Friday, 24 October 2014
Monday, 20 October 2014
विचार - वंशवाद के ताबूत में एक और कील!
विचार
वंशवाद के ताबूत में एक और कील!
ओम वर्मा om.varma17@gmail.com
ओम वर्मा om.varma17@gmail.com
हरियाणा व महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में व
इससे पहले सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस की जो गत हुई है उसकी कल्पना किसी
कांग्रेसी या जी हुज़ूरी के शोर में डूबे गांधी परिवार ने शायद ही कभी की होगी।
गांधी परिवार को लेकर कांग्रेसियों की सोच कुछ ऐसी है कि ‘तेरे नाम से शुरू, तेरे नाम पे खतम’ ! पार्टी अध्यक्ष से लेकर उपाध्यक्ष और संसदीय दल
की अध्यक्ष तक गांधी ही गांधी...! 1999 में शरद पवार संगमा व तारीक अनवर के साथ मिलकर
सोनिया गांधी के विदेशी मूल के आधार पर अलग होकर भी पंद्रह साल तक साथ चलते रहे
हैं। एनडीए ने नरेंद्र मोदी को जब पीएम उम्मीदवार के रूप में सामने रख कर बढ़त ले ली थी तब यूपीए सिर्फ संवैधानिक प्रावधान की
दुहाई देता रह गया था कि पीएम सांसदों के द्वारा चुना जाता है। मगर वे यह भूल गए
थे कि किसी को पीएम उम्मीदवार घोषित करके चुनाव लड़ने पर कोई कानूनी रोक भी तो नहीं
है। यह भी सभी जानते थे कि जयपुर सम्मेलन में राहुल गांधी की पार्टी उपाध्यक्ष के
रूप में नियुक्ति ही इसलिए की गई थी कि भविष्य में उनका राजतिलक किया जा सके। जब
भाजपा ने नरेंद्र मोदी को पीएम पद का दावेदार घोषित किया था तब यह कहने की हिम्मत
किसी कांग्रेसी में नहीं थी कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ राहुल गांधी को लाना ‘निर्बल से लड़ाई बलवान की ’ वाली बात साबित हो जाएगी। और तो और जैसी कि अब
माँग उठने लगी है, राहुल
की तुलना में प्रियंका को लाना शायद ज्यादा फलदायी हो सकता था, यह बात कोई भी कांग्रेसी न तो समझ सका न 10, जनपथ को समझा सका। समझाता भी कैसे, जहाँ एक ओर मनु सिंघवी सरीखे बड़े वफादार जब यह स्थापित करने
पर तुले थे कि “राहुल तो जन्मजात नेता हैं ”, एक वरिष्ठ नेता तो राहुल जी को जीवन में एक बार
पीएम के रूप में देखने के लिए ही जीवन जी रहे हैं, वहीं कुछ लोग सोनिया को देश की माँ बताकर उनके
एक इशारे पर झाड़ू तक लगाने के लिए तैयार बैठे थे। और तो और मासूमियत की हद तो तब
हो गई थी जब पिछले दिनों लोकसभा में सोते हुए राहुल गांधी का ‘चिंतन’ करते हुए बताकर बचाव किया गया था।
लोकसभा चुनावों की तरह विधानसभा के इन चुनावों
में भी जहाँ नरेंद्रभाई एण्ड कं. अपनी सभा व मीडिया में स्थानीय सरकारों की नाकामियों को बड़ी
शालीनता से उठाते रहे वहीं दोनों राज्यों में शासक दलों की स्थिति इतनी दयनीय थी
कि वे अपनी छोटी-मोटी उपलब्धियों को भी जनता के जहन में नहीं उतार सके! गुजरात के
2002 एपिसोड का मुद्दा तो लोकसभा चुनाव में ही पिट चुका था। नरेंद्र मोदी को
अमेरिका में बापू का नाम मोहनदास की जगह मोहनलाल बोल देने पर पानी पी पीकर कोसने वाले
काँग्रेसी मित्रों को राहुल द्वारा पृथ्वीराज चौहान के विधानसभा भंग होने के कारण
त्यागपत्र देने के बाद भी उन्हें सीएम बताने की बात पर यूँ चुप थे मानो उन्हें
साँप सूँघ गया था।
मोदी पर पुस्तकें आना, विदेशी अखबारों में उनके राज्य के विकास की
प्रशंसा होना और तभी मनमोहनसिंह को कमजोर पीएम बताने वाली दो किताबें आना व
अमेरिका के मेडिसन गार्डन में उनका भाषण अंतत: राहुल गांधी व नरेंद्र मोदी में
वामन व विराट की इमेज बनाते चले गए।
महाराष्ट्र की जनता ने यह साबित कर दिया है कि
देश में उग्रवादी तेवर दिखाना, टोल नाकों पर उपद्रव करना व अन्य प्रांत से रोटी कमाने आए लोगों का
तिरस्कार जैसे मुद्दों की काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ाई जा सकती। साथ ही
महाराष्ट्र में मुस्लिम समाज ने काँग्रेस व एनसीपी के बजाय जो विश्वास भाजपा में दिखाया है उसे सिर्फ संपूर्ण समुदाय में
सुरक्षा का भाव जागृत करके ही रिसिप्रोकेट किया जा सकेगा। ***
--------------------------------------------------------------------------------------------
--------------------------------------------------------------------------------------------
100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001
Sunday, 19 October 2014
कच्ची व पक्की दीवार
ओम वर्मा
om.varma17@gmail.com
दीवारें दो तरह की होती हैं – कच्ची दीवार और पक्की दीवार। साहित्यिक भाषा में एक मूर्त और एक अमूर्त! कच्ची दीवार यानी वह मूर्त दीवार जो ईंट गारे या अन्य बिल्डिंग मटेरियल की बनी होती है व सारी दुनिया को दिखाई देती है... जैसे कि ‘ग्रेट वाल ऑफ चाइना’, या दोनों जर्मनियों के पुनर्मिलन से पूर्व पैंतालीस वर्षों तक तनी रही ऐतिहासिक ‘बर्लिन वाल’। चीन की 6000 किमी लंबी दीवार तो चाँद से भी दिखाई देती है। बहरहाल दीवार चाँद से भले ही दिखे या न दिखे, दो देशों को बाँटे या न बाँटे, वह होती बड़ी ही कच्ची है। आखिर दीवार ही तो है कोई रेडक्लिफ लाइन नहीं कि हथौड़े, डायनामाइट या परमाणु बम से भी नहीं मिटाई जा सके। कई बार तो यूँ लगता है कि जैसे सारी दुनिया ही शीशे की है जहाँ कभी कोई सिरफिरा एक हवाई जहाज का अपहरण कर उसे टकरा दे तो ऊँची से ऊँची दीवार को ज़ीरो ग्राउंड में बदलने में पल भर न लगे। यानी मूर्त दीवारों को अच्छे या बुरे किसी भी प्रयोजन के लिए ध्वस्त किया जा सकता है। कहीं कोई दबंग जमीन हथियाने के लिए दीवारें जबरन भी खड़ी कर लेता है। घर पर पेटी बिस्तर तैयार रखकर नौकरी पर जाने वाला दबंग अफसर ऐसी दीवारों को एक झटके में जमींदोज़ भी कर सकता है।
दीवारें दो तरह की होती हैं – कच्ची दीवार और पक्की दीवार। साहित्यिक भाषा में एक मूर्त और एक अमूर्त! कच्ची दीवार यानी वह मूर्त दीवार जो ईंट गारे या अन्य बिल्डिंग मटेरियल की बनी होती है व सारी दुनिया को दिखाई देती है... जैसे कि ‘ग्रेट वाल ऑफ चाइना’, या दोनों जर्मनियों के पुनर्मिलन से पूर्व पैंतालीस वर्षों तक तनी रही ऐतिहासिक ‘बर्लिन वाल’। चीन की 6000 किमी लंबी दीवार तो चाँद से भी दिखाई देती है। बहरहाल दीवार चाँद से भले ही दिखे या न दिखे, दो देशों को बाँटे या न बाँटे, वह होती बड़ी ही कच्ची है। आखिर दीवार ही तो है कोई रेडक्लिफ लाइन नहीं कि हथौड़े, डायनामाइट या परमाणु बम से भी नहीं मिटाई जा सके। कई बार तो यूँ लगता है कि जैसे सारी दुनिया ही शीशे की है जहाँ कभी कोई सिरफिरा एक हवाई जहाज का अपहरण कर उसे टकरा दे तो ऊँची से ऊँची दीवार को ज़ीरो ग्राउंड में बदलने में पल भर न लगे। यानी मूर्त दीवारों को अच्छे या बुरे किसी भी प्रयोजन के लिए ध्वस्त किया जा सकता है। कहीं कोई दबंग जमीन हथियाने के लिए दीवारें जबरन भी खड़ी कर लेता है। घर पर पेटी बिस्तर तैयार रखकर नौकरी पर जाने वाला दबंग अफसर ऐसी दीवारों को एक झटके में जमींदोज़ भी कर सकता है।
मगर जो
अदृश्य व अमूर्त दीवारें होती हैं उनका लेखा जोखा या जवाब है किसी के पास? वो दीवार
जिसे गुजरात और शेष भारत के बीच खड़ी करने की कोशिशें जारी हैं, वो दीवार जो कश्मीरियत और हिंदुस्तानियत के बीच या पूर्वोत्तर राज्यों के
देशवासियों व शेष देशवासियों के बीच व हर अलगू चौधरी और जुम्मन शेख के बीच तामीर
की जा रही है और रोज उस पर नई नई परतें चढ़ाई जा रही हैं… वह दीवार जो एक नेता और वीज़ा के बीच में आड़े
आ जाती है मगर उसके पीएम बनते ही एक झटके में ढह जाती है, या वह जो किसी ‘लंगड़’ को आज तक अदालत के फैसले की नकल लेने से रोक रही है...वह दीवार जो आज भी
होरी को भूखा सोने या आत्महत्या करने पर विवश करती है... वह दीवार जो राँझे को हीर
और मजनूँ को लैला से मिलने से आज भी रोके हुए है... वह कभी टूटेगी भी? और वह दीवार जिसके कि इस पार वाला उस पार वाले को सिर्फ पाँच साल में एक ही
बार देख पाता है या वह जिसकी वजह से वंशवाद में सेंध लगाने के बारे में सोचना ही 1857 के विद्रोह के समान गदर मान लिया जाए, उस दीवार के
लिए कोई बारूद या बुलडोजर अभी तक ईज़ाद क्यों नहीं हुआ? क्या
मातृभूमि की रक्षा हेतु प्राण न्योछावर कर देने वाले शहीदों की शहादत की स्वर्णिम दीवार
से उनकी मज़हबी पहचान की दीवार बड़ी हो सकती है? क्या टोपी और
तिलक के बीच में दीवारें खड़ी की जाती रहेंगी? क्या हिंदी को
संपूर्ण देश की राष्ट्रभाषा और संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनने में जो दीवार अवरोध
बनकर खड़ी है उसे कोई ध्वस्त कर सकेगा? और लास्ट बट नॉट द
लीस्ट कि अर्जुन को इक़बाल के साथ क्रिकेट खेलने से रोकने वाली या उनके बालमन में
विषबेल सी खड़ी की जा रही दीवार को गिराने के लिए भी कोई महापुरुष कभी रथ यात्रा
निकालेगा?
जाहिर है कि देश में दीवारें बहुत हैं। अगर इनमें से ‘गलत’ दीवारों को गिराकर सही सही चुन ली जाएँ और उन पर सद्भाव की छतें ढाल दी
जाएँ तो इतने मकान, बल्कि
घर बन जाएँ कि इंसानियत की ‘छत्रछाया’ के
बगैर कोई सिर न बचेगा!
***
------------------------------------------------------------------------------------
100,
रामनगर
एक्सटेंशन, देवास 455001(म.प्र.)
व्यंग्य
बाईस हजार हत्याओं के
भविष्यवक्ता कहाँ हैं?
ओम वर्मा
बाईस हजार हत्याओं के
भविष्यवक्ता कहाँ हैं?
ओम वर्मा
om.varma17@gmail.com
या तो
वे कोई त्रिकालदर्शी हैं या अतींद्रिय शक्तियों के स्वामी! सच देखा जाए तो आज देश
व समाज को उनके जैसे विचारक व स्वपनदृष्टा की जरूरत है। आज भले ही सामान हमारे पास
सौ बरस का हो पर खबर पल भर की भी नहीं होती। ऐसे में सभी सर्वे व ओपिनियन पोल्स
में आगे चल रहे या संवैधानिक प्रक्रिया से अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के निर्वाचित
हो सकने की ’आशंका’ पर उन्होंने जो
पूर्वानुमान, भविष्य कथन, चेतावनी या ‘धमकी’ दी थी
उसे मैं अगर सदी की सबसे बड़ी भविष्यवाणी कहूँ तो शायद स्वर्ग पहुँच चुकी
मानव कंप्युटर शकुंतलादेवी या बिना जान वाले, मेरा मतलब
बेजान दारूवाला को भी कोई आपत्ति नहीं होगी। उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि अगर मतदाताओं ने उनके
प्रतिद्वंद्वी को पीएम बनाया तो बाईस हजार लोगों की हत्या हो जाएगी। यानी देश की जनता ने अपने इस पवित्र व सबसे बड़े लोकतांत्रिक
अधिकार का उपयोग उनके अनुसार न करके बाईस हजार लोगों की जान को दाँव पर लगा दिया।
एक राष्ट्रीय दल की अध्यक्ष का बेटा और
उपाध्यक्ष जब इतनी बड़ी भविष्यवाणी करता है तो उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
मैं अपना ज्ञान बघारूँ या कथित विशेषज्ञों से बात करूँ इससे बेहतर मैंने यह समझा
कि क्यों न हरयाणा व महाराष्ट्र के चुनाव परिणामों के बाब अज्ञातवास पर जा चुके
उक्त त्रिकालदर्शी नेताजी को खोजकर उनसे ही बात की जाए।
“सर उनके पीएम बनने पर बाईस हजार लोगों की
हत्या की बात आपने किस आधार पर कही थी?”
“हम कोई भी बात हवा में नहीं करते। राजनीति
के हमारे ‘अनुभव’ हमारे कार्यकर्ताओं की रिपोर्ट, हमारे बहुत सारे
सीनियर लीडर्स के निष्कर्ष और अपने लेपटॉप में दर्ज़ आँकड़ों के आधार पर मैंने यह
बात कही थी।”
“मैं नहीं समझ पा रहा हूँ, थोड़ा स्पष्ट करें।”
“हमारे एक वरिष्ठ साथी ने हमें बताया था कि
बारह वर्ष पहले उनके राज्य में दंगों में 1300 लोग मारे गए थे। अब आप खुद जोड़ के
देख लो कि पूरे देश का क्षेत्रफल गुजरात के क्षेत्रफल का सत्रह गुना है। तेरह सौ
इन टु(गुणित) सत्रह = बाईस हजार एक सौ। मैंने सौ कम करके बाईस हजार बताया तो क्या
बुरा किया? रेशो प्रपोर्शन का बड़ा ही
सिंपल सा गणित! एक और गणित देखें। किसी ने दंगों में मरने वालों की संख्या ग्यारह
सौ बताई। आप उसको पॉपुलेशन से को-रिलेट
करके देख लें। देश की पॉपुलेशन, गुजरात की पॉपुलेशन
से बीस गुना ज्यादा है। अब ग्यारह सौ में बीस का गुणा करके देख लो। वही बाईस हजार
फिर आ जाएगा।” आँकड़ेबाजी में वे मुझे योगेन्द्र यादव व योजना आयोग वालों से भी
भारी नज़र आ रहे थे।
“अगर लोग आपकी बात न मानें तो आप क्या
करेंगे?”
“देखिए जैसे हम गुजरात में पिछले बारह
वर्षों से उनका विरोध करते आए हैं, अगले पाँच वर्ष तक इन बाईस हजार हत्याओं के लिए भी करेंगे और इस ‘भारी’ मुद्दे के आधार पर अगले चुनाव में हम उनका ‘नमो नमो’ का नारा ‘रागा रागा’ में बदल देंगे।”
लोकसभा, फिर हरयाणा व महाराष्ट्र के विधानसभा परिणाम, विकास
के मुद्दे और अदालतों की क्लीन चिटें, मुझे कोने में सिसकते
नज़र आने लगे। तभी बाहर जनसमूह का शोर
सुनाई दिया –
“प्रियंका लाओ-देश बचाओ!”
***
-----------------------------------------------------------------------------------------------
100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001(म.प्र.)
-----------------------------------------------------------------------------------------------
100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001(म.प्र.)
Friday, 3 October 2014
व्यंग्य (नईदुनिया, 03.10.2014)
“जिस तरह खादी भण्डार में नौकरी कर लेने भर से कोई
गांधी नहीं
हो जाता; गर्मियों में गन्ने के रस का ठेला लगा कर उस
पर ‘फलां मधुशाला’ लिखा
बोर्ड व अमिताभ बच्चन का फोटू लगा लेने भर से कोई ‘हालावादी’ नहीं हो जाता; अचकन में सुर्ख गुलाब लगा लेने भर से कोई नेहरू नहीं हो जाता; मरियल
घोड़े जुते ताँगे में बैठकर ‘टेसन’ तक जाने से कोई पार्टी का पितृपुरुष या ‘रथयात्री’ नहीं हो जाता; लिंग परीक्षण करवाकर कन्या भ्रूण
के खात्मे के बाद नवरात्र में आठ दस कन्याओं को भोज करा देने से कोई नारी उद्धारक
नहीं हो जाता; रुई धुनने वाला हर जुलाहा कबीरदास नहीं हो जाता; जीवनसंगिनी से उसके आत्मिक
सौंदर्य से कहीं ज्यादा दैहिक सौंदर्य को महत्व देने के कारण प्रताड़ना पाने वाला
हर शख्स तुलसीदास नहीं हो जाता; जूते गाँठने वाला हर चर्म शिल्पी प्रभु को चंदन मान स्वयं को पानी के रूप
में प्रस्तुत कर चुका रैदास नहीं हो जाता और आगे की लटें सफ़ेद कर लेने भर से कोई लालबहादुर शास्त्री नहीं हो जाता; उसी तरह किसी सरकारी कार्यालय या उपक्रम में हिंदी अधिकारी हो जाने भर से
कोई हिंदी का कवि या लेखक नहीं हो जाता ...!," कहते
कहते वे हाँफने लग गए थे।
वे शहर के नामी गिरामी साहित्यकार व समीक्षक हैं। उनके सामने एक काव्य संकलन व दो व्यंग्य संकलन समीक्षार्थ रखे हैं। तीनों के रचनाकार वे हिंदी अधिकारी हैं जो अपने कार्यालयों के हिंदी पखवाड़ों में उन्हें वर्षों से पत्रं-पुष्पं देकर बुलवाते रहे हैं। 'काव्य संकलन' बेहतरीन आवरण-चित्र, चिकने पन्नों और सर्जक के फोटो के कारण 'दर्शनीय' अवश्य है पर पठनीय कतई नहीं। कविता का शरीर तो हर कहीं था, आत्मा कहीं नहीं थी। कविताएँ पढ़कर उन्हें आंग्ल महाकवि वर्ड्सवर्थ का कविता के जन्म को लेकर व्यक्त विचार कि "कविता शक्तिशाली भावनाओं का सहज अतिप्रवाह है: इसकी उत्पत्ति ट्रेंक्व्लिटी (tranquility) में रिकलेक्ट (recollected) हुए इमोशन से होती है", दम तोड़ता नज़र आ रहा था। यही हाल 'व्यंग्यकार हिंदी अधिकारी' के सपाटबयानी वाले व्यंग्यों के संकलन के भी थे।
दरअसल सरकारी कागजों के हिंदी
अनुवाद व स्टॉफ को हिंदी का कार्यसाधक ज्ञान देने लिए कार्यशालाओं का आयोजन करते
करते और हिंदी स्लोगन के पोस्टर लगवाते लगवाते या कहें कि हिंदी की रोटी खाते खाते कुछ (सब नहीं) हिंदी सेवियों को
अकस्मात यह इल्हाम हो जाता है कि वे साहित्यकार हैं या उन्हें यह अपराध बोध कचोटने
लगता है कि हिंदी की सेवा तो बहुत कर ली, अब तक साहित्य सेवा
क्यों नहीं की? कार्यालयीन लायब्रेरी की धूल झाड़ते
झाड़ते उन्हें अकस्मात यह अपराध बोध भी सताने लगता है कि साहित्य सेवा न करने से
उनका जन्म कहीं अकारथ न चला जाए! लिहाजा अच्छा खासा इंसान फाइलों में हिंदी और
अँगरेजी में लिखे पत्र और टिप्पणियों के आँकड़े भरते भरते कुछ ऐसा भाव विह्वल हो
जाता है कि ‘कविता’ करने या
वह जो लिखता है उसे कविता की संज्ञा देने लग जाता है। कुछ तीन चार सौ शब्दों वाले
त्वरित टिप्पणीनुमा आलेख जो कुछ टुटपुंजिया अखबारों के व्यंग्य(?) कॉलम में छप भी जाते हैं उन्हें पुस्तकाकार देकर, तड़क भड़क वाला विमोचन समारोह करवा कर खुद के लिए 'प्रतिष्ठित' या 'वरिष्ठ' व्यंग्यकार लिखवाना प्रारंभ कर देता है। प्रकारांतर में वह हिंदी पखवाड़े
के अवसर पर अपने संग्रह को खपाने की कला भी सीख जाता
है! कवि अधिकारी का बस चले तो वह सुमित्रानंदन पंत को स्वर्ग में जाकर ज्ञापन दे
आए और उनकी कविता “वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान... निकलकर आँखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान..“ को बदलकर यह कहने पर विवश कर दे कि “हिन्दी
अधिकारी होगा पहला कवि, वाह से उपजा होगा ज्ञान।" पंत जो मानते थे कि "कविता विचारों या
तथ्यों से नहीं बल्कि अनुभूति से होती है", उन्हें
इस संकलन को पढ़कर मानना पढ़ जाए कि अब कविता की दशा और दिशा हिंदी साहित्यकार नहीं, हिंदी अधिकारी तय करेगा। उधर स्वर्ग में शरद, परसाई
व रवींद्रनाथ त्यागी की आत्मा को यही सोचकर शांति मिल रही होगी कि हमारे बाद
व्यंग्य की फसल सूखी नहीं है, आज का संख्यात्मक रुझान
कल के गुणात्मक अभियान में अवश्य परिणत होगा।
***
------------------------------------------------------------------------------------------------
100,रामनगर
एक्स्टेंशन, देवास 455001(म.प्र.) Tuesday, 16 September 2014
उच्चारण व अनुवाद में हिंदी
ओम वर्मा
उस दिन खुश तो बहुत थे वे। पर शाम को उनकी खुशियाँ कार्यालयों के एक दिनी हिंदी दिवसीय उत्साह या जीतेजी उपेक्षित मगर श्राद्ध पक्ष में एक दिन तस्वीरों पर हार बदले जाने का सम्मान पाने वाले मरहूमों की तरह काफूर हो गईं। नए-नए मित्र बने बेनर्जी बाबू ने उन्हें शाम को अपने यहाँ 'भोजन' के लिए आमंत्रित किया था। वे शाम को उनके घर सपरिवार 'मत्स्य-भक्षण' का मन बनाकर पहुँचे तो देखते हैं कि हॉल का फर्नीचर हटाकर जमीन पर बैठक व्यवस्था की गई है और वहाँ तबला हारमोनियम आदि रखे हुए हैं। यानी बांग्लाभाषी बेनर्जी बाबू ने उन्हें 'भजन' के लिए आमंत्रित किया था कि 'भोजन' के लिए। यह और बात है कि बाबू मोशाय ने उन्हें 'रोबिन्द्रो शोंगीत' की मधुरता में डुबाकर न सिर्फ भूख के अहसास से बचाया, बल्कि उन्हें 'जोल' और चाय भी 'खिलाई'। मेरे एक तेलुगूभाषी मित्र हर वर्ष फरवरी-मार्च में मुझसे 'बडजट' पर 'हॉनेस्टली' पूरे एक 'हवर' तक चर्चा करते हैं। तीस वर्ष से साथ काम कर रहे इस मित्र के मुख से आज तक मैंने कभी बजट, ऑनेस्टली या अवर नहीं सुना। इसी तरह कभी-कभी अनुवाद की साधारण सी त्रुटि भी परिहास निर्मित कर देती है। टेलीप्रिंटर के युग में एक अखबार में खबर छपी थी, ''डाकुओं और पुलिस में गोलियों का आदान-प्रदान।" जाहिर है कि खबर थी कि, ''डेकोइट्स एंड पुलिस एक्सचेंज्ड फायर्स।'' अब 'एक्सचेंज् का शाब्दिक अनुवाद 'आदान-प्रदान' ही होना था। न्यूज़ पढ़कर ऐसा लगा मानो पुलिस का शिष्टाचार सप्ताह चल रहा होगा जिस कारण पुलिस और डाकुओं में एक दूसरे को मिठाइयों के साथ तश्तरी में रखकर लखनवी अंदाज में पहले आप -पहले आप कहते हुए गोलियों का आदान-प्रदान संपन्न हुआ होगा। एक बड़े संस्थान के फायर -ब्रिगेड के दफ्तर में स्थित स्टोर्स पर वर्षों तक 'अग्नि भण्डार' लिखा रहा। समझना मुश्किल था कि ये आग बुझाते हैं या आग जारी करते हैं। बाद में उसे 'अग्नि शमन सामग्री भण्डार' लिखा गया उसी संस्थान में जनरल केशियर को वहाँ के कर्मचारी वर्षों तक 'सामान्य रोकड़िया' लिखते व समझाते रहे। बाद में उन्हें 'महारोकड़िया' घोषित किया गया। संजय दत्त जब जेल से रिहा हुए तो पत्रकारों के यह पूछने पर कि ''अब वे कैसा महसूस कर रहे हैं?'' उनका जवाब था, ''आय’ म फीलिंग ग्रेट !" अनुवादक की त्रुटि के कारण इसी समाचार का शीर्षक ''संजय खुद को महान समझने लगे!" प्रकाशित हुआ। आस्तिक व्यक्ति सिर्फ ईश्वर को महान मानेगा और नास्तिक भी कम से कम खुद को महान तो नहीं कहेगा। हमारे गुणों के कारण दूसरा व्यक्ति भले ही हमें महान कहे, पर खुद को महान समझना रामायण रचे जाने का कारण बन सकता है |
क्रिकेट
में जो बल्लेबाज पिच के स्वभाव तथा गेंदबाज व क्षेत्ररक्षण की खामियों उठाकर रन बना
ले उसे 'अपार्चुनिस्ट
बेट्समेन' कहा जाता है। एक बार रेडियो पर टेस्ट
मैच की कामेंट्री में मैंने एक्सपर्ट कमेंटेटर से सुना, ''उन्होंने
उस स्थान पर फील्डर नहीं होने का फायदा उठाकर वहाँ शॉट लगाकर रन ले लिया है। वे एक अच्छे अवसरवादी बल्लेबाज
हैं।
अँगरेजी
में 'अपार्चुनिस्ट
बेट्समैन' होना
अच्छा
गुण हो
सकता है, पर
हिन्दी में किसी को अवसरवादी कहना निश्चित ही उसका घोर अपमान करना
है।
और फिर भाषा तो अपने आप में ही महान होती है। ऐसी छोटी-मोटी त्रुटियाँ या विसगतियाँ उसके प्रगति रथ को कभी नहीं रोक सकतीं।
व्हाट इज़ योर ओपिनियन सर?
***
100,रामनगर एक्स्टेंशन, देवास 455001
Friday, 5 September 2014
Subscribe to:
Posts (Atom)
