Saturday, 5 March 2016

पुस्तक समीक्षा - दिनन दिनन के फेर



                             पुस्तक समीक्षा

                                              
पुस्तक का नाम-                                        दिनन दिनन के फेर
                            लेखक – लीलाधर मंडलोई
                                            
                                                       समीक्षक – ओम वर्मा

डायरी लेखन भी साहित्य की एक विधा है जो अपेक्षाकृत कम प्रचलित है। इसका उपयोग यात्रा आख्यान लिखने में ज्यादा हुआ है। अँग्रेजी साहित्य में वर्जीनिया वुल्फ़ और डोरोथी वर्ड्सवर्थ की डायरी बहुत लोकप्रिय हुई हैं। इस विधा में तीसरी सबसे बड़ी लेखिका एन. फ्ऱेंक मानी जाती हैं। उसी के परिवार के ऑटो फ्रैंक ने इसे द डायरी ऑफ़ ए यंग गर्ल नाम से प्रकाशित करवाया जिसका बाद में अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ है। इसमें में 1942 से 1944 तक की उन घटनाओं का वर्णन है जब लेखिका का बचपन हिटलर की हुकूमत का शिकार हुआ था। इसी दौरान उसके परिवार को जर्मन नाजियों से छिपकर जिस तरह जीवन बिताता पड़ता है उसका वर्णन आज भी पाठकों पर जबर्दस्त प्रभाव छोडता है।
     पुस्तक में तिथिहीन डायरी के रूप में दर्ज़ टिप्पणियाँ हैं जो 2004 से 2014 के मध्य लिखी गईं हैं। आवरण पृष्ठ पर वरिष्ठ कथाकार श्री प्रभु जोशी ने एक वाक्य में पूरी पुस्तक का निचोड़ रख दिया है कि मंडलोई के इस लिखे - धरे में ढेरों अल्पाक्षरा, लेकिन अर्थबहुला पंक्तियाँ हैं, जिनके बीच हमें ऐसी बहुतेरी छूटी हुई जगहें बा-आसानी बरामद हो जाती हैं जहां डायरी लेखन की अचूक निस्संगता और किसी एक को संबोधित पत्र लेखन की अलभ्य अंतरंगता एक दूसरे में एकमेक हो जाती हैं।“ । दरअसल यह पुस्तक न तो कोई कथा संग्रह है और न ही कोई उपन्यास। हर पृष्ठ के बाद अगले पृष्ठ पर विचार किस फॉर्म में सामने आएंगे इसे जानने की उत्सुकता बनी रहती है। कहीं गद्य में कविता की अंतरलय व रवानी मिलती है तो कहीं छोटी सी टिप्पणी एक रूपांकन का मजा देती है।
     पुस्तक में कुल छह अध्याय हैं - कवि का डार्करूम’, सूर्य के हमजोली’, पेड़ और पक्षी’, माँ और पास-पड़ोस’, लोग दुनिया में’, यमुना के पुलिन पर। लेखक ने प्रारंभ में ही स्वयं एक कविता के माध्यम से घोषणा की है कि -
                              “...जो यहाँ है वही है मेरा लिखा हुआ
                                  “और उसे पढ़ने के लिए चाहिए एक गरीब की आत्मा
                                  जिसे लिखते हैं वही लेखक
                                  जिन्हें लेखक की तरह नहीं जानते लोग...!”

        लेखक की रचनाओं में कई प्रश्न उभरते हैं – जैसे कविता और कविमन (पृष्ठ संख्या 16)शीर्षक की टिप्पणी में वे लिखते हैं-
                               “शब्द वरदान हैं
                                यदि शब्दों को वापरने में हुई भूल
                                वे तबाही मचा सकते हैं”

         वे अपनी कविताओं को सृष्टि में खोजते हैं। कुछ प्रश्न उन्हें मथते हैं जैसे- समय का बदलाव क्या है? मां का दुलार, पत्नी का प्यार, रसोई में सूखी रोटी से लेकर व्यंजनों की बौछार? भाषा, बोली, राग वगैरह-वगैरह सब क्या हैं? ये तमाम सवाल दार्शनिक से लगते हैं पूछने पर, साधारण से लगते हैं चर्चा करने पर और लिखा हुआ महसूस करते हैं सोचने पर। कहीं वे अपने अनुभवों को कविताओं के माध्यम से व्यक्त करते नजर आते हैं। जैसे ‘और तुम नहीं हो’(पृष्ठ संख्या 33)  शीर्षक वाली कविता में लीलाधर मंडलोई लिखते हैं—
                   ‘देह उदास-सी और त्वचा मुरझाने के सिम्त
                    रंग और रोशनी में कभी नहाया तुम्हारा चेहरा रह-रहकर दीवार पर उभरता दीखता है।’

     ‘कहावतों की जमीन’ (पृष्ठ 43) शीर्षक टिप्पणी में वे लिखते हैं—‘हमारे घुमक्कड़ चोखे कक्का मजेदार और सीख वाली कहावतों के उस्ताद थे। ऐसी कई संस्मरणनुमा टिप्पणियाँ और उनसे जुड़ी कहानियां भी हैं। ‘मसालों का आश्चर्य’ शीर्षक के संस्मरण में लीलाधर लिखते हैं—“मैंने मां, जीजी, पत्नी और बेटी के साथ रसोई में जबरन घुस-घुसकर कई व्यंजन सीखे। कुछ अपने प्रयोगों से स्वाद को या तो द्विगुणित किया या फिर नया स्वाद संभव किया। रसोई में बनती रचना प्रकि्रया के लिये एक उस्ताद चाहिए। जैसे मां, बहन, बुआ, पत्नी या बेटी।“ किसी  रम्य रचना की तरह पेड़ और पक्षी खंड की  टिप्पणियों में तमाम प्रकृति से जुड़ी चीजों का जिक्र भी है। इसमें ‘इमली’ शीर्षक से अपनी रचना (पृष्ठ 64)में बचपन में सुनी कव्वाली पर चर्चा करते हुए वे कैफ भोपाली के शे’र -
                               
                                 ‘तुमसे मिलके इमली मीठी लगती है/
                                  तुमसे बिछड़के शहद भी खारा लगता है।’
को याद करते हुए उनका संस्मरण है जिसमें इमली के पेड़, फल व बीज से जुड़ी स्मृतियों को सँजोया है। जीवन दर्शन पर एक कविता ‘घर, भूलना और याद’(पृष्ठ 90) में लीलाधर मंडलोई लिखते हैं -
                               “मैं याद करने के लिए
                                याद करते हुए भूल जाता हूं
                                मैं अच्छा करने के लिए
                                भूल जाता हूं
                                भूलना एक सहज बात है…
                                चलो छोड़ो भी
                                इतनी याद ही काफी है।“

     पूरे संकलन में लीलाधर अपने सहज प्रवाह से पाठक को बांधे रखते हैं। भाषा व शैली से रचनाकार के चिंतन के नए आयाम सामने आते हैं। साहित्य भंडार, इलाहाबाद से प्रकाशित 124 पृष्ठीय इस पुस्तक का मूल्य 500/- है। पुस्तकों का पाठकों से दूर होते जाने का एक कारण अधिक मूल्य होना भी है।
                                               ***
                                                                           -ओम वर्मा, 100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001


    

Thursday, 3 March 2016

नईदुनिया, 04.03.16 में व्यंग्य - कुली से सहायक तक


व्यंग्य -'कुली से सहायक तक', नईदुनिया , 04.03.16


व्यंग्य
                        कुली से सहायक तक
                                                                                            ओम वर्मा
ट्रेन से उतरकर मैंने कुली को आवाज देने के लिए  प्लेटफार्म पर नजर दौड़ाई तो एक भी बंदा नजर नहीं आया!
     रेल्वे प्लेटफार्म का नाम लेते ही जो पहला बिंब हमारे सामने आता है वह है बादशाह खान के लाल कुर्ती आंदोलन वाले खुदाई खिदमतगारों  का। कहाँ तो पहले जित देखूँ तित लाल वाला माहौल रहा करता था और कहाँ अब लाल रंग सिर्फ प्लेटफार्म पर मारी गई पान की या पान मसाले की पिचकारियों तक सिमट कर रह गया है। कहीं ये सारे लाल कुर्ते वाले साथी दिल्ली में कुछ लाल रंग वालों द्वारा चलाए जा रहे आज़ादी के आंदोलन में भाग लेने तो नहीं चले गए हैं या जेएनयू में नारे लगाने वालों की धरपकड़ के चलते अडरग्राउंड तो नहीं हो गए हैं?
     “बाबूजी सामान पहुँचाने के लिए सहायक चाहिए?’ एक श्वेत वसनी की आवाज ने मेरी विचार तंद्रा को भंग किया।
    “क्या आज कुलियों की हड़ताल है? और आप कौन हैं?” मैंने इस संदिग्ध मददगार से पूछा।
     “हम ही कल के कुली हैं बाबूजी जो प्रभु कृपा से अब सहायक हो गए हैं। उनके कुछ चेला लोग तो भगवा कमीज पहनने की के रिये थे पर नए पदनाम की इज्जत के वास्ते हमने सफ़ेदई अपना लिया।“
      ओह! अब समझा। मैंने सारा माजरा भाँपते हुए उससे सामान ले चलने के पैसे पूछे। सहायक ने जो पैसे बताए वह उससे ठीक डबल थे जो मैंने यहाँ से जाते समय इसी सामान के लिए कुली को दिए थे। दुनिया का दस्तूर है कि लोग काम का नहीं नाम का दाम वसूलते हैं। मंच पर स्थानीय कवि सौ रु. पाकर भी खुश हो सकता है और चुटकुलों में विश्वास रखने वाला कवि कई हजार रु.लेने के बाद ही मंच पर चढ़ता है। बहरहाल पैसे तय होने के बाद सहायक महोदय को लगेज दिखाया। मैं आगे बढ़ा और देखा कि वे बरात में डांस देखे बिना आगे नहीं बढ़ने वाली घोड़ी की तरह वहीं खड़े, बल्कि अड़े  हुए हैं।
    “रुक क्यों गए भाई क्या बात है?” मैंने चौंकते हुए सहायक जी से पूछा।
    “साहब हम सहायक हैं, कोई कुली नहीं। सहायक सहायता करने के लिए होता है, सारी दुनिया का बोझ उठाने के लिए नहीं। एक हाथ आपको भी लगाना पड़ेगा।“
     “मैंने चुपचाप एक हाथ लगाकर बाहर निकलने मैं ही भलाई समझी। बाहर आकर तुरंत पैसे दिए क्योंकि अब मुझे यह भय था कि कहीं वह यह न कह दे कि “सहायक प्रभु जी को आपकी शिकायत का ट्विट कंपोज़ करे उससे पहले उसका सहायता शुल्क मिल जाना चाहिए।“
     बहरहाल कुली को सहायक का दर्जा देना एक क्रांतिकारी कदम है। इससे जहाँ एक ओर सारे कुली स्वाभिमान की पहली पायदान पर पहुँच गए हैं वहीं वे लोग जिनके पदनाम में सहायक विशेषण नत्थी है आज राजनीति की हिट परेड में स्वयं को एक पायदान नीचे खिसका हुआ पा रहे हैं। कार्यालयों में हर सहायक स्टाफ की कमी के कारण काम के बोझ से इतना दबता जा रहा है कि स्वयं का कुलीकरण होता देख रहा है। वहीं मनमोहन देसाई इकबाल को लेकर बनी कुली व डेविड धवन के कुली नं. 1 फिल्मों  के निर्माण व सफलता के बाद से व प्रभु कृपा से सारे कुली स्वयं का सहायक में अपग्रेडेशन होता देख रहे हैं। अब मुल्कराज आनंद जी व मनमोहन देसाई जी भी स्वर्ग से आएँ और समय के साथ चलते हुए जैसे बंबई को मुंबई व कलकत्ता को कोलकाता किया गया है वैसे क्रमशः अपनी अंग्रेजी कृति कुली (COOLIE) का नाम असिस्टेंट व फिल्म का नाम सहायक कर दें। डेविड धवन भी अपनी फिल्म  कुली नं. 1 का नाम बदलकर सहायक नं. 1 कर दें।  
     कुलियों को अच्छे दिन मुबारक हों!
                                                  ***

100, रामनगर एक्स्टेंशन, देवास 455001 (म.प्र.) 

सुबह सवेरे 23.02.16


     व्यंग्य 
           गांधी चरखा और सोलर चरखा
                                            ओम वर्मा 
                                      om.varma17@gmail.com     
त्य, अहिंसा, धोती, सत्याग्रह और चरखे को मिलाओ तो गांधी बनता है ! आपात्काल में कांग्रेस अध्यक्ष रहे स्व. देवकांत बरुआ जी से क्षमा याचना कर करना चाहूँगा कि गांधी इज़ चरखा; चरखा इज़ गांधी!’ सागौन की लकड़ी से बना यह पोर्टेबल चरखा यरवड़ा जेल में भी गांधी के व्यक्तित्व और दिनचर्या का अविभाज्य अंग था। 1933 में रिहा होने के बाद उन्होंने इसे वर्धा की एक मिशनरी के रेवरेण्ड डॉ. फ्लायड ए. पफ़र  (1888-1965) तथा उनकी पत्नी को भेंट कर दिया था। और इसी करामाती चरखे को गत 5 नवं.13 को लंदन के मलस्क्स आक्शन हाउस में एक लाख दस हजार पौंड में नीलाम कर दिया गया। नीलामी की खबर से तब सभी दलदलों, आयमीन राजनीतिक दलों में खलबली मच गई थी।
     “क्या आपको पता है कि बापू चरखा चलाया करते थे?” मैंने गांधी के नाम पर सालों से राजनीति कर रहे राजनीतिक दल के कार्यालय में एक कार्यकर्ता से पूछा।
     ये बापू आखिर चरखा क्यों चलाते थे? क्या इसका सूत चीन के सूत या कपड़े से भी सस्ता था?”उस कार्यकर्ता ने मुँह में भरी पान मसाले की पीक थूकते हुए प्रतिप्रश्न कर डाला।
    “क्या आपको पता है कि वह चरखा इंग्लैंड में था और वहाँ दस लाख पौंड की बोली लगाकर उसे किसी विदेशी ने ही खरीद लिया है।“ मैंने उन्हें बहुमूल्य जानकारी देनी चाही।
    “चरखे से सूत कातना सिखाने से तो अच्छा होता यदि वे यह सिखा कर जाते कि चुनाव कैसे जीता जाए या कट्टे तमंचे बनाने के गुर सिखाते... अब चरखे को चाटें क्या?” तभी मंत्रीजी के एक लट्ठ-भारती पट्ठे ने अपनी जिज्ञासा सामने रखी।
     “मेरे ख्याल से वो चरखा हमें खरीद लेना था।” एक और चुनावी झाँकी विशेषज्ञ ने सुझाव दिया।
     “क्या चरखे टाइप बात कर रहे हो यार! ब्रिटिश पौंड आज सौ रु. का है। एक करोड़ के चरखे पर एक करोड़ तो कस्टम वाले ही ले लेते। दो करोड़ से भी ज्यादा का चरखा लेकर अचार डालेंगे क्या?” पार्टी के एक चंदा संग्राहक तथा ‘अर्थशास्त्री’ टाइप कार्यकर्ता ने कुछ इस तरह श्रद्धांजलि दी।
     “सोचो अगर बापू का चरखा हमारे पास आ जाता तो हम पटेल के स्टेचू ऑफ यूनिटी से भी बड़ा मुद्दा जनता के सामने रख सकते थे। इस जोरदार विचार पर कई लोग नंगे सिर होते हुए भी हेट्स ऑफ! हेट्स ऑफ !! चिल्लाने लगे।
     “मैं कहता हूँ अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है। क्यों न हम किसी साधू से यह बयान दिलवा दें कि उसे सपना आया है कि फलाने फलाने किसी दलित व्यक्ति के यहाँ रखा चरखा ही बापू का असली चरखा है। फिर वहाँ हमारे बड़े सर एक बार जाकर भोजन भी कर लें, कुछ मच्छरों को रक्तदान भी कर दें और चरखा लेकर राष्ट्र को समर्पित भी कर दें। इससे ये दलित लोग भी खुश हो जाएंगे और मच्छरों का भी टेस्ट चेंज हो जाएगा। फिर  उसी  चरखे से काते गए सूत में से एकाध धागा लेकर बाकी सिंथेटिक सूत मिलाकर उससे बनी साड़ियाँ देश की तमाम मातृशक्ति मेँ बँटवाने की घोषणा कर दी जाए। चरखे की हिफाजत भी हो जाएगी, खादी का प्रचार भी हो जाएगा और गांधीगिरी वाला मुद्दा भी अगले चुनाव से पहले हमारे पलड़े में आ जाएगा।“ स्वयं को पार्टी का थिंक टैंक समझने व लंबा कुर्ता, खिचड़ी दाढ़ी की वज़ह से बुद्धिजीवी टाइप दिखाने की कोशिश कर रहे एक वरिष्ठ नेताजी ने कहा।
       इस बीच देश में नई घोषणा हो गई कि देश में वर्तमान समय में चल रहे साढ़े बारह लाख चरखों को सोलर चरखों से बदल दिया जाएगा जिससे अगले दस सालों में पाँच करोड़ महिलाओं रोजगार मिलेगा। जाहिर है कि इससे दूसरे खेमे में चिंता की लहर व्याप्त हो गई। इस आगामी ख़तरे से निपटने के लिए एक कार्यकर्ता टाइप बंदे ने सुझाव दिया कि फिलहाल हर मोहल्ले में एक एक चरखा केंद्र खुलवा कर सूत कताई का साप्ताहिक आयोजन प्रारंभ कर दिया जाए।
        चरखे पर गांधीगिरी जारी है।
***