Saturday, 15 November 2014

ओपिनियन पोल यानी हँडिया का एक दाना


     ओपिनियन पोल यानी हँडिया का एक दाना
                                          ओम वर्मा
                                                       om.varma17@gmail.com
बिना स्वप्न आधारित या बिना पुरातत्वीय खुदाई के अपनी मातृभूमि को स्वर्णनगरी मेँ बदल देने वाले त्रिलोकपति लेकिन महाअहंकारी दशानन का वध तथा चौदह वर्ष का वनवास काट कर जब प्रभु श्रीराम अयोध्या लौटे तो इतिहास का पहला ओपिनियन पोल उनकी राह देख रहा था ।
     बाहरी व्यक्ति द्वारा अपहृत पत्नी को वापस उचित स्थान दिए जाने का ‘अपराधकरने पर हो रही लोकनिंदा व कानाफूसी से रामजी भी तंग आ गए थे! अब चूँकि हर अयोध्यावासी से मिलना तो उनके लिए संभव नहीं था।लिहाजा उन्होंने स्वयं छद्म भेष धारण कर ‘दलित के घर रात गुजारने’ वाली स्टाइल मेँ एक लॉन्ड्री वाले के यहाँ व कुछ अन्य अड्डों पर कुछ समय व्यतीत कर केजरीवाल स्टाइल में आम नागरिकों की राजा के आचरण पर प्रतिक्रिया जानी। जाहिर है कि त्रेता युग के इस महान  शासक ने किसी संस्था से फिक्स्ड सर्वे’ करवाने के बजाय स्वयं एक सेंपल सर्वे कर पहले ओपिनियन पोल की विधिवत शुरुआत कर दी थी।
     एक ओपिनियन पोल का उल्लेख मुगलकालीन इतिहास मेँ भी मिलता है जो इससे थोड़ा भिन्न है। हुआ यूँ कि एक दिन बादशाह अकबर भरमा बैंगन की शानदार सब्जी खाकर मस्त हो गए थे और उसका स्वाद मुँह मेँ देर तक बना रहा। सभासदों के बीच मेँ उन्होंने सबसे पहले इसका जिक्र किया तो बीरबल ने तुरंत राजनीति के ‘अनुशासित सिपाही’ की तरह बयान जारी किया, “हुज़ूर बैंगन तो सब्जियों का राजा है। उसका रंग शानदारसर पर बादशाहों जैसा ताज! जहांपनाह का हुक्म हो तो बैंगन को राजकीय सब्जी घोषित कर दिया जाए!
     बैंगन को राजकीय सब्जी घोषित करने की प्रक्रिया चल ही रही थी कि एक दिन बादशाह अकबर ने फिर वही मसालेदार सब्जी और ज्यादा खा ली। उन दिनों वहाँ न तो कोई जयराम रमेश थे और न कोई विद्या बालनतब भी उन्हें शौचालय की महत्ता समझ मेँ आ गई। अगले दिन उन्होंने दरबार मेँ बैंगन की सब्जी को कोसते हुए जैसे ही अपनी हालत के बारे मेँ बताया कि चतुर सुजान बीरबल ने तुरंत शरद पँवार द्वारा मुंबई में नरेंद्र मोदी व बीजेपी के बारे मेँ बदली गई राय की तरह बैंगन के बारे मेँ अपनी राय बदली, ”जी आलमपनाह! बैंगन भी कोई सब्जी है...काला कलूटा ...सिर पर काँटों भरा ताज...कोई गोल तो कोई लंबा...! मेरी मानें तो हुज़ूर इसकी खेती पर ही पाबंदी लगा दें ताकि कल कोई इसमें नस्लीय बदलाव (जेनेटिक माडिफिकेशन) न कर सके।
      प्रभु श्रीराम चक्रवर्ती सम्राट व कानूनी तौर पर एक राज्य के राजा थे। राजतंत्र मेँ भी उन्हें ओपिनियन पोल जैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था मेँ विश्वास था। मगर इधर लोकतंत्र मेँ वर्षों या दिनों (49 ही सही) सत्ता सुख भोग चुके या सत्ता के इच्छुक मित्रों को वर्तमान ओपिनियन पोल फूटी आँख नहीं सुहा रहे हैं। वे कभी ओपिनियन पोल को  कूड़ेदान में फेंकने लायक बता देते हैं तो कभी मात्र हजार - दो हजार लोगों की राय बताकर खारिज कर देते हैं। शायद वे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ द्वारा करवाए गए ओपिनियन पोल की जगह बीरबल द्वारा बादशाह की स्तुति जैसा राजतंत्री ओपिनियन पोल चाहते हैं। वे शायद यह भूल रहे हैं  कि बैंगन प्रकरण मेँ अपनी नीति परिवर्तन पर बीरबल ने बादशाह सलामत को डिप्लोमेटिक जवाब देते हुए यह भी तो कहा था कि “हुज़ूर गुलाम नमक आपका खाता है न कि बैंगन का!” आज के बादशाहों को अब कौन समझाए कि जनता तो अपनी ही गाढ़ी कमाई से खरीदा नमक खा रही है! क्या वे यह भूल गए कि बचपन में जब घर में प्रेशर कुकर की सीटी नहीं बजती थी तब माँ चावल का सिर्फ एक दाना देख कर मालूम कर लिया करती थी कि हँडिया के बाकी दानों का क्या मिजाज़ है।

                      ***

100रामनगर एक्सटेंशनदेवास 455001 (म॰प्र॰)

Tuesday, 11 November 2014

व्यंग्य - भैंस-यूपी में स्वागत तो गुजरात में बगावत!


 


व्यंग्य  
    भैंस-यूपी में स्वागत तो गुजरात में बगावत!
                                     ओम वर्मा
                               om.varma17@gmail.com
हले उनकी तुलना काले अक्षरों से की गईफिर उन्हें हारमोन के इंजेक्शन लगाकर दुहना शुरू कर उनके बछड़े का दूध भी छीन लिया गयामगर वे खामोश रहीं। उधर लोग साँप जैसे बिना कान वाले जीव के आगे बीन बजा बजा कर अपना उल्लू सीधा करते रहे और इन्हें अपने आगे बीन बजाए जाने का सिर्फ सियासी आश्वासन ही मिलता रहा। और तो और कभी आज तक किसी ने दूध दुहते वक़्त भी इनके आगे बीन बजाने की बात तो छोड़ो बीन का रेकोर्डेड म्यूज़िक तक नहीं सुनवाया। काले अक्षर मसि- कागद से निकल कर कंप्यूटर के की-बोर्ड में और बीन की धुन सिंथेसाइजर में समा गई। मगर भैंस के भैंसपने में आज तक कोई अंतर नहीं आया।
   मगर इन्हीं काले अक्षरों को अपनी कुछ ऊर्जा अब इन भैंसों पर भी खर्च करनी पड़ रही है। इनके माध्यम से भैंसें भी अब सुर्खियाँ बटोर रही हैं। पहली बार तब जब यूपी के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री मुहम्मद आजम खां के वीआयपी आवास या वीआयपी तबेले से अपने चोरी हो जाने पर इन्होंने पुलिस महकमे में नई ऊर्जा का संचार किया। पुलिस ने आनन फानन में इन्हें बरामद कर साबित कर दिया कि दंगों व बलात्कारियों के ऊँचे उठते ग्राफ के बावजूद भी पुलिस ‘कहीं न कहीं अवश्य सक्रिय है!  बल्कि ‘ऑपरेशन भैंस’ ने सिद्ध कर दिया कि असली पुलिस वह है जो मूक प्राणियों तक का दर्द समझती है। यदि यह एक ही बार हुआ होता तो इसे महज़ तुक्का या मंत्रीजी की जी-हुज़ूरी कहकर उड़ाया जा सकता था। मगर अहो भाग्य कि यूपी पुलिस को ‘प्राणी मात्र’ का रक्षक व चिंतक साबित करने का दूसरा अवसर भी मिल गया।
    इस बार मौका दिया उन पाँच भैंसों ने जो आजम खाँ साहब के लिए पंजाब से खरीदी गईं और हरियाणा के रास्ते यूपी की बॉर्डर तक पहुँचीं। खड़े खड़े पहुँचीं इन पाँच सहेलियों की मूक फरियाद को सुना आजम खाँ सा. के नज़दीकी और राज्य मंत्री का दर्ज़ा प्राप्त सपा नेता सरफराज खाँ ने। उन्होंने इनके सहारनपुर पड़ाव पर देखभाल करने का वहाँ की पुलिस को कथित रूप से फरमान जारी किया। बॉर्डर से ही यूपी पुलिस ने उस गाड़ी को सहारनपुर के रास्ते रामपुर तक एस्कॉर्ट किया। सुना है कि कुछ अति उत्साही कार्यकर्ता डीजे साउण्ड पर “मेरी भैंस को डण्डा क्यों मारा...” बजवाकर नाचते-गाते चलना चाहते थेजिन्हें बड़ी मुश्किल से रोका गया। सिर्फ हूटर बजाती पुलिस की गाड़ी भैंस के वाहन के आगे चल रही थी। सरफराज खां सहारनपुर जिले के गगलहेरी थाना क्षेत्र के पशुगृह में भैंसों की देखभाल का जायजा लेने स्वयं गए। पुलिसकर्मी कानून-व्यवस्था संबंधी अपनी ड्यूटी छोड़कर पंजाब से लाई गई खां सा. की पाँच भैंसों की देखभाल में जुटे रहे। उन्होंने भैंसों के चारे-पानी और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए। उन्हें मच्छर न काटें और कीड़े-मकोड़े कोई नुकसान न पहुँचा पाएँइसका भी खासा ख्याल रखा गया। एसएसपी राजेश पाण्डेय ने तो मीडिया के सामने यह स्वीकार भी किया कि ये भैंसें खां सा.की थीं और अगले दिन तड़के चार बजे उन्हें रामपुर रवाना किया गया।
   हर अच्छे काम की शुरुआत घर से ही होनी चाहिए। आज भैंसों की सुरक्षा की गई है तो कल आम आदमी की भी होगी। सूत्रों के हवाले से यह ज्ञात हुआ है कि यूपी सरकार ने जीव दया आंदोलन वाले से पुलिस दल को सम्मानित करने की अनुशंसा की है।        
    यूपी में मिले वीआईपी ट्रीटमेंट के बाद गुजरात की भैंसों के मन में भी अच्छे दिनों की आशा का संचार हो गया है। सूरत एयर पोर्ट पर उनका प्रतिनिधि इसी उद्देश्य को लेकर विरोध प्रकट करने हवाईजहाज के सामने फेंसीड्रेस वाले अंदाज में कुछ इस तरह दौड़ता हुआ आया कि अभी तक उनके 'ही' या 'शी' होने का फैसला भी नहीं हो सका है। गुजरात में भैंसों ने बगावत शुरू कर दी है। अन्य राज्यों की भैंस बहिनें सुन रही हैं न!
                                                              ***
------------------------------------------------------------------------------------------------
100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास (म.प्र.) 455001




Wednesday, 5 November 2014

मानस के राजहंसों के नाम !



व्यंग्य (पत्रिका, 01.11.14.)
              मानस के राजहंसों के नाम !
                                   ओम वर्मा
                        
om.varma17@gmail.com

भे  रहे  स्नेह निमंत्रण, प्रियवर तुम्हे बुलाने को| ओ मानस के राजहंस, तुम भूल न जाना आने को पता नहीं किस महाकवि ने ये पंक्तियाँ लिखी थीं। मगर जिस तरह बैण्ड वालों के लिए बहारों फूल बरसाओ...गाना देकर शंकर-जयकिशन अमर हो गए हैं उसी तरह वैवाहिक पत्रिकाओं के लिए स्वागत की उक्त दो पंक्तियाँ लिखकर वह अनाम कवि भी युगों युगों के लिए अमर हो गया है।
         मगर पिछले कई वर्षों में मैं कई ऐसी शादियों का भी हिस्सा रहा हूँ जिनमें हुई कुछ विशिष्ट घटनाओं के कारण मैं इन पंक्तियों में आंशिक सुधार किया जाना आवश्यक समझता हूँ। बात शुरू करता हूँ राधेश्याम जी से। इनकी खासियत है कि इनको निमंत्रण चाहे अकेले व्यक्ति का मिले, हमेशा छह लोगों के भरे-पूरे परिवार के साथ ही जाते हैं। घर में अगर चार ऐसे मेहमान भी हों जिनका विवाह वाले घर से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं हो, उन्हें भी साथ ले जाने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता। कोई भी व्यक्ति इन राधेश्याम जी को जो वैवाहिक पत्रिका दे उसमें इस मानस के राजहंस को निम्न पंक्तियों से निमंत्रण दिया जाए- भेज  रहे  स्नेह निमंत्रण, प्रियवर तुम्हे बुलाने को। घर भर के मेहमानों को तुम साथ न लाना खाने को
      इसी तरह एक हैं बत्तो बुआ। रिश्ता चाहे कितना ही लंबा हो, हर कार्यक्रम में चार दिन पहले से पूरे परिवार के साथ मौजूद। वे जहाँ रुकें वहाँ तीसरे दिन लड़ाई न हो यह हो ही नहीं सकता। उनकी यह अमिट छाप नाते रिश्तेदारों में दूर दूर तक बनी हुई है। बेहतर हो कि उनके माननीय राजहंस यानी जगत फूफाजी को भेजी जाने वाली पत्रिका में दूसरी काव्य पंक्ति में निम्न परिवर्तन हो- भेज रहे.....। साथ न लाना बत्तो भुआ को घर भर से लड़वाने को
     ऐसे ही बिहारीलाल जी का प्रबंधन भी समझना मुश्किल है। पिछले बीस वर्षों में इनके यहाँ चार शादियाँ हो चुकी हैं। हर शादी में दो घण्टे में खाना खत्म ! हर बार कम से कम सौ-डेढ़ सौ लोग बिना भोजन के वापस लौटे हैं। इन्हें अपनी अगली वैवाहिक पत्रिका में काव्य पंक्तियों को निम्नानुसार रूपांतरित कर छपवाना   चाहिए- भेज रहे...। थोड़ा सा खाना भी अपने साथ में लाना खाने को
     और अब बात परमानंद काका सा. की। वे कला फिल्म के डायरेक्टर की तरह शादियों में भी हमेशा ऑफ बीट चलते हुए गिरते पानी में दाल बाफले और पूस की रात में हो  रही दावत में आइसक्रीम या श्रीखण्ड की माँग कर बैठते हैं। दूल्हे को किसी भी बात पर बिलावल भुट्टो द्वारा कश्मीर की एक एक इंच जमीन की तरह अड़ जाने के लिए भड़काना उनका प्रिय शगल है। इनको दिए जाने वाले निमंत्रण पत्र में निम्न पंक्तियाँ होनी चाहिए-भेज रहे...। परमानंद जी आ मत आना फिर माथे रँगवाने को
     और अंत में बात भियाजी की बात जिनके बिना शहर का हर  कार्यक्रम अधूरा है। ये राजनीति के एक उभरते हुए सितारे हैं। पिछले बीस साल से उभर ही रहे हैं। उन्हें व उनके दाएं बायों को यह अटूट विश्वास है कि वे एक दिन टिकट पाकर ही रहेंग़े। चमचों की एक पूरी की पूरी फौज़ हमेशा उनके साथ रहती है। वैवाहिक कार्यक्रमों में भी वे पूरे लवाजमें के साथ पहुँचते हैं। आधे चमचे पहले गला तर करके आते हैं। इनको दिए जाने वाले निमंत्रण पत्र में निम्न पंक्तियाँ प्रस्तावित हैं- भेज रहे...। चमचों की तुम फौज़ न लाना झूठी शान दिखाने को॥”  
    वैवाहिक कार्यक्रमों की गरिमा बनाए रखने के लिए निमंत्रण पत्रों में आवश्यकतानुसार ये सुधार निश्चित ही उपयोगी साबित होंगे।
--------------------------------------------------------------------------------------------
100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001

Thursday, 30 October 2014



व्यंग्य (नईदुनिया,29.10.14)
        समर्थन की वरमाला !
                       ओम वर्मा
                                   om.varma17@gmail.com
 
जैसे सोने का मिलना भी अशुभ और खोना भी अशुभजैसे पुलिसवालों से न दोस्ती अच्छी न दुश्मनी अच्छीजैसे अल्पवृष्टि भी त्रासदी और अतिवृष्टि भी कयामत, वैसे ही राजनीति में समर्थन लेना भी अशुभ और न लेना भी अशुभ होता है। यह समझना मुश्किल है कि समर्थन न लेना ज्यादा अशुभ है या लेना। समर्थन न लेना यानी आसमान से नीचे गिरना और ले लेना(चाहे बाहर से ही सही) यानी खजूर पर पूरे पाँच साल तक अटके रहना! न जाने कब समर्थक अत्ता माझी सटकली की दहाड़ लगाता हुआ आए और खजूर हिलाकर नीचे टपका दे!
    वैसे देखा जाए तो समर्थन  का इतिहास सदियों पुराना है। त्रेतायुग में .विभीषण ने अपने ज्येष्ठ भ्राताश्री के बजाय प्रभु श्रीराम को समर्थन दिया पर उनका वह कृत्य था सत्य की रक्षा के लिए। द्वापर के महाभारत काल में अर्जुन और दुर्योधन भगवान श्रीकृष्ण से समर्थन लेने पहुँचे थे। यहाँ समर्थन की डील को दो फेक्टर्स ने प्रभावित किया : एक तो टाइमिंग और दूसरा उनकी लोकेशन। अर्जुन निद्रालीन प्रभु के चरणों के पास खड़े थे जबकि दुर्योधन सिर के पास। अर्जुन को मिला सारथी और दुर्योधन ने पाई नारायणी सेना। एक ने पाई ‘क्वालिटी’ तो दूजे ने ’क्वांटिटी। संदेश साफ था कि याचक बनकर ही सशक्त व स्थाई समर्थन लिया जा सकता है। यही नहीं कृष्ण ने समर्थन देते समय यह शर्त भी रखी कि वे शस्त्र नहीं उठाएँगेसिर्फ सारथी की भूमिका में रहेंगे यानी समर्थन अहिंसात्मक होगा।
   अब समर्थन के मायनेतौर तरीके और समर्थन लेने व देने वाले दोनों पूरी तरह से बदल गए हैं। समर्थन लेने वाला माँगे या न माँगेदेने वाला शोले के गब्बर की तरह अपनी शर्तें पहले रखने लगता है। जब तक बसंती नाचती रहेगीवीरू की साँसें चलेंगी। मुट्ठी भर विधायकों/सांसदों के दम पर समर्थक सारे मलाईदार विभाग अपने पास चाहता है। चूहे मात्र कुछ चिंदियों के बदले कपड़े की पूरी दुकान के लिए अड़ जाते हैं। समर्थन देकर कोई बहिनजी  सिर्फ अपनी ‘माया’ के विस्तार में लग जाती हैं तो कोई दीदी समर्थन देकर भी अवसर पाते ही समर्थित व समर्थक के बीच की ‘ममता’ का सेतु तोड़ने में तनिक देर नहीं करतीं। और अम्मा के पास तो समर्थन लेने के लिए दिल्ली वालों को इस तरह जाना पड़ा था मानो जलालुद्दीन अकबर पुत्र की कामना के लिए नंगे पैर सूफी संत सलीम चिश्ती की ख़ानक़ाह पर जा रहे हों।  
    मगर कभी कभी पांसे उलटे भी पड़ जाते है। जैसे पाँच वर्ष पूर्व दिल्ली में हुआ व इस बार मुंबई में होता नजर आया। दिल्ली में यूपी के हमारे एक मित्र जनपथ की सड़कों पर ‘मर्थन ले लो SSS समर्थन’ की हाँक लगा-लगाकर दिन भर घूमते रहेमगर किसी ने उन्हें घास तो दूरतिनका तक नहीं डाला था। ऐसी ही हाँक इन दिनों मुंबई में दो फेरी वाले सिर पर टोकरी रख कर लगाते नजर आए। एक की टोकरी में ढेर सारी घड़ियाँ थीं तो दूसरे की टोकरी में तीर-कमान। सभी पर समर्थन हाजिर है लिखे स्टिकर लगे थे। लेकिन घड़ी वाले की सारी घड़ियाँ या तो बंद पड़ी हुई थीं या उनमें बारह बज रही थी। वहीं तीर-कमानों की प्रत्यंचाएँ उतरी हुई थीं व तीर भोथरा गए थे।
    राजनीति का रंगमंच धीरे धीरे स्वयंवर में तब्दील होने लगा है। विवाह योग्य सुंदर राजकुमार सिर्फ एक होता है जिसका वरण करने के लिए कल तक सत्ताई सौंदर्य के मद में चूर पड़ी राजकुमारियाँ समर्थन की वरमाला लेकर पीछे पीछे दौड़ने लगती हैं। दिल्ली में हुए स्वयंवर में भी ऐसी ही थुक्का-फजीहत हुई थी जो लोगों की स्मृति से अभी मिटी भी नहीं थी कि अब एक नया एपिसोड सामने आ गया है। यह समर्थन की वरमाला का ही पुण्य-प्रताप है की हमेशा ‘लट्ठ भारती’ की बात कर दूसरों की धड़कनों को नियंत्रित करने वाले सीधे ‘विविध भारती’ की तरह देश की सुरीली धड़कन बनने का क्षुद्र प्रयास करते नजर आने लगे हैं।   
   और सबसे खतरनाक समर्थन तो वह होता है, जो बाहर से दिया जाता है, जिसकी महत्ता बहिर्मन के हथकंडे से ही प्रमाणित होती है। ऐसा समर्थन लेना तो मानो सबसे अशुभ होता है।
                                                          ***
--------------------------------------------------------------------

100, रामनगर, एक्सटेंशन, देवास 455001(म.प्र.)

Wednesday, 29 October 2014


नईदुनिया, दि. 29.10.2014 में प्रकाशित व्यंग्य


imageview

Monday, 20 October 2014

विचार - वंशवाद के ताबूत में एक और कील!




विचार
   वंशवाद के ताबूत में एक और कील! 
                      ओम वर्मा        om.varma17@gmail.com 
रियाणा व महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में व इससे पहले सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस की जो गत हुई है उसकी कल्पना किसी कांग्रेसी या जी हुज़ूरी के शोर में डूबे गांधी परिवार ने शायद ही कभी की होगी। गांधी परिवार को लेकर कांग्रेसियों की सोच कुछ ऐसी है कि तेरे नाम से शुरू, तेरे नाम पे खतम’ पार्टी अध्यक्ष से लेकर उपाध्यक्ष और संसदीय दल की अध्यक्ष तक गांधी ही गांधी...! 1999 में  शरद पवार संगमा व तारीक अनवर के साथ मिलकर सोनिया गांधी के विदेशी मूल के आधार पर अलग होकर भी पंद्रह साल तक साथ चलते रहे हैं। एनडीए ने नरेंद्र मोदी को जब पीएम उम्मीदवार के रूप में सामने रख कर बढ़त  ले ली थी तब यूपीए सिर्फ संवैधानिक प्रावधान की दुहाई देता रह गया था कि पीएम सांसदों के द्वारा चुना जाता है। मगर वे यह भूल गए थे कि किसी को पीएम उम्मीदवार घोषित करके चुनाव लड़ने पर कोई कानूनी रोक भी तो नहीं है। यह भी सभी जानते थे कि जयपुर सम्मेलन में राहुल गांधी की पार्टी उपाध्यक्ष के रूप में नियुक्ति ही इसलिए की गई थी कि भविष्य में उनका राजतिलक किया जा सके। जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी को पीएम पद का दावेदार घोषित किया था तब यह कहने की हिम्मत किसी कांग्रेसी में नहीं थी कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ राहुल गांधी को लाना ‘निर्बल से लड़ाई बलवान की ’ वाली बात साबित हो जाएगी। और तो और जैसी कि अब माँग उठने लगी हैराहुल की तुलना में प्रियंका को लाना शायद ज्यादा फलदायी हो सकता थायह बात कोई भी कांग्रेसी न तो समझ सका न 10जनपथ को समझा सका। समझाता भी कैसेजहाँ एक ओर मनु सिंघवी सरीखे बड़े वफादार जब यह स्थापित करने पर तुले थे कि “राहुल तो जन्मजात नेता हैं एक वरिष्ठ नेता तो राहुल जी को जीवन में एक बार पीएम के रूप में देखने के लिए ही जीवन जी रहे हैंवहीं कुछ लोग सोनिया को देश की माँ बताकर उनके एक इशारे पर झाड़ू तक लगाने के लिए तैयार बैठे थे। और तो और मासूमियत की हद तो तब हो गई थी जब पिछले दिनों लोकसभा में सोते हुए राहुल गांधी का ‘चिंतन’ करते हुए बताकर  बचाव किया गया था। 
     लोकसभा चुनावों की तरह विधानसभा के इन चुनावों में भी जहाँ नरेंद्रभाई एण्ड कं. अपनी सभा व मीडिया में स्थानीय सरकारों की नाकामियों को बड़ी शालीनता से उठाते रहे वहीं दोनों राज्यों में शासक दलों की स्थिति इतनी दयनीय थी कि वे अपनी छोटी-मोटी उपलब्धियों को भी जनता के जहन में नहीं उतार सके! गुजरात के 2002 एपिसोड का मुद्दा तो लोकसभा चुनाव में ही पिट चुका था। नरेंद्र मोदी को अमेरिका में बापू का नाम मोहनदास की जगह मोहनलाल बोल देने पर पानी पी पीकर कोसने वाले काँग्रेसी मित्रों को राहुल द्वारा पृथ्वीराज चौहान के विधानसभा भंग होने के कारण त्यागपत्र देने के बाद भी उन्हें सीएम बताने की बात पर यूँ चुप थे मानो उन्हें साँप सूँघ गया था।
    मोदी पर पुस्तकें आनाविदेशी अखबारों में उनके राज्य के विकास की प्रशंसा होना और तभी मनमोहनसिंह को कमजोर पीएम बताने वाली दो किताबें आना व अमेरिका के मेडिसन गार्डन में उनका भाषण अंतत: राहुल गांधी व नरेंद्र मोदी में वामन व विराट की इमेज बनाते चले  गए।
    महाराष्ट्र की जनता ने यह साबित कर दिया है कि देश में उग्रवादी तेवर दिखानाटोल नाकों पर उपद्रव करना व अन्य प्रांत से रोटी कमाने आए लोगों का तिरस्कार जैसे मुद्दों की काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ाई जा सकती। साथ ही महाराष्ट्र में मुस्लिम समाज ने काँग्रेस व एनसीपी के बजाय जो विश्वास भाजपा में दिखाया है उसे सिर्फ संपूर्ण समुदाय में सुरक्षा का भाव जागृत करके ही रिसिप्रोकेट किया जा सकेगा।                                         ***
--------------------------------------------------------------------------------------------
                       
 
100रामनगर एक्सटेंशनदेवास 455001