Friday, 29 August 2014




05 सितंबर, शिक्षक दिवस पर विशेष 
           कुछ गुरु जी ऐसे भी होते हैं ! 
                                                                           
ओम वर्मा 
                    
 om.varma17@gmail.com  
पाँच सितंबर यानी शिक्षक दिवस! गुरुओं के सम्मान और महिमागान का दिन! इलेक्ट्रानिक से लेकर प्रिंट मीडिया तक सभी दूर गुरुजी ही गुरुजी! शिक्षाकर्मी से लेकर पुराने शिक्षाधर्मी तक... सभी का सम्मान ही सम्मान! ‘मध्यान्ह भोजन’ खिलाने वाले सरकारी स्कूलों से लेकर बच्चों से घर से तैयार किया हुआ ‘लंच बॉक्स’ व वॉटर बॉटल मँगवाने वाले असरकारी’, मेरा मतलब गैर-सरकारी... सभी स्कूलों में “गुरुः ब्रह्मा, गुरुः विष्णु...” की ही गूँज...! गुरुजी की हालत उस साँप की तरह होने लगती है जिसे नागपंचमी के दिन दूध पिला-पिलाकर पूजित किया जा रहा है। यानी हर कहीं कुछ ऐसा माहौल बनने लगता है मानों हर वह शख्स जो गुरु है, वही सर्वश्रेष्ठ है।
   लेकिन मैं इससे सहमत नहीं हूँ । गुरु का पद श्रेष्ठ हो सकता है। गुरु से की गई अपेक्षाओं के अनुरूप जो कार्य या आचरण करे या किसी कंकर को शंकर में बदलने के लिए प्रेरित कर सके उसे ही मैं सच्चा गुरु मानूँगा या गोविंद से भी ऊपर की हायरार्कि’ (hierarchy) में रखना पसंद करूँगा। पर मैं यहाँ कुछ ऐसे गुरुओं की चर्चा कर रहा हूँ जिन्होंने अपने एक कदम या वाक्य से मुझ जैसे कई शिष्यों की दिशा व दशा दोनों ही बिगाड़ कर रख दी।    
    सन्‌ 1967-68 में नौवीं क्लास का बायलॉजी समूह का विद्यार्थी था। बायलॉजी और केमिस्ट्री दोनों विषय हमें पढ़ाते थे पंड्या जी। एक अन्य सेक्शन में यही विषय एक दूसरे शिक्षक अवधेश जी पढ़ाते थे। अवधेश सर के पढ़ाने के तरीके और विषय में मास्टरी थी इस कारण उनके घर ट्यूशन पढ़ने वालों की भीड़ लगी रहती थी। क्लास और घर में ट्यूशन पर वे एक जैसा पढ़ाते थे और यही बात ट्यूशन पर आने वालों से भी पहले ही बता दिया करते थे। कभी-कभी दूसरे सेक्शन के कुछ विद्यार्थी भी उनकी क्लास में बैठने का लोभ संवरण नहीं कर पाते थे। उनकी इस लोकप्रियता से पंड्या जी जैसे शिक्षक ईर्ष्या रखते थे। इसे आत्मप्रवंचना न समझें तो कहना चाहूँगा कि मैं पढ़ने-लिखने में अपेक्षाकृत बहुत आगे था। न जाने क्यों पंड्या जी को लगा कि मैं अवधेश जी के यहाँ ट्यूशन  पढ़ने जाता हूँ। उन्होंने उनके यहाँ पढ़ने वाले एक छात्र के माध्यम से मुझ तक अवधेश सर को छोड़कर उनके यहाँ ट्यूशन पर आने का संदेश भिजवाया। सर नाराज़ होकर मुझे कहीं देख’ न लेंइस डर से मैं  दो माह उनके यहाँ ट्यूशन पर गया। इन दो महीनों के कुल चालीस रु. देने के लिए उन दिनों मेरे पिताश्री ने कैसे पेट काटा होगा यह वही जानते होंगे।
    अगले वर्ष दसवीं कक्षा में इन्हीं पंड्या जी ने केमिस्ट्री में कार्बन का चेप्टर पढ़ाते  समय पहले दिन ही डरा दिया। कार्बन हर ऑर्गेनिक कंपाउण्ड की संरचना का पहला आवश्यक तत्व है। इसे सीधे-सरल शब्दों में व्यक्त करने के बजाय इन्होंने यह कहकर कि ‘कार्बन’ एक बहुत ही कठिन और ‘दादा’ टॉपिक है...इसमें अच्छों-अच्छों की...हो जाती है। अब आप ही सोचिए कि 14-15 आयुवर्ग के विद्यार्थियों पर इन विचारों का क्या असर पड़ा होगा ! वह भी ऐसे स्कूल में जहाँ पर कि आधे विद्यार्थी आसपास के गाँवों से आए थे। और प्रायवेट स्कूलों का तो तब चलन ही नहीं था। यह खौ‌फ मुझ पर पूरे विद्यार्थी जीवन में हावी रहा।
    इन्हीं गुरुजी ने इसी साल एक और हैरतअंगेज़ करतब कर दिखाया। उन दिनों एक छह माही या अर्धवार्षिक परीक्षा हुआ करती थी। मैं अपना दसवीं कक्षा का केमिस्ट्री का अर्धवार्षिक परीक्षा का पर्चा दे रहा था। ढाई घण्टे का समय। प्रश्नपत्र हाथ में आते ही पाँच-दस मिनट में आधा हॉल खाली हो गया। आधा घण्टा भी नहीं बीता होगा कि मुझे छोड़कर बाकी भी चले गए। यानी आधे घण्टे के बाद परीक्षा हॉल में सिर्फ दो लोग थेएक मैं और एक इन्‌विजिलेटर पंड्या जी। पहले तो उन्होंने मुझे घूर कर देखा। फिर मेरे हाथ से उत्तर-पुस्तिका ही छीन ली। बोले,”तुम्हारे अकेले के लिए क्या हम ढाई घण्टे तक बैठे रहेंगे?” मुझे आज तक अफसोस है कि अपनी ग्रामीण पृष्ठभूमिशिक्षक पिता का पुत्र और चौदह वर्ष की आयु होने के कारण मैं उनका किसी भी तरह से विरोध करने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाया। पंड्या जी जैसे शिक्षकों ने अपनी ऐसी हरकतों से कितने विद्यार्थियों की जिंदगी में अवसाद पैदा कर दिया होगाकरियर की दिशा बदल दी होगीविषय के प्रति अरुचि पैदा कर दी होगीयह या तो ऊपर वाला जानता है या पंड्या जीया फिर मेरे जैसे भुक्तभोगी!
    सन्‌ 64-65 के सत्र में छठी कक्षा की बात है। एक शिक्षक श्री तुलसीराम वर्मा अक्सर विद्यार्थियों से सिगरेट मँगवाया करते थे। एक बार मैंने भी उन्हें सिगरेट लाकर दी थी। आज विश्लेषण करने पर समझ में आता है कि अपनी युवावस्था में कुछ वर्ष मैं धुम्रपान की लत का शिकार रहा तो उसके सीखने की पृष्ठभूमि में एक कारण गुरुजी को लाकर दी गई सिगरेट भी थी। हाथ में रह गई तंबाकू की मादक गंध और सर का लाइटर से सिगरेट जलाने का अंदाज़ कई  दिन तक मेरे अचेतन में छाए रहे थे।
    यही नहींशिक्षकों की बोलचाल से लेकर बॉडी लेंगवेज़ तक का विद्यार्थियों पर बड़ा जबर्दस्त प्रभाव पड़्ता है। चौथी क्लास के मेरे क्लास टीचर को पलकें झपकाने की आदत थी। उन्हें देखकर कुछ बच्चे भी अपनी पलकें झपकाने लग गए थे। दूसरे टीचर्स के समझाने या घर के बड़ों की डाँट-फटकारों के बाद बच्चों की ये आदतें सुधरीं। इसी तरह प्रायमरी स्कूल की एक शिक्षिका अनुनासिक स्वर(नेज़ल टोन) में बोलती हैं। उनकी क्लास के बच्चे भी नेज़ल टोन अपनाते देखे गए हैं। मिडिल स्कूल के एक गुरुजी नवरात्र के दिनों में कड़ा उपवास रखते थे इसलिए नौ दिन पढ़ाना स्थगित रख चुपचाप बैठे रहते थे। पता नहीं उन्हें इसका पुण्य लाभ मिला या नहीं पर बच्चों का पढ़ाई का नुकसान अवश्य ही होता था।
    इसी तरह विज्ञान जैसे विषय में पुस्तक रखकर पढ़ाने या सिर्फ एक- दो ‘प्रिय’ छात्रों से ही बार-बार बात करने या पूछने वाले शिक्षक भी कभी भी विद्यार्थियों से सम्मान नहीं पा सके। बल प्रयोग भी अब न सिर्फ शिक्षक की अक्षमता में गिना जाता है,बल्कि अनैतिक व असंवैधानिक भी है। विद्यालयीन शिक्षाखासकर के छोटी कक्षाओं में सिर्फ पढ़ाने की कला व बालमनोविज्ञान की टेक्निक ही शिक्षक को विद्यार्थी की नज़रों में स्थाई रूप से सम्मानीय व वंदनीय बना सकती है।
    मेरे ही शहर में कुछ वर्ष पूर्व एक शिक्षक को कुछ लड़कों के साथ अप्राकृतिक कृत्य के जुर्म में गिरफ्तार किया गया था। जिन बच्चों के नाम सामने आए थे उन्हें व उनके परिजनों को कितनी  कठिनाइयों का सामना करना पड़ा होगा!
    यहाँ बात सिर्फ विद्यालयीन शिक्षा से जुड़े शिक्षकों की हो रही है। महाविद्यालयीन शिक्षा में गुरु-शिष्य अंतरसंबंध विद्यालयीन अंतरसंबंध से बहुत भिन्न होते हैं। वहाँ बालमनोविज्ञान की कोई भूमिका लगभग नहीं है।
    और अंत में प्रार्थना! पंड्या जी जैसे गुरु जीईश्वर करेकिसी भी बच्चे को न मिलें। ईश्वर सभी को इतना साहस दे कि ट्यूशन के लिए बाध्य करने वाले या बीच परीक्षा में कॉपी छीनने वाले शिक्षक की शिकायत कर सकें !   

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Thursday, 28 August 2014



हिंदू का दूसरा विवाह और लव जेहाद
                                          ओम वर्मा
                                  om.varma17@gmail.com
न दिनों विवाह सबंधी एक बयान व धार्मिक पहचान छिपा कर किए जा रहे विवाह की घटनाओं ने समरसता के ताने बाने को विच्छिन्न करने का जो प्रयास किया है, वह चिंतनीय है।
    शंकराचार्य स्वरूपानंदजी ने एक साक्षात्कार में पीएम नरेंद्र मोदी से माँग की है कि किसी हिंदू पति को पत्नी के संतानोत्पत्ति योग्य न होने की दशा में दूसरे विवाह का अधिकार दिया जाए। क्या इसका मतलब यह लगाया जाए कि जीवनसाथी होने का मतलब क्या सिर्फ संतानोत्पत्ति भर है? क्या औरत सिर्फ बच्चा पैदा करने की मशीन है? संतान न होने की स्थिति में हमेशा क्या सिर्फ पत्नी ही जिम्मेदार होती है? यदि दूसरी पत्नी भी पति को पिता नहीं बना सके तो क्या उसे तीसरा विवाह करना होगा? यदि पत्नी फरटाइल और पति स्टेराइल हो तो क्या शंकराचार्यजी ऐसे प्रकरण में पत्नी को पहले पति को त्याग कर दूसरे विवाह का अधिकार देने की माँग करेंगे? अब जबकि विज्ञान नई ऊँचाइयाँ पर पहुँच चुका है, तब हम हैं कि मध्य युगीन धारणाओं को दोहराने कि बात करने लग जाते हैं। आज टेस्ट ट्यूब बेबी व सरोगेसी जैसी कई ऐसी तकनीकें ईज़ाद की जा चुकी हैं जिन्हें अपनाकर कई निसंतान माँओं की गोदें हरी हो गईं हैं। शुक्र है कि धर्मगुरू संतानोत्पत्ति के लिए यज्ञ, हवन, व पशु बलि जैसे उपाय नहीं बता रहे हैं। धर्म ग्रंथों के हवाले से तो लोग यह भी कह सकते हैं कि बेटा ही पिता की चिता को अग्नि दे सकता है या पुत्र से ही वंश चल सकेगा। अचरज नहीं अगर कल से कोई धर्म गुरू लिंग परीक्षण को वैध करने की माँग कर बैठे, या कोई पुत्र रत्न प्राप्त होने तक लगे रहो मुन्नाभाई जैसा धर्मोपदेश देने लगे! कभी कभी कुछ धर्म गुरुओं द्वारा अन्य समुदाय की बढ़ती जनसंख्या के परिप्रेक्ष्य में धर्म की रक्षा के लिए संतानवृद्धि पर ज़ोर दिया जाता है। मेरे विचार से शासन या नेतृत्व करने के लिए संख्यात्मक विकास के बजाय गुणात्मक विकास करना ज्यादा जरूरी होता है।       
    दूसरी घटना सामने आई है धर्म परिवर्तन की। मेरे विचार से एक स्वतंत्र, धर्म-निरपेक्ष या पंथ-निपेक्ष देश में हर नागरिक को अपनी पसंद का धर्म अपनाने या परिवर्तन करने का अधिकार होना चाहिए। प्रशासन व हमारे रहनुमाओं को यहाँ यह अवश्य सुनिश्चित करना होगा कि कहीं इसके पीछे कोई बोफोर्स तो नहीं हुई है! दो विभिन्न धर्मों के लड़के लड़की यदि विवाह करते हैं तो प्यार भरा दिल कभी न तोड़ो, जिस दिल में दिलवर रहता वाले विचार को अपनाना आज समय की आवश्यकता है।
    लेकिन यहाँ समाज में इस मुद्दे पर भी एक सार्थक विचार विमर्श की जरूरत है कि मुस्लिम लड़के और हिंदू लड़की के विवाह करने पर धर्म परिवर्तन लड़की ही करती देखी गई है, कहीं लड़के के धर्म परिवर्तन की बात सुनने में नहीं आई है। यहाँ दोनों के समाज अगर उन पर दबाव न डालें और दोनों पक्षों को अपनी अपनी धार्मिक पहचान बनाए रखने की छूट दे दें तो शायद कुछ सार्थक परिणाम सामने आ सकें। और कुछ हो न हो कम से कम दो प्यार करने वाले सुख से जी तो सकेंगे। एक महानगर में मेरे एक पारिवारिक बंगाली मित्र हैं जहाँ सुबह शाम माँ की पूजा होती है। उनकी बिटिया ने अपने जिस सहकर्मी से प्रेम विवाह किया उसके मज़हब में मूर्ति पूजा निषेध है। दोनों परिवारों में पहले इसका विरोध हुआ। फिर बेटे की विधवा माँ  ने बहू को अपनी धार्मिक पहचान व मान्यता कायम रखने की स्वीकृति दी। पहले कन्या पक्ष ने बंगाली रीति रिवाज से विवाह कर बेटी को विदा किया। बाद में वर पक्ष ने अपने यहाँ निकाह भी पढ़वाया। वधू को हालांकि धर्म परिवर्तन के लिए बाध्य तो नहीं किया गया मगर ससुराल में रहकर उसे तस्वीर लगाने या मूर्ति पूजा और किसी हिंदू त्योहार को मनाने की इजाजत नहीं है। यहाँ लाख टके का सवाल यह पैदा होता है कि क्या दो प्यार करने वालों को समाज धर्म के बंधनों से कभी मुक्त नहीं करेगा?

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, रामनगर एक्सटेंशन देवास 455001 (म.प्र.)

Monday, 25 August 2014





 व्यंग्य (नईदुनिया, 25.08.2014)
           आरटीओ की शहादत
                                    ओम वर्मा 
                                          om.varma17@gmail.com
 क फोन काल क्या आया, पूरे घर में कोहराम मच गया। 
   अनोखीलालजी की होने वाली बहू के पिता बदामीलालजी अपनी बेटी का रिश्ता तोड़ रहे हैं। न तो वे कोई कारण बता रहे थे और न ही आगे कुछ बात करने को तैयार थे। छह महीने पहले ही उन्होंने बेटे का रिश्ता तय किया था। दहेज में बीस लाख रुपय्ये नकद गिनकर देने की बात हुई थी। अगले महीने लगन था। लड़का उनका था तो सिर्फ बी.ए. पासमगर उसकी नौकरी बड़ी मलाईदार थी। आरटीओ में क्लर्क जो था।
   लेकिन आज बदामीलालजी बदाम के नरम बीज से यकायक अखरोट के कठोर छिलकों में बदल गए थे। अपनी घबराहट पर काबू पाने के लिए उन्होंने अखबार में नजरें गढ़ा दीं। जैसे दो अपरिचित लोग मौसम या बरसात को लेकर कभी भी और कहीं भी बातचीत का सूत्र पकड़ सकते हैं वैसे ही उन्होंने अखबार में कोई सांत्वना सूत्र तलाशने का प्रयास किया। एक खबर पर नजर पड़ते ही उनके हाथ से पेपर और पैरों तले जमीन खिसक गई! खबर थी की सरकार देश के सारे आरटीओ बंद करने का मन बना रही है। जिस मलाईदार महकमे में बेटे की जुगाड़ जमाने के लिए उन्होंने दस लाख का इनवेस्टमेंटकिया था, जिसके बदले विवाह की मण्डी में वे बेटे पर बीस लाख रु. का 'प्राइस टैगलगाने में सफल हुए थे, और जिस कारण बी.ए.पास लड़के को बी.ई. पास लड़की मिल रही थी वह भी नोटों की  गड्डियों के साथ, उनका वही 'कीमती सामान' यकायक रिडक्शन सेल में तब्दील हो गया था।
   उन्हें लगा आरटीओ पदस्थ पुत्र के कारण कल तक सारी बिरादरी में उनकी नाक जो शूर्पणखा की नाक से भी बड़ी हुआ करती थी, उसे लक्ष्मण रूपी परिवहन मंत्री ने एक झटके में क्षत-विक्षत कर दिया है।
   यह दुखड़ा एक अकेले अनोखीलाल का नहीं है। देश में ऐसे कई अनोखीलाल हैं जिनका दाना-पानी आरटीओ से बँधा है। माना कि सरकार सारे आरटीओ वालों को कहीं न कहीं एडजस्ट कर उनकी दालरोटी का इंतजाम तो कर ही देगी। लेकिन आरटीओ कर्मी चाहे वह अधिकारी हों या चपरासी, एक स्वर में यही कहेंगे कि "सरकार हमें क्यों उल्लू बनाविंग! उल्लू बनाविंग!!” सीधी-सी बात है बंधु, दाल-रोटी बस स्टैंड के रामसखा भोजनालय में भी मिलती है और फाइव स्टार होटल में भी। और जाहिर है कि अन्य सरकारी विभागों की दाल रोटी बस स्टैंड के भोजनालय की दाल रोटी होती है जबकि एक आरटीओ कर्मी की दाल रोटी फाइव स्टार होटल का  शाही टुकड़ा होती है। 
   आज चाहे 'कफ़न' और 'गोदान' के घीसू- माधौ और होरीराम हों या 'राग दरबारी' का लंग्गड़, सब जानते हैं कि आरटीओ जैसी समाजवादी व्यवस्था अन्यत्र दुर्लभ है। यहाँ एक बाबू अपने एक या दो एवजियों से काम करवाकर बेरोजगारी हल करने की दिशा में प्रशंसनीय कार्य करता है। और ये जो हर आरटीओ ऑफिस के बाहर ढेर सारे एजेंट, कर सलाहकार कच्ची पक्की गुमटियाँ बनाकर बैठे हैं क्या ये अपने जमे जमाए कारोबार को आसानी से छोड़ देंगे? आरटीओ के दलाल सिर्फ खिलाने की कला जानते हैं, ये कोई तरला दलाल नहीं हैं जिन्हें पकाने का भी शौक हो।
   सच तो यह है कि एजेंट के माध्यम से बिना ट्रायल के पर्मार्नेंट लायसंस बनवा चुके लोग भी आज आरटीओ की वर्तमान कार्यप्रणाली के इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि वे इसे अब भ्रष्टाचार नहीं, एक स्वाभिक प्रक्रिया मानने लगे हैं। और दिल्ली वालों को यह कौन समझाए, जो 'सारे घर के बदल डालूँगा' की नादानी में लगे हुए हैं।                                          ***
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100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 4565001

Tuesday, 29 July 2014

व्यंग्य कथा - कफन -2

व्यंग्य  कथा 

कफ़न -2

ओम वर्मा
बर गणेश की मूर्तियों के दुग्धपान की तरह पूरे देश मेँ फैल गई कि पिता-पुत्र घीसू और माधव बुधिया की अंत्येष्टि सामग्री के पैसों से शराब पी गए हैं और नशे मेँ बदमस्त होकर पास्कल के अड्डे पर औंधे मुँह पड़े हुए हैं।
हुआ कुछ यूँ था कि उस दिन शहर की उस अवैध बस्ती के उस अवैध कच्चे मकान के अगले कमरे मेँ बैठे माधव व घीसू बिजली के खंबे से अवैध रूप से तार की हेकड़ी डालकर लिए गए कनेक्शन वाले बिजली के हीटर पर आलू भून कर खा रहे थे। घर मेँ आटा-दाल और पैसा कौड़ी नदारद था। बचे थे तो सिर्फ आलू। बस्ती मेँ ही कालू दादा की शराब भट्टी से उधार में लाए गए पाव का भी साथ साथ मज़ा लेते जा रहे थे। अंदर के कमरे मेँ माधव की पत्नी बुधिया प्रसव पीड़ा के मारे तड़प रही थी।
मालूम होता है कि अस्पताल वालों का जेब भरे बिना मानेगी नहीं। सारा दिन हो गया दौड़ते भागते और इसकी चिल्लाचोंट सुनते सुनते। जा, देख तो आ, और तेरे मोबाइल से वो क्या केते हैं उसकू वो जननी गाड़ी वालों को फोन तो लगा”, घीसू ने जननी एक्सप्रेस बुलाने का कहना चाहा।
“मैं क्यों लगाऊँ ? बहू तुम्हारी है। तुम लगाओ अपने मोबाइल से। मेरे पास बैलेंस नहीं है।“ माधव ने चिढ़कर जवाब दिया। दरअसल वह अपना कीमती समय ऐसे फालतू काम मेँ गँवाना नहीं चाहता था। उसे भय था कि उधर वह बात करे उतनी देर मेँ बापू कहीं सारे आलू और उसका ठर्रे का पाव भी खत्म न कर दे।
उस तंग बस्ती का यह कुनबा सारे कस्बे मेँ बदनाम था। मनरेगा के तहत घीसू एक दिन काम करता तो तीन दिन आराम। माधव इतना कामचोर था कि हर आधे घण्टे मेँ कभी बीड़ी पीने भागता तो कभी एक दक्षिणी राज्य के विधायकों की तरह कुछ खास विडियो क्लिप देखने लग जाता जो उसने अपने मोबाइल मेँ जुगाड़मेंट से फिरी – फोकट मेँ डलवा रखी थी। बीच बीच मेँ जब चाहे तब कभी भूरिया की घरवाली को मोबाइल लगा देता तो कभी राधिया की बहिन को मुस्काल (मिस्ड काल) मार देता। हालांकि मेहनती आदमी के लिए पचासों काम थे मगर इन दोनों को जो एक बार बुला लेता वह वैसे ही पछताता जैसे लोग चुनावों मेँ अपनी पसंद के उम्मीदवार के लिए अपनी ऊँगली रँगवाने के बाद पूरे पाँच साल तक पछताते रहते हैं। इसलिए इनसे तो सब दूर से राम राम करने मेँ ही अपनी भलाई समझते थे। कभी कभी जब किसी का काम अटक जाए या खेतों मेँ पकी फसल खड़ी हो, मावठे का डर सता रहा हो और मजदूर भी न मिल रहे हों, तब लोगों को इन्हें भी सहना पड़ता था। मगर तब उनके पास दोनों से एक का काम पाकर भी संतोष कर लेने के सिवा कोई चारा न होता। सोयाबीन और गेंहू की फसल कटाई के वक़्त तो दोनों दुगुनी मज़दूरी माँगते। दोनों फटे चिथड़ों से अपनी नग्नता को ढाँके हुए, क़र्ज़े से लदे हुए, जब अल्लाह दे खाने को तो कौन जाए कमाने कोवाले सिद्धांत का अक्षरशः अनुसरण करते हुए मस्त जिंदगी जीने मेँ विश्वास रखते थे। घीसू अपने इसी बादशाही अंदाज़ से उम्र के साठ साल काट चुका था और माधव भी अपने ही भक्तों के तिरस्कार के पात्र बने संत पिता के संत पुत्र की तरह बाप का नाम और उजागर कर रहा था।
माधव का ब्याह पिछले साल ही हुआ था। जब से यह गृहलक्ष्मी घर मेँ  आई थी, दोनों को कुछ ऐसी राहत मिल गई थी मानों पड़ोसी मुल्क को आतंकी गतिविधियों के चलते भी अंकल सैम से करोड़ों डालर का पैकेज या जैसे अन्ना हज़ारे के आंदोलन और भूख हड़ताल से कुछ राजनीतिक दलों को बैठे बैठे ही चुनाव जीतने या लोकपाल बिल पटल पर रखने का लाभ मिल गया हो। कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि पाँच-छह घरों का झाड़ू पोंछे और बर्तन का काम करके उसी ने खानदान मेँ न सिर्फ व्यवस्था की नींव डाली, बल्कि दोनों को कई बार भूखा सोने से भी बचाया था। जब से वह आई, यह दोनों और भी आलसी और आरामतलब तो हो ही गए थे और मुट्ठी भर विधायकों या सांसदों के दम पर सरकार बनाने का दम रखने वाले पार्टी लीडर की तरह कुछ कुछ अकड़ने भी लगे थे। वही औरत आज प्रसव वेदना से मर रही थी तो दोनों भुने आलू और कच्ची दारू का मज़ा छोड़कर जननी एक्सप्रेस वाहन के लिए मोबाइल करने को भी तैयार नहीं थे।
माधव आशंकित था कि अगर उसने अंदर जाकर घरवाली की दशा देखने की सौजन्यता दिखाई तो घीसू आलूओं का बड़ा भाग साफ कर देगा। इसी आशंका के तहत घीसू भी बहू का उघड़ा बदन न देख सकने के बहाने आलू भक्षण का लोभ न छोड़ पा रहा था। आलू खाकर दोनों ने अपने अपने पाव खत्म किए और हीटर का जुगाड़ अलग कर वहीं ढेर हो गए।
सुबह माधव ने अंदर जाकर देखा कि बुधिया के प्राण पखेरू उड़ चुके हैं। मुँह पर मँडराती मक्खियाँ, पति के इंतज़ार मेँ पथरा चुकी आँखें, धूल से लथपथ देह और पेट मेँ मरा बच्चा। बाप बेटों ने जबर्दस्त स्यापा शुरू कर दिया। शीघ्र ही आस पड़ोस के लोग इकट्ठे हो गए और इन अभागों को सांत्वना प्रकट कर समझाने लगे। बिना उपचार के एक गर्भवती स्त्री और वह भी दलित वर्ग की, मरी पड़ी थी। कुछ ही देर मेँ हमेशा सबसे पहले हमने दिखाया का दावा करने वाले टीवी चैनल वाले अपनी अपनी भूमिकाओं का मंचन प्रारंभ कर चुके थे।
“पत्नी के निधन पर आप कैसा महसूस कर रहे हैं ?” नए नए नियुक्त हुए टीवी पत्रकार ने प्रशिक्षण मेँ सीखे अपने ज्ञान का परिचय देते हुए प्रश्न किया।

     “हे भगवान! गरीबों की तो कोई सुनने वाला ही नहीं है रे!” सामने कैमरा देख माधव और ज़ोर से पछाड़ खाने लगा और कुछ इस तरह विलाप करने लगा जैसे सीता अपहरण के बाद प्रभु श्रीराम वन मेँ कर रहे थे।
     “मेरे घर से तो लछमी ही चली गई है भगवान!” घीसू भी छाती माथा कूटने लगा।
     “देखिए यहाँ पर एक दलित की गर्भवती पत्नी ने समय पर उपचार न मिल पाने के कारण तड़प तड़प कर जान दे दी है और सरकार के कानों पर जूँ तक नहीं रेंग रही है। यहाँ न तो कोई जनप्रतिनिधि अभी तक आया है न ही प्रतिपक्ष का कोई नेता !... माधव और घीसू के घर से कैमरामेन विनोदकुमार के साथ, मैं दीपक मनबसिया, अभी तक के लिए...!” खबरिया चैनलों की जुगाली शुरू हो चुकी थी।
तभी वहाँ सत्ता दल व प्रमुख विपक्षी दल के राजनीतिक कार्यकर्ता भी अवतरित हो गए।
“यह विपक्ष की चाल है !...हमने जननी सुरक्षा वाहन यहाँ भिजवाया था मगर उसे गलत पता बताकर यहाँ से अपोजिशन वालों ने लौटा दिया।“ अभी अभी सांत्वना प्रकट करने आए नेताजी ने चैनल वालों द्वारा घेरे जाने पर पान मसाले की खपत का प्रमाण दे रही बत्तीसी दिखाते हुए जवाब दिया।
“ये सरकार हर मुद्दे पर फेल है। जो एक गर्भवती दलित औरत की जिंदगी नहीं बचा सकते उनको सरकार मेँ बने रहने का कोई हक़ नहीं है। मुख्यमंत्री को तत्काल इस्तीफा दे देना चाहिए।“ प्रतिपक्ष का नेता था वह... जलती चिता पर हाथ सेंकने मेँ माहिर! आज का अवसर भला क्यों हाथ से जाने देता!
अब मृतक को तो वापस जिंदा नहीं किया जा सकता पर मैं शासन की ओर से अंतिम क्रिया करम के लिए पाँच सौ रु॰ की धनराशि प्रदान करता हूँ।“ नेताजी ने घोषणा कुछ इस अंदाज़ मेँ की मानों भामाशाह ने महाराणा प्रताप के सामने फिर से युद्ध लड़ने के लिए अपना खज़ाना रख दिया हो। शर्माशर्मी मेँ अपोजिशन वाले भी अपनी अपनी इच्छा और टीवी वालों के सामने मिल रहे कवरेज़ के मद्देनजर अपनी सहयोग राशि भी क्रियाकर्म फण्ड में दे देकर चलते बने। दो साँड़ों को मुक्त विचरण के लिए पूरी चरागाह मिल गई थी। करीब हजारेक रुपए हाथ लग गए थे जिसे दोनों ने जेबों के हवाले किए और क्रियाकर्म का सामान लेने चल दिए ताकि बुधिया की मिट्टी खराब न हो।
जुआरी के हाथ मेँ पैसे आते ही जैसे खुजली चलने लगती है और किसी  नेता को जनता के सामने शोक सभा मेँ भी भाषण सूझने लगता हैवैसे ही पैसे हाथ मेँ आते ही दोनों के नथुने पुलिस के कुत्तों की तरह शराब की गंध खोजने को बेचैन होने लगे। बाज़ार मेँ उनके पैर स्वतः ही उन्हें पास्कल के दारू के अड्डे पर खींच ले गए।
“दादा, लोग हमसे पूछेंगे कि क्रियाकर्म के पैसे कहाँ गए तो हम क्या जवाब देंगे ?” लगभग आधी बोतल खाली करने के बाद माधव को अचानक ज़िम्मेदारी का इल्हाम हुआ।  नशे में भी आदमी के मुँह से कभी कभी आत्मा की आवाज निकल ही आती है।
घीसू हँसा, “अबे कह देंगे कि जेब फटी थी और रुपए उसमें से खिसक गए। बहुत ढूँढ़ा, मिले नहीं। लोगों को विश्वास तो न आएगा लेकिन फिर वही हमें रुपए देंगे। और कोई न दे तो वो भोत सारे एनजीओ वाले कहाँ जाएँगे। हाँ तब रुपए हमारे हाथ न आएँगे। फिर स्वर्गवासी बहू के सम्मान मेँ शोक संदेश जारी करने जैसी मुद्रा में कहने लगा, “कितनी भली औरत थी बेचारी जो जाते जाते भी हमारा गला तर कर गई!”
पास्कल की इस अवैध मधुशाला की रौनक अंधेरे के साथ साथ बढ़ती जा रही थी। शराब का नशा बेसुरे से बेसुरे आदमी को सुरीला होने का गुमान पैदा कर देता है और अँग्रेजी में हमेशा फेल होते रहने वाले को धाराप्रवाह बोलने की प्रेरणा भी दे देता है। वहाँ भी कोई गाने लग जाता तो कोई अंग्रेज़ी झाड़ने लग जाता। कोई कोई देश मेँ रोज रोज उजागर हो रहे घोटालों पर घोटालेबाज़ों को गाली बकने लग जाता था। समझना मुश्किल था कि यह मात्र शराब का असर था या सबके मुख से देश व समाज की आज की सही तस्वीर सामने आ रही थी।   
     “कुछ भी कहो दादा, वह बैकुण्ठ मेँ जाएगी, वह बैकुण्ठ की रानी बनेगी।“ माधव ने मछली का एक बड़ा टुकड़ा मुँह मेँ डालते हुए कहा।
     “हाँ बेटा
, जरूर बैकुण्ठ मेँ जाएगी। इतने दुःख देखने के बाद भी जिसके मुख से कभी किसी के लिए बुरा न निकला वह बैकुण्ठ नहीं जाएगी तो क्या वो बैकुण्ठ जाएंगे जो मुल्क को बेचने पर तुले हैं? क्या वो बैकुण्ठ जाएंगे जो हमारी गाय भैंसों का चारा खा गए हैं...या क्या वे बैकुण्ठ जाएंगे जिन्होंने माँओं के सामने बेटों के कत्ल कर दिए है?,,,नहीं नहीं माधव...तेरी बुधिया जरूर बैकुण्ठ जाएगी।“ घीसू भी आखिर बिलख ही उठा।
और माधव खड़ा होकर गाने लगे-
बुधिया बदनाम हुईSSS माधव तेरे लिए...!
घीसू भी सुर मेँ सुर मिलाने लगा-
“बुधिया की जान गईSSS माधव तेरे लिए...!”
फिर दोनों शादियों मेँ नाच रहे अधेड़ों की तरह नाचने लगे। चुनावों की रैलियों मेँ पैसे लेकर शामिल हुए कार्यकर्ताओं की तरह कभी उछलने, कभी कूदने और कभी मटकने भी लगे। और जैसा कि अधिकतर शराबियों के साथ होता है, अंत मेँ नशे से बदमस्त होकर वहीं धड़ाम से गिर पड़े।
सरकार ने आनन फानन में एक जाँच आयोग बैठा दिया है।
(प्रेमचंद जी से क्षमायाचना सहित)
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 100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001 (म॰प्र)

Wednesday, 23 July 2014



व्यंग्य               
                          
नारद, अंगद और वैदिक

                                         ओम वर्मा
                                                                         om.varma@gmail.com
र्म ग्रंथों में अक्सर दो दूत, मध्यस्थ या वार्ताकारों का उल्लेख आता है- अंगद और महर्षि नारद ! अंगद अपने दूत-कर्म के लाइफ टाइम अचीवमेंट वाले परफॉर्मेंस के कारण जाना जाता है जिसे राम ने रावण के पास युद्ध टालने के अंतिम प्रयास हेतु एक राजनयिक दूत बनाकर भेजा था। धार्मिक लोग अंगद को इस डिप्लोमेटिक मिशन के कारण जानते हैं और कुछ चतुर लोग उसकी खूबियों को कुछ ऐसी आत्मीयता से आत्मसात कर चुके हैं कि मलाईदार जगह पर ऐसे पैर जमाते हैं कि बरसों उन्हें कोई हिला भी नहीं पाता। 
   जिस रावण ने पड़ोसी राजा की बहू व भावी महारानी का अपहरण कर लिया हो उसका अपराध आज के पटरियाँ उखाड़ने वाले या 9/11 के ट्विन टॉवर्स, या 26/11 के ताज होटल के विध्वंसकारियों से कम तो कतई नहीं माना जा सकता! जाहिर है कि अयोध्या के लिए रावण की छवि वही थी जो अमेरिका के लिए कल ओसामा की या भारत के लिए आज हाफ़िज़ सईद की है। रावण प्रभु श्रीराम से अधिक शक्तिशाली भले ही नहीं था फिर भी उसने प्रभु का सुख चैन तो छीन ही लिया था। इसी तरह हाफ़िज़ सईद की ताकत भी भारत से भले ही बहुत कम हो, तब भी भारत के लिए वह उतना ही अवांछित है जितना त्रेतायुग में राम के लिए रावण था। दूसरे दूत नारद दरअसल एक फ्री-लांसर किस्म के दूत थे जिन्हें मुक्त भ्रमण के लिए कभी भी किसी लोक ने वीज़ा जारी करने में कोई अमेरिकाना हरकत नहीं की थी। उनके कदम जहाँ भी पड़ते वहाँ कलह का बीजारोपण अपने आप हो जाता था।
   लेकिन अब एक और दूत हैं डॉ. वेदप्रताप वेदिक, जिसके उल्लेख के बिना दूतों का इतिहास कभी पूर्ण नहीं कहा जा सकेगा। यह अभी तक एक गूढ़ रहस्य ही बना हुआ है कि वैदिक नारद की तरह स्वयं स्वतंत्र विचरण करते हुए शत्रु के खेमे में गए थे या अंगद की तरह उन्हें वहाँ अच्छे दिनों की खोज में भेजा गया था। भले ही वे किसी गुप्त मिशन के तहत भेजे गए अंगद हों, पर वे दोनों मुल्कों के सियासी हल्कों में खलबली मचाकर नारद तो साबित हो ही चुके हैं। इंटरव्यू की पूरी क्लिपिंग में वे कहीं भी अंगद की तरह अपने राम के सामर्थ्य का बखान करते या अपना पैर जमाकर हिला भर देने की चुनौती देते तो नज़र नहीं आते, अलबत्ता वे इतमीनान से सोफ़े पर बैठे अवश्य नज़र आते हैं। अंगद ने हनुमान जी के साथ मिलकर वानर सेना गठित की थी। मगर ये अपने राम के लिए कोई टास्क फोर्स गठन करते या कोई हेल्पिंग हैण्ड बढ़ाते उससे पहले ही अयोध्या के दरबारियों ने उनसे पल्ला अवश्य झाड़ लिया है। आज के ये अंगद न सिर्फ पूरी तरह अलग थलग पड़ गए हैं,बल्कि उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाने तक की बात हवा में उछाली जा रही है। अंगद के साथ तो उसकी माँ तारा जो तत्कालीन पंचकन्याओं में से एक थी, भी राम-रावण प्रसंग में साथ थी। इधर आज देश की प्रभावशाली पंचकन्याओं में से एक सुषमाजी इस अंगद से कई योजन की दूरी बना चुकी हैं।
  
   बहरहाल, जाने अनजाने वैदिकजी जनता व अच्छे दिनों के बीच दीवार बन ही चुके हैं! 
                                                                
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