Saturday, 31 January 2015
Monday, 26 January 2015
Tuesday, 6 January 2015
शीत लहर- एक व्यंग्य शब्दचित्र
मौसम का बिगड़ता मिजाज़
ओम वर्मा
कथा शिल्पी प्रेमचंद की कहानी ‘पूस की रात’…!
ठण्ड से ठिठुरते हलकू और मुन्नी...! मुन्नी हलकू को बार बार कोसती रहती है कि वह इफ़रात में खर्च न करे ताकि कुछ बचत हो सके और ‘कम्मल’(कंबल) खरीदा जा सके जिससे ‘पोस-माघ’ ढंग से कट सकें!
आज भले ही हलकू हलकप्रसाद और मुन्नी मुन्नी मैडम में बदल गई हो मगर कुछ नहीं बदला तो वह है माघ पूस की रातें। कंबल हर घर में है मगर फिर भी सर्दियाँ हैं कि जान लेवा साबित हो रही हैं। आज मुन्नियाँ हलकुओं को कोस रही हैं- “इस मुई ठण्ड का क्या करूँ...कहा था कि रजाई भारी बनवाना... बनवा लाए चादरे जैसी...! रूम हीटर ही ले आते तो कमरा ही थोड़ा गर्म हो जाता...!” अब इन मुन्नियों को कौन समझाए कि यदि रूम हीटर चलाए गए तो बाद में बिजली का बिल देख कर दिमाग पर जो गर्मी चढ़ेगी उसे उतारने के लिए केजरीवाल भी फ्री नहीं है।
मौसम विज्ञानी दाड़ी बढ़ाकर अंधत्व निवारण शिविर से ऑपरेशन करवा कर लौटे रोगी या दक्षिण के अभिनेता से नेता बने राजनेता की तरह काला चश्मा लगा कर सूट टाई पर भी शॉल लपेटे छिपते फिर रहे हैं। एक श्रीमान अलाव तापते गरम हाथों, यानी रँगे हाथों पकड़ा ही गए। कल तक जो ग्लोबल वार्मिंग के नाम से डरा डरा कर मुंबई जैसे तटवर्ती शहरों के डूब जाने का खतरा बता रहे थे वे आज ग्लोबल कूलिंग की बात करते फिर रहे हैं।
अपने राम को न तो वैज्ञानिकों की बात समझ में आती है और न ही ज्योतिषियों की। ज्वलंत विषयों पर दोनों वर्गों के लोग जो भविष्यवाणी करते हैं,वह प्रायः फेल हो जाती है। बाद में ये अपनी गणनाओं की त्रुटि का कारण बताने लगते हैं या फिर “हमारा मतलब यह नहीं था...” जैसी बेमतलब की लीपापोती करने लग जाते है।
लाख टके की बात यह है कि आखिर इस जमा देने वाले जाड़े से निज़ात मिले तो मिले कैसे? इन दिनों कुछ ‘फायर ब्राण्ड’ बयानवीर अपने बयानों से सियासी आग भले ही लगा देते हों पर भौतिक रूप से गर्मी उत्पन्न नहीं कर सकते! इसी तरह कल तक जो मुझे राह रोक रोक कर पूछा करते थे कि दिल्ली के विधानसभा चुनाव में ऊँट किस करवट बैठेगा, वे आज पूछते हैं कि नए टोपे बाज़ार में आए या नहीं, या ये स्वेटर कहाँ से लिया, या यह कि आखिर ये ठण्ड कब खत्म होगी यार...! हिंदी की प्रसिद्ध कहानी ‘उसने कहा था’ का वह दृश्य रह रह कर कौंध जाता है जिसमें लहनासिंह के साथी ठण्ड से परेशान हैं और चाहते हैं कि एक बार ‘जंग’ हो ही जाए ताकि कुछ गर्मी तो आए। कोहरे की वज़ह से ट्रैनें व उड़ानें लेट होने की तो बात पुरानी हो गई, हद तो तब हो गई जब दिल्ली में एक चोर ने महिला समझकर कुत्ते की ही चैन झपट ली...!
इन दिनों जिसे देखो वही कुछ ठिगना नज़र आ रहा है। क्या लोगों की औसत उँचाई एक दो इंच कम हो गई है। ध्यान से देखने पर समझ में आता है कि हर शख्स सिकुड़कर गुड़ी-मुड़ी होकर चल रहा है। मिलते ही तपाक से हाथ मिलाने वाला शख्स देखते ही मुँह फेर रहा है कि कहीं गलती से जेब की गर्मी छोडकर हाथ बाहर न निकालना पड़ जाएँ। गलती से अगर उन्हें हाथ मिलाना भी पड़े तो सामने वाले से एक बत्ती कनेक्शन वाले की तरह ज्यादा से ज्यादा एनर्जी खींचने की कोशिश करने लगते हैं। इधर चौराहे पर क्या पुतला दहन हो रहा है? नहीं नहीं, यह जो आग जल रही है वह कोई विरोध प्रदर्शन या पुतला दहन नहीं बल्कि ठण्ड भगाने का इंतजाम है। जिन्हें मैं प्रदर्शनकारी समझ बैठा था वे और दो पुलिस के जवान मिलकर अलाव ताप रहे हैं।
दिल्ली में इन दिनों मोदी की लहर है या केजरीवाल की इस पर शायद अलग अलग दावे हो सकते हैं लेकिन दिल्ली सहित पूरे उत्तरी भारत में इस समय शीत की लहर है, इस बात पर सभी एकमत हैं। भोपाल के यूनियन कार्बाइड में जैसे किसी की गलती से ‘मिक’ गैस के टेंक का वॉल्व खुल गया था, वैसे ही शायद ऊपर वाले के दरबार में कोई मौसम का स्विच चेंजओवर करना भूलकर आराम से बीड़ी पीने चला गया है। नीचे वाले मरें तो मरें, उसकी बला से!
सुबह हो गई है...दरवाजे पर पेपर फेंकने की आवाज आ चुकी है। कोई भी पेपर उठाकर लाने को तैयार नहीं है। रज़ाई कौन छोड़े! शीत लहर के चलते स्कूल खुलने का समय बढ़ा दिया गया है और कहीं तो छुट्टी ही कर दी गई है। इधर
किसकी हिम्मत जो मुझे जल्दी उठा सके। घर के अस्सी वर्षीय वरिष्ठ नागरिक अखबार के बिना छटपटाने लगते हैं, और शॉल, टोपे, मोजे के जिरहबख्तर में क़ैद होकर जाकर उठा लाते हैं। श्रीमतीजी कुढ़मुढ़ा रही हैं कि ‘बाई’ आज भी आती दिखाई नहीं देती।
जहाँ छुट्टी नहीं है उन स्कूलों में सुबह सुबह बच्चे मुँह से वाष्प छोडकर सारी वैधानिक चेतावनियों को ठेंगा बताते हुए धूम्रपान की नकल करने लगते हैं। क...क...किरण बोलने वाले इस शख्स को आप शाहरुख खान समझने की भूल न करें। दरअसल ठण्ड के मारे इसके दाँत किटकिटा रहे हैं। पारा जितना नीचे होने लगता है उधर ‘भियाजी’ की लाल रंग की ‘दवा’ का डोज़ भी उसी अनुपात में बढ़ जाता है। ठण्ड से अपने अपने ढंग से सबकी जंग जारी है। ***
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संपर्क : 100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001
Saturday, 13 December 2014
Friday, 12 December 2014
व्यंग्य- बाबागिरी का प्रताप (नईदुनिया, 12.12.2014)
व्यंग्य (नईदुनिया,12.12.14)
बाबागिरी का प्रताप
ओम वर्मा
बाबा शब्द हमारे जीवन में दो बार प्रवेश करता है - बाल्यकाल में व बाल्यकाल के बाद। हमारे बालमन में बाबा के नाम पर अक्सर ऐसे गूढ़ व्यक्तित्व की छवि स्थापित हो चुकी होती है जो न सिर्फ कुछ अलौकिक शक्तियों का स्वामी होता है बल्कि माता-पिता के सामने‘अनावश्यक’ जिद करने वालों को ‘पकड़कर’ भी ले जा सकता है। मेरे जैसे कई तत्कालीन बच्चे बाहर ‘बाबाओं’ को देखकर घर में छुप जाया करते थे। हालांकि बाबाओं को लेकर तब डर जरूर बना हुआ था लेकिन हमारे संज्ञान में तब भी यह कभी नहीं आया था कि वे किसी भव्य महलनुमा आश्रम में रहते होंगे, उनके लिए मरने मारने वालों की पूरी की पूरी फौज तैयार रहती होगी, वे अन्य कोई ‘खास’ यानी ऐसा काम भी करते हैं जिसकी वजह से उन्हें जेल जाकर जमानत के लिए भी तरसना पड़ जाए, या स्वयं न्यायपालिका को उनके लिए पीले चावल भिजवाना पड़ें। अब मुझे जाकर समझ में आया कि बड़े होने पर ही क्यों हमारे मुँह से यह निकलने लगता है कि “बार बार आती है मुझको, मधुर याद बचपन तेरी...।”शायद उसका एक कारण हमारे बालमन में बसा बाबाओं का वह रहस्यलोक भी हो! क्योंकि जीवन की रामायण में बालकाण्ड के बाद के अध्यायों में बाबाओं की जो छवि बनती है वह सर्वथा भिन्न है। वह एक ऐसी अवस्था होती है जब हम सीख समझकर चीजों व विचारों को ग्रहण कर रहे होते हैं। तब हमारे लिए ‘बाबा’ नामक जातिवाचक संज्ञा के ध्वनित होते ही हमारे सामने एक ऐसे दिव्य व्यक्तित्व का अक्स उभरने लगता है जिसकी विशाल जटाएँ,लंबी दाड़ी, कपाल पर लंबा चौड़ा तिलक और बड़े बड़े सम्मोहक या आग्नेय नेत्र हों, वह सत्य की खोज में निकला हुआ परिव्राजक या योगी होता है न कि असत्य या मिथ्या जगत के मायाजाल में उलझा हुआ कोई भोगी।
लेकिन जीवन के लंकाकाण्ड में हम देखते हैं कि हम जिसकी कृपा पाने के लिए शीश कटवाना भी मामूली कीमत समझते थे, उसने हमारी मासूम बच्चियों की अस्मत का शीश पहले ही काट लिया है। जो हमें सिर्फ ईश्वर की शरण में जाने का उपदेश देता रहता था वह स्वयं बाउंसरों व कई कमांडों की शरण में ही विचरण करता है। जो हमें ज्ञान बाँटता था कि हम हर पल ईश्वर की निगाह में हैं वह हर पल हम पर गुप्त कैमरों से निगाह रखता रहा है। वह हमें माया-मोह के बंधनों से मुक्त करवाते करवाते खुद की माया का भंडार भरने लगता है और मारीच से बड़ा मायावी बनकर सामने आता है।
वक्त की जरूरत है कि इस बदनाम ‘बाबागिरी’ को अब हीरोपंती में बदला जाए। क्यों न 'शोले’ के ठाकुर की तरह हम भी इन जय और वीरुओं यानी आज के बाबाओं की मदद लेकर व्यवस्था के गब्बरों का वध करें। इनकी सारी संपत्ति दिल्ली जैसे छोटे राज्य का बजट बना सकती है। और तो और जिंदा बाबा करोड़ का तो मरा भी सवा करोड़ से कम का नहीं होता तभी तो भक्तगण उसकी ‘मिट्टी’ को बाबा के ‘समाधिस्थ’ होने के भ्रम में मिट्टी में विलीन नहीं होने देते हैं। तो क्यों न ऐसे बाबाओं के आश्रम को गुप्त विद्याओं की अध्ययनपीठ यानी ‘चेयर’ घोषित कर दिया जाए। जो अनुयायी बाबा के लिए तीन दिन तक पुलिस से लोहा ले सकते हैं क्या वे अपने बाबा के आह्वान पर सीमापार से प्रवेश कर रहे घुसपैठियों से टक्कर नहीं ले सकते? जो बाबा दुग्ध स्नान कर अपनी धोवन को प्रसाद रूपी खीर में बदल सकते हैं उनकी 'प्रतिभा' का उपयोग यदि हम सारे 'वेस्ट' पदार्थों की रिसायकलिंग में करें तो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में उन्हें नोबेल पुरस्कार भी मिल जाए और देश का नाम रोशन हो जो अलग! बाबाओं के आश्रम को नेस्त-नाबूद करने के बजाय पर्यटन विभाग को देकर या होटल में बदलकर तो देखिए, माया का ढेर लग जाएगा। बाबा के आदेश पर ये अनुयायी अगर अपने इन्हीं शस्त्रों के साथ नक्सलियों से जा भिड़ें तो नक्सलवाद का नामोनिशान मिट सकता है। लोहे को आखिर सिर्फ लोहा ही तो काट सकता है।
100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001(म.प्र. )
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