Sunday, 14 June 2015

सूरज की दादागिरी से कीटों की हाराकिरी तक

ललित निबंध
  सूरज की दादागिरी से कीटों की हाराकिरी तक 

                                                                                                                                  –ओम वर्मा

मौ
सम का मिजाज बेवफा प्रेमिका व चतुर राजनीतिज्ञों की प्रतिबद्धता की तरह अचानक बदल गया है। सूरज कल तक गली के गुंडे की तरह अपनी प्रचंडता का रौब गाँठता हुआ मानो घर घर चौथ वसूल रहा था। शायद यही देख प्रकृति के चितेरे स्व. रामविलास शर्मा ने कहा था-
                                                                                                                                                                                                                                                                                      सूरज यों निकला पहाड़ से
 
                                      गुंडा ज्यों छूटा तिहाड़ से... 
    किंतु अब वही सूरज आसमानी संसद में बादल पार्टी के आगे विश्वास का मत प्राप्त करने में असफल होकर भीगी बिल्ली-सा दुम दबाए बैठा है। गरम दल का पतन हो गया है और नरम दल ने सरकार बना ली है। यदि दिल्ली जैसी कोई अनहोनी न हुई तो यह सरकार आठ-नौ माह तो चलेगी ही।
          आप चाहे उसे देवता मानें या न माने पर यह तो मानना ही पड़ेगा कि सूरज  नाम है अनुशासन का। हर बात में सख्ती, हर कहीं कानून-कायदा। यही अनुशासन ग्रीष्म के दो महीनों में साधारण अनुशासन न रहकर सन् ’75 की इमरजेंसी के डंडे वाले अनुशासन में बदल जाता है। आप चाहे उन्हें नमस्कार करें या न करें पर किसकी मजाल जो उनके निजाम में नंगे सिर प्रवेश कर सके। किसकी मजाल जो उस महाप्रतापी से आँख भी मिला सके। अभी मई माह में एक सामाजिक दायित्व के निर्वाहवश सारा दिन धूप में घूमता रहा। हर पल यही कामना करता रहा कि काश, कुछ पल के लिए पवनपुत्र हनुमान इस आर्यावर्त पर उतर आएँ और एक बार फिर चंद पल के लिए ही सही, रवि का भक्षण कर लें...। बहरहाल नंगे सिर घूमकर सूर्यदेव के राज का जो अनुशासन मैंने तोड़ा, मुझे उसकी जबर्दस्त सजा मिली। तीन दिन अस्पताल में बंद रहना पड़ा, खाकी वर्दी की बजाय सफ़ेद वर्दी वालों के बीच। खाकी वर्दी वाले शायद डंडे से मेरी लू उतारते, यहाँ मेरी लू के लिए मोटी मोटी सुइयाँ थीं। वहाँ शायद कलाई पर लौह कंगन पहनाए जाते, यहाँ ग्लूकोज-सेलाइन के नाजुक बंधन थे। वहाँ बंधन में बाँधने वाले मेरी वंशावली का मनचाहा बखान करते, यहाँ बंधन बाँधनेवालों (और वालियों) ने मुझसे सिर्फ यह पूछकर कि क्या खाया था, क्या पिया था और छूटते वक्त क्या खाना-पीना है बोलकर ही संतोष कर लिया था। फ्लोरेंस नाइटिंगेल की शिष्याओं ने इतनी बार मेरा चर्म-भेदन कर डाला कि उसकी मीठी चुभन अभी भी बाकी है। नर्सिंग-होम का व दवाइयों का हर वक्त भुगतान करते यूँ लगा मानो सूर्यदेव के एकसूत्री लू लगाओ कार्यक्रम के समर्थन में हस्ताक्षर करके मीसा के तहत छूटकर आ रहा हूँ। परीक्षा में कम नंबर लाने वाले बच्चे को बार बार ताने मारने वाले बाप सा जुल्म ढा रहा था सूरज। लिहाजा जिस तरह बाप के तानों से तंग आकर कुछ बच्चे घर छोड़कर भाग जाते हैं और कुछेक दुनिया छोड़ देने की नादानी कर बैठते हैं, उसी तरह कुछ नवधनाड्य सूरज के गरम मिजाज से तंग आकर हिल स्टेशनों की ओर पलायन कर गए थे और यूपी, आंध्र और तेलंगाना में कुछ लोग परलोक गमन कर गए थे।  धरती माँ को अपने लालों पर अंततः दया आना ही थी, सो बादलों की गड़गड़ाहट के माध्यम से उसने मुनादी करवा ही दी...”मेरे जिगर के टुकड़ों...मेरे लालों... तुम्हारे पिता का क्रोध शांत हो गया है। तुम जहाँ भी हो चले आओ...कोई तुम्हें कुछ नहीं कहेगा। रो-रोकर मेरी हालत खराब हो गई है...तुम्हें सताने वाली दुष्ट बहिन रोहिणी अपने ससुराल चली गई है... तुम्हारे छोटे मामा आषाढ़, बड़े मामा सावन व नानाजी भादौ तुम्हारे स्वागत के लिए तैयार खड़े हैं...।”
                                     
    हाँ तो अब जबकि पहली फुहारें गिर चुकी हैं और गर्मी की त्राहि-त्राहि से राहत मिल चुकी है तो ऐसा लग रहा है जैसे समस्त आतंकवादियों ने एकतरफा संघर्ष विराम लागू कर दिया हो। अँगरेजी साहित्य के रोमांटिक युग के प्रसिद्ध कवि जॉन कीट्स को एक अँधेरी रात में बुलबुल की तान सुनकर इतनी अलौकिक खुशी हुई थी कि उन्हें लगने लगा था कि मृत्यु के लिए इससे अच्छा समय और नहीं हो सकता। कुछ ऐसी ही खुशी वर्षा के आगमन पर इन कीट पतंगों को हो रही है। वे खुश, खुश और इतने खुश हैं कि हाराकिरी करने पर तुले हुए हैं। आकाश अक्सर स्याह बादलों से भर उठता है। कभी किसी श्वेत-श्याम फिल्म सा दृश्य उपस्थित हो जाता है, तो कभी रुई के ढेर से इधर से उधर खानाबदोशों की तरह ठौर-ठिकाना बदलते नजर आते हैं। कभी स्याह रंग बढ़ जाता है और नागिनों की तरह बिजलियाँ चमकने लगती हैं, तो लगता है मानो शूर्पणखा, रामानुज लक्ष्मण द्वारा नाक काट लिए जाने पर क्रोधित हो विलाप कर रही हो। कभी लगता है कि यह धरा स्वयं माता यशोदा है और बादल उनके पुत्र नंदकिशोर हैं जिन्हें वे पवन का झूला झुला रही हैं। अब जबकि चिट्ठी-पत्रियाँ बीते युग की बात हो गई हैं, मोबाइल में कभी नेटवर्क तो कभी लो बैटरी का खतरा हो, इंटरनेट में हैकिंग का खतरा हो तो ऐसे में क्यों न हम उन तक अपना संदेश भेजने के लिए विरही यक्ष की तरह इन आवारा बादलों को ही काम पर लगाएँ। लेकिन ई-मेल और इंटरनेट चैटिंग के युग में आजकल के प्रेमियों में इतना धैर्य कहाँ कि वे बादल को यक्ष की तरह अपनी व्यथा समझाते फिरें। फिर भी मेरा विश्वास है कि, समय, काल और देह की सीमा से परे शाश्वत प्रेम करने वाला कोई प्रेमी अपने अलौकिक प्रेम के इज़हार के लिए एक बार फिर मेघों को अपना दूत बना सकता है।
    कई पेड़-पौधे वर्षा ऋतु में अपने वसन मिनी से मिडी और मैक्सी में परिवर्तित कर देते हैं। मगर मुझे सबसे अधिक सुहाता है कदंब। कृष्ण की लीलाओ से जुडा होने के कारण ब्रज में कदम्ब के पेड़ की बहुत महिमा है।  ब्रजभाषा के अनेक कवियों ने इसका उल्लेख किया है। इसका इत्र भी बनता है जो बरसात के मौसम मैं अधिक उपयोग में आता है। हालाँकि मथुरा में अब यह वृक्ष बहुत ही कम पाया जाता है।  रूबिएसी कुल के इस वृक्ष में वर्षा ऋतु में चक्राकार पीले गुच्छे के रूप में बहुत छोटे  सुगंधमय फूल लगते हैं।  यह भी कहा जाता है कि बादलों की गर्जना से इसके फूल अचानक खिल उठते हैं। सावन-भादौ में कदंब के पेड़ पर लगे छोटे-छोटे मोतीचूर के लड्डू जैसे हल्के पीत-श्वेत वर्ण के फूल, उनकी निर्मल सी खुशबू और फूलों का पीला पराग झरने के बाद, पकने पर लाल हो जाना...! इसे 'हरिद्र' और 'नीप' भी कहा जाता था। फूलों से इत्र तैयार करने का उल्लेख भी मिलता है। साहित्य में नायिकाओं द्वारा श्रृंगार में इसका उल्लेख भी मिलता है। कीचड़ और फिसलन भरी जमीन इसके प्रिय हेबिटेट (वास स्थान) हैं। इसे कृत्रिम उद्यानों में नहीं पनपाया जा सकता। निश्चित ही कदंब प्रकृति के अधिक निकट है और शायद इसी कारण इसके दो पर्याय हरिप्रिय (कृष्ण को प्रिय) और हलिप्रिय (बलदाऊ को प्रिय) भी पड़ गए हैं। किंतु दुर्भाग्य से लालची मनुष्य जो कि नीड (Need) की सीमा पाए कर ग्रीड (लालच) तक पहुँच चुका है, की नजर इस पर भी पड़ गई है। दरअसल इसे सुखाकर इसका केमिकल ट्रीटमेंट कर लिया जाता है, जिससे यह बिल्कुल चंदन का आभास देता
है।  फिर इसकी मूर्तियाँ बनाकर सैकड़ों गुना महँगेदाम पर चंदन के नाम से बेची जाती हैं। इस कारण दुनिया से चरित्रवान लोगों की तरह इसकी संख्या भी घटती जा रही है।
      हरीतिमा तो खैर वर्षा की पहचान है ही, कीचड़ और मेंढक भी मानो इन्हीं दिनों के लिए बने हैं। सारे मेंढक मानो गर्मी के ताप से झुलस गए थे और इंतजार ही कर रहे थे कि कब पहली फुहार गिरे और कब वे अपनी अगन मिटाएँ। गड्ढों से बाहर आकर मेंढक यूँ टर्राने लगते हैं मानो खोया बछड़ा मिल जाने पर गाय रँभाने लगती है। वर्षाजल से आल्हादित हो मेंढक एक दूजे पर यूँ लंबी लंबी छलांगे भरकर उछलने लगते हैं जैसे पिता के काम से लौटने पर नन्हा बालक उनकी ओर भागता है। कभी ग्रीष्म निद्रा तो कभी शीत निद्रा के नाम पर साल भर से सोए पड़े मेंढक वातावरण को लोकसभा के शून्यकाल सा बनाने पर तुले हुए हैं। जब से जीवविज्ञान की प्रयोगशालाओं में इनके कटने पर पाबंदी लग गई है तब से इनका टर्राना जरा कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। उछल कर सुविधाजनक स्थान पर बैठने की इनकी विशिष्टता को जब से राजधानी वालों ने अपना लिया है तब से बेचारे थोड़े परेशान जरूर रहने लगे हैं।
    मंत्री जी खुश हैं क्योंकि हेलिकॉप्टर से बाढ़ का नजारा देखने कहीं न कहीं तो जाना ही पड़ेगा। सोच रहे हैं कि इस बार किसी नई जगह बाढ़ आना चाहिए ताकि कुछ चेंज हो जाए। मुन्नू की अम्मा, मुन्नू और उसके पाँचों भाई-बहिन जिद कर रहे हैं कि इस बार हम भी चलेंगे हेलिकॉप्टर में घूमने। देखें, किसका नंबर लगता है। प्रतिपक्ष खुश है कि सरकार की टाँग खिंचाई का एक और मौका मिलेगा, फलां जगह बाढ़ आई, सरकार ने कुछ कदम नहीं उठाए...फलां जगह सूखा पड़ा, सरकार के कदम वहाँ भी (बक़ौल शरद जोशी) जरूरत से ज्यादा ठोस हो गए इसलिए नहीं उठ पाए...! सरकार से इस भारी असफलता को लेकर इस्तीफा माँगा जा सकता है और यह भी हो सकता है कि इस मुद्दे का लागत लाभ का गणित अनुकूल पा कोई जूझारू नेता धरना, प्रदर्शन या बाढ़ पीड़ित के घर एक रात गुजारने जैसा कोई क्रांतिकारी कदम उठा ले। और कुछ हो न हो वाक ऑउट से तो कोई नहीं रोक सकेगा।
    किसान खुश हैं। ईश्वर ने लगता है निदा फाजली की इन पंक्तियों पर दाद दे दी है- “गरज बरस प्यासी धरती को फिर पानी दे मौला/ चिड़ियों को दाना, बच्चों को गुड-धानी दे मौला।” मेरे घर के आसपास आषाढ़ और सावन के महीनों में  बिलकुल प्राकृतिक झील बन जाती है। हर वर्ष मेंढकों के टर्राने का शोर एक किस्म की मादकता भर देता है। कुछ मेंढक तो ऐसे टर्राने लगते हैं गोया उन्हें भी बिना बहुमत के सरकार बनाने का मौका मिल गया हो। पास के स्कूल के बच्चे घर को लौटते हुए मेरे घर के आसपास बनी झील में पत्थर फेंक रहे हैं और कॉपियों के पन्ने फाड़-फाड़कर नाव तैरा रहे हैं। नाव जब तक सूखी है, तैरती है, भीगते ही डूब जाती है और बिन कहे एक संदेश छोड़ जाती है कि जहाँ तक हो सके अन्तःकरण को कागज की नाव की तरह सूखा यानी शुद्ध रखें वर्ना पाप की आर्द्रता जहाँ लगी कि नाव का डूबना तय है।
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Thursday, 4 June 2015

विश्व पर्यावरण दिवस (05 जून 2015) पर जनसत्ता दिल्ली में




                  घुसपैठ की जंग
                                ओम वर्मा
घुसपैठ यानी किसी के कार्यक्षेत्र, अधिकार क्षेत्र या परिसर में अनधिकृत दखल या प्रवेश। यह सार्वभौमिक समस्या इन दिनों जीवन के हर क्षेत्र में व्याप्त है।
  मंदिर से दर्शन कर लौट रही एक बुजुर्ग महिला को रास्ते में रोजाना भिक्षावृत्ति के लिए घर आने वाले पंडित जी मिले। माँजी ने उनका अभिवादन किया तो पंडित जी ने दीन भाव से कहा कि माताजी आज आप घर पर नहीं थीं तो इस गरीब ब्राह्मण को भिक्षा नहीं मिल सकी। बहूरानी ने कहा कि “आटा चक्की पर है।“
   “अच्छा! बहू ने ऐसा कहा? आइए मेरे साथ।“
   घर पहुँचते ही सासूमाँ ने भी पंडित जी को वही जवाब दिया जो पहले बहू ने दिया था। पंडित जी ने जो कि परशुराम के वंशज थे, स्वयं को जब्त करते हुए कहा, “यही बात तो आपकी बहू भी कह चुकी थी। क्या यही कहने के लिए आप मुझे वापस लेकर आईं थी?
   सासूमाँ में ने अपना ललिता पवारी संस्करण जारी रखते हुए कहा, “इस घर से भिक्षा देना या न देना यह मैं तय करूँगी। घर की मालकिन मैं हूँ। वह कौन होती है मेरे अधिकार क्षेत्र में घुसपैठ करने वाली? जाहिर है कि पंडित जी घुसपैठ के मुद्दे पर निरुत्तर होकर एक बार फिर खाली हाथ लौट गए।
  आज घुसपैठ कहाँ नही है? करगिल की घुसपैठ तो इतिहास बन चुकी है क्योंकि वहाँ से खदेड़े जाने के बावजूद भी घुसपैठियों के सरदार हार को गले में डाला गया हार समझकर हर साल जश्न मनाते रहते हैं। उधर पूर्वोत्तर के राज्यों में वर्षों से चल रही घुसपैठ शनैः शनैः वोट बैंक में तब्दील हो जाती है और यह मुद्दा भी राम मंदिर, काला धन व धारा 370 जैसे सिर्फ चुनावों के समय उठाए जाने वाले अन्य मुद्दे की तरह फिर ठंडे बस्ते में समा जाता है। बड़े बड़े उद्योगों में प्रयोगशाला विभाग व उत्पादन विभाग वाले एक दूसरे के अधिकार क्षेत्र में या तो घुसपैठ करते देखे गए हैं या एक दूसरे पर घुसपैठ करने के आरोप लगाते रहते हैं। कुछ घरों में नौकरीपेशा ससुर रिटायर होते ही बहू की रसोई में घुसपैठ करने लग जाते हैं और विवाद का कारण बन जाते हैं। साहित्य के क्षेत्र में जबर्दस्त घुसपैठ व्याप्त है। किसी बड़े अखबार समूह का मालिक जब अपने साप्ताहिक परिशिष्टों में अपनी लंबी लंबी कविताएँ छापने लगे तो सारे समीक्षक व समालोचक इस साहित्यिक घुसपैठ पर साइलेंट मोड में चले जाते हैं। किसी अच्छे खासे राजनेता के राजधानी के तख्ते-ताऊस पर आसीन होते ही उसको आज का सर्वश्रेष्ठ कवि या चित्रकार स्थापित करने के प्रयास शुरू हो जाते हैं। प्रकाशक और कैसेट-सीडी कंपनियाँ उसके दफ्तर के चक्कर काटने लग जाते हैं। नामवरों के कान खड़े होने से पहले राजनीति साहित्य व कला के क्षेत्र में घुसपैठ कर चुकी होती है। एक वरिष्ठ कथाकार साहित्यिक कार्यक्रमों में कभी अपना ऊटपटाँग लिखा हुआ कविता के नाम पर सुनाकर व कभी सेक्स पर प्रवचन देकर मुक्तिबोध और वात्स्यायन के प्राविंस में घुसपैठ करने लग जाते हैं।
   अगर केंद्र व राज्य में अलग अलग दलों की सरकारें हों तो या तो राज्यपाल राज्य सरकार के कामों में घुसपैठ शुरू कर देते हैं या न भी करें तो भी राज्य सरकार को हमेशा यही लगता रहता है कि राज्यपाल मंत्रिमंडल के अधिकारों में घुसपैठ कर रहे हैं। यही हाल अब दिल्ली के हैं। एक तरफ निर्वाचित सरकार है जिसका मुखिया आंदोलन व धरनों की उपज है। दूसरी तरफ उपराज्यपाल हैं जिनके पास संबंधित राज्य के पास पूर्ण राज्य का दर्जा न होने से कुछ विशेष या अतिरिक्त अधिकार भी हैं। यहाँ मंत्रिमंडल कुछ नौकरशाहों की नियुक्ति को लेकर उपराज्यपाल पर घुसपैठ का आरोप लगा रहा है। और जनता जो घुसपैठ तो छोड़िए, अभी तक अपने अधिकारों का उपयोग करना भी नहीं सीखी है चुपचाप तमाशा देखने व सहने को अभिशप्त है! घुसपैठ की यह जंग आखिर क्या गुल खिलाएगी यह तो बस अगले चुनाव में ही देख सकेंगे हम लोग!
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Tuesday, 2 June 2015

5 जून, विश्व पर्यावरण दिवस पर

वैचारिक लेख (5 जून, विश्व पर्यावरण दिवस पर}
      
      पर्यावरण बचाना है तो कागज़ बचाओ 
                                               ओम वर्मा
ठवीं  कक्षा का मेरा एक सहपाठी ...! रफ कॉपी में पहले वह पेंसिल से लिखता, पूरी भर जाने पर एक बार फिर  पेन से  लिखता। यानी एक कॉपी का दो बार उपयोग। साथी  विद्यार्थियों में उसकी छबि  'कंजूस-मक्खीचूस' के रूप में स्थापित हो चुकी थी। दूसरी ओर अन्य बच्चे कॉपियों का आधा-अधूरा उपयोग तो करते ही थे, जब चाहे पन्ने फाड़कर कभी कोलंबस बन नाव चलाते, कभी राइट बंधु बन हवाई जहाज उड़ाते तो कभी अल्फ्रेड नोबेल बन पन्नों से हवा में डायनामाइट लगाने का मज़ा लेते। आज जबकि वसुंधरा पर हरीतिमा सिकुड़ती जा रही है, पर्यावरण दिनो दिन प्रदूषित होता जा रहा है और मौसम-चक्र साल दर साल कभी ग्लोबल वार्मिंग तो कभी ग्लोबल कूलिंग के ख़तरे उत्पन्न कर रहा है और कभी अतिवृष्टि तो कभी अनावृष्टि! ऐसे में निश्चित ही कागज़ का सदुपयोग या न्यूनतम उपयोग करना आज कंजूसी नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बहुत ही सार्थक पहल होगी।

    पहले वार्षिक परीक्षा के बाद फेयर कॉपियों के शेष बचे कोरे पन्नों को एकत्र कर उनकी एक जिल्द  वाली रफ कॉपी बनवा ली जाती थी। इन सभी उपायों को आज फिर से अपनाने की जरूरत है। आज के मॉडर्न स्कूलों में मोटे-मोटे कव्हर वाली कॉपियों पर फिर अलग मोटे-मोटे कव्हर चढ़ाए जाते हैं। एक एक विषय की दो-दो, तीन-तीन कॉपियाँ बनवाई जाती हैं। इससे एक ओर बस्ते का बोझ तो बढ़ता ही है, बच्चों में कागज़ बचाने संबंधी संस्कार भी बीजारोपित नहीं हो पाते। गाँवों  में खाकरे के पत्तों से बने पत्तल-दोनों का स्थान कागज़ी पत्तल दोनों ने ले लिया है। आज इस पलायन को रोका जाना बेहद ज़रूरी है।

    कागज़ का दुरुपयोग करने में कुछ सरकारी कार्यालय या कुछ सरकारी लोग कुछ अधिक ही निर्मम होते हैं। एक -एक दस्तावेज़ की अनावश्यक रूप से कई कई प्रतियाँ, चार लाइन की जानकारी के लिए भी फुलस्केप कागज़ का उपयोग, एक ही परिपत्र की ढेर सारी प्रतियाँ, किसी किसी कार्यालय में अँगरेजी के साथ साथ हिंदी या क्षेत्रीय भाषा (या तीनों में ) सारी प्रतियाँ,और बाद में त्रुटि निवारण यानी अमेंडमेंट के लिए फिर उतनी ही प्रतियाँ...! कागज़ की इन फिजूलखार्चियाँ से बचा जा सकता है। एक उदहारण देखिए जिसे जनरलाइज़ करके समझा जा सकता है। कुछ साल पहले बीएसएनएल ने नई बिलिंग पद्धति लागू की है। जहाँ बिल पहले एक पृष्ठ का होता था वहीँ अब तीन पृष्ठ का हो गया है। बिल की रसीद का आकार भी तीन गुना कर दिया है। यानी कागज़ पर तीन गुना खर्च! क्या पहले के बिलों में इतनी परेशानी थी कि उसके निवारण के लिए कागज़ों का खर्च तीन गुना बढ़ा दिया  जाए?  इसके फ़ॉर्मेट में थोड़ा सा बदलाव कर अंतर्देशीय पत्र कार्ड पर मुद्रित कर इसे एक पन्ने तक सीमित किया जा सकता था। इससे डाक व्यय और कागज़ दोनों की बचत होती। इसी तरह किसी भी चुनाव में कागज़ी मतपत्रों का उपयोग यदि पूरी तरह से बंद कर सिर्फ इवीएम यानी इलेक्ट्रानिक मशीन का ही उपयोग किया जाए तो कई टन कागज़ बचाया जा सकता है। कागज़ी मुद्रा पर ऑस्ट्रेलिया की तरह प्लास्टिक क़ोटिंग या वार्निश लेपन कर मुद्रा का जीवनकाल बढाकर बहुत सारा कागज़ बचाया जा सकता है। इसी तरह खेरची व बड़े सभी लेनदेनों में डेबिट कार्ड के प्रयोग को आवश्यक व लोकप्रिय बनाकर कागज़ी मुद्रा के प्रयोग को मिनिमाइज़ किया जा सकता है । अब समय आ गया है कि ई-मेल सुविधा का अधिक से अधिक उपयोग किया जाए। 'सॉफ्ट-कॉपी'  से किया गया हर लेन देन या पत्राचार कागज़ बचाएगा।

    कागज़  के उपयोग के बाद जलने या फेंकने से बेहतर है कि उसे एकत्र कर कागज़ उद्योगों को पुनर्चक्रीकरण यानी रिसायकलिंग के लिए उपलब्ध करवाया जाए। प्रारंभ में यह प्रक्रिया थोड़ी महँगी लग सकती है मगर जिस तरह दुनिया में कुछ चीजें लाभ हानि के गणित से ऊपर होती है, उसी तरह पर्यावरण पर किया गया खर्च भी धरती माँ की सेवा में किया गया दीर्घकालीन निवेश है। मत भूलिए कि जब भी हम एक टन पुनर्चक्रीकृत कागज़ उपयोग में लाते हैं तब हम 17 पेड़, 2103 ली. तेल, 4077 कि.वा. ऊर्जा,  31587 ली. पानी, और 266 कि. ग्रा. हवा को  प्रदूषित होने से तथा भूमि का 2.33 घनमीटर हिस्सा 'लैण्ड फिल'  बनने से यानी बंजर बनने से बचाते हैं। धरती को अगर माँ माना है तो माँ की तरह उसकी रक्षा भी करनी होगी।                                            ***
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