Friday, 12 June 2015
Thursday, 4 June 2015
घुसपैठ की जंग
ओम वर्मा
घुसपैठ यानी किसी के कार्यक्षेत्र, अधिकार क्षेत्र या परिसर में
अनधिकृत दखल या प्रवेश। यह सार्वभौमिक समस्या इन दिनों जीवन के हर क्षेत्र में व्याप्त
है।
मंदिर से दर्शन कर लौट रही एक बुजुर्ग महिला को
रास्ते में रोजाना भिक्षावृत्ति के लिए घर आने वाले पंडित जी मिले। माँजी ने उनका अभिवादन
किया तो पंडित जी ने दीन भाव से कहा कि माताजी आज आप घर पर नहीं थीं तो इस गरीब
ब्राह्मण को भिक्षा नहीं मिल सकी। बहूरानी ने कहा कि “आटा चक्की पर है।“
“अच्छा! बहू ने ऐसा कहा? आइए मेरे साथ।“
घर पहुँचते ही सासूमाँ ने भी पंडित जी को वही
जवाब दिया जो पहले बहू ने दिया था। पंडित जी ने जो कि परशुराम के वंशज थे, स्वयं को जब्त करते हुए
कहा, “यही
बात तो आपकी बहू भी कह चुकी थी। क्या यही कहने के लिए आप मुझे वापस लेकर आईं थी?”
सासूमाँ में ने अपना ललिता पवारी संस्करण जारी
रखते हुए कहा, “इस घर से भिक्षा देना या न देना यह मैं तय करूँगी। घर की
मालकिन मैं हूँ। वह कौन होती है मेरे अधिकार क्षेत्र में घुसपैठ करने वाली?” जाहिर है कि पंडित जी घुसपैठ के मुद्दे पर निरुत्तर होकर एक
बार फिर खाली हाथ लौट गए।
आज घुसपैठ कहाँ नही है? करगिल की घुसपैठ तो
इतिहास बन चुकी है क्योंकि वहाँ से खदेड़े जाने के बावजूद भी घुसपैठियों के सरदार
हार को गले में डाला गया हार समझकर हर साल जश्न मनाते रहते हैं। उधर पूर्वोत्तर के
राज्यों में वर्षों से चल रही घुसपैठ शनैः शनैः वोट बैंक में तब्दील हो जाती है और
यह मुद्दा भी राम मंदिर, काला धन व धारा 370 जैसे सिर्फ चुनावों के समय उठाए जाने वाले
अन्य मुद्दे की तरह फिर ठंडे बस्ते में समा जाता है। बड़े बड़े उद्योगों में
प्रयोगशाला विभाग व उत्पादन विभाग वाले एक दूसरे के अधिकार क्षेत्र में या तो
घुसपैठ करते देखे गए हैं या एक दूसरे पर घुसपैठ करने के आरोप लगाते रहते हैं। कुछ
घरों में नौकरीपेशा ससुर रिटायर होते ही बहू की रसोई में घुसपैठ करने लग जाते हैं
और विवाद का कारण बन जाते हैं। साहित्य के क्षेत्र में जबर्दस्त घुसपैठ व्याप्त
है। किसी बड़े अखबार समूह का मालिक जब अपने साप्ताहिक परिशिष्टों में अपनी लंबी
लंबी कविताएँ छापने लगे तो सारे समीक्षक व समालोचक इस साहित्यिक घुसपैठ पर साइलेंट
मोड में चले जाते हैं। किसी अच्छे खासे राजनेता के राजधानी के तख्ते-ताऊस पर आसीन
होते ही उसको आज का सर्वश्रेष्ठ कवि या चित्रकार स्थापित करने के प्रयास शुरू हो
जाते हैं। प्रकाशक और कैसेट-सीडी कंपनियाँ उसके दफ्तर के चक्कर काटने लग जाते हैं।
नामवरों के कान खड़े होने से पहले राजनीति साहित्य व कला के क्षेत्र में घुसपैठ कर
चुकी होती है। एक वरिष्ठ कथाकार साहित्यिक कार्यक्रमों में कभी अपना ऊटपटाँग लिखा
हुआ ‘कविता’ के नाम पर सुनाकर व कभी
सेक्स पर प्रवचन देकर मुक्तिबोध और वात्स्यायन के प्राविंस में घुसपैठ करने लग
जाते हैं।
अगर केंद्र व राज्य में अलग अलग दलों की
सरकारें हों तो या तो राज्यपाल राज्य सरकार के कामों में घुसपैठ शुरू कर देते हैं
या न भी करें तो भी राज्य सरकार को हमेशा यही लगता रहता है कि राज्यपाल मंत्रिमंडल
के अधिकारों में घुसपैठ कर रहे हैं। यही हाल अब दिल्ली के हैं। एक तरफ निर्वाचित
सरकार है जिसका मुखिया आंदोलन व धरनों की उपज है। दूसरी तरफ उपराज्यपाल हैं जिनके
पास संबंधित राज्य के पास पूर्ण राज्य का दर्जा न होने से कुछ विशेष या अतिरिक्त
अधिकार भी हैं। यहाँ मंत्रिमंडल कुछ नौकरशाहों की नियुक्ति को लेकर उपराज्यपाल पर
घुसपैठ का आरोप लगा रहा है। और जनता जो घुसपैठ तो छोड़िए, अभी तक अपने अधिकारों का
उपयोग करना भी नहीं सीखी है चुपचाप तमाशा देखने व सहने को अभिशप्त है! घुसपैठ की
यह जंग आखिर क्या गुल खिलाएगी यह तो बस अगले चुनाव में ही देख सकेंगे हम लोग!
संपर्क
: 100, रामनगर एक्स्टेंशन, देवास 455001 (म.प्र॰)
Tuesday, 2 June 2015
5 जून, विश्व पर्यावरण दिवस पर
वैचारिक लेख (5 जून, विश्व पर्यावरण दिवस पर}
पर्यावरण
बचाना है तो कागज़ बचाओ
ओम वर्मा
आठवीं कक्षा का मेरा एक सहपाठी ...! रफ कॉपी
में पहले वह पेंसिल से लिखता, पूरी भर जाने पर एक बार फिर पेन से लिखता। यानी एक कॉपी का दो
बार उपयोग। साथी विद्यार्थियों में उसकी छबि 'कंजूस-मक्खीचूस' के रूप में
स्थापित हो चुकी थी। दूसरी ओर अन्य बच्चे कॉपियों का आधा-अधूरा उपयोग तो करते ही थे, जब चाहे पन्ने
फाड़कर कभी कोलंबस बन नाव चलाते,
कभी राइट बंधु बन हवाई जहाज उड़ाते तो
कभी अल्फ्रेड नोबेल बन पन्नों से हवा में डायनामाइट लगाने का मज़ा लेते। आज जबकि वसुंधरा पर
हरीतिमा सिकुड़ती जा रही है,
पर्यावरण दिनो दिन प्रदूषित होता जा
रहा है और मौसम-चक्र साल दर साल कभी ग्लोबल वार्मिंग तो कभी ग्लोबल कूलिंग के
ख़तरे उत्पन्न कर रहा है और कभी अतिवृष्टि तो कभी अनावृष्टि! ऐसे में निश्चित ही
कागज़ का सदुपयोग या न्यूनतम उपयोग करना आज कंजूसी नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण की
दिशा में एक बहुत ही सार्थक पहल होगी।
पहले वार्षिक परीक्षा के बाद फेयर कॉपियों के
शेष बचे कोरे पन्नों को एकत्र कर उनकी एक जिल्द वाली रफ कॉपी बनवा ली जाती थी। इन सभी उपायों को
आज फिर से अपनाने की जरूरत है। आज के मॉडर्न स्कूलों में मोटे-मोटे
कव्हर वाली कॉपियों पर फिर अलग मोटे-मोटे कव्हर चढ़ाए जाते हैं। एक एक विषय की
दो-दो, तीन-तीन कॉपियाँ बनवाई जाती हैं। इससे एक ओर बस्ते
का बोझ तो बढ़ता ही है, बच्चों में कागज़ बचाने संबंधी संस्कार भी बीजारोपित नहीं हो पाते। गाँवों में खाकरे के
पत्तों से बने पत्तल-दोनों का स्थान कागज़ी पत्तल दोनों ने ले लिया है। आज इस पलायन को रोका
जाना बेहद ज़रूरी है।
कागज़ का दुरुपयोग करने में कुछ सरकारी
कार्यालय या कुछ सरकारी लोग कुछ अधिक ही निर्मम होते हैं। एक -एक दस्तावेज़
की अनावश्यक रूप से कई कई प्रतियाँ, चार लाइन की जानकारी के लिए भी
फुलस्केप कागज़ का उपयोग, एक ही परिपत्र की ढेर सारी प्रतियाँ, किसी किसी कार्यालय में अँगरेजी के
साथ साथ हिंदी या क्षेत्रीय भाषा (या तीनों में ) सारी प्रतियाँ,और बाद में त्रुटि
निवारण यानी अमेंडमेंट के लिए फिर उतनी ही प्रतियाँ...! कागज़ की इन फिजूलखार्चियाँ से बचा जा सकता है। एक उदहारण देखिए
जिसे जनरलाइज़ करके समझा जा सकता है। कुछ साल पहले बीएसएनएल ने नई बिलिंग पद्धति लागू की है। जहाँ बिल पहले एक
पृष्ठ का होता था वहीँ अब तीन पृष्ठ का हो गया है। बिल की रसीद का
आकार भी तीन गुना कर दिया है। यानी कागज़ पर तीन गुना खर्च! क्या
पहले के बिलों में इतनी परेशानी थी कि उसके निवारण के लिए कागज़ों का खर्च तीन
गुना बढ़ा दिया जाए? इसके फ़ॉर्मेट में थोड़ा सा बदलाव कर अंतर्देशीय पत्र कार्ड पर
मुद्रित कर इसे एक पन्ने तक सीमित किया जा सकता था। इससे डाक व्यय और
कागज़ दोनों की बचत होती। इसी तरह किसी भी
चुनाव में कागज़ी मतपत्रों का उपयोग
यदि पूरी तरह से बंद कर सिर्फ इवीएम यानी इलेक्ट्रानिक मशीन का ही
उपयोग किया जाए तो कई टन कागज़ बचाया जा सकता है। कागज़ी मुद्रा पर
ऑस्ट्रेलिया की तरह प्लास्टिक क़ोटिंग या वार्निश लेपन कर मुद्रा का जीवनकाल बढाकर
बहुत सारा कागज़ बचाया जा सकता है। इसी तरह खेरची व बड़े सभी लेनदेनों
में डेबिट कार्ड के प्रयोग को आवश्यक व लोकप्रिय बनाकर कागज़ी मुद्रा के प्रयोग को
मिनिमाइज़ किया जा सकता है । अब समय आ गया है कि ई-मेल सुविधा का
अधिक से अधिक उपयोग किया जाए।
'सॉफ्ट-कॉपी' से किया गया हर लेन देन या पत्राचार कागज़ बचाएगा।
कागज़ के उपयोग के बाद जलने या फेंकने से बेहतर है कि उसे एकत्र कर कागज़
उद्योगों को पुनर्चक्रीकरण यानी रिसायकलिंग के लिए उपलब्ध करवाया जाए। प्रारंभ में यह
प्रक्रिया थोड़ी महँगी लग सकती है मगर जिस तरह दुनिया में कुछ चीजें लाभ हानि के
गणित से ऊपर होती है, उसी तरह पर्यावरण पर किया गया खर्च भी धरती माँ की सेवा में किया
गया दीर्घकालीन निवेश है। मत भूलिए कि जब भी हम एक टन
पुनर्चक्रीकृत कागज़ उपयोग में लाते हैं तब हम 17 पेड़, 2103 ली. तेल, 4077 कि.वा. ऊर्जा, 31587 ली. पानी, और 266 कि. ग्रा. हवा को प्रदूषित होने से तथा भूमि का 2.33
घनमीटर हिस्सा 'लैण्ड फिल' बनने से यानी बंजर बनने से बचाते हैं। धरती को अगर माँ माना है तो माँ की तरह उसकी रक्षा
भी करनी होगी। ***
संपर्क :100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001 (म.प्र.)
मेल आईडी om.varma17@gmail.com *************************************************************************************
Monday, 25 May 2015
मोदी का एक साल
ओम वर्मा
ओम वर्मा
बेशक नमो सरकार का एक साल
अनेक उपलब्द्धियों से भरा हुआ है जिसकी प्रस्तुति व मार्केटिंग वे शानदार तरीके से
कर भी रहे हैं। अधिकांश तथ्य और आँकड़े भी उनकी बात का समर्थन करते नजर आते हैं।
लेकिन जैसे बैंड बाजे के शोर में दुल्हन की सिसकियाँ दबी रह जाती हैं कुछ वैसे ही ‘कामयाबी’ के इस जश्न में कुछ प्रश्न मुँह बाए खड़े हैं और जवाब भी माँग रहे हैं।
जैसे विदेशी दौरों में पीएम देवानंद की तरह ‘नारसिसिज़्म’
के शिकार होकर हर फ्रेम में खुद की तस्वीर देखते नजर आते हैं। दौरे
विदेश के हैं पर विदेशमंत्री साथ नहीं हैं, उधर वे
फ्रांस से लड़ाकू जहाजों का सौदा कर रहे हैं मगर रक्षामंत्री साथ नहीं हैं। चुनाव
से पहले व इस पूरे साल में पार्टी ने बुजुर्गों को जिस तरह से नेपथ्य में खड़ा कर
दिया है उसका क्या जवाब है? बेंगुलुरू की मीटिंग में
वक्ताओं की लिस्ट से आडवाणी जी का नाम हटाकर मार्गदर्शक से सिर्फ दर्शक बना देना क्या
दर्शाता है? सतहत्तर वर्षीय जसवंतसिंह की कोई खोज न
खबर! पिछली सरकार की 'नाकामियों' का विदेश में
रोना रोकर व अपने भारतीय होने पर ‘शर्मिंदगी’ की बात भले ही किसी भी परिप्रेक्ष्य में कही गई हो,
अपनी किरकिरी ही करवाई है। आत्महत्या करते किसानों के देश का पीएम दूसरे देश को लाखों
डालर की सहायता की बात करे तो ‘अम्मा चली भुनाने’ वाली कहावत याद करने के अलावा हम क्या कर सकते हैं?
इधर मोदी जी ‘सबके विकास’ की बात करते हैं और उधर कभी उनका पार्टी अध्यक्ष चुनाव में ‘बदला लेने’ की बात कहता है, कोई उनको वोट न देने वालों को पाकिस्तान भेजने की ‘मधुर’ धौंस देता है। साथियों का एक समुदाय
विशेष के प्रति ‘प्रेम’ कभी
कभी इतना ज्यादा ज़ोर मारने लगता है कि कोई उनसे सांख्य बल में आगे रहने के लिए चार
तो कोई दस बच्चे पैदा करने का फरमान जारी कर देता है। और इस नेहले पर दहला मारते
हुए कोई उस समुदाय का मतदान का अधिकार छीन लेने की वकालात ही कर बैठता है। क्या
नमो का यहाँ खुद चुप बैठे रहना भर ‘सेक्यूलर’ कहलाने के लिए पर्याप्त है? यही हाल मनमोहनसिंह
का था जब वे कनिमोझी, राजा व कलमाड़ी के कामों के लिए नैतिक
रूप से जिम्मेदार होते हुए भी खुद को ईमानदार व पाक साफ बताते आ रहे हैं। यानी इस मुद्दे
पर मनमोहनसिंह व नमो दोनों एक जैसे हैं। सच तो यह है कि इन बद्जुबानों ने जो
वैचारिक प्रदूषण फैलाया है उसके आगे सारी उपलब्द्धियाँ बोनी नजर आती हैं। जब तक अल्पसंख्यक
समुदाय का पूर्ण विश्वास हासिल नहीं हो जाता, कोई जश्न मनाना
फिजूल है। जब राज्यों व केंद्र में एक ही दल की सरकार हो तो नक्सल समस्या से क्यों
नहीं निपटा जा रहा है?
दिल्ली में उपराज्यपाल व
केजरीवाल के बीच जो जंग जारी है उसमें कानूनी रूप से केजरीवाल भले ही सही न हों मगर
एक स्पष्ट बहुमत वाली सरकार होने के नाते अपनी पसंद के ब्यूरोक्रेट नियुक्त न कर पाने
के कारण जनता की सहानुभूति केजरीवाल के पक्ष में बढ़ती जा रही है। और केजरीवाल की सहानुभूति
बढ्ने का मतलब अप्रत्यक्ष रूप से नमो की लोकप्रियता कम होना ही कहा जाएगा। एक बात के
लिए सरकार अवश्य प्रशंसा की हकदार है कि अभी तक कोई घोटाला या भ्रष्टाचार का सुर्खियाँ
बटोरने लायक समाचार सामने नहीं आया है।
और अंत में यही कि जिस तरह
मोदी जी ने सक्षम लोगों से गैस सबसिडी छोडने की अपील की और कई लोगों ने उसे मान कर
छोड़ा भी ऐसे ही क्या वे सक्षम लोगों से जातिगत आरक्षण छोड़ने की अपील कर सकते हैं?
***
Saturday, 23 May 2015
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