Wednesday, 29 January 2014


व्यंग्य (नईदुनिया, 29.01.14.)
     दो टूक और निशाना साधना
                                                         ओम वर्मा
                                      om.varma17@gmail.com
हामात्य ने उन्हें एक बार फिर दो टूक जवाब दे दिया है और इधर इन्होंने उन पर और उन्होंने इन पर आज फिर निशाना साध लिया है।
     दरअसल वे जबसे राजनीति में आए हैं, सिर्फ दो टूक बात ही करते आए हैं। उनका सारा स्टाफ और सारे टीवी चैनल इस बात के साक्षी हैं कि उनके ये टूक कभी दो से तीन या दो से एक नहीं हुए। वे या तो कभी बोले नहीं या जब भी बोले हैं तो दो टूक ही बोले हैं। अखबारों के मुखपृष्ठ, संपादकीय पृष्ठ या फिर टीवी के टाक शो हों, हर कहीं दो टूक बात कहने का आह्वान, चुनौती या कहने के बाद शाबाशी से भरे पड़े हैं। उनकी इस बार बार दोहराई जा रही इबारत पर उनके समर्थक कुछ इस अंदाज़ मेँ चर्चा व वाहवाही करने लगते हैं मानों परशुरामजी द्वारा चलाए गए क्षत्रिय हटाओ अभियान की तरह वे भी भारत भूमि को इक्कीस बार आतंकवादी व घुसपैठिए विहीन कर डालेंगे। अब तो पड़ोसी भी  उनकी इस दो टूक वाली शैली के क़ायल हो गए हैं। एक पड़ोसी जब चाहे सैनिकों के सिर काट ले जाता है और दूसरा जब चाहे, सीमा पर तंबू गाढ़ लेता है। तब वे कुछ इस तरह दो टूक बात करते हैं कि पड़ोसी मुल्क के हुक्मरानों व घुसपैठियों के मुख से बरबस निकल पड़ता है कि, इस सादगी पे कौन न मर जाए ए ख़ुदा, लड़ते भी हैं और हाथ मेँ तलवार भी नहीं !बच्चों बच्चों की जुबान पर यह मुहावरा कुछ ऐसा चढ़ गया है कि वे आपस मेँ तो ठीक, माँ-बाप से भी अब दो टूक बात करने लग गए हैं। कल ही बेटे ने महँगाई को देखते हुए जेबखर्च बढ़ाने के लिए व काम वाली बाई ने पैसे बढ़ाने के लिए दो टूक बात की।
     सियासतदान लाख ऊलजलूल बातें करें मगर मतदाता पाँच साल मेँ एक बार ही दो टूक बात कर पाता है। ईवीएम मेँ नोटा प्रावधान दरअसल मतदाता के हाथ मेँ दिया गया एक दो टूक बटन ही तो है। 
     इधर एक दूसरा मुहावरा जो टीवी दर्शक व अखबार के पाठकों के भाषा ज्ञान से लेकर जुबान तक का फ़ालूदा करने पर तुला है वह है निशाना साधना। आजकल तो भाई लोग जिसके समर्थन से सरकार बना लेते हैं, उस पर निशाना साधने में भी नहीं चूकते। बदले में भले ही उन्हें दो टूक लहज़े में येड़ा घोषित कर दिया जाए वे इसे अलंकरण की तरह स्वीकार कर फूले नहीं समा रहे हैं। देश में हुए दो ऐतिहासिक दंगों को लेकर इन दिनों जबर्दस्त निशानेबाज़ी चल रही है। मगर यह भी सब जानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय खेल स्पर्धाओं की तरह इस निशानेबाजी के मंथन से भी कभी कोई मेडल रूपी अमृत नहीं निकलने वाला। अगर कुछ निकलेगा तो बस अविश्वास व नफ़रत रूपी विष...!
    हमने बचपन से पढ़ा-सुना है कि अर्जुन ने पक्षी की आँख पर निशाना साधा था और गुरु द्रोण से शाबाशी पाई थी। द्वापर में ही गुरु की मूर्ति के सामने एकलव्य ने निशाना साधना सीखकर ओलिम्पिक (अगर हुए होते तो) का गोल्ड मेडल पक्का कर लिया था। हालांकि यह सीखना उसे बहुत भारी पड़ा था और इसकी कीमत उस निर्धन दलित को अंगूठे की बलि देकर चुकाना पड़ी थी।
     इधर त्रेतायुग मेँ समुद्र ने तीन दिन तक जब मार्ग नहीं दिया तो प्रभु ने सबक सिखाने के लिए निशाना साधा और साधते ही जलधि जड़ ने सारी अकड़ पिटे अध्यादेश की तरह वापस ले ली। उधर युद्ध मेँ यही प्रभु लंकेश पर निशाने पर निशाना तो साधते रहे मगर लक्ष्यभेद तभी कर सके जब विभीषण के सुझाने पर नाभिकुण्ड पर निशाना साधा गया। निशाने तो अभी चार राज्यों के चुनावों में भी बहुत साधे गए थे। गुजराती तीरंदाज़ ने शायद लक्ष्य की सही पहचान कर ली थी इसलिए तीर कम भटके वहीं दिल्ली वाले का भटका तीर दीवार पर जहाँ भी निशान बना देता, दरबारी लोग तुरंत उसके आसपास गोला बना कर निशाने की सफलता पर तालियाँ पीटने लगते थे। आज न तो निशाना साधने वाले राम हैं और न ही उनकी हेल्प के लिए कहीं विभीषण है। जाहिर है कि अधिकांश निशाने हवा मेँ साधे जा रहे हैं।                                               ***

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Tuesday, 28 January 2014

ठंड के दोहे, नईदुनिया (16.01.2011)




व्यंग्य
                 मौसम का बिगड़ा मिजाज़
                                                   
                      ओम वर्मा    
थाशिल्पी प्रेमचंद की कहानी पूस की रात…!
ठण्ड से ठिठुरता हलकू और मुन्नी...! मुन्नी हलकू को बार बार कोसती रहती है कि वह इफ़रात  में खर्च न करे ताकि कुछ बचत हो सके और कम्मल (कंबल) खरीदा जा सके जिससे पोस-माघ ढंग से कट सकें!
     आज भले ही हलकू हलकप्रसाद और मुन्नी मुन्नी मैडम में बदल गई हो मगर कुछ नहीं बदला तो वह है माघ पूस की रातें। कंबल हर घर में है मगर फिर भी सर्दियाँ हैं कि जान लेवा साबित हो रही हैं। आज मुन्नियाँ हलकुओं को कोस रही हैं- “इस मुई ठण्ड का क्या करूँ...कहा था कि रजाई  भारी बनवाना... बनवा लाए चादरे जैसी...! रूम हीटर ही ले आते तो कमरा ही थोड़ा गर्म हो जाता...! अब इन मुन्नियों को कौन समझाए कि यदि रूम हीटर चलाए गए तो बाद में बिजली का बिल देख कर दिमाग पर जो गर्मी चढ़ेगी उसे उतारने के लिए या तो केजरीवाल को धरने पर या संजय निरूपम को भूख हड़ताल पर बैठाना पड़ेगा।
    मौसम विज्ञानी दाड़ी बढ़ाकर अंधत्व निवारण शिविर से ऑपरेशन करवा कर लौटे रोगी या दक्षिण के अभिनेता से नेता बने राजनेता की तरह काला चश्मा लगा कर सूट टाई पर भी शॉल लपेटे छिपते फिर रहे हैं। एक श्रीमान अलाव तापते गरम हाथों, यानी रँगे हाथों पकड़ा ही गए। कल तक जो ग्लोबल वार्मिंग के नाम से डरा डरा कर मुंबई जैसे तटवर्ती शहरों के डूब जाने का खतरा बता रहे थे वे आज ग्लोबल कूलिंग की बात करते फिर रहे हैं।
     अपने राम को न तो वैज्ञानिकों की बात समझ में आती है और न ही ज्योतिषियों की। ज्वलंत विषयों पर दोनों वर्गों के लोग जो भविष्यवाणी करते हैं,वह प्रायः फेल हो जाती है। बाद में ये अपनी गणनाओं की त्रुटि का कारण बताने लगते हैं या फिर “हमारा मतलब यह नहीं था...” जैसी बेमतलब की लीपापोती करने लग जाते है।
     लाख टके की बात यह है कि आखिर इस जमा देने वाले जाड़े से निज़ात मिले तो कैसे? कुछ फायर ब्राण्ड बयानवीर अपने बयानों से सियासी आग भले ही लगा दें, मगर भौतिक रूप से गर्मी उत्पन्न नहीं कर सकते! इसी तरह कल तक जो मुझे राह रोक रोक कर पूछा करते थे कि अगले चुनाव में ऊँट किस करवट बैठेगा, वे आज पूछते हैं कि नए टोपे बाज़ार में आए या नहीं, या ये स्वेटर कहाँ से लिया, या यह कि आखिर ये ठण्ड कब खत्म होगी यार...! हिन्दी की प्रसिद्ध कहानी उसने कहा था का वह दृश्य रह रह कर कौंध जाता है जिसमें लहनासिंह के साथी ठण्ड से परेशान हैं और चाहते हैं कि जंग हो ताकि कुछ गर्मी आए।
     इन दिनों जिसे देखो वही कुछ ठिगना नज़र आ रहा है। क्या लोगों की औसत ऊँचाई एक दो इंच कम हो गई है। ध्यान से देखने पर समझ में आता है कि हर शख्स सिकुड़कर गुड़ी-मुड़ी होकर चल रहा है। मिलते ही तपाक से हाथ मिलाने वाला शख्स देखते ही मुँह फेर रहा है कि कहीं गलती से जेब की गर्मी छोडकर हाथ बाहर न निकालना पड़ जाएँ। गलती से अगर उन्हें हाथ मिलाना भी पड़े तो सामने वाले से एक बत्ती कनेक्शन वाले की तरह ज्यादा से ज्यादा एनर्जी खींचने की कोशिश करने लगते हैं। इधर चौराहे पर जो आग जल रही है वह कोई विरोध प्रदर्शन या पुतला दहन नहीं है। यह तो ठण्ड भगाने का इंतजाम है। जिन्हें मैं प्रदर्शनकारी समझ बैठा था वे और दो पुलिस के जवान अलाव ताप रहे हैं।
     मोदी के पक्ष में चाहे लहर हो या न हो, शीत के पक्ष में लहर है यह सभी एकमत से स्वीकार रहे हैं। भोपाल के यूनियन कार्बाइड में जैसे किसी की गलती से मिक गैस के टेंक का वॉल्व खुल गया था, वैसे ही शायद ऊपर वाले के दरबार में कोई मौसम का स्विच चेंजओवर करना भूलकर आराम से बीड़ी पीने चला गया है। नीचे वाले मरें तो मरें, उसकी बला से!
     सुबह हो गई है...दरवाजे पर पेपर फेंकने की आवाज आ चुकी है। कोई भी पेपर उठा कर लाने को तैयार नहीं है। रज़ाई कौन छोड़े! आज संडे है। किसकी हिम्मत जो मुझे जल्दी उठा सके। घर के अस्सी वर्षीय वरिष्ठ नागरिक अखबार के बिना छटपटाने लगते हैं, और शॉल, टोपे, मोजे के जिरहबख्तर में क़ैद होकर जाकर उठा लाते हैं। श्रीमतीजी कुढ़मुढ़ा रही हैं कि बाई आज भी आती दिखाई नहीं देती।
     सुबह सुबह स्कूलों में बच्चे मुँह से वाष्प छोडकर ध्रूमपान की नकल करने लगते हैं। क...क...किरण बोलने वाले इस शख्स को आप शाहरुख खान समझने की भूल न करें। दरअसल ठण्ड के मारे इसके दाँत किटकिटा रहे हैं। पारा जितना नीचे होने लगता है, भियाजी की लाल रंग की दवा का डोज़ भी उसी अनुपात में बढ़ जाता है। ठण्ड से अपने अपने ढंग से सबकी जंग जारी है।                ***
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Sunday, 15 December 2013



व्यंग्य (नईदुनिया, 06.04.13)
         इनकी दाड़ियाँ आखिर कब कटेंगी ?
                             ओम वर्मा om.varma17@gmail.com
न तीनों में अलगू चौधरी और जुम्मन शेख से भी गाढ़ी मित्रता थी। तीनों को अक्सर राष्ट्रहित, जनहित, विश्व शांति व मानवता को प्रभावित कर सकने वाले हर ज्वलंत मुद्दे पर बहस- चिंतन करते देखा जा सकता था।
     तीनों की संत फक़ीरों की तरह बढ़ी हुई दाड़ियाँ देखकर मैं थोड़ा चौंका। पांचाली के केश खुले रखने, चाणक्य द्वारा चोंटी पर गाँठ बाँधने और इंदिरा गाँधी को चुनाव में हराने वाले राजनारायण जी द्वारा दाड़ी बढ़ाने के पीछे जाहिर है कि समय की धारा को मोड़ देने जैसे कोई संकल्प हुआ करते थे जिनके पूरे होने पर केश विन्यास हुएगाँठें खोली ग्ईं और समारोहपूर्वक दाड़ी बनवाई गई। तीनों ने  अपने संकल्पों के बारे में कुछ इस तरह बताया-
     रामलाल दिल्ली रेप काण्ड के बाद से पूरे देशवसियों की तरह व्यथित थे। स्त्री की अवमानना तो द्वापर और त्रेता युग में भी हुई थी। मगर आजकल अवमानना का स्थान हर दूसरे – तीसरे दिन होने वाले सामूहिक उत्पीड़न व बलात्कार (मीडिया की भाषा में गेंग रेप )ने ले लिया। लिहाजा रामलाल ने भी केश खुले रखने की तर्ज पर दाड़ी न बनाने की शपथ ली है। उनका  संकल्प है कि जब तक लगातार पूरे सात दिन बिना गेंग रेप की खबर वाले अखबार एकत्र न कर लें, दाड़ी नहीं बनाएँगे। उनके बैग में ऐसे सामूहिक अभियानों की ढेर सारी कतरनें भी थीं।   
     दूसरे मित्र मुहम्मद भाई से दाड़ी न कटवाने का राज पूछा तो वे कुछ इस अंदाज़ में बोले – “मैं अपने मुल्क में हो रहे नित घोटालों से हैरान-परेशान हूँ। विपक्ष वाले एक के पीछे हंगामा करें, धरने में लगे टेंट वाले की उधारी चुकाने वाले को ढूढ़ें उसकी पहले ही अगला घोटाला उजागर ! मैंने भी प्रण किया है कि अखबारों में जिस दिन भी घोटाले की खबरों में कम से कम एक सप्ताह का अंतर होगा तभी अपनी दाड़ी बनवाऊँगा। कतरनें इनके पास भी कुछ कम न थीं।
     तीसरे मित्र डिसूजा ने अपनी दाड़ी बढ़ाने का भी कुछ ऐसा ही ठोस कारण बताते हुआ कहा, “जिस दिन अखबार में देश व प्रदेश की राजधानियों में नेता द्वारा गाली गलौच की भाषा वाला या एक दूसरे को साँप बिच्छू व दीमक की उपाधि देने वाला, एक दूसरे के निजी जीवन या चरित्र पर लांछन लगाने वाला बयान या किसी के विवाह करने या न करने पर कोई अमर्यादित टिप्पणी नहीं मिलेगी, उस दिन ही दाड़ी बनवाऊँगा। इनके पास भी रामलाल व मुहम्मद की तरह कतरनों का ढेर था। जब तक दुष्कर्मी, घोटालेबाज़ और बयानवीर अपनाकर्म नहीं छोड़ते तब तक भाई राम, मुहम्मद और डिसूजा, अपना  संकल्प नहीं छोड़ने वाले!
     मुझे उम्मीद है कि मैं अपने जीवनकाल में एक बार इन तीनों को क्लीन शेव देख पाऊँगा।
आमीन !
                          ***

Saturday, 14 December 2013



विचार

        तीन भारत रत्ननरेंद्र मोदी और
                साहित्यकार  
                                                         
                        ओम वर्मा
                                           om.varma17@gmail.com  

नके साम्राज्य मेँ सूर्य कभी अस्त नहीं होता। सुगम संगीत की इस साम्राज्ञी के लिए कहे गए इस कथन से बेहतर कोई दूसरी उक्ति हो ही नहीं सकती। वे कई दशकों से फिल्म संगीत मेँ, हर हिंदुस्तानी के दिल मेँ और माँ सरस्वती के आँचल तले बसी हुई हैं। कृतज्ञ राष्ट्र ने इसके लिए उन्हें भारत-रत्न जैसे सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित कर एक तरह से इसी भावना या विचार का अनुमोदन ही तो किया है।
     लता मंगेशकर वह शख्सियत हैं जो धर्म, जातीयता और राजनीतिक विचारधारा से कहीं ऊपर हैं। राज्य सभा के कांग्रेसी सांसद सचिन तेंडुलकर को वे अपने पुत्रवत और भाजपा के पितृ-पुरुष आडवाणी जी को वे आदरवश दादा बोलती हैं। यानी उनके प्रशंसक इस दल से उस दल तक या कहें कि चतुर्दिक फैले हुए हैं। उनकी इस सर्वस्वीकृत छवि के आगे राजनीतिक छवि या किसी दल विशेष के व्यक्ति की छवि की तुलना की जाए तो वामन और विराट वाली स्थिति बनती है। तटस्थता के प्रति इसी प्रतिबद्धता मेँ अपनी आस्था व्यक्त करने के लिए कई बार देश के तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपतियों ने मतदान का अधिकार त्यागा भी  है।    
     इस परिप्रेक्ष्य में यह प्रश्न विचारणीय है कि क्या लता जी को अपनी यह इच्छा कि
नरेंद्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनना चाहिए सार्वजनिक मंच पर व्यक्त करनी चाहिए? इस देश की नागरिक होने के नाते उन्हें अपनी पसंद के उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करने का पूरा अधिकार है और सार्वजनिक मंच पर अपनी राय व्यक्त करने से भी इस देश का कानून उन्हें रोक नहीं सकता। लेकिन कानूनी अधिकार और नैतिकता को एक पलड़े पर नहीं तोला जा सकता। राहुल गांधी और उनके दल  या यहाँ कहें कि यूपीए परिवार में भी उनके प्रशंसक लाखों में ही होंगे। क्या वे इस सरस्वतीकन्या के आशीर्वाद के पात्र नहीं हैं? ईश्वर की स्तुति या आराधना कर कोई भक्त आशीर्वाद माँगता है तो वह प्रतिद्वंद्वी के लिए आराधना व कृपा के द्वार बंद नहीं कर रहा होता है। मगर भारतीय जनमानस में देवीय आसान ग्रहण कर चुकी स्वर साम्राज्ञी जब नरेंद्र मोदी को पीएम के रूप में देखने की इच्छा व्यक्त करती हैं तो उसका निहितार्थ नरेंद्र मोदी के किसी भी प्रतिद्वंद्वी के लिए पराजय की कामना भी तो है। यानी प्रतिद्वंद्वी के लिए उनके पास आशीर्वाद और शुभकामनाओं का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। लता जी ने मोदी को लेकर जो मनोकामना व्यक्त की इस बात को लेकर उनके पक्ष या विरोध मेँ तर्क दिए जा सकते हैं पर उनसे भारत रत्न वापस लिए जाने की माँग निर्विवाद रूप से निहायत ही घटियापन है। यही दुविधा एक अन्य भारत रत्न अमर्त्य सेन को लेकर सामने आती है। मोदी के नाम पर उन्होंने अपने विचार कुछ ऐसे व्यक्त किए मानो मोदी राजनीति के क्षेत्र मेँ ही नहीं बल्कि देश के लिए भी अस्पृश्य और अवांछित व्यक्ति हों। क्या उनके ये विचार उन्हें दिए गए भारत रत्न अलंकरण का रिटर्न गिफ्ट  नहीं माने जाने चाहिए? अब यदि कल मोदी पीएम बन जाएँ तो क्या वे विरोध स्वरूप भारत रत्न अलंकरण वापस लौटाएंगे?    
     यहाँ हाल ही मेँ भारत रत्न से नवाजे गए सचिन तेंडुलकर का उदाहरण सामने आता है। वे राज्य सभा में यूपीए सरकार के मनोनीत सांसद हैं। उनका क्रिकेट प्रेमियों के बीच वही स्थान है जो संगीत प्रेमियों के बीच लता जी का। शासक दल की ओर से उनसे कांग्रेस का चुनाव प्रचार करने का आग्रह किया गया तो उन्होंने विनम्रतापूर्वक इंकार करके अपना कद और भी बढ़ा लिया। सचिन पूरे देश का वह रत्न है जिसकी बिदाई की तुलना अमेरिकी अखबार द्वारा गांधीजी की बिदाई से की गई, ब्रिटिश संसद द्वारा जिसे बधाई दी गई और जिसके सारे रेकॉर्ड्स स्वयं उसकी महानता की कहानी कह रहे हैं।  ऐसे सचिन अगर किसी दल विशेष का प्रचार करते तो क्या वे अपने आभा मण्डल को सीमित नहीं कर रहे होते? क्या तब उनके लिए वानखेड़े मेँ लग रही सचिन सचिन की एक सुर मेँ लगाई जा रही पुकार बीच मेँ किसी भी पल मोदी मोदी मेँ नहीं बदल जाती!
     कुछ ऐसा ही चमत्कार दो साहित्यकारों ने कर दिखाया। कन्नड़ साहित्यकार अनंतमूर्ति ने मोदी को लेकर जो बयानबाजी की वह किसी भी साहित्यकार के लिए सर्वथा अशोभनीय है। जिसे जनता ने तीन बार चुना हो और जब गुजरात दंगों की सर्वोच्च अदालत के मार्गदर्शन मेँ हुई जाँचों मेँ भी इस बात के कोई सबूत नहीं पाए गए कि दंगों के लिए मोदी स्वयं किसी भी प्रकार से जिम्मेदार थे, उसके लिए अन्य राज्य के साहित्यकार द्वारा विरोध करना क्या गुजरात की जनता का अपमान नहीं है? गुजरात के दंगों मेँ मोदी द्वारा समय पर नियंत्रण न कर पाने और ’84 के सिख नरसँहार मेँ तत्कालीन दिल्ली सरकार द्वारा न कर पाने को अलग अलग चश्मे से देखने वाले शंका के घेरे मेँ आने से नहीं बच सकते। इससे बेहतर होता कि अनंतमूर्ति नरेंद्र मोदी के विचारों का तार्किक भाषणों या लेखों के माध्यम से जवाब देते।
     ऐसी ही एक अप्रिय व फूहड़ स्थिति मेरे शहर (देवास) मेँ अभी कुछ माह पूर्व एक पुस्तक विमोचन के कार्यक्रम मेँ बनी। कार्यक्रम मेँ पधारे एक कवि की कविता का विषय उनमें व नरेंद्र मोदी के नाम मेँ समानता को लेकर था। लोकतांत्रिक पद्धति से निर्वाचित किसी राजनीतिक शख्सियत को कविता के बहाने भी गालियाँ दी जा सकती हैं यह पहली बार देखा था। इस दौरान कुछ श्रोताओं को असहज होते व बाद मेँ अधिकांश को तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भी देखा गया। कवि को अपने नाम नरेंद्र (विदिशा के नरेंद्र जैन) होने पर तो अफसोस था पर उन्हें शायद यह पता नहीं है कि नरेंद्र नाम आचार्य नरेंद्र देव व स्वामी विवेकानंद का भी था।
     अब समय आ गया है कि राजनीति के धरातल से ऊपर स्थापित किए जा चुके सेलेब्रिटीज़ तय करें कि वे राष्ट्र की धरोहर हैं, न कि किसी राजनीतिक दल की। उनकी प्रतिबद्धता शोषित, आमजन व अंततः वतन के प्रति ही होनी चाहिए, किसी दल या राजनीतिक व्यक्तित्व के लिए नहीं। इसी तरह साहित्यकारों मेँ सियासती छद्म का थाह लेने की सूक्ष्म दृष्टि होनी चाहिए। उन्हें अपनी लेखनी को वैमनस्य फैलाने का माध्यम हरगिज़ नहीं बनने देना चाहिए।    
                       ***   

100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001 (म.प्र.)          

Friday, 13 December 2013


नईदुनिया के परिशिष्ट 'नायिका' में  04.12.13 के अंक में प्रकाशित टिप्पणी।


   
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ओम वर्मा  
नईदुनिया, इंदौर  ने अपने कुछ गिने चुने उत्कृष्ट व्यंग्य अपने वेब- पोर्टल  'वेबदुनिया' पर अपलोड कर रखे हैं। उनमें जनवरी'2011 में प्रकाशित मेरा यह प्रिय व्यंग्य भी है। 

  
    मुर्गी या अंडा; कटआउट और झण्डा   

                                                       - ओम वर्मा

भारत एक त्योहारों का देश है। यकीन न हो तो आप कोई भी कैलेंडर उठाकर देख लें। हर दिन किसी न किसी धर्म, जाति, संप्रदाय, खाप या कबीले का त्योहार या उसके किसी 'महापुरुष' की जन्म या निर्वाण तिथि मिलेगी। उस दिन भी इनमें से कोई बड़ा त्योहार ही था। 

  हर त्योहार की तरह उस दिन उमंग-उल्लास देखते ही बनता था। सुबह के बाद थोड़ा समय सुख-चैन से बीता ही था कि दोपहर तक उमंग और उल्लास उन्माद में बदलने लगा। आठ-दस डीजे साउंड एवं 'उभरते' नेताओं के आदमकद पोस्टरों से सजे-सँवरे वाहन शहर में घूमने लगे। 

ND
   देखते ही देखते शहर का कोना-कोना कानफोड़ू संगीत के शोर-शराबे में डूब गया। बीमार अपने-अपने इष्ट देवता का स्मरण करने लगे। कुछ लोगों की नजरों में, घर में बोझ समझे जाने वाले वरिष्ठ नागरिक अपनी बेकाबू धड़कनों को थामने की नाकामयाब कोशिशें करने लगे।

     आखिर हिम्मत करके एक कबीरनुमा सज्जन ने चौराहे पर जाकर एक अति उत्साही कार्यकर्ता को समझाने यानी भैंस के आगे बीन बजाने का प्रयास करते हुए कहा, 'भाई! थोड़ा कम आवाज में बजाओ। इतनी तेज आवाज से बच्चे, बूढ़े और बीमार सभी को तकलीफ होती है।'

     इस पर धर्मप्रेमी सज्जन ने जवाब दिया, 'क्यों, हमको तो मनाकर रिये हो, पर जब 'उनके' त्योहार पर वे जोर से बजाते हैं तब उनको क्यों नहीं रोकते! जाहिर है कि कबीर निरुत्तर हो गए थे।

    कुछ दिन बाद दूसरे संप्रदाय का त्योहार आया। फिर वही कानफोड़ू डीजे साउंड...शोर-शराबा, नारों से गूँजता और झंडियों से पटा शहर...!" बदला था तो सिर्फ लोगों के दुपट्टों, टोपियों और झंडियों का रंग। इस कबीर की फिर वही पीड़ा थी। इसने फिर वही हिमाकत की। और जाहिर है कि फिर वही उत्तर पाया, 'क्यों हमको तो मना कर रिये हो पर...।' 

ND
     कबीर का यह वंशज तब से अब तक दोनों समुदायों के बीच अपने प्रश्नों का उत्तर खोज रहा है। तय नहीं हो पा रहा है कि यह घातक ध्वनि प्रदूषण आखिर किस धर्म, मजहब या समुदाय के अनुयायी फैला रहे हैं? बच्चों, बुजुर्गों और बीमारों की शांति पर डाका आखिर कौन डाल रहे हैं? ये इसलिए चिल्ला रहे हैं कि कल वो चिल्ला रहे थे...! कल वो इसलिए चिल्लाएँगे कि आज इन्होंने नाक में दम कर रखा है।

    ऐसी कई श्रृंखलाएँ अनवरत जारी हैं। आज ये संसद इसलिए ठप कर रहे हैं कि कल उन्होंने की थी। या अगली बार सत्ता में ये आ गए तो कल वे करेंगे। सीधी सी बात है कि मुर्गी क्यों है? क्योंकि अंडा है। वही अंडा जो किसी मुर्गी ने ही दिया है। पहले किसे खत्म किया जाए ताकि दूसरा भी न रहे, यह चिंतन आज और भी प्रासंगिक हो गया है।

    मुर्गी पक्ष वाले और अंडा पक्ष वाले दोनों यह कब समझेंगे कि उदरस्थ तो दोनों को ही किया जा रहा है। और पहले आप-पहले आप में हमारी 'शांति एक्सप्रेस' छूटी जा रही है।                         ***