्ट बट नॉट द लीस्ट कि अर्जुन को इक़बाल के साथ क्रिकेट खेलने से रोकने वाली या उनके बालमन में विषबेल सी खड़ी की जा रही दीवार को गिराने के लिए भी कोई महापुरुष कभी रथ यात्रा निकालेगा?  
   जाहिर है कि देश में दीवारें बहुत हैं। अगर इनमें से गलत दीवारों को गिराकर सही सही चुन ली जाएँ और उन पर सद्भाव की छतें ढाल दी जाएँ तो इतने मकान,  बल्कि घर बन जाएँ कि इंसानियत की छत्रछाया के बगैर कोई सिर न बचेगा!
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व्यंग्य       
       बाईस हजार हत्याओं के
        भविष्यवक्ता कहाँ हैं
? 
                                                ओम वर्मा
              
                                   
om.varma17@gmail.com
या तो वे कोई त्रिकालदर्शी हैं या अतींद्रिय शक्तियों के स्वामी! सच देखा जाए तो आज देश व समाज को उनके जैसे विचारक व स्वपनदृष्टा की जरूरत है। आज भले ही सामान हमारे पास सौ बरस का हो पर खबर पल भर की भी नहीं होती। ऐसे में सभी सर्वे व ओपिनियन पोल्स में आगे चल रहे या संवैधानिक प्रक्रिया से अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के निर्वाचित हो सकने की आशंका पर उन्होंने जो पूर्वानुमान, भविष्य कथन, चेतावनी या धमकी दी थी  उसे मैं अगर सदी की सबसे बड़ी भविष्यवाणी कहूँ तो शायद स्वर्ग पहुँच चुकी मानव कंप्युटर शकुंतलादेवी या बिना जान वाले, मेरा मतलब बेजान दारूवाला को भी कोई आपत्ति नहीं होगी। उन्होंने  भविष्यवाणी की थी कि अगर मतदाताओं ने उनके प्रतिद्वंद्वी को पीएम बनाया तो बाईस हजार लोगों की हत्या हो जाएगी। यानी  देश की जनता ने अपने इस पवित्र व सबसे बड़े लोकतांत्रिक अधिकार का उपयोग उनके अनुसार न करके बाईस हजार लोगों की जान को दाँव पर लगा दिया।
     एक राष्ट्रीय दल की अध्यक्ष का बेटा और उपाध्यक्ष जब इतनी बड़ी भविष्यवाणी करता है तो उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। मैं अपना ज्ञान बघारूँ या कथित विशेषज्ञों से बात करूँ इससे बेहतर मैंने यह समझा कि क्यों न हरयाणा व महाराष्ट्र के चुनाव परिणामों के बाब अज्ञातवास पर जा चुके उक्त त्रिकालदर्शी नेताजी को खोजकर उनसे ही बात की जाए।
     “सर उनके पीएम बनने पर बाईस हजार लोगों की हत्या की बात आपने किस आधार पर कही थी?”
     “हम कोई भी बात हवा में नहीं करते। राजनीति के हमारे अनुभव हमारे कार्यकर्ताओं की रिपोर्ट, हमारे बहुत सारे सीनियर लीडर्स के निष्कर्ष और अपने लेपटॉप में दर्ज़ आँकड़ों के आधार पर मैंने यह बात कही थी।”
     “मैं नहीं समझ पा रहा हूँ, थोड़ा स्पष्ट करें।”
     “हमारे एक वरिष्ठ साथी ने हमें बताया था कि बारह वर्ष पहले उनके राज्य में दंगों में 1300 लोग मारे गए थे। अब आप खुद जोड़ के देख लो कि पूरे देश का क्षेत्रफल गुजरात के क्षेत्रफल का सत्रह गुना है। तेरह सौ इन टु(गुणित) सत्रह = बाईस हजार एक सौ। मैंने सौ कम करके बाईस हजार बताया तो क्या बुरा किया? रेशो प्रपोर्शन का बड़ा ही सिंपल सा गणित! एक और गणित देखें। किसी ने दंगों में मरने वालों की संख्या ग्यारह सौ बताई। आप उसको पॉपुलेशन से को-रिलेट  करके देख लें। देश की पॉपुलेशन, गुजरात की पॉपुलेशन से बीस गुना ज्यादा है। अब ग्यारह सौ में बीस का गुणा करके देख लो। वही बाईस हजार फिर आ जाएगा।” आँकड़ेबाजी में वे मुझे योगेन्द्र यादव व योजना आयोग वालों से भी भारी नज़र आ रहे थे।
     “अगर लोग आपकी बात न मानें तो आप क्या करेंगे?”
     “देखिए जैसे हम गुजरात में पिछले बारह वर्षों से उनका विरोध करते आए हैं, अगले पाँच वर्ष तक इन बाईस हजार हत्याओं के लिए भी करेंगे और इस भारी मुद्दे के आधार पर अगले चुनाव में हम उनका नमो नमो का नारा रागा रागा में बदल देंगे।” 
   लोकसभा, फिर हरयाणा व महाराष्ट्र के विधानसभा परिणाम, विकास के मुद्दे और अदालतों की क्लीन चिटें, मुझे कोने में सिसकते नज़र आने  लगे। तभी बाहर जनसमूह का शोर सुनाई दिया –
      “प्रियंका लाओ-देश बचाओ!”

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Friday, 3 October 2014


व्यंग्य (नईदुनिया, 03.10.2014)
          अधिकारी और साहित्य
              (समस्त हिंदी अधिकारियों से क्षमा याचना सहित)
                  ओम वर्मा         
                                  
om.varma17@gmail.com
जिस तरह खादी भण्डार में नौकरी कर लेने भर से कोई गांधी नहीं हो जातागर्मियों में गन्ने के रस का ठेला लगा कर उस पर ‘फलां मधुशाला’ लिखा बोर्ड व अमिताभ बच्चन का फोटू लगा लेने भर से कोई ‘हालावादी’ नहीं हो जाताअचकन में सुर्ख गुलाब  लगा लेने भर से कोई नेहरू नहीं हो जातामरियल घोड़े जुते ताँगे में बैठकर ‘टेसन’ तक जाने से कोई पार्टी का पितृपुरुष या ‘रथयात्री’ नहीं हो जातालिंग परीक्षण करवाकर कन्या भ्रूण के खात्मे के बाद नवरात्र में आठ दस कन्याओं को भोज करा देने से कोई नारी उद्धारक नहीं हो जातारुई धुनने वाला हर जुलाहा कबीरदास नहीं हो जाताजीवनसंगिनी से उसके आत्मिक सौंदर्य से कहीं ज्यादा दैहिक सौंदर्य को महत्व देने के कारण प्रताड़ना पाने वाला हर शख्स तुलसीदास नहीं हो जाताजूते गाँठने वाला हर चर्म शिल्पी प्रभु को चंदन मान स्वयं को पानी के रूप में प्रस्तुत कर चुका रैदास नहीं हो जाता और आगे की लटें सफ़ेद कर लेने भर से कोई लालबहादुर शास्त्री नहीं हो जाताउसी तरह किसी सरकारी कार्यालय या उपक्रम में हिंदी अधिकारी हो जाने भर से कोई हिंदी का कवि या लेखक नहीं हो जाता ...!," कहते कहते वे हाँफने लग गए थे। 

   वे शहर के नामी गिरामी साहित्यकार व समीक्षक हैं। उनके सामने एक काव्य संकलन व दो व्यंग्य संकलन समीक्षार्थ रखे हैं। तीनों के रचनाकार वे हिंदी अधिकारी हैं जो अपने कार्यालयों के हिंदी पखवाड़ों में उन्हें वर्षों से पत्रं-पुष्पं देकर बुलवाते रहे हैं। 'काव्य संकलनबेहतरीन आवरण-चित्रचिकने पन्नों और सर्जक के फोटो के कारण 'दर्शनीयअवश्य है पर पठनीय कतई नहीं। कविता का शरीर तो हर कहीं थाआत्मा कहीं नहीं थी। कविताएँ पढ़कर उन्हें आंग्ल महाकवि वर्ड्सवर्थ का कविता के जन्म को लेकर व्यक्त विचार कि "कविता शक्तिशाली भावनाओं का सहज अतिप्रवाह है: इसकी उत्पत्ति ट्रेंक्व्लिटी (tranquility) में रिकलेक्ट (recollected) हुए इमोशन से होती है", दम तोड़ता नज़र आ रहा था। यही हाल 'व्यंग्यकार हिंदी अधिकारीके सपाटबयानी वाले व्यंग्यों के संकलन के भी थे।
   दरअसल सरकारी कागजों के हिंदी अनुवाद व स्टॉफ को हिंदी का कार्यसाधक ज्ञान देने लिए कार्यशालाओं का आयोजन करते करते और हिंदी स्लोगन के पोस्टर लगवाते लगवाते या कहें कि हिंदी की रोटी खाते खाते कुछ (सब नहीं) हिंदी सेवियों को अकस्मात यह इल्हाम हो जाता है कि वे साहित्यकार हैं या उन्हें यह अपराध बोध कचोटने लगता है कि हिंदी की सेवा तो बहुत कर ली, अब तक साहित्य सेवा क्यों नहीं कीकार्यालयीन लायब्रेरी की धूल झाड़ते झाड़ते उन्हें अकस्मात यह अपराध बोध भी सताने लगता है कि साहित्य सेवा न करने से उनका जन्म कहीं अकारथ न चला जाए! लिहाजा अच्छा खासा इंसान फाइलों में हिंदी और अँगरेजी में लिखे पत्र और टिप्पणियों के आँकड़े भरते भरते कुछ ऐसा भाव विह्वल हो जाता है कि ‘कविता’ करने या वह जो लिखता है उसे कविता की संज्ञा देने लग जाता है। कुछ तीन चार सौ शब्दों वाले त्वरित टिप्पणीनुमा आलेख जो कुछ टुटपुंजिया अखबारों के व्यंग्य(?) कॉलम में छप भी जाते हैं उन्हें पुस्तकाकार देकरतड़क भड़क वाला विमोचन समारोह करवा कर खुद के लिए 'प्रतिष्ठितया 'वरिष्ठव्यंग्यकार लिखवाना प्रारंभ कर देता है। प्रकारांतर में वह हिंदी पखवाड़े के अवसर पर अपने संग्रह को खपाने की कला भी सीख  जाता है! कवि अधिकारी का बस चले तो वह सुमित्रानंदन पंत को स्वर्ग में जाकर ज्ञापन दे आए और उनकी कविता “वियोगी होगा पहला कविआह से उपजा होगा गान... निकलकर आँखों से चुपचापबही होगी कविता अनजान..“ को बदलकर यह कहने पर विवश कर दे कि “हिन्दी अधिकारी होगा पहला कविवाह से उपजा होगा ज्ञान।पंत जो मानते थे कि "कविता विचारों या तथ्यों से नहीं बल्कि अनुभूति से होती है"उन्हें इस संकलन को पढ़कर मानना पढ़ जाए कि अब कविता की दशा और दिशा हिंदी साहित्यकार नहीं, हिंदी अधिकारी तय करेगा। उधर स्वर्ग में शरदपरसाई व रवींद्रनाथ त्यागी की आत्मा को यही सोचकर शांति मिल रही होगी कि हमारे बाद व्यंग्य की फसल सूखी नहीं हैआज का संख्यात्मक रुझान कल के गुणात्मक अभियान में अवश्य परिणत होगा। 
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100,रामनगर एक्स्टेंशनदेवास 455001(म.प्र.) 

Tuesday, 16 September 2014


     
      उच्चारण  व अनुवाद में हिंदी

                           ओम वर्मा
                                     om.varma17@gmail.com   

स दिन खुश तो बहुत थे वे।  पर शाम को उनकी खुशियाँ कार्यालयों के एक दिनी हिंदी दिवसीय उत्साह या  जीतेजी उपेक्षित मगर  श्राद्ध पक्ष में एक दिन तस्वीरों पर हार बदले जाने का सम्मान  पाने वाले मरहूमों की तरह काफूर हो गईं नए-नए मित्र बने  बेनर्जी बाबू  ने उन्हें शाम को अपने यहाँ 'भोजन' के लिए आमंत्रित किया था वे शाम को उनके घर सपरिवार 'मत्स्य-भक्षण' का मन बनाकर पहुँचे तो देखते हैं कि हॉल का  फर्नीचर हटाकर जमीन पर बैठक व्यवस्था  की गई है और वहाँ तबला हारमोनियम आदि रखे हुए हैं। यानी बांग्लाभाषी बेनर्जी बाबू ने उन्हें 'भजनके लिए आमंत्रित  किया था कि 'भोजन' के लिए यह और बात है कि बाबू मोशाय ने उन्हें 'रोबिन्द्रो शोंगीतकी मधुरता में डुबाकर  न सिर्फ भूख के अहसास से बचाया, बल्कि उन्हें  'जोल' और चाय भी 'खिलाई' मेरे एक तेलुगूभाषी मित्र हर वर्ष फरवरी-मार्च   में मुझसे 'बडजट' पर 'हॉनेस्टली' पूरे एक 'हवर' तक चर्चा करते हैं।  तीस वर्ष  से साथ काम कर रहे इस मित्र के मुख से आज तक मैंने कभी बजट, ऑनेस्टली या अवर नहीं सुना इसी तरह  कभी-कभी अनुवाद की साधारण सी त्रुटि भी परिहास निर्मित कर देती है।  टेलीप्रिंटर के युग में एक अखबार में खबर छपी थी, ''डाकुओं और पुलिस में गोलियों  का आदान-प्रदान"  जाहिर है कि खबर थी कि, ''डेकोइट्स एंड पुलिस एक्सचेंज्ड फायर्स''  अब 'एक्सचेंज् का शाब्दिक अनुवाद 'आदान-प्रदान' ही होना था। न्यूज़ पढ़कर ऐसा लगा मानो पुलिस का शिष्टाचार सप्ताह चल रहा होगा जिस कारण पुलिस और डाकुओं में एक दूसरे को  मिठाइयों के साथ तश्तरी  में रखकर लखनवी अंदाज में पहले आप -पहले आप कहते हुए गोलियों का आदान-प्रदान संपन्न हुआ होगा।  एक बड़े संस्थान के फायर -ब्रिगेड के दफ्तर में स्थित स्टोर्स पर वर्षों तक 'अग्नि भण्डार' लिखा रहा। समझना मुश्किल था कि ये आग बुझाते हैं या  आग जारी करते हैं।  बाद में उसे 'अग्नि शमन सामग्री भण्डार'  लिखा गया उसी संस्थान में जनरल केशियर  को वहाँ के कर्मचारी वर्षों तक 'सामान्य रोकड़िया'  लिखते व समझाते रहे।  बाद में उन्हें  'महारोकड़िया' घोषित किया गया संजय दत्त जब जेल से रिहा हुए तो पत्रकारों के यह पूछने पर कि  ''अब वे कैसा महसूस कर रहे हैं?''  उनका जवाब था, '' म फीलिंग ग्रेट !" अनुवादक की त्रुटि के कारण इसी समाचार का शीर्षक ''संजय खुद को महान समझने  लगे!" प्रकाशित हुआ। आस्तिक व्यक्ति सिर्फ ईश्वर को महान मानेगा और नास्तिक भी कम से कम खुद को महान तो नहीं कहेगा।  हमारे गुणों के कारण दूसरा व्यक्ति भले ही हमें महान कहे, पर खुद को महान समझना रामायण  रचे जाने का कारण बन सकता है |
     क्रिकेट में जो बल्लेबाज पिच के स्वभाव तथा गेंदबाज व क्षेत्ररक्षण की खामियों उठाकर रन बना ले उसे  'अपार्चुनिस्ट बेट्समेन'  कहा जाता है।  एक बार रेडियो पर टेस्ट मैच की कामेंट्री में मैंने   एक्सपर्ट कमेंटेटर से सुना, ''उन्होंने उस स्थान पर फील्डर नहीं होने का फायदा उठाकर वहाँ शॉट लगाकर रन ले लिया है।  वे एक अच्छे अवसरवादी बल्लेबाज हैं। अँगरेजी में 'अपार्चुनिस्ट बेट्समैन' होना अच्छा गुण हो सकता है, पर हिन्दी में किसी को अवसरवादी कहना  निश्चित ही उसका घोर अपमान  करना है।

         
और फिर भाषा तो अपने आप में ही महान होती है। ऐसी छोटी-मोटी त्रुटियाँ या विसगतियाँ उसके प्रगति रथ को कभी नहीं रोक सकतीं।
        व्हाट इज़ योर ओपिनियन सर?                                                      ***
100,रामनगर एक्स्टेंशन, देवास 455001
          

Friday, 29 August 2014




05 सितंबर, शिक्षक दिवस पर विशेष 
           कुछ गुरु जी ऐसे भी होते हैं ! 
                                                                           
ओम वर्मा 
                    
 om.varma17@gmail.com  
पाँच सितंबर यानी शिक्षक दिवस! गुरुओं के सम्मान और महिमागान का दिन! इलेक्ट्रानिक से लेकर प्रिंट मीडिया तक सभी दूर गुरुजी ही गुरुजी! शिक्षाकर्मी से लेकर पुराने शिक्षाधर्मी तक... सभी का सम्मान ही सम्मान! ‘मध्यान्ह भोजन’ खिलाने वाले सरकारी स्कूलों से लेकर बच्चों से घर से तैयार किया हुआ ‘लंच बॉक्स’ व वॉटर बॉटल मँगवाने वाले असरकारी’, मेरा मतलब गैर-सरकारी... सभी स्कूलों में “गुरुः ब्रह्मा, गुरुः विष्णु...” की ही गूँज...! गुरुजी की हालत उस साँप की तरह होने लगती है जिसे नागपंचमी के दिन दूध पिला-पिलाकर पूजित किया जा रहा है। यानी हर कहीं कुछ ऐसा माहौल बनने लगता है मानों हर वह शख्स जो गुरु है, वही सर्वश्रेष्ठ है।
   लेकिन मैं इससे सहमत नहीं हूँ । गुरु का पद श्रेष्ठ हो सकता है। गुरु से की गई अपेक्षाओं के अनुरूप जो कार्य या आचरण करे या किसी कंकर को शंकर में बदलने के लिए प्रेरित कर सके उसे ही मैं सच्चा गुरु मानूँगा या गोविंद से भी ऊपर की हायरार्कि’ (hierarchy) में रखना पसंद करूँगा। पर मैं यहाँ कुछ ऐसे गुरुओं की चर्चा कर रहा हूँ जिन्होंने अपने एक कदम या वाक्य से मुझ जैसे कई शिष्यों की दिशा व दशा दोनों ही बिगाड़ कर रख दी।    
    सन्‌ 1967-68 में नौवीं क्लास का बायलॉजी समूह का विद्यार्थी था। बायलॉजी और केमिस्ट्री दोनों विषय हमें पढ़ाते थे पंड्या जी। एक अन्य सेक्शन में यही विषय एक दूसरे शिक्षक अवधेश जी पढ़ाते थे। अवधेश सर के पढ़ाने के तरीके और विषय में मास्टरी थी इस कारण उनके घर ट्यूशन पढ़ने वालों की भीड़ लगी रहती थी। क्लास और घर में ट्यूशन पर वे एक जैसा पढ़ाते थे और यही बात ट्यूशन पर आने वालों से भी पहले ही बता दिया करते थे। कभी-कभी दूसरे सेक्शन के कुछ विद्यार्थी भी उनकी क्लास में बैठने का लोभ संवरण नहीं कर पाते थे। उनकी इस लोकप्रियता से पंड्या जी जैसे शिक्षक ईर्ष्या रखते थे। इसे आत्मप्रवंचना न समझें तो कहना चाहूँगा कि मैं पढ़ने-लिखने में अपेक्षाकृत बहुत आगे था। न जाने क्यों पंड्या जी को लगा कि मैं अवधेश जी के यहाँ ट्यूशन  पढ़ने जाता हूँ। उन्होंने उनके यहाँ पढ़ने वाले एक छात्र के माध्यम से मुझ तक अवधेश सर को छोड़कर उनके यहाँ ट्यूशन पर आने का संदेश भिजवाया। सर नाराज़ होकर मुझे कहीं देख’ न लेंइस डर से मैं  दो माह उनके यहाँ ट्यूशन पर गया। इन दो महीनों के कुल चालीस रु. देने के लिए उन दिनों मेरे पिताश्री ने कैसे पेट काटा होगा यह वही जानते होंगे।
    अगले वर्ष दसवीं कक्षा में इन्हीं पंड्या जी ने केमिस्ट्री में कार्बन का चेप्टर पढ़ाते  समय पहले दिन ही डरा दिया। कार्बन हर ऑर्गेनिक कंपाउण्ड की संरचना का पहला आवश्यक तत्व है। इसे सीधे-सरल शब्दों में व्यक्त करने के बजाय इन्होंने यह कहकर कि ‘कार्बन’ एक बहुत ही कठिन और ‘दादा’ टॉपिक है...इसमें अच्छों-अच्छों की...हो जाती है। अब आप ही सोचिए कि 14-15 आयुवर्ग के विद्यार्थियों पर इन विचारों का क्या असर पड़ा होगा ! वह भी ऐसे स्कूल में जहाँ पर कि आधे विद्यार्थी आसपास के गाँवों से आए थे। और प्रायवेट स्कूलों का तो तब चलन ही नहीं था। यह खौ‌फ मुझ पर पूरे विद्यार्थी जीवन में हावी रहा।
    इन्हीं गुरुजी ने इसी साल एक और हैरतअंगेज़ करतब कर दिखाया। उन दिनों एक छह माही या अर्धवार्षिक परीक्षा हुआ करती थी। मैं अपना दसवीं कक्षा का केमिस्ट्री का अर्धवार्षिक परीक्षा का पर्चा दे रहा था। ढाई घण्टे का समय। प्रश्नपत्र हाथ में आते ही पाँच-दस मिनट में आधा हॉल खाली हो गया। आधा घण्टा भी नहीं बीता होगा कि मुझे छोड़कर बाकी भी चले गए। यानी आधे घण्टे के बाद परीक्षा हॉल में सिर्फ दो लोग थेएक मैं और एक इन्‌विजिलेटर पंड्या जी। पहले तो उन्होंने मुझे घूर कर देखा। फिर मेरे हाथ से उत्तर-पुस्तिका ही छीन ली। बोले,”तुम्हारे अकेले के लिए क्या हम ढाई घण्टे तक बैठे रहेंगे?” मुझे आज तक अफसोस है कि अपनी ग्रामीण पृष्ठभूमिशिक्षक पिता का पुत्र और चौदह वर्ष की आयु होने के कारण मैं उनका किसी भी तरह से विरोध करने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाया। पंड्या जी जैसे शिक्षकों ने अपनी ऐसी हरकतों से कितने विद्यार्थियों की जिंदगी में अवसाद पैदा कर दिया होगाकरियर की दिशा बदल दी होगीविषय के प्रति अरुचि पैदा कर दी होगीयह या तो ऊपर वाला जानता है या पंड्या जीया फिर मेरे जैसे भुक्तभोगी!
    सन्‌ 64-65 के सत्र में छठी कक्षा की बात है। एक शिक्षक श्री तुलसीराम वर्मा अक्सर विद्यार्थियों से सिगरेट मँगवाया करते थे। एक बार मैंने भी उन्हें सिगरेट लाकर दी थी। आज विश्लेषण करने पर समझ में आता है कि अपनी युवावस्था में कुछ वर्ष मैं धुम्रपान की लत का शिकार रहा तो उसके सीखने की पृष्ठभूमि में एक कारण गुरुजी को लाकर दी गई सिगरेट भी थी। हाथ में रह गई तंबाकू की मादक गंध और सर का लाइटर से सिगरेट जलाने का अंदाज़ कई  दिन तक मेरे अचेतन में छाए रहे थे।
    यही नहींशिक्षकों की बोलचाल से लेकर बॉडी लेंगवेज़ तक का विद्यार्थियों पर बड़ा जबर्दस्त प्रभाव पड़्ता है। चौथी क्लास के मेरे क्लास टीचर को पलकें झपकाने की आदत थी। उन्हें देखकर कुछ बच्चे भी अपनी पलकें झपकाने लग गए थे। दूसरे टीचर्स के समझाने या घर के बड़ों की डाँट-फटकारों के बाद बच्चों की ये आदतें सुधरीं। इसी तरह प्रायमरी स्कूल की एक शिक्षिका अनुनासिक स्वर(नेज़ल टोन) में बोलती हैं। उनकी क्लास के बच्चे भी नेज़ल टोन अपनाते देखे गए हैं। मिडिल स्कूल के एक गुरुजी नवरात्र के दिनों में कड़ा उपवास रखते थे इसलिए नौ दिन पढ़ाना स्थगित रख चुपचाप बैठे रहते थे। पता नहीं उन्हें इसका पुण्य लाभ मिला या नहीं पर बच्चों का पढ़ाई का नुकसान अवश्य ही होता था।
    इसी तरह विज्ञान जैसे विषय में पुस्तक रखकर पढ़ाने या सिर्फ एक- दो ‘प्रिय’ छात्रों से ही बार-बार बात करने या पूछने वाले शिक्षक भी कभी भी विद्यार्थियों से सम्मान नहीं पा सके। बल प्रयोग भी अब न सिर्फ शिक्षक की अक्षमता में गिना जाता है,बल्कि अनैतिक व असंवैधानिक भी है। विद्यालयीन शिक्षाखासकर के छोटी कक्षाओं में सिर्फ पढ़ाने की कला व बालमनोविज्ञान की टेक्निक ही शिक्षक को विद्यार्थी की नज़रों में स्थाई रूप से सम्मानीय व वंदनीय बना सकती है।
    मेरे ही शहर में कुछ वर्ष पूर्व एक शिक्षक को कुछ लड़कों के साथ अप्राकृतिक कृत्य के जुर्म में गिरफ्तार किया गया था। जिन बच्चों के नाम सामने आए थे उन्हें व उनके परिजनों को कितनी  कठिनाइयों का सामना करना पड़ा होगा!
    यहाँ बात सिर्फ विद्यालयीन शिक्षा से जुड़े शिक्षकों की हो रही है। महाविद्यालयीन शिक्षा में गुरु-शिष्य अंतरसंबंध विद्यालयीन अंतरसंबंध से बहुत भिन्न होते हैं। वहाँ बालमनोविज्ञान की कोई भूमिका लगभग नहीं है।
    और अंत में प्रार्थना! पंड्या जी जैसे गुरु जीईश्वर करेकिसी भी बच्चे को न मिलें। ईश्वर सभी को इतना साहस दे कि ट्यूशन के लिए बाध्य करने वाले या बीच परीक्षा में कॉपी छीनने वाले शिक्षक की शिकायत कर सकें !   

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      100,  रामनगर एक्सटेंशन,  देवास 455001(म.प्र.) मो. 09302379199     

Thursday, 28 August 2014



हिंदू का दूसरा विवाह और लव जेहाद
                                          ओम वर्मा
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न दिनों विवाह सबंधी एक बयान व धार्मिक पहचान छिपा कर किए जा रहे विवाह की घटनाओं ने समरसता के ताने बाने को विच्छिन्न करने का जो प्रयास किया है, वह चिंतनीय है।
    शंकराचार्य स्वरूपानंदजी ने एक साक्षात्कार में पीएम नरेंद्र मोदी से माँग की है कि किसी हिंदू पति को पत्नी के संतानोत्पत्ति योग्य न होने की दशा में दूसरे विवाह का अधिकार दिया जाए। क्या इसका मतलब यह लगाया जाए कि जीवनसाथी होने का मतलब क्या सिर्फ संतानोत्पत्ति भर है? क्या औरत सिर्फ बच्चा पैदा करने की मशीन है? संतान न होने की स्थिति में हमेशा क्या सिर्फ पत्नी ही जिम्मेदार होती है? यदि दूसरी पत्नी भी पति को पिता नहीं बना सके तो क्या उसे तीसरा विवाह करना होगा? यदि पत्नी फरटाइल और पति स्टेराइल हो तो क्या शंकराचार्यजी ऐसे प्रकरण में पत्नी को पहले पति को त्याग कर दूसरे विवाह का अधिकार देने की माँग करेंगे? अब जबकि विज्ञान नई ऊँचाइयाँ पर पहुँच चुका है, तब हम हैं कि मध्य युगीन धारणाओं को दोहराने कि बात करने लग जाते हैं। आज टेस्ट ट्यूब बेबी व सरोगेसी जैसी कई ऐसी तकनीकें ईज़ाद की जा चुकी हैं जिन्हें अपनाकर कई निसंतान माँओं की गोदें हरी हो गईं हैं। शुक्र है कि धर्मगुरू संतानोत्पत्ति के लिए यज्ञ, हवन, व पशु बलि जैसे उपाय नहीं बता रहे हैं। धर्म ग्रंथों के हवाले से तो लोग यह भी कह सकते हैं कि बेटा ही पिता की चिता को अग्नि दे सकता है या पुत्र से ही वंश चल सकेगा। अचरज नहीं अगर कल से कोई धर्म गुरू लिंग परीक्षण को वैध करने की माँग कर बैठे, या कोई पुत्र रत्न प्राप्त होने तक लगे रहो मुन्नाभाई जैसा धर्मोपदेश देने लगे! कभी कभी कुछ धर्म गुरुओं द्वारा अन्य समुदाय की बढ़ती जनसंख्या के परिप्रेक्ष्य में धर्म की रक्षा के लिए संतानवृद्धि पर ज़ोर दिया जाता है। मेरे विचार से शासन या नेतृत्व करने के लिए संख्यात्मक विकास के बजाय गुणात्मक विकास करना ज्यादा जरूरी होता है।       
    दूसरी घटना सामने आई है धर्म परिवर्तन की। मेरे विचार से एक स्वतंत्र, धर्म-निरपेक्ष या पंथ-निपेक्ष देश में हर नागरिक को अपनी पसंद का धर्म अपनाने या परिवर्तन करने का अधिकार होना चाहिए। प्रशासन व हमारे रहनुमाओं को यहाँ यह अवश्य सुनिश्चित करना होगा कि कहीं इसके पीछे कोई बोफोर्स तो नहीं हुई है! दो विभिन्न धर्मों के लड़के लड़की यदि विवाह करते हैं तो प्यार भरा दिल कभी न तोड़ो, जिस दिल में दिलवर रहता वाले विचार को अपनाना आज समय की आवश्यकता है।
    लेकिन यहाँ समाज में इस मुद्दे पर भी एक सार्थक विचार विमर्श की जरूरत है कि मुस्लिम लड़के और हिंदू लड़की के विवाह करने पर धर्म परिवर्तन लड़की ही करती देखी गई है, कहीं लड़के के धर्म परिवर्तन की बात सुनने में नहीं आई है। यहाँ दोनों के समाज अगर उन पर दबाव न डालें और दोनों पक्षों को अपनी अपनी धार्मिक पहचान बनाए रखने की छूट दे दें तो शायद कुछ सार्थक परिणाम सामने आ सकें। और कुछ हो न हो कम से कम दो प्यार करने वाले सुख से जी तो सकेंगे। एक महानगर में मेरे एक पारिवारिक बंगाली मित्र हैं जहाँ सुबह शाम माँ की पूजा होती है। उनकी बिटिया ने अपने जिस सहकर्मी से प्रेम विवाह किया उसके मज़हब में मूर्ति पूजा निषेध है। दोनों परिवारों में पहले इसका विरोध हुआ। फिर बेटे की विधवा माँ  ने बहू को अपनी धार्मिक पहचान व मान्यता कायम रखने की स्वीकृति दी। पहले कन्या पक्ष ने बंगाली रीति रिवाज से विवाह कर बेटी को विदा किया। बाद में वर पक्ष ने अपने यहाँ निकाह भी पढ़वाया। वधू को हालांकि धर्म परिवर्तन के लिए बाध्य तो नहीं किया गया मगर ससुराल में रहकर उसे तस्वीर लगाने या मूर्ति पूजा और किसी हिंदू त्योहार को मनाने की इजाजत नहीं है। यहाँ लाख टके का सवाल यह पैदा होता है कि क्या दो प्यार करने वालों को समाज धर्म के बंधनों से कभी मुक्त नहीं करेगा?

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