Wednesday, 29 April 2015
Tuesday, 28 April 2015
Monday, 27 April 2015
Friday, 24 April 2015
उनका छुट्टी से आना
व्यंग्य
उनका छुट्टी से आना!
ओम वर्मा
शायद वे देश के पहले राजनेता हैं जिनका दृश्यपटल पर न होना उनके होने से ज्यादा चर्चा में रहा। जब वे ‘सक्रिय’ थे तो पार्टी के वरिष्ठजनों का भी अवलंबन थे। वे नहीं थे तो सोशल मीडिया के सारे चुटकुलेबाज भी परेशान थे क्योंकि अब तो उन्हें आलिया भट्ट भी कोई मौका नहीं देती।
किसी वीआईपी को जब मुख्य परिदृश्य से दूर करना होता है तो उसके लिए ‘लंबी छुट्टी पर भेजने’ जैसी सम्मानजनक सूक्ति इस्तेमाल की जाती है जबकि छोटे मोटे के लिए‘निलंबन’। गैर कांग्रेसियों को उनका लंबी छुट्टी पर जाना शायद पार्टी हित में उठाया गया ऐसा ही कोई ‘सम्मानजनक’ कदम लगा होगा। लेकिन एक वरिष्ठ पार्टीजन के अनुसार वे ‘चिंतन-मनन’ के लिए एकांतवास पर गए थे। चिंतन तो उनका पुराना पेशन (Passion) है जिसे वे संसद में बीच सत्र में आँखें बंद कर भी कर लिया करते थे। मगर उनके इस चिंतन प्रवास से पार्टी को और कुछ हासिल हो न हो ‘चिंता’ जरूर हासिल हो गई थी। कहाँ तो पार्टी के कई वरिष्ठजन अध्यक्ष के रूप में उनका राजतिलक देखना चाहते थे और कहाँ वे कृष्ण की तरह ब्रज में गोपियों को रोता बिलखता छोड़ चले गए! जयपुर अधिवेशन में उनकी ताजपोशी के समय माते ने जहर के नाम से डरा तो दिया था मगर कान में यह मंत्र नहीं फूँका कि तैरना सीखने के लिए पानी में उतरना ही पड़ता है, जमीन पर चिंतन करने से कोई तैरना नहीं सीख सकता। कुछ पार्टीजनों की इच्छा थी कि शायद वे अवकाश पर जाने के बजाय हनुमान जी की तरह संकल्प लें कि कांग्रेस को सत्ता में लौटाए बिना ‘मोहि कहाँ बिश्राम!’, मगर उनकी आवाज बैंड-बाजे के शोर में दुल्हन की सिसकियों की तरह दब कर रह गईं।
बहरहाल हाशिए पर सिमटकर आईसीयू में दाखिल कांग्रेस का इस समय लोकतंत्र की रक्षा के लिए एक मजबूत पार्टी के रूप में पुनर्जीवित होना बेहद जरूरी है। शायद उन्हें अपने दल की ऐसी स्थिति देखकर सियासत से कुछ कुछ वैसी ही विरक्ति हो गई थी जैसी कभी राजकुमार सिद्धार्थ को एक रोगी, एक जईफ(अति वृद्ध व्यक्ति) और एक शवयात्रा देखकर राजपाट से हुई थी। उस विरक्ति ने तो सिद्धार्थ को ‘बुद्ध’ बना दिया मगर चौथा स्तंभ यह जानने को बेकरार है कि क्या ये भी किसी ‘बोधि वृक्ष’ जैसी शरणस्थली में चिंतन- मनन करके लौटे हैं या अपने पसंदीदा खेल ‘पेराग्लाइडिंग’ का आनंद ले रहे थे। क्या उनकी क्षुधा भी किसी ‘सुजाता’ ने शांत की है?
मेंढक जैसे कुछ शीत रुधिर(cold blooded) वाले जीव बिलों में छुपकर कुछ समय के लिए एक निष्क्रिय जीवन(हायबरनेशन) बिताते हैं। ऐसे ही कुछ पक्षी लंबी दूरियों के लिए माइग्रेट कर जाते हैं। हालाँकि हायबरनेशन और माइग्रेशन से लौटकर दोनों तरह के जीव एक नई ऊर्जा से भर जाते हैं। क्या हमारे युवराज का लौटना भी उनके व कांग्रेस के लिए ऐसा ही कायाकल्प करने वाला साबित होगा? या हो सकता है कि जैसे सुभाष बाबू के विलुप्त होने के अनसुलझे रहस्य पर कुछ कुछ अंतराल से कोई न कोई नई कहानी पेश कर दी जाती है और गरमागरम बहस होने लगती हैं, या जिस तरह हेमलेट नाटक के राजकुमार हेमलेट के‘पागलपन’ को लेकर समालोचकों में आज भी बहस होती रहती है कुछ वैसे ही अगले कई वर्षों तक देश में जेरे-बहस यह मुद्दा बना रहेगा और किताबें लिखी जाती रहेंगी कि हमारे युवराज अज्ञातवास पर कहाँ और क्यों गए थे, या उनका अवकाश पर जाना सचमुच चिंतन था या महज देशाटन था। और लाख टके का सवाल यह कि यदि चिंतन था तो उस चिंतन-मनन के मंथन से जो नवनीत उपजा है उससे क्या सचमुच उनका, पार्टी का या देश का कुछ भला हो सकेगा?
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संपर्क: 100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001
Wednesday, 22 April 2015
मेरा कुछ सामान रह गया है...!
मेरा कुछ सामान रह गया है...!
सन 1971 में आई जेमिनी की फिल्म ‘लाखों में एक’। नायक है भोला यानी मेहमूद जो अनाथ, भोला भाला, अल्प शिक्षित व बेरोजगार है। एक चाल में सीढ़ियों के नीचे उसका आवास। भोला चाल के सभी परिवारों के घरेलू कामकाज निपटाता है और बदले में सब दया करके उसे भोजन दे देते हैं। चाल में रहने वाली लड़की गौरी जो भोला से प्यार करती है उससे रहमो-करम पर चल रही भोला की जीवन दशा देखी नहीं जाती। तभी एक दिन सिंगापुर से एक करोड़पति व्यक्ति अपने पुत्र भोला को खोजता हुआ आता है। जैसे ही चाल वालों को मालूम पड़ता है कि भोला रोड़पति से करोड़पति बनने वाला है और उनमें से प्रत्येक को एक-एक लाख रु. मिलने वाले हैं, सभी का भोला के प्रति व्यवहार बदल जाता है। उससे कोई काम नहीं करवाता, कोई उसे पौष्टिक पेय, कोई अलार्म घड़ी, कोई टेबुल लैंप, कोई सूटकेस और कोई टेबुल फैन लाकर भेंट कर देता है। बाद में जैसे ही सभी को यह मालूम पड़ता है कि यह गौरी का चाल में ही रहने वाले ट्रक ड्राइवर शेरसिंह यानी प्राण के साथ मिलकर बनाया गया प्लान था जिसके तहत प्राण का क्लीनर जग्गा सूट बूट पहनकर मेहमूद का नकली करोड़पति बाप बनकर आया था और सबको लखपति बनने का ख्वाब दिखाकर चला गया था।
भोला के फिर से “जैसे थे” की स्थिति में पहुँचते ही सबकी नजरें फिर बदल जाती है। सब अपने द्वारा दी गई गिफ़्टें अपने अपने तर्क देकर वापस उठा ले जाते हैं। भोला ‘पुनः मूषको भवः’ वाली स्थिति में लौट आता है।
यही हाल आज ‘आप’ और अरविंद केजरीवाल का है। पार्टी बनी तो कुछ लोगों को उनमें जादूगर मैंड्रेक नजर आने लगा जिसके छड़ी घुमाते ही दिल्ली में रामराज्य आ जाएगा,दिल्ली वाले पड़ौसी राज्यों को बिजली और पानी देना शुरू कर देंगे। लिहाजा किसी ने एक करोड़ रु. चंदा दिया तो किसी ने कार दी। किसी ने पार्टी का लोगो बनाकर दिया और कइयों ने पार्टी का काम करने के लिए टीवी चैनल से लेकर आईटी सेक्टर की अपनी बड़ी बड़ी नौकरियाँ छोड़ दीं। मगर जो केजरीवाल कल अथाह जनता के बीच में “इंसान से इंसान का हो भाईचारा, यही पैगाम हमारा” गाकर सबको कोरस में गाने पर प्रेरित कर देते थे, वे आज अकेले ‘बिछड़े सभी बारी बारी...” गाने को मजबूर हैं। फिल्म में भोला से वापस ले ली गई गिफ़्टों की तरह केजरीवाल से भी वसूली अभियान शुरू हो गया है। कार माँगी जा चुकी है,बौद्धिक अधिकार संपदा कानून के तहत पार्टी का ‘लोगो’ वापस माँगा जा रहा है। सुना है कि जिन्होंने झाड़ू भेंट कर कई गोदाम भर दिए थे वे अपनी झाड़ू, जिन्होंने दस-दस, बीस –बीस हजार देकर डिनर किया था वे भोजन के तात्कालिक मूल्यानुसार पैसे काटकर बाकी पैसे माँगने के लिए उपभोक्ता फोरम या चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाने का सोच रहे हैं।
वैसे आज के युग में भेंट लेना व देना दोनों खतरे से खाली नहीं है। मोदी सर को भेंट में मिला कोट उन्हें दिल्ली चुनाव में ताश के चौकड़ी वाला कोट (एक हाथ भी न बनने पर पराजित के लिए कहा जाने वाला फ्रेज) साबित हुआ। वैसे ‘भेंट’ या ‘दान’ में दी गई वस्तु के बारे में जहाँ तक खाकसार को ज्ञान है, उसे वापस नहीं माँगा जा सकता या कहें कि नहीं माँगा जाना चाहिए। यहाँ कोई ‘राइट टु रिकाल’ लागू नहीं होता। लेकिन जहाँ आस्थाएँ भंग होने लगती हैं नई परंपराओं का जन्म भी वहीं होता है क्योंकि न तो आज दान लेने वालों में कोई महाराणा प्रताप है और न ही देने वालों में कोई भामाशाह! लोग ‘आप’ के दरवाजे पर खड़े हैं और पुकार रहे हैं, “मेरा कुछ सामान रह गया है...लौटा दो ना...!
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100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001(म.प्र. )
विचार
कमजोर कौन, राहुल गांधी या कांग्रेस?
कमजोर कौन, राहुल गांधी या कांग्रेस?
ओम वर्मा
पहले सोलहवीं लोकसभा
चुनाव व बाद में हरयाणा व
महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों के बाद से कांग्रेस अभी आईसीयू से बाहर निकली भी न थी कि दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणामों ने उसे
एक बार फिर वहीं पहुँचा दिया। हर बार की तरह फिर ‘प्रियंका लाओ’ के आठ – दस पोस्टर बाहर निकले जो हमेशा की तरह फिर संदूकों में समा गए।
जब भाजपा ने
नरेंद्र मोदी को पीएम पद का दावेदार घोषित किया था तब यह बात कोई भी कांग्रेसी न तो समझ सका था न 10, जनपथ को समझा सका कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ राहुल गांधी को उतारना
शेर के आगे सिर्फ बंदूक का लायसंस दिखाने वाली बात होगी। तभी राहुल की तुलना में
प्रियंका को लाना शायद ज्यादा फलदायी हो सकता था। लेकिन यह भी एक तरह से वंशवाद की
बेल को सींचना ही होता। कांग्रेस की दौड़ कहाँ तक? एक
गांधी से दूसरे गांधी तक! यदा-कदा कोई पार्टीमेन काँग्रेस को गांधी परिवार
के आभा मण्डल से दूर ले जाने के उपक्रम में आवाज उठा दे या कोई विरोध पत्र लिखे तो
उसे या तो ‘लेटर बम’ करार दे दिया जाता है या जयंती नटराजन बना दिया जाता है। संवैधानिक ढंग से
निर्वाचित वर्तमान प्रधानमंत्री की कार्यशैली या किसी अन्य गुण की कोई कांग्रेसी
अगर प्रशंसा कर भी बैठे तो या तो उसकी आवाज बैंड-बाजा-बरात के शोर में दुल्हन की
सिसकियों की तरह दब कर रह जाती है या उसे बगावत मान कर नोटिस थमा दिया जाता है।
आज इस पर विचार करना चाहिए
कि जिस देश की आबादी में 65 प्रतिशत युवा हों वहाँ राहुल गांधी की स्वीकार्यता
आखिर क्यों नहीं बन सकी? मेरे विचार में इस रुझान को
बदलने या बनने से रोकने वाली दो सबसे महत्वपूर्ण घटनाएँ थीं उनका टाइम्स चैनल पर प्रसारित इंटरव्यू जिसमें उनकी सूई बार बार अटक जाती थी और अमेरिका के ‘वाल स्ट्रीट जर्नल’ में रॉबर्ट वाड्रा के
मायाजाल का खुलासा होना। फिर रही सही कसर राहुल गांधी
के हिंदी ज्ञान ने पूरी कर दी जिसकी वजह से वे ‘वन आउट
ऑफ टू’ के लिए गुजरात में ‘एक में से दो’ बच्चे कुपोषित और पंजाब में 'सेवन आउट ऑफ टेन' के लिए 'सात में से दस' युवा नशे की गिरफ्त में बताते हैं। और तो
और चाटुकारिता की हद तो तब हो गई थी जब पिछले दिनों लोकसभा में सोते हुए राहुल
गांधी का ‘चिंतन’ करते
हुए बताकर बचाव किया गया था।
उनका विपश्यना शिविर के लिए
थाईलैंड जाना वैसा ही है जैसे राजतंत्र में किसी राजकुमार को राजतिलक से पहले गुरुओं के पास
भेजा जाता था। कुछ किस्से कहानियों में गणिकाओं के पास 'तहजीब प्रशिक्षण' हेतु भेजे जाने का उल्लेख भी मिलता है। लाख टके का सवाल यह है कि दो माह के लिए मुख्य भूमिका से दूर रहकर परदेस
में जाकर 'ज्ञान' प्राप्त करने या चिंतन मनन करने से लाभ किसे मिला है? अगर यह सिर्फ किसी के लिए 'व्यक्तित्व विकास' भर था तो पार्टी में क्या अन्य कोई भी नेतृत्व गुण वाला सदस्य नहीं है? सचिन पायलट या ज्योतिरादित्य सिंधिया राहुल गांधी से किस गुण में उन्नीस बैठते
हैं?
अब समय आ गया है कि कांग्रेसी नेहरू- गांधी परिवार का भाट-चारणों की तरह गुणगान बंद करें।
लोकतंत्र का तकाजा है कि कांग्रेसी वंशवाद व परिवारवाद के दायरे से अब बाहर
निकलें। राहुल गांधी को अगर कमान सौंपी जाती है तो कांग्रेस को भी कहीं दिल्ली
सीएम के लिए किरण बेदी की पेराशूट लैंडिंग जैसे परिणाम भुगतना पड़ सकते हैं और देश में
कांग्रेस के 'वंशवादी' होने का संदेश जाएगा जो अलग!
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(M.P.)
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