Friday, 9 November 2012

               दबंग दुनिया, 09/11/12 
               दो  ग़ज़लें       ओम वर्मा 

                               एक                           
   जिस  तरह  थामे कोई  गिरती हुई दीवार को |
   तसल्लियाँ वे दे  रहे गिरती  हुई  सरकार को |

   माना कि पैसे नहीं लगते किसी  भी पेड़  पर,
   फिर काटते क्यों नहीं खेतों की खरपतवार को |

   यह तो हुई कुछ इस तरह की बात मेरे दोस्तों,
   नाव  में  ही छेद  हैं  और   दोष दें पतवार को |

   बाहरी  रंग-रूप घर का फिर सजाने  के लिए ,
   आज निकले हैं  'भियाजी' बेचने घरबार को  |

    हर शहर हर गाँव से आवाज आती है यही,
    क्या हुआ है आज 'बूढ़े शेर' की ललकार को  
                       ***
                    दो  
     होते  हैं  घोटाले     कितने  |
     छापें या कि उछालें कितने |

     हमने  अपनी  आस्तीन में,
     किंग कोबरे  पाले  कितने |

     बेटों में खलबली, बाप अब 
     खाने लगा निवाले कितने |

     देते  हो हमको जो सिक्के,
     खर्चें  और  बचालें कितने |

     बात  बात में  लग  जाते हैं,
     हर पल मिर्च मसाले कितने|

     इश्को-मुश्क और घोटाले , 
     छुपे नहीं, हों ताले कितने |    
                         ओम वर्मा  <om.varma17@gmail.com>
                              100, रामनगर एक्सटेंशन , देवास 455001(म.प्र.)
          

Monday, 5 November 2012



व्यंग्य (पत्रिका, 05/11/12)
        
         मंत्रीमण्डल में फेरबदल
                                     
                                          ओम वर्मा                  
सारे घर में कोहराम मचा हुआ था। रोज़ रोज़ आलू-गोभी और भटे की सब्ज़ी। बहू बेचारी करे तो क्या करे! कभी ससुर नाराज़ तो कभी सास, कभी ननद नाराज़ तो कभी भौजाई...। पति ने तो आज थाली उठाकर ही फेंक दी। यानी पत्नी पर इतना ज्यादा दबाव पड़ चुका था कि उसे सब्ज़ी बदलने के बारे में गंभीरता से विचार करना पड़ गया। घबराई पत्नी ने अपनी माँ से राय ली। माँ की सलाह पर बहू ने ससुराल में सब्ज़ी के मेनू में प्रस्तावित भारी फेरबदल कर ही दिया। क्या था आखिर वो भारी फेरबदल? आलू-गोभी और भटे के बजाय आलू-भटे और गोभी, और एक बार गोभी-भटे-आलू, किसी दिन भटे-आलू-गोभी, किसी दिन सूखे आलू-भटे-गोभी, किसी दिन गीले आलू-भटे-गोभी
                       कुछ ऐसा ही फेरबदल दिल्ली में हुआ है। रामलाल को श्यामलाल की जगह, श्यामलाल को पन्नालाल की जगह, और पन्नालाल को रामलाल की जगह...एण्ड सो ऑन...! क्या ममता दी की धौंस का जादू है ये फेरबदल...या सलमान खुर्शीद की ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस का प्रतिफल..। या शायद प्रधानमंत्री जी प्रकाश जायसवाल की पुरानी पत्नी के मज़ा नहीं दे पाने की शिक्षाप्रद सीख से प्रभावित हो गए हों और इस कारण उन्हें अब पुराने मंत्रीमण्डल में मज़ा नहीं आ रहा हो। वैसे भी कोयला महँगाई ;एफडीआई या ऐसे ही बार-बार उछाले जा रहे मुद्दों से जनता अब बोर हो चुकी है। नए लोग होंगे तो कुछ नई बातें सामने आ सकती हैं। सलमान जी जब देश की कानून व्यस्था के मंत्री थे तब उन्होंने खिलाफ बोलने पर आईएसी वालों को अपने इलाके में आए तो वापस न जाने देने की अपनी शैली में धमकी दी थी। अब वे विदेशमंत्री हैं। मान लो विदेश में किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कोई नया केजरीवाल सामने आ जाए और कुछ वैसे ही खतरनाक सवाल पूछ बैठे, तब क्या उन्हें भारत से वापस न जा पाने की धमकी दी जाएगी?
                    किसी भी सरकार के फेरबदल पर विपक्ष वाले ये अवश्य कहते हैं कि नई बोतल में पुरानी शराब भर दी गई है। मगर आप यह न भूलें कि बाकी सारी पुरानी चीजों को कुछ लोग भले ही बेमज़ा समझ लें, मगर रिंदों के अनुसार शराब जितनी पुरानी होगी उतनी ही अच्छी या महँगी मानी जाती है।     
                   नए मंत्रीमण्डल के सभी महानुभावों से निवेदन है कि इतने भी ईमानदार मत बन जाना कि विपक्ष वाले, अखबारों में व्यंग्य लिखने और आईएसी  वाले हाथ पर हाथ धरे बैठे ही रह जाएँ।
                                                                                                                    ***
                           100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001 

Thursday, 25 October 2012


   व्यंग्य (नईदुनिया, 25/10/12)       
                                   फर्रुखाबाद का अघोषित वन-वे 
                                                             ओम वर्मा  
                                                                       

 नका  दावा है कि हमारे यहाँ आकर तो देखिए, जा नहीं पाओगे । कुछ लोग इस सीधी सादी बात पर 'हत्या की धमकी' की धारा में वाद लगाने की बात कर रहे हैं तो कुछ इसे महज गीदड़ भपकी मान रहे हैं । कुछ इसे ऐसे वरिष्ठ सत्ताधारी की बौखलाहट मान रहे हैं जो खुद तो किसी से कुछ भी पूछ सकता है या बोल सकता है, मगर आपकी किसी भी बात का जवाब देना जिसके उसूओं के ख़िलाफ़ है । पता नहीं लोग क्यों हर बात में कुछ 'बोफोर्स' ढूढ़ने की कोशिश करने लगते हैं और क्यों उनको दाल में पड़ा हर पदार्थ 'काला' ही नज़र  आता है । हर वक़्त काँटे ही काँटे क्यों देखे जाएं  ... एक बार फूल का जिक्र भी तो हो । मरुभूमि पर भी मेघ खोजा जा सकता है ।
               कुछ जगहों व कुछ लोगों में इतना आकर्षण होता है कि वहाँ गए व्यक्ति की वापस लौटने की कभी इच्छा ही नहीं होती । जैसे अँगरेज एक बार जब भारत आए तो उन्हें यहाँ की आबो-हवा और यहाँ की जनता कुछ ऐसी रास आई कि उन्हें वापस लौटने की याद ही नहीं आई । हो सकता है कि कुछ ऐसी ही खासियत फर्रुखाबाद की मिट्टी में भी हो ।वहाँ के तो आलू भी बड़े प्रसिद्ध हैं । और आलू स्वयं सामाजिक समरसता का ज्वलंत उदाहरण है । किसी में भी मिलने को तैयार । या फिर यह भी हो सकता है कि फर्रुखाबाद की शानो-शौकत देखकर कोई 'सड़क छाप' व्यक्ति वहीँ रचने बसने के लिए मजबूर हो जाए । 
               वे आलाकमान के लिए जान देने को तैयार बैठे हैं । धर्मों के अनुसार  जान लेना या देना दोनों ही कर्म हिंसा के पैमाने पर एक समान हैं । मैं आत्महत्या करूं तो ब्रह्महत्या और यदि हत्या करूं तो भी ब्रह्महत्या । शायद उनका भी कुछ ऐसा ही नेक विचार हो । हो सकता है कि उनके व्यक्तित्व और उनकी वाणी में कुछ ऐसा सम्मोहन हो कि वहाँ जाकर हम भी वहीँ किसी'विकलांग' व्यक्ति का भला करने लग जाएं !
             कहीं जाकर वापस न आना तो एक प्राचीन परंपरा है । कृष्ण जब द्वारका गए तो वहीँ के होकर रह गए । इन हज़रत का भी शायद कुछ ऐसा ही आशय हो कि उनका फर्रुखाबाद ऐसी पाक़ जगह है जहाँ जाने वाले को अपने मूल स्थान, दोस्त-अहबाब व माया मोह के बंधनों से मुक्ति मिल जाएगी या दिला दी जाएगी और ऐसे में उसकी वापसी की क्या जरूरत ! फर्रुखाबाद आखिर को शहर ही है, कोई राजनीतिक दल तो नहीं जहाँ आयाराम जी जब चाहें आएं और गयाराम जी जब और जहाँ चाहें चले जाएं ! फर्रुखाबाद के सारे रास्ते अघोषित रूप से 'वन-वे' हैं जहाँ सिर्फ अपनी मर्ज़ी से पहुँचा तो जा सकता है मगर वापसी का कोड  सिर्फ 'उनके ' पास है । 
                                                               ***********************************************************************
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Monday, 22 October 2012

  व्यंग्य/ पत्रिका (22/10/12) 
                                               
                                        सलमान जी के पक्ष में 
  
                                                                                      ओम वर्मा                            ये हमारे केजरीवाल जी को आखिर हुआ क्या है ? पंगा और वो भी क़ानून मंत्री से ! क़ानून जिनकी रग रग में है, जिन्होंने क़ानून की ऊँगली  पकड़कर चलना सीखा, और जो बॉस के लिए जान देने का जज्बा रखते हों...उनकी टोपी उछालकर आपने अच्छा नहीं किया अरविंद भाई ! पूरा का पूरा आइएसी एक मासूम व निरपराध के हाथ धोकर पीछे पड़ गया है ! सलमान जी, उनकी बेगम साहिबा या उनके ट्रस्ट ने जो  काम करके दिखाया है वह वाकई 'उत्तर आधुनिक' सोच वाला काम है । हमारे समाज में मृतक की स्मृति में कोई प्याऊ खुलवाता है तो कहीं अन्नदान करने का रिवाज़ है । उन्होंने किसी को मरणोपरांत 'हियरिंग एड' दिलवाया है तो क्या गुनाह किया ? इसे उनके द्वारा मृतक के पिंडदान या श्राद्धपक्ष में दिए जाने वाले 'ब्राह्मंण भोज' की तरह ही लिया जाना चाहिए !   
                             अब वक़्त आ गया है कि इन घोटाले और जाँच  के मुद्दों को महँगाई के मूल्य सूचकांक की तरह घोटालों के मूल्य सूचकांक से जोड़ें । यानी घोटालों का मूल्यांकन पर्सेंटाइल पद्धति से किया जाना चाहिए । जैसे भारतीय इतिहास के कोयला खदान घोटाले को जो कि पत्रकार संतोष भारतीय के अनुसार छब्बीस लाख करोड़ का बैठता है, उसे एक स्टैण्डर्ड या 100 प्रतिशत मूल्य  का माना जाए । बाकी सारे घोटालों का प्रतिशत इसे आधार मान कर जोड़ा जाए । यानी परसेंटेज़ के बजाय हम पर्सेंटाइल की भाषा में बात करें । जाहिर है कि 71 लाख का घपला पर्सेंटाइल की इस स्केल पर अपनी औकात ढूढता नज़र आएगा । इतने कम पर्सेंटाइल पर सलमान खुर्शीद या मोहतरमा लुईस को भारतीय राजनीति के प्रतिष्ठित 'घोटाला महाविद्यालय' में प्रवेश हरगिज़ नहीं दिया जा सकता ।
                            हैदराबाद के निजाम जहाँ खड़े हो जाते हैं, अमीरी की ऊपर से नीचे की तरफ जाने वाली लाइन वहीँ से शुरू होती है । कुछ ऐसे ही फ़ॉर्मेट  में यदि घोटालों का सूचीकरण किया जाए तो सलमान दंपति या उनका ट्रस्ट इत्यादि- इत्यादि तक ही सिमटकर रह जाएगा । हमारे बेनी बाबू ने कितने सहज ढंग से यह बात कही है कि सलमान जी लाखों का घोटाला कर ही नहीं सकते ...कभी करोड़ों में करते तो कुछ सोचा भी जा सकता था । रबर की तरह ढीली ढाली या घुमाने फिराने वाली बात न कहकर इस्पात मंत्री जी ने इस्पात की तरह ठोस इशारा किया है कि खबरों के जिन हिस्सों पर पचास लाख से  तीन साल में तीन सौ करोड़ बनाने वाले दामाद जी का हक़ बनता है, वहाँ आप 71 लाख वालों पर क्यों फुटेज़ बर्बाद कर रहे हैं ?    

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Sunday, 19 August 2012


                              रोहित उवाच
               
                                                      
                   मुझको अपने  बाप से,  नहीं  चाहिए दाम |
             बस मुझको तो चाहिए, महज़ बाप का नाम ||1||

              शोहरत  पाई  आपने , मिला  आपको राज | 
              मुझको  मेरी  वल्दियत, मिल पाई है आज ||2||

               बेटा  नाज़ायज  नहीं ,  नाज़ायज  है  बाप |
               जिसके कारण 'उज्ज्वला',झेल रही अभिशाप||3||

               माँ  भी कुंती की तरह, कर सकती थी त्याग |
               लेकिन  मेरे  माथ  पर ,  नहीं  लगाया दाग ||4||

                तीस  बरस में आपको, कभी न आया ख्याल |
                बोया था जिस बीज को, अब वो है किस हाल ||5||

                 फिर से कोई उज्ज्वला ,  और  न हो बरबाद  |
                 रोहित जैसे सब नहीं ,  कर  सकते  फ़रियाद ||6||

                 किसी  सियासतदान  का ,  कैसे  करें यकीन |
                 कब  तक कोई उज्ज्वला , बची रहेगी क्लीन ||7||

                         खोज़  रहे  हैं  वे   उसे ,  जिसने  की  ईज़ाद |
                 पद्धतियाँ  वो जाँच  की, जिनसे बढ़ा विवाद ||8||
                                              *** 100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001    

Friday, 3 August 2012


विचार


राहुल गांधी में चमत्कार खोजने की कोशिश
                                   
कांग्रेसियों की वर्षों पुरानी आदत या कहें कि राजनीतिक मजबूरी है कि वे नेहरू- गांधी परिवार का भाट-चारणों की तरह गुणगान करें | इसी भावना के तहत कोई जबरन  'युवा ह्रदय सम्राट' बनाए जा रहे राहुल गांधी को जीवन में एक बार प्रधानमंत्री की कुर्सी पर देखना चाहता है तो कोई 'वे चाहें तो रात को बारह बजे भी प्रधानमंत्री बन सकते हैं ' जैसी अवधारणा  'सूर्य सदा पूर्व में ही उदित होता है ' जैसे युनिवर्सल फेक्ट की तरह जनमानस में स्थापित करना चाहता है |
       मगर ये ही बड़बोले जब कभी बहुत कड़वी और बहुत खरी बात भी कह जाते हैं तो उसकी चुभन सत्ता और दल के शिखर पुरुषों के मर्म को छेद कर रख देती है | नतीजा यह होता है कि या तो किसी के मुँह पर ताला लगा दिया जाता है या फिर कांग्रेस की वर्तमान स्थिति और राहुल गांधी के वर्तमान सोच व कार्यशैली पर कड़वा सच उगल देने वाले को अपनी बात 'संदर्भ से काटकर देखे जाने की ' सफाई देना पड़ती है | नेहरू अपने जीवनकाल में करिश्मा बने रहे, इंदिरा जी 'गरीबी  हटाने '   'हाथ मज़बूत ' करवाने के करिश्मों से ग्रीक पुराण के पक्षी फिनिक्स की तरह भस्म हो होकर पुनर्जन्म लेती रहीं...और राजीव गांधी प्रारम्भिक दौर में सहानुभूति व मासूमियत की वज़ह से 'मि. क्लीन' जरूर बन गए थे और उनके कार्यकाल का उत्तरार्द्ध भले ही उस सेंचुरी बेट्समेन की तरह था जिसने पहले पचास रन तो मात्र बीस गेंदों में ही बना लिए थे मगर अगले पचास रन बनाने में पचहत्तर गेंदें खेल ली हों...| मगर यह भी तय है कि राजीव गांधी का जब भी नाम लिया जाएगा, उनकी 'शहादत' का उल्लेख पहले होगा
            मगर राहुल गांधी में ऐसे किसी चमत्कार को खोजने की व्यर्थ कोशिश की जा रही हैं | इसी छवि को बनाने या चमकाने के चक्कर में उन्होंने कभी मंच पर कागज़ फाड़ने जैसी नाटकीय व बचकानी हरकत की तो कभी दलित के यहाँ पड़ाव डालकर गांधी से 'महात्मा गांधी ' बनने की अप्रासंगिक व नाकाम कोशिशें की | यह वैसा ही है जैसे आज कोई किसी दलित स्त्री के हाथों बेर खाकर सोचे कि वह 'राम' बन गया है | न तो आज कोई दलित शबरी की परंपरा का है और न ही आज के 'राजा' राम हैं | बीच में कुछ वानर जरूर उछल-कूद कर हरी भरी 'अशोक वाटिका ' को ध्वस्त करने पर तुले हुए हैं |
           कुल मिलाकर बात यह है कि इससे पहले कि देश में 'राहुल लाओ-देश बचाओ' जैसा कोई आंदोलन शुरू हो, कांग्रेस के हितचिंतकों और देश की जनता को सजग होना होगा और डायनेस्टीसिज्म व  नेपोटिज्म की उगाई जा रही फसल को कहीं भी खाद पानी लगने से रोकना होगा !   

                                                           *** 
                       - ओम वर्मा
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Sunday, 29 July 2012


व्यंग्य                                       पत्रिका, 26/07/2012
                     ज़ीरो से हीरो 
                                             -ओम वर्मा  om.varma17@gmail.com 
 में  बचपन से स्कूलों में यह पढ़ाया गया है कि भारत ही वह देश है जहाँ शून्य की खोज़ हुई थी | बड़े-बड़े दार्शनिक यह कहते हुए कभी नहीं अघाते  कि शून्य से ही सृष्टि का जन्म हुआ है aऔर हर नश्वर वस्तु या जीव को  अंत में शून्य में ही समाना है | तो फिर आंध्रप्रदेश में इंजीनीयरिंग प्रवेश  परीक्षा में शून्य अंक के आधार पर हुए बाईस छात्रों के प्रवेश पर इतना  हंगामा क्यों ? दूसरों के बारे में तो अभी से कुछ नहीं कहा जा सकता पर  मुझे इतना विश्वास है कि ये बाईस छात्र जरूर कुछ न कुछ अनहोनी करके  दिखाएंगे ! ये वो 'कूड़ा' है जिससे 'सोना' बनना तय है |
           ज़ीरो के आलोचक यह क्यों भूल जाते हैं कि आज दुनिया कम्प्युटर  के बिना नहीं चल सकती और कम्प्युटर की अवधारणा ही शून्य एवं एक पर आधारित  'बाइनरी डिजिट' की भाषा पर टिकी है | और क्या आप ज़ीरो का  महत्व नहीं समझते जो एक बार सही जगह पर लग जाए तो किसी भी संख्या की औकात बदल सकता है |
          लेट'स होप फॉर दि बेस्ट ! मीडिया और अखबार वालों को तो हर चीज़  में कुछ न कुछ 'बोफोर्स' ही नज़र आने लगता है | मुझे विश्वास है कि ज़ीरो  लाकर प्रवेश पाने वाले ये बाईस लोग उन बीस-बाईस 'हीरो'ज़' से तो बेहतर ही  साबित होंगे जिन्होंने पिछले बीस-बाईस वर्षों में देश की इज्ज़त खाक़ में मिला  दी है | मुझे यह भी विश्वास है कि ये भावी इंजीनियर कम से कम ऐसी सड़कें तो  नहीं बनवाएंगे कि राज्य के किसी मंत्री को नाराज़ होकर इन्हें उसी सड़क के गड्ढों में दफ़्न करने की बात कहना पड़ जाए ! और यह भी विश्वास है कि ये बाईस छात्र अपने कार्य को जैसा भी हो, स्वयं ही करेंगे न कि यू.पी. के उस  चिकित्सक की तरह जिसने मरीज़  को टाँके लगाने का कार्य सफाई कर्मी के  जिम्मे  छोड़ दिया था |
       हमारा देश और हमारे ग्रंथ चमत्कारों और कारनामों से भरे पड़े हैं | जब जिस डाली पर बैठा है उसी को काटने जैसी ज़ीरो नंबर लाने की समझ रखने  वाला शख्स हमारे यहाँ संस्कृत का 'हीरो नाटककार' बन सकता है तो आंध्र की प्रवेश  परीक्षा में ज़ीरो अंक लाकर प्रवेश पाने वाले बाईस छात्र राष्ट्र के कर्णधार  क्यों नहीं बन सकते ?
     इसलिए व्यंग्यकारों और कार्टूनिस्टों से अनुरोध है कि आंध्रप्रदेश की शिक्षा  व्यस्था पर ऊंगली उठाना बंद करें !

                                                                                           ***