Tuesday, 14 February 2017

न्यूज़ फॉक्स, गोरखपुर, 15.02.17 में व्यंग्य


     व्यंग्य                          
                 विचारधारा का पैदाइशी होना!
                                                                                                    ओम वर्मा
“मैं एक पैदाइशी कवि हूँ।“ कवियों के उस समूह में उस शाम रसरंजन के दौर में उन्होंने एक हाथ से मीरा की तरह अपना प्याला उठाया और दूसरे हाथ से पास बैठे कवि के हाथ पर ताली ठोकते हुए किसी वीर-रस के कवि के अंदाज में सबके बीच अपनी घुसपैठ को जस्टिफ़ाइ करने का प्रयास किया।
     “आप अपनी वही आठ-दस पुरानी कविताएँ बार बार गोष्ठियों में सुनाते आए हैंन कोई संकलन न कोई पुरस्कार... कुछ इक्का-दुक्का पत्र-पत्रिकाओं में मित्रता निभाओ अभियानके तहत दस-बीस कविताएँ क्या छप गईं, आप खुद को पैदाइशी कवि बताने लग गए!” हर गोष्ठी में उनसे पेंच लड़ाते रहने वाले अनोखीलाल जी ने चतुर टीवी एंकर की तरह अड़ी लगा ही दी।
     “पैदाइशी इसलिए हूँ कि मेरे पिता पं रसिकलाल रसाल कवि थे, दादा पं चरणदासधमाल राजाश्रय प्राप्त कवि थे, माँ तो मुझे गर्भ में ही लोरियाँ सुनाया करती थी...! तो गुरु मैं पैदाइशी कवि हुआ कि नहीं।“ उन्होंने रणभूमि में जा रहे वीर सैनिक की तरह हुंकार भरते हुए जवाब दिया।
     कल तक वे न सिर्फ कविता के नाम से चिढ़ते थे बल्कि जब भी अवसर मिलता, इस समिति के सारे कवियों का मज़ाक उड़ाने लग जाते थे। लेकिन आज शाम उन्होंने शहर के कवियों की समन्वय समिति की गोष्ठी में समारोहपूर्वक एंट्री मार  ही दी। हालांकि इसी समिति को कुछ ही दिन पहले वे मुन्नी की तरह बदनाम घोषित कर चुके थे। बाकी कवि भी जानते थे कि खुद को आज कवि बताने वाला यह शख़्स  महज आंगिक नौटंकी वाला कवि है जिसके पास गरजने की कला तो भरपूर है, बरसने लायक जल की एक बूँद भी नहीं है। लेकिन समिति में कुछ कवि ऐसे भी थे जो वर्षों से काव्य साधना में लीन थे और यह सोचकर चिंतित थे कि कहीं यह चुटकुलेबाज सचमुच मंच न लूट ले। जमे जमाए पंडितों से भी कभी कभार पब्लिक का टेस्ट पहचानने में चूक हो जाया करती है। 
     विवाद बढ़ते देखकर समिति ने कथित पैदाइशी कवि की डीएनए जाँच करवाने की घोषणा कर दी है। वैज्ञानिकों ने उस जीन (गुणसूत्र) की खोज प्रारंभ कर दी हैं जिससे व्यक्ति की विचारधारा व प्रतिबद्धता सुनिश्चित की जा सके।                                          
                                                     ***
      

Thursday, 9 February 2017

व्यंग्य - मैं पार्टी का महज अनुशासित सिपाही !/सुबह सवेरे, 09.02.17

व्यंग्य
                                     अनुशासित सिपाही  
                                                                                                  ओम वर्मा
“मैं तो पार्टी का महज एक अनुशासित सिपाही हूँ।“ सियासत में इन दिनों यह बार बार दुहराया जाने वाला एक आम जुमला हो गया है। किंतु जिस प्रकार उन्नीसवीं सदी के अँगरेजी निबंधकार चार्ल्स लैंब ने अपने प्रसिद्ध निबंध इंपर्फ़ेक्ट सिंपैथीज़ में लिखा है कि वे सभी चीज़ों व व्यक्तियों को समान रूप से पसंद नहीं कर सकते, क्योंकि उनके अंदर एक पूर्वाग्रहों की ग्रंथी है। कुछ इसी प्रकार मुझे सिपाही शब्द भी मेरे पूर्वाग्रहों के चलते कुछ कम ही पसंद है।
     सिपाही शब्द सुनते ही मुझे घड़ी में आधी रात को भी दस पर दस दिखाई देने लगते हैं। सिपाही यानी एक डंडा जो सड़क पर जा रहे कुत्ते से लेकर किसी भी घीसू या माधौ के पिछवाड़े पर निशान बना सकता है। फिर उसके साथ अनुशासित विशेषण उसे और भी विशिष्ट बना देता है। इस अति संक्षिप्त भूमिका का लुब्बे लुबाब यह है कि इन दिनों अनुशासित सिपाहियों से शहंशाह से लेकर वलीअहद तक परेशान हैं। और इसी वजह से मैं भी कुछ ज़्यादा ही डरने लगा हूँ।
    आज  कोई व्यक्ति यदि स्वयं को अनुशासित सिपाही बताता है और बार बार बताता ही जाता है तो समझ लेना चाहिए कि वह और कुछ भले ही हो सकता है, पर अब कम से कम सिपाही के रूप में तो ज़्यादा दिन नहीं रहने वाला। उसे अकस्मात यह इल्हाम होने लगता है कि वह सिर्फ भीड़ बढ़ाने या सिर्फ उनके जय जयकार करते रहने के लिए नहीं बना है। अब उसकी महत्वाकांक्षा का राकेट अपनी उलटी गिनती पूरी कर चुका है और उसे अब लांच होने से नहीं रोका जा सकेगा। रोके जाने पर वह या तो सीधे आलाकमान की कुर्सी पर गिरने वाला है या फिर बंगाल की खाड़ी में समा जाने वाला है। गरज यह है कि उन्हें जिन्हें कि कल तक माई- बाप और क्या क्या नहीं बताया करता था, अब कब, कैसे पटखनी दे मारेगा, आज कोई नहीं जानता।
     हनुमान राम के अनुशासित सिपाही थे, पर उनकी निगाह कभी भी अयोध्या के राजसिंहासन पर नहीं पड़ी। बीसवीं सदी के सबसे बड़े अनुशासित सिपाही महात्मा गांधी थे जिन्होंने कथित नीची जाति वालों को हरिजन की शुभसंज्ञा दी और धोती और खड़ाऊ से ऊपर कभी अपनी महत्वाकांक्षा को उठने ही नहीं दिया। एक अनुशासित सिपाही मंगल पांडे था जिसका अनुशासन तोड़ना भी इतिहास बन गया था।
     यह अनुशासित सिपाही स्वयं को अनुशासित कहता ज़रूर है पर अनुशासन शब्द में से अनु उपसर्ग को उसने अंतरिक्ष में पृथ्वी की कक्षा छोड़ने पर अपना एक हिस्सा अलग कर देने वाले राकेट की तरह त्याग दिया है। उसे लगता है कि अब भी वह शासन न कर सका तो फिर कब करेगा? लिहाज़ा आज राजनीतिक दलों के ये अनुशासित सिपाही ही दलाधिपतियों की सबसे बड़ी चिंता बन गए हैं। आलाकमान यानी दलाधिपति, इससे पूर्व कि कोई अनुशासित सिपाही ज़रूरत से ज़्यादा अनुशासित होने लगे, या तो उसे कहीं राज्यपाल पद पर सुशोभित कर देते हैं या फिर राज्य की राजनीति में रिबाउंड कर देते हैं। और जो समय रहते नहीं कर पाते, वे पाते हैं कि उनका यह अनुशासित सिपाही जो कल तक उनको कौंतेय अर्जुन और स्वयं को उनका सारथी कृष्ण बताते नहीं अघाता था, यकायक पाला बदलकर कौरवों की सेना में शामिल हो गया है या उसने अपनी स्वयं की बटालियन गठित कर ली है।
     अनुशासित सिपाहियों की स्थिति कभी कभी साँप-छछूँदर सी हो जाती है। उनके जबर्दस्त अनुशासन को आलाकमान न उगल सकता है न निगल सकता है। यह अनुशासित सिपाही आक्रोशित हो अपने भाषणों में कभी कभी बैजू बावरा बन मालकोस की ऐसी तान छेड़ता है कि उससे उत्पन्न गर्मी से माइक भी पिघलने लगता है।
      कोई अनुशासित सिपाही सचमुच इतना अधिक अनुशासित होता है कि वह सच में अंत तक अनुशासित ही बना रहता है। वह अपना अनुशासन फिर अपनी आत्मकथा के बम के माध्यम से ही  तोड़ता है। इन सियासी अनुशासित सिपाहियों से अलग उन सिपाहियों की दुनिया भी है जिनकी नौकरी की पहली शर्त ही अनुशासन है। ये इतने अनुशासित होते हैं कि खुशी खुशी साहबों के जूते पॉलिश भी कर लेते हैं और जैसा खाना मिले खा लेते हैं। जली रोटियों व पतली दाल की बात करना इन अनुशासितों को अनुशासनहीन की बिरादरी में खड़ा कर देता है। अब भला मातृभूमि की सेवा का व्रत लेने वाले भी कभी खाने की क्वालिटी को लेकर लड़े हैं? बल्कि देशसेवकों ने जो मिला वही खाकर या भूखे रहकर या फिर अनशन करके देशसेवा की है।
     बहरहाल आप भले ही इन अनुशासित सिपाहियों, खासकर सियासत के सिपाहियों के किरदार से सहमत हों या असहमत, पर उन्हें नकार तो हरगिज़ नहीं सकते। इतिहास गवाह है कि आज़ादी के बाद देश व राज्यों में कई बार इन्हीं अनुशासित सिपाहियों ने तख़्ता पलट किया है।
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Thursday, 2 February 2017

लेख- 'मरने-मिटने और मार- मिटाने वालों में फर्क है। (लेखन - 15.08.16)


गांधी - कुछ दोहे


कुछ यादवी दोहे


बिना गुरु के एकलव्य, दैनिक ट्रिब्यून, 14.12.16


क्या विचारधारा भी आनुवांशिक होती है?



 व्यंग्य                          
                क्या विचारधारा भी अनुवांशिक होती है?
                                                                                                    ओम वर्मा
साहिर कह गए हैं कि “मालिक ने इनसान को इनसान बनाया, हमने उसे हिंदू या मुसलमान बनाया! जाहिर है कि जन्म के समय बच्चा किसी लघु उद्योग इकाई से निकला वह उत्पाद होता है जिस पर ब्रांडनेम का टैग बड़े प्रतिष्ठानों में लगाया जाता है। यही बात उसकी राजनीतिक प्रतिबद्धता के बारे में भी कही जा सकती है। वह परिपक्व होकर अपनी विचारधारा तय करे उससे पूर्व ही परिजनों की विचारधारा उसे अपने रंग में रँग चुकी होती है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह मिलता है कि अपने राजनीतिक करियर में तात्कालिक लाभ देखकर यदि वह  दल में चला भी गया हो तो बाद में पलटी मारते समय खुद को पैदाइशी  दल का बताकर दलबदल के अनैतिक कृत्य के विरोध में भभकी आग को घर वापसी के छींटे डालकर ठंडी करने का प्रयास करने लगता है।
      जब हम जन्म से हिंदू या मुसलमान नहीं हो सकते तो जन्म से काँग्रेसी या भाजपाई कैसे हो सकते हैं? जैसे एक बच्चे को खुद अपने विवेक से अपना धर्म तय करने लायक होने से पहले हम उसका धर्म तय कर देते हैं, वैसे ही राजनीतिज्ञों के परिवार में जन्म लेने वाले बच्चे को भी अपनी राजनीतिक विरासत संभालना अपना फर्ज़ लगता है। उसे किसी भी पार्टी का न तो इतिहास जानने की और न ही उसके गुणदोष परखने की जरूरत है। मैंने सोचा कि ऐसे में क्यों न उनसे ही कुछ ज्ञान प्राप्त किया जाए जिन्हें अभी अभी अकस्मात यह इल्हाम हुआ है कि वे पैदाइशी काँग्रेसी हैं।
     उनके पास पहुँचा तो देखा कि वे घर की दीवारों पर अपनी नई पार्टी, मेरा मतलब उनके पिताश्री के समय की उनकी पार्टी या उनके अनुसार वह पार्टी जिसके दफ्तर में ही उनका जन्म हुआ था, उसके वर्तमान  उपाध्यक्ष के चित्र पर मोटे मोटे अक्षरों में उन्हीं के हाथ से लिखा हुआ पप्पू शब्द घिस घिस कर मिटाने का प्रयास कर रहे हैं। तस्वीर से पप्पू शब्द मिटाने और उस पर हार पहना देने के बाद वे मेरी ओर मुखातिब होकर बोले,
     “कहो गुरु क्या जानना चाहते हो?”
     कल तो आप भाजपा को अपनी माँ बताते थे और नमो सर के पैर छूते थे, फिर बिना कोई डीएनए जाँच या शपथपत्र प्रस्तुत किए अकस्मात ये वल्दीयत के खाने में बदलाव कैसे कर दिया?”
     गुरओं के गुरु ने तपाक से जवाब दिया-“देखो गुरु ऐसा है कि  -
        “कल उनका था आज इनका हूँ।
         मैं नहीं जानता मैं किनका हूँ।
         जिसमें दम हो उड़ा के ले जाए,
          हवा में उड़ता हुआ तिनका हूँ।“
     लेकिन आप तो कल बीजेपी को अपनी माँ और काँग्रेस को बदनाम मुन्नी बता रहे थे...!”
     इस पर फिर एक शेर ठोका, “क्या हुआ मुन्नी अगर बदनाम है।
                                             पंजाब में अब इसी का नाम है।
                                             भाजपा ने नहीं दिया पद मुझे
                                             मुख्यमंत्री पद यहाँ इनाम है।“
      “मगर सर इससे पहले आप आप आप भजते फिर रहे थे और उससे पहले उसी आप वाले को आप बेपेंदी का लोटा भी बता चुके थे। मुझे लगा कि मैं अपनी इस गेंद से उनके डंडे उड़ा दूँगा पर वे तो पहले ही एक कदम आगे निकल चुके थे। तुरंत बोले-
     “ऐसा है गुरु कि –
                            राजनीति में सब बिन पेंदे लोटे हैं,
                            खरे यहाँ हैं कम अधिकतर खोटे हैं,
                           बड़े वहाँ थे अधिक, पड़े मुझ पर भारी,
                           गली यहाँ पर दाल यहाँ सब छोटे हैं।“
     पर सर यह तो अवसरवाद हुआ।“ मैंने एक बाउंसर से उनको डराना चाहा जिस पर उनका हुक शॉट तैयार था। तुरंत बोले-
                           जैसे मैखाने में सब हालावादी,
                            वैसे राजनीति में सब अवसरवादी,
                            मैं तटस्थ रह कर अब कैसे देख  सकूँ
                           , पंजाबी सूबे की होती बरबादी।
     मेरे हर सवाल का उनके पास ठोको तालीनुमा जवाब तैयार होता था। मैंने अंतिम ओवर में डाली जाने वाली गेंदों की तरह आक्रामक क्षेत्ररक्षण जमाने वाले अंदाज़ में अपने मन की बात आखिर कह ही डाली-
     
कृपया बताएँ कि आपने इतने साल पार्टी में रहकर व बाद में राज्यसभा में रहकर देश व जनता के लिए क्या किया?”
     ये पूछो कि क्या नहीं किया गुरु? वर्ड कप के समय क्रिकेट के टॉक शो में कई शेर सुनाकर खिलाड़ियों की होसला-अफजाई की, कॉमेडी शो में बरसों दर्शकों को हँसाया,! और गुरु आज के समय में किसी को हँसाना ही सबसे बड़ी मानव सेवा है। आगे के प्रश्न मेरे जहन में ही कुलबुलाते रह गए कि “गुरु कॉमेडी शो हो चाहे क्रिकेट का टॉक शो, वो तो सब आपने पैसे लेकर ही किए होंगे। उसमें जनता की सेवा कैसे हुई?” मगर मेरी हिम्मत नहीं हुई। वे एक शेर सुनाकर मुझे बकरी की तरह मिमियाने पर मजबूर कर सकते थे। वे ताली ठोकने के लिए मेरा हाथ तलाश रहे थे जो मैं अपना माथा ठोकने के लिए बढ़ा चुका था!
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