Wednesday, 30 April 2014

व्यंग्य       
              घोषणा पत्र की चोरी 
                                      ओम वर्मा
                              
ब सुबह से सिर्फ एक सामूहिक बलात्कार, दो छेड़खान,एक लड़की भगाने की व दो मामूली चोरियों की रपटें ही लिखवाने वाले आए तो हवलदार बलभद्रसिंह व इंस्पेक्टर सा. बुरी तरह से बोर हो गए। उन्हें लगा कि अब लोगों में उनकी  पुलिसगिरी कम और दूसरों की गांधीगिरी ज्यादा काम करने लगी है। दोनों यह सोच सोचकर हलाकान होने लगे कि क्या सचमुच में कहीं अच्छे दिन तो नहीं  आ गए हैं। मगर तभी धड़धड़ाते हुए कुछ लोगों ने झण्डों व पोस्टरों के साथ नारे लगाते हुए प्रवेश किया।
   “दारोगा जी चोरी हो गई हैरिपोर्ट लिखवाना है!”
   “क्या माल चोरी हुआ?” दारोगा जी ने खैनी की फंकी मारते हुए पूछा।
   “हमारा घोषणा पत्र चोरी हो गया है।“
   “कहाँ रखा था आपका घोषणा पत्र...हमारा मतलब है कि किस जगह से चोरी हुआ आपका वो...क्या बताया था...हाँ,घोषणा पत्र?”
   जी वो तो हमने सार्वजनिक रूप से घोषित कर रखा था, हमारा मतलब है छपवा कर पूरे देश की पब्लिक के सामने रखा था।“
   “तो फिर चोरी की रिपोर्ट लिखाने क्यों आए है? जब आप खुद ही कह रहे हैं कि आपका माल पब्लिक के लिए था, तो उसकी रक्षा भी आपको ही करनी चाहिए थी कि नहीं? फिर जब मामला पूरे देश का है तो क्या आपको यही थाना मिला था रपट लिखवाने के लिए?”
   “पर दारोगाजी हम सच कह रहे हैं कि उन लोगों ने इसे चुराया है!”
   “देखो यार एक तो चुनावों के चलते हमारा पहले ही भेजा फ्राई हो रहा है और ऊपर से आप लोग ये सड़ी सड़ी हगी-मूती बातें ले के आ जाते हो रपट लिखाने। एक तो तुमने तुम्हारा वो क्या नाम बताया था...पत्र वत्र, वो खुद तो सम्हाल कर रखा नहीं अब पुलिस उसमें क्या करे? फिर भी तुम नहीं मानते हो तो लिखाओ रपट ! हाँ तो बोलो कहाँ रखा था तुम्हारा घोषणा पत्र?”
   “नहीं दारोगाजी आप समझिए, वो रखने जैसी चीज नहीं है, वो तो कागज था...!”
   “अरे कागज भी था तो ये तो लिखना पड़ेगा कि कित्ता बड़ा था, किस रंग रूप का था, चोरी से पहले किसके पास था, तुमने उसे कहाँ से खरीदा था, उसकी कीमत क्या थी,उसका बिल विल है की नहीं ...?” दारोगाजी पुलिसगिरी दिखाने से खुद को बड़ी मुश्किल से रोक रहे थे।
   “उसकी कीमत आपको कैसे बताएँ वह तो हमारे लिए अमूल्य है, हमारा मतलब बहुत कीमती है।“
   “अगर बहुत कीमती है तो आपने उसे फिर बैंक लॉकर या पुलिस कस्टडी में क्यों नहीं रखा? खुद के गार्ड क्यों नहीं लगाए? फिर जिस चीज की तुम कीमत तक नहीं बता पा रहे हो उसकी चोरी जाने की रपट कैसे लिखूँगा और कौनसी धारा लगाऊँगा?”
    “अरे दारोगाजी हम आपसे पहले ही कह चुके हैं कि घोषणा पत्र सबके बीच पहुंचाने के लिए ही होता है, छिपाकर रखने के लिए नहीं।“
   “तो फिर कायकी रपट! तुम्हारा जो कागज दूसरों के लिए ही था और जिसे तुमने खुला रख छोड़ा था और जिसका कोई नकद मूल्य ही नहीं है, उसकी चोरी की रपट किस धारा में लिखूँ?”
   रपट लिखाने आए पार्टी के उत्साही व सीनियर लीडर्स दारोगाजी के आगे सिर पटक पटक कर रह गए मगर दारोगाजी की कानूनी परिभाषा में घोषणा पत्र की चोरीचोरी नहीं मानी जा सकती थी। इंस्पेक्टर के पास पहुँचे तो उन्होंने यह कहकर सबको झिड़क दिया कि चूँकि उन्होंने घोषणा पत्र पर सर्वाधिकार सुरक्षित होने या कॉपीराइट अपने पास होने की चेतावनी नहीं लिखी है लिहाजा चोरी का प्रकरण नहीं बन सकता !
    सुना है अब पार्टी चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाने जा रही है।      ***
-----------------------------------------------------------------------------------
                                     



Monday, 21 April 2014

     
        चुनावी कुण्डलियाँ
         एक
       टिकटों  को  लेकर  मची, कैसी  हाहाकार।
       कोई  जिद पर है अड़ा
, किया  कहीं इनकार॥
       किया कहीं  इंकार
,  आप  देने को आतुर।
       रहे 'कमल' को थाम
, कई अब हाथ बहादुर
       कहे
ओम कविराय, हकालों उन नकटों को।
       बेच रहे ईमान
,  देखकर  जो  टिकटों  को॥
                
                   दो
       बिल्ली मासी ठीक हो, या कोई तकलीफ।
       सुना तुम्हारे लाल को
, आई थी कल छींक॥
       आई थी  कल छींक
, रहे  ना छींका खाली।
       लगा पूछने  श्वान
, देखकर  बिल्ली काली॥
       कहे
ओम तज पाप, चलें जब सब जन काशी।
       आए  आम  चुनाव
,  समझना बिल्ली मासी॥
            
                  
                  तीन
       उनके वादे घोषणा, कपट तंत्र हैं मात्र।
       जैसे उनके हाथ में
, लगा है अक्षयपात्र॥
       लगा है अक्षयपात्र
, कहाँ से आए पैसा।
       बंदर अब मत नाच
, मदारी चाहे वैसा॥
       कहे
ओम कविराय,समझ लो उधर इरादे।
       हैं शिकार के जाल
, आज सब उनके वादे॥
                         
            
                  चार
       परसों  उसकी थी सपा’, कल पंजे का साथ।
       अब लगता है  भाजपा
, के  बिन हुआ अनाथ॥
       के बिन हुआ अनाथ
, वहाँ कल दम था घुटता
       आज लगे वो पाक़
, जहाँ सब  कल था लुटता
       कहे
ओम कविराय, लाभ बिन क्यों तुम तरसो।         
       थामेंगे  कल 
हाथ’,  देखना  फिर कल परसों॥ 
------------------------------------------------------------------

Tuesday, 18 March 2014

            रंग भरे दोहे दनादन

                     ओम वर्मा
                                                                                   om.varma17@gmail.com
------------------------------------------------------------------------------
डॉ. मनमोहनसिंह      अगर  कहेंगी सोनिया, तो खेलूँगा रंग ।
                   यूँ बोले सरदारजी, करो न मुझको तंग ॥  01
----------------------------------------------------------------------------------
सोनिया गांधी         इटली मेरा  मायका, भारत  है ससुराल ।
                   भौजाई हूँ आपकी ,  डालो रंग गुलाल ।।  02
----------------------------------------------------------------------------------
लालकृष्ण आडवानी     निकले रथ पर बैठकर, खेल रहे हैं फाग । 
                  इस शालीन बुज़ुर्ग की, किस्मत अब तो जाग।। 03
----------------------------------------------------------------------------------
नरेंद्र मोदी           खेलूँगा होली तभी, दिल्ली लूँ जब जीत ।
                  कुछ ऐसे इस फाग में, गाओ मंगल गीत ॥  04
----------------------------------------------------------------------------------
 राहुल गांधी           राहुल  होली  खेलने , निकले हैं इस बार ।
                   रँगवाएँगे  मुख वहीं, जहाँ दलित का द्वार ॥  05
----------------------------------------------------------------------------------
सुशीलकुमार शिंदे    इक येड़े को छोडकर, बाकी सबको छूट।
                 मेला है  यह फाग का
, लूट सके तो लूट॥  06

----------------------------------------------------------------------------------सुषमा स्वराज      होली खेलें जब कभी, बीजेपी के लोग।
                 उन उन पर ही ना करें
, सारे रंग प्रयोग॥  07
--------------------------------------------------------------------------------
राजनाथसिंह          मान रहे अरविंद का, राजनाथ  आभार।
                                           
फिर दिल्ली में मिल गया, होली का आधार।।08
---------------------------------------------------------------------------------

ममता बेनर्जी                         बस अन्ना के संग ही,   खेलेगा बंगाल। 
                         
 इस होली में इस तरह, होगा रंग गुलाल॥ 09
----------------------------------------------------------------------------------
लालूजी             चारे की कुटिया बना
, बैठे खटिया डाल ।

                                         
 अब कोई तो डाल दे, आकर रंग गुलाल ॥  10
----------------------------------------------------------------------------------
सुमित्रा महाजन        हो भाई का साथ तो, जीतूँगी हर जंग।
                    यह कह वे  कैलाश पर
, लगीं डालने रंग॥  11
---------------------------------------------------------------------------------नीतीशकुमार          खेल रहे नीतीशजी
, गुपचुप गुपचुप रंग ।
                   मोदी आकर बीच में
, करें नहीं रसभंग॥ 12
----------------------------------------------------------------------------------
नितिन गड़करी        काया से भी मर्द हैं, माया से भी मर्द
                   रंग देखकर
आप के, शुरू हो गया दर्द ॥  13
----------------------------------------------------------------------------------शिवराजसिंह चौहान   
   सुन लें सारी लाड़ली, हैं मामा  शिवराज ।
                    
 रंग डालकर नेग लो, नहीं छोड़ना आज ॥ 14
----------------------------------------------------------------------------------
अरविंद केजरीवाल       किस पर कैसे रंग की
, करना है बरसात ।
                    अब जनता की राय से
, तय होगी यह बात॥15
----------------------------------------------------------------------------------
अन्ना हजारे            पहले पूरी जो करे
, मेरी सत्रह माँग।
                     गाऊँ उसके राग में
, मैं होली का सांग॥ 16
----------------------------------------------------------------------------------
सलमान खुर्शीद           खेलूँ ना होली कभी
, नपुंसकों के संग।
                      जाचूँगा मर्दानगी
, वरना होगी जंग॥ 17
----------------------------------------------------------------------------------
शरद पवार              दिन में होली खेलने
, पहुंचे जनपथधाम।
                      मोदी के घर रात में
, किया मगर विश्राम॥18
----------------------------------------------------------------------------------
दिग्विजयसिंह          जिस दिन राहुल बन गए, अगले पंतप्रधान।
                   उस दिन से हर दिन यहाँ
, होगा फागुनगान॥19
----------------------------------------------------------------------------------
रामविलास पासवान
      मोदी का मुँह रँग दिया, फिर बोले ये राम।
                      हम पंछी उस डाल के
, जहाँ पके हों आम॥20
----------------------------------------------------------------------------------
 श्रीप्रकाश जायसवाल
        ये जूनी पिचकारियाँ, करती हैं रसभंग।
                         लेकर आओगे नई
, तो खेलूँगा  रंग॥ 21
----------------------------------------------------------------------------------
अखिलेश यादव          जिस पिचकारी पर बनी, पापा की तस्वीर ।
                     रंग उसी से डालना, हाकिम हो कि  वज़ीर॥ 22
 ---------------------------------------------------------------------------------
आजम खान
              पहले  मेरी भैंस से, जो खेलेगा रंग।
                      
अब खेलूँगा मैं सदा, होली उसके संग॥ 23
-------------------------------------------------------------------------------- 
राज ठाकरे            आओ  सिर्फ मराठियों, मैं खेलूँगा रंग।
                    चुंगी  नाकों  पर खड़े
, बोले एक दबंग॥ 24        

 
---------------------------------------------------------------------------------
अमिताभ बच्चन         कुछ दिन तो गुजरात में, होली खेलो यार।
                     किसी दूसरे राज्य में
,  होगी  अगली बार॥ 25
----------------------------------------------------------------------------------
संजय दत्त              सुन सर्किट इस टैंक में
, रंग ढेर सा घोल।
                       अब होली के नाम पर
, माँगूँगा पेरोल॥ 26
----------------------------------------------------------------------------------
राखी सावंत              राखीजी को इन दिनों
, भाया मोदी रंग।
                       बाँट रहीं हैं मुफ्त ही
, ले पिचकारी संग॥ 27
--------------------------------------------------------------------------------
सुरेश कलमाड़ी           कलमाड़ी से खेलना, चाह रहे जो लोग।
                     पहले  आधे  रंग का, देना होगा भोग॥ 28
----------------------------------------------------------------------------------
बाल कटवाता नेता       भाई मेरे यह बता, कितने मेरे बाल।
                     कटने को हैं  जान लो
, क्या होना है हाल॥ 29
--------------------------------------------------------------------------------
नेताओं पर रंग डलता      तुमने उन पर रंग क्यूँ
, दिया व्यर्थ में डाल।
देखकर  आम आदमी      खूनी  होली खेलते
, रहते  वे हर  साल॥ 30
----------------------------------------------------------------------------------
जयललिता व करुणानिधि देखें किसके गाल पर
, मोदी मलें गुलाल।
                     करुणानिधिजी औ
जया, आतुर लेकर गाल॥31
---------------------------------------------------------------------------------
 मायावती                मनुवादी को छोडकर
, बाकी सबके साथ।
                      खेलेंगी मायावती
, लाख टके की बात॥ 32
----------------------------------------------------------------------------------
आम आदमी पार्टी         सब लाए पिचकारियाँ, झाड़ू इनके पास।
                       देखें किनका रंग अब
, आता इनको रास॥ 33
----------------------------------------------------------------------------------
भागीरथ प्रसाद        राहुल जी की जेब से,  लेकर रंग गुलाल।
                   
                   मोदीजी को रँग दिया
, सरजी किया कमाल॥ 34
----------------------------------------------------------------------------------
योगेंद्र यादव             डाली कुछ ने स्याहियाँ, कुछ ने डाले रंग।
                      खुशियाँ और विरोध के
, सबके अपने ढंग॥ 35

Saturday, 8 March 2014


 व्यंग्य                                        जनवाणी, मेरठ, 
                                             08.03.14  
                  जूते की अभिलाषा
                          ओम वर्मा
                                    om.varma17@gmail.com
त्ता केंद्र के प्रति विरोध प्रकट करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। राजमहलों में राजा के प्रति रानियों के गरिमामय विरोध के लिए कोपभवन तक का प्रावधान रखना पड़ता था। गांधीजी इसे असहयोग और सत्याग्रह से प्रारंभ कर अनशन तक लाए जिसे बाद में निर्वाचित मुख्यमंत्री समर्थन देने वालों के खिलाफ ही धरने के नाम से आजमाने लग गए! लेकिन कई बार ये उपकरण फेल होते भी देखे गए तथा अखबारों की तलवार से भी तेज मानी जाने वाली कलम की स्याही भी फीकी पड़ने लगी। लिहाजा फास्ट फूड के जमाने में विरोध प्रदर्शन का तरीका भी कैसे अछूता रह सकता था? अब नेक काम के लिए लोगों ने जूते का प्रयोग शुरू कर उसे सम्मानजनक स्थान पर बैठा दिया है।                       
     लिहाज़ा अब समय आ गया है कि प्रजातांत्रिक देशों के राजनीतिक दल अपने चुनावी घोषणा पत्र, अपनी कार्य पद्धति या अपने अभ्यास सत्रों में विरोध प्रकट करने की इस नई तकनीक पर चिंतन मनन करें। अब यह स्पष्ट घोषणा होनी चाहिए कि सत्ता में आने पर उनका दल या उम्मीदवार कम से कम कितने जूते फेंके जाने या खाने के बाद ही किसी की बात सुनेगा! यह भी स्पष्ट हो कि क्या सिर्फ जूता दिखाना भर पर्याप्त होगा आखिर उनके कानों पर कम से कम कितने जूते खाने के बाद जूँ रेंगना प्रारंभ करेगी? यह भी हो सकता है कि कल से जूता फेकने वाले की ही बात हर हाल में मान ली जाए या फिर जूता फेंकने वाले की हर हाल में अच्छी तरह से खबर ले ली जाए! वैसे प्रहारक पर विभिन्न कानूनी धाराओं के तहत कार्रवाई भी की जा सकती है। जैसे बिल प्रस्तुत न करने वाले विद्रोही पर उन्हें मंदिर या मस्जिद से चुराए जाने का आरोप लगाया जा सकता है। प्रहारक संप्रदाय का हो और लक्ष्य संप्रदाय का, तो सांप्रदायिकता फैलाने का आरोप, और हमारे देश में जैसा कि अक्सर होता आया है, प्रहारक सवर्ण हो और लक्ष्य दलित वर्ग का, तो दलित उत्पीड़न का प्रकरण! जूता यदि प्लास्टिक का था, तो पर्यावरण एक्टिविस्ट आगे आ सकते हैं कि इससे पर्यावरण का क्षरण हुआ है, या कि जूते का मटेरियल ईको फ्रैंडली नहीं है। चमड़े के जूते हों तो पेटा वाले जीव उत्पीड़न का मामला बनाकर मैदान में कूद सकते हैं।
     आशावादी अँधेरे में भी उजाले की किरण  खोज़ लेता है। तो क्यों न जूता फेंकने वालों में से सही निशाना लगा पाने वाले को चुनकर आगामी ओलिंपिक खेलों के लिए निशानेबाजी की तैयारी के लिए चुन लिया जाए! आने वाले चुनाव में सभा या प्रेस वार्ता में उम्मीदवार राजनीतिक लाभ लेने  के लिए पेड़ न्यूज़ की तर्ज़ पर अपने ही आदमियों से भी यह काम करवा सकते हैं। बहरहाल इतना तो तय है कि जॉर्ज बुश और ज़रदारी से लेकर भूपिंदरसिंह हुड्डा तक, जूतों को अस्त्र बनाने का कार्य यदि इसी रफ्तार से चलता रहा तो हो सकता है कि भविष्य में चौथा विश्व युद्ध जूतों से ही लड़ा जाए! बाहुबलियों के परिवारों में शस्त्र पूजन की तर्ज़ पर जूता पूजन भी शुरू हो सकता है! ओपिनियन पोल जैसी विवादास्पद प्रक्रिया का स्थान जूता ले सकता है। जितने जूते, उतने लाइक्स या अनलाइक्स’! एक जूता यानी दस सीट की बढ़त या दस का नुकसान! वैसे जूते की अभिलाषा तो मात्र इतनी है कि वह न तो सम्राटों के पैरों की शोभा बढ़ाना चाहता है, वह किसी बड़े शॉपिंग माल के शो केस में बैठ कर अपने भाग्य पर इठलाना भी नहीं चाहता ...उसकी अभिलाषा तो मात्र इतनी है कि उसे उसके मुँह पर मार दिया जाए जो देश को खाने या बेचने की राह पर चल पड़ा हो!
                                               ***
100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001 (म.प्र.)        

Wednesday, 26 February 2014


             अंगुलिमाल, वाल्मीकि और
              गुण्डा विरोधी अभियान !
                                    ओम वर्मा
                                                      om.varma17@gmail.com
चुनाव सर पर हैं। ऊपर से आदेश हैं कि गुण्डों के खिलाफ़ सख़्त से सख़्त कार्रवाई की जाए। लिहाज़ा हर कहीं गुण्डा विरोधी अभियान की धूम मची हुई है। गुण्डा चाहे छोटा हो या बड़ा, चाहे इस पार्टी का खास हो या उस पार्टी का, चाहे कल का गुमनाम, परसों का बदनाम या आज का नाम वाला ही क्यों न हो ... गर्ज़ यह कि हर कोई खौफजदा है। पुलिस कब किसको पकड़कर उसकी टंटफोर कर दे या कब किसका जुलूस निकालकर नागरिक अभिनंदन करवा दे, खुद नहीं जानती!
     हाँ तो ऐसे ही एक सद्भावना मिशन के तहत एक हाय वोल्टेज अभियान विशेष दर्जा दिए जाने की राजनीति कर रहे उस राज्य में जहाँ के मुख्यमंत्री अब बाक़ायदा सेकुलर घोषित कर दिए गए हैं और जहाँ कट्टे खिलौनों की जगह ले चुके हैं, में भी जारी था। यहाँ पुलिस जिस गुण्डे को पकड़ कर पूजा करती हुई ले जा रही थी वह बार बार स्वयं को बुद्धं शरणं गच्छामि हो जाने की दुहाई दे रहा था। मगर पुलिस रेकॉर्ड में वह अंगुलिमाल नाम का ऐसा डाकू था जो अपने शिकार को न सिर्फ लूटता है बल्कि बाद में हत्या करके उनकी ऊँगलियों की माला बनाकर पहन लेता है। उनके लिए उसका बौद्ध भिक्षु बन जाना बिल्लियों के मूषक भक्षण की सेंचुरी के बाद की जा रही हज़ यात्रा या किसी समुदाय के निर्दोषों के सामूहिक नरसंहार के कई वर्षों बाद मनाए जा रहे क्षमापर्व में कोई फ़र्क़ नहीं था।
     ऐसे ही एक अभियान में एक अन्य राज्य का पुलिस दल अपने पूरे लाव लश्कर के साथ मैदान में था। मुखबिर से खबर मिली थी कि रत्नाकर नाम का एक बदमाश घर में छिपा बैठा है।
    “अबे ओ रत्नाकर... बाहर निकल !” उन्होंने रत्नाकर निवास नामक पर्ण कुटीर के दरवाजे पर प्रहार करते हुए दहाड़ लगाई।
     “आया हुज़ूर...!” राम नाम की माला जपता हुआ शुभ्र केशराशि एवं भगवा वस्त्रधारी अधेड़ प्रकट हुआ।
     “अबे ढोंगी चल अंदर ! शहर में गुण्डा विरोधी अभियान चल रहा है। हम तुझे अंदर करने आए हैं।“ दरोगा जी ने भद्रजनों के बीच इन दिनों प्रयुक्त किए जा रहे कुछ और भी असंसदीय शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा।
     “पर राम के बंदों, मैं रत्नाकर हूँ जरूर पर मैंने अब मैंने सारे काले धंधे बंद कर दिए हैं। मैं प्रभु श्रीराम की शरण में चला गया हूँ और उनका चरित्र लिखने में लगा हूँ। मेरा नाम भी रत्नाकर से बदल कर वाल्मीकि हो गया है।“ कल का दस पाँच सांसदों के दम पर सरकार गिराने का दम रखने वाले जैसा कठोर रत्नाकर इस समय सीबीआई के भूत से खौफ खाए मुलायम वाल्मीकि में बदल चुका था।
     “तुझे रामजी की शरण में नहीं, कृष्ण मंदिर में जगह मिलेगी बेट्टा..!” दरोगा जी के एक गणवेशधारी सहयोगी वाल्मीकि...आय मीन रत्नाकर को उचित तरीके से अपने साथ ले जाते हुए बोला। रास्ते भर वाल्मीकि जंजीर फिल्म के शेर खान द्वारा इंस्पेक्टर विजय को सारे काले धंधे बंद कर खुद के रूपांतरण व कायांतरण किए जाने जैसी दुहाई देता रहा...अपने द्वारा संस्कृत में प्रभु श्रीराम पर रचे जा रहे ग्रंथ का हवाला देता रहा। मगर वाल्मीकि की एक न चली। प्रशासन की नज़र में वह रत्नाकर ही था। इधर संकल्प का धनी वाल्मीकि था कि रत्नाकर वाली पर आना नहीं चाहता था।
     लगता है हमें पाप से चाहे घृणा हो न हो पापियों से जरूर है। क्या आज हम किसी रत्नाकर में वाल्मीकि बनने की और किसी अंगुलीमाल में भिक्षुक बनने की लेषमात्र संभावना भी नहीं रख छोड़ना चाहेंगे ?
                  ***

100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास ,455001, मो. 9302379199                

Sunday, 23 February 2014


व्यंग्य (नईदुनिया, 24.02.14.में प्रकाशित व्यंग्य)
 ओपिनियन पोल यानी हँडिया का एक दाना
                                                  ओम वर्मा
                                                       om.varma17@gmail.com
बिना स्वप्न आधारित या बिना पुरातत्वीय खुदाई के अपनी मातृभूमि को स्वर्णनगरी मेँ बदल देने वाले त्रिलोकपति लेकिन महाअहंकारी दशानन का वध तथा चौदह वर्ष का वनवास काट कर जब प्रभु श्रीराम अयोध्या लौटे तो इतिहास का पहला ओपिनियन पोल उनकी राह देख रहा था ।
     बाहरी व्यक्ति द्वारा अपहृत पत्नी को वापस उचित स्थान दिए जाने का अपराध करने पर हो रही लोकनिंदा व कानाफूसी से रामजी भी तंग आ गए थे! अब चूँकि हर अयोध्यावासी से मिलना तो उनके लिए संभव नहीं था।लिहाजा उन्होंने स्वयं छद्म भेष धारण कर दलित के घर रात गुजारने वाली स्टाइल मेँ एक लॉन्ड्री वाले के यहाँ व कुछ अन्य अड्डों पर कुछ समय व्यतीत कर केजरीवाल स्टाइल में आम नागरिकों की राजा के आचरण पर प्रतिक्रिया जानी। जाहिर है कि त्रेता युग के इस महान  शासक ने किसी संस्था से फिक्स्ड सर्वे करवाने के बजाय स्वयं एक सेंपल सर्वे कर पहले ओपिनियन पोल की विधिवत शुरुआत कर दी थी।
     एक ओपिनियन पोल का उल्लेख मुगलकालीन इतिहास मेँ भी मिलता है जो इससे थोड़ा भिन्न है। हुआ यूँ कि एक दिन बादशाह अकबर भरवां बैंगन की शानदार सब्जी खाकर मस्त हो गए थे और उसका स्वाद मुँह मेँ देर तक बना रहा। सभासदों के बीच मेँ उन्होंने सबसे पहले इसका जिक्र किया तो बीरबल ने तुरंत राजनीति के अनुशासित सिपाही की तरह बयान जारी किया, “हुज़ूर बैंगन तो सब्जियों का राजा है। उसका रंग शानदार, सर पर बादशाहों जैसा ताज! जहांपनाह का हुक्म हो तो बैंगन को राजकीय सब्जी घोषित कर दिया जाए!”
     बैंगन को राजकीय सब्जी घोषित करने की प्रक्रिया चल ही रही थी कि एक दिन बादशाह अकबर ने फिर वही मसालेदार सब्जी और ज्यादा खा ली। उन दिनों वहाँ न तो कोई जयराम रमेश थे और न कोई नरेंद्र मोदी, तब भी उन्हें शौचालय की महत्ता समझ मेँ आ गई। अगले दिन उन्होंने दरबार मेँ बैंगन की सब्जी को कोसते हुए जैसे ही अपनी हालत के बारे मेँ बताया कि चतुर सुजान बीरबल ने तुरंत अमेरिका द्वारा नरेंद्र मोदी के बारे मेँ बदली गई राय की तरह बैंगन के बारे मेँ अपनी राय बदली, जी आलमपनाह! बैंगन भी कोई सब्जी है...काला कलूटा ...सिर पर काँटों भरा ताज...कोई गोल तो कोई लंबा...! मेरी मानें तो हुज़ूर इसकी खेती पर ही पाबंदी लगा दें ताकि कल कोई इसमें नस्लीय बदलाव (जेनेटिक माडिफिकेशन) न कर सके।“
      प्रभु श्रीराम चक्रवर्ती सम्राट व कानूनी तौर पर एक राज्य के राजा थे। राजतंत्र मेँ भी उन्हें ओपिनियन पोल जैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था मेँ विश्वास था। मगर इधर लोकतंत्र मेँ दस वर्षों से सत्ता सुख भोग रहे मित्रों को वर्तमान ओपिनियन पोल फूटी आँख नहीं सुहा रहे हैं। वे कभी ओपिनियन पोल को  कूड़ेदान में फेंकने लायक बता देते हैं तो कभी मात्र हजार - दो हजार लोगों की राय बताकर खारिज कर देते हैं। शायद वे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ द्वारा करवाए गए ओपिनियन पोल की जगह बीरबल द्वारा बादशाह की स्तुति जैसा राजतंत्री ओपिनियन पोल चाहते हैं। वे शायद यह भूल रहे हैं  कि बैंगन प्रकरण मेँ अपनी नीति परिवर्तन पर बीरबल ने बादशाह सलामत को डिप्लोमेटिक जवाब देते हुए यह भी तो कहा था कि हुज़ूर गुलाम नमक आपका खाता है न कि बैंगन का! आज के बादशाहों को अब कौन समझाए कि जनता तो अपनी ही गाढ़ी कमाई से खरीदा नमक खा रही है!
     क्या आज के हुक्मरान यह भूल गए कि बचपन में जब घर में प्रेशर कुकर की सीटी नहीं बजती थी तब मांएं चावल का सिर्फ एक दाना देख कर मालूम कर लिया करती थीं कि हँडिया के बाकी दानों का क्या मिजाज़ है।

                      ***
100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001 (म॰प्र॰)
-----------------------------------------------------------------------------------------------