Sunday, 6 April 2014
Tuesday, 18 March 2014
रंग भरे दोहे दनादन
– ओम वर्मा
om.varma17@gmail.com
------------------------------------------------------------------------------
डॉ. मनमोहनसिंह अगर
कहेंगी सोनिया, तो खेलूँगा रंग ।
यूँ बोले सरदारजी, करो न मुझको तंग ॥ 01
----------------------------------------------------------------------------------
सोनिया गांधी इटली मेरा मायका, भारत है ससुराल ।
भौजाई हूँ आपकी , डालो रंग गुलाल ।। 02
----------------------------------------------------------------------------------
लालकृष्ण आडवानी निकले रथ पर बैठकर, खेल रहे हैं फाग ।
इस शालीन बुज़ुर्ग की, किस्मत अब तो जाग।। 03
----------------------------------------------------------------------------------
नरेंद्र मोदी खेलूँगा होली तभी, दिल्ली लूँ जब जीत ।
कुछ ऐसे इस फाग में, गाओ मंगल गीत ॥ 04
----------------------------------------------------------------------------------
यूँ बोले सरदारजी, करो न मुझको तंग ॥ 01
----------------------------------------------------------------------------------
सोनिया गांधी इटली मेरा मायका, भारत है ससुराल ।
भौजाई हूँ आपकी , डालो रंग गुलाल ।। 02
----------------------------------------------------------------------------------
लालकृष्ण आडवानी निकले रथ पर बैठकर, खेल रहे हैं फाग ।
इस शालीन बुज़ुर्ग की, किस्मत अब तो जाग।। 03
----------------------------------------------------------------------------------
नरेंद्र मोदी खेलूँगा होली तभी, दिल्ली लूँ जब जीत ।
कुछ ऐसे इस फाग में, गाओ मंगल गीत ॥ 04
----------------------------------------------------------------------------------
राहुल गांधी राहुल होली खेलने , निकले हैं इस बार
।
रँगवाएँगे मुख वहीं, जहाँ दलित का
द्वार ॥ 05
----------------------------------------------------------------------------------
सुशीलकुमार शिंदे
इक ‘येड़े’ को छोडकर, बाकी सबको छूट। ----------------------------------------------------------------------------------
मेला है यह फाग का, लूट सके तो लूट॥ 06
----------------------------------------------------------------------------------सुषमा स्वराज होली खेलें जब कभी, बीजेपी के लोग।
उन उन पर ही ना करें, सारे रंग प्रयोग॥ 07
--------------------------------------------------------------------------------राजनाथसिंह मान रहे अरविंद का, राजनाथ आभार।
फिर दिल्ली में मिल गया, होली का आधार।।08
---------------------------------------------------------------------------------
ममता बेनर्जी बस अन्ना के संग ही, खेलेगा बंगाल।
इस होली में इस तरह, होगा रंग गुलाल॥ 09
----------------------------------------------------------------------------------
लालूजी चारे की कुटिया बना, बैठे खटिया डाल ।
अब कोई तो डाल दे, आकर रंग गुलाल ॥ 10
----------------------------------------------------------------------------------
सुमित्रा महाजन हो भाई का साथ तो, जीतूँगी हर जंग।
यह कह वे कैलाश पर, लगीं डालने रंग॥ 11
---------------------------------------------------------------------------------नीतीशकुमार खेल रहे नीतीशजी, गुपचुप गुपचुप रंग ।
मोदी आकर बीच में, करें नहीं रसभंग॥ 12
----------------------------------------------------------------------------------
नितिन गड़करी काया से भी ‘मर्द’ हैं, माया से भी ‘मर्द’।
रंग देखकर ‘आप’ के, शुरू हो गया दर्द ॥ 13
----------------------------------------------------------------------------------शिवराजसिंह चौहान सुन लें सारी लाड़ली, हैं मामा शिवराज ।
रंग डालकर नेग लो, नहीं छोड़ना आज ॥ 14
----------------------------------------------------------------------------------
अरविंद केजरीवाल किस पर कैसे रंग की, करना है बरसात ।
अब जनता की राय से, तय होगी यह बात॥15
----------------------------------------------------------------------------------
अन्ना हजारे पहले पूरी जो करे, मेरी सत्रह माँग।
गाऊँ उसके राग में, मैं होली का ‘सांग’॥ 16
----------------------------------------------------------------------------------
सलमान खुर्शीद खेलूँ ना होली कभी, नपुंसकों के संग।
जाचूँगा मर्दानगी, वरना होगी जंग॥ 17
----------------------------------------------------------------------------------
शरद पवार दिन में होली खेलने, पहुंचे जनपथधाम।
मोदी के घर रात में, किया मगर विश्राम॥18
----------------------------------------------------------------------------------
दिग्विजयसिंह जिस दिन राहुल बन गए, अगले पंतप्रधान।
उस दिन से हर दिन यहाँ, होगा फागुनगान॥19
----------------------------------------------------------------------------------
रामविलास पासवान मोदी का मुँह रँग दिया, फिर बोले ये राम।
हम पंछी उस डाल के, जहाँ पके हों आम॥20
----------------------------------------------------------------------------------
श्रीप्रकाश जायसवाल ये जूनी पिचकारियाँ, करती हैं रसभंग।
लेकर आओगे नई, तो खेलूँगा रंग॥ 21
----------------------------------------------------------------------------------अखिलेश यादव जिस पिचकारी पर बनी, पापा की तस्वीर ।
रंग उसी से डालना, हाकिम हो कि वज़ीर॥ 22
---------------------------------------------------------------------------------
आजम खान पहले मेरी भैंस से, जो खेलेगा रंग।
अब खेलूँगा मैं सदा, होली उसके संग॥ 23
--------------------------------------------------------------------------------
राज ठाकरे आओ सिर्फ मराठियों, मैं खेलूँगा रंग।
चुंगी नाकों पर खड़े, बोले एक दबंग॥ 24
---------------------------------------------------------------------------------
अमिताभ बच्चन कुछ दिन तो गुजरात में, होली खेलो यार।
किसी दूसरे राज्य में, होगी अगली बार॥ 25
----------------------------------------------------------------------------------
संजय दत्त सुन सर्किट इस टैंक में, रंग ढेर सा घोल।
अब होली के नाम पर, माँगूँगा पेरोल॥ 26
----------------------------------------------------------------------------------
राखी सावंत राखीजी को इन दिनों, भाया मोदी रंग।
बाँट रहीं हैं मुफ्त ही, ले पिचकारी संग॥ 27
--------------------------------------------------------------------------------सुरेश कलमाड़ी कलमाड़ी से खेलना, चाह रहे जो लोग।
पहले आधे रंग का, देना होगा भोग॥ 28
----------------------------------------------------------------------------------बाल कटवाता नेता भाई मेरे यह बता, कितने मेरे बाल।
कटने को हैं जान लो, क्या होना है हाल॥ 29
--------------------------------------------------------------------------------
नेताओं पर रंग डलता तुमने उन पर रंग क्यूँ, दिया व्यर्थ में डाल।
देखकर आम आदमी खूनी होली खेलते, रहते वे हर साल॥ 30
----------------------------------------------------------------------------------
जयललिता व करुणानिधि देखें किसके गाल पर, मोदी मलें गुलाल।
करुणानिधिजी औ’ जया, आतुर लेकर गाल॥31
---------------------------------------------------------------------------------
मायावती मनुवादी को छोडकर, बाकी सबके साथ।
खेलेंगी मायावती, लाख टके की बात॥ 32
----------------------------------------------------------------------------------
आम आदमी पार्टी सब लाए पिचकारियाँ, झाड़ू इनके पास।
देखें किनका रंग अब, आता इनको रास॥ 33
----------------------------------------------------------------------------------भागीरथ प्रसाद राहुल जी की जेब से, लेकर रंग गुलाल।
मोदीजी को रँग दिया, सरजी किया कमाल॥ 34
----------------------------------------------------------------------------------योगेंद्र यादव डाली कुछ ने स्याहियाँ, कुछ ने डाले रंग।
खुशियाँ और विरोध के, सबके अपने ढंग॥ 35
Saturday, 8 March 2014
व्यंग्य जनवाणी, मेरठ,
08.03.14
जूते की अभिलाषा
ओम वर्मा
om.varma17@gmail.com
सत्ता केंद्र के प्रति विरोध प्रकट करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। राजमहलों में राजा के प्रति रानियों के गरिमामय विरोध के लिए कोपभवन तक का प्रावधान रखना पड़ता था। गांधीजी इसे असहयोग और सत्याग्रह से प्रारंभ कर अनशन तक लाए जिसे बाद में निर्वाचित मुख्यमंत्री समर्थन देने वालों के खिलाफ ही धरने के नाम से आजमाने लग गए! लेकिन कई बार ये उपकरण फेल होते भी देखे गए तथा अखबारों की तलवार से भी तेज मानी जाने वाली कलम की स्याही भी फीकी पड़ने लगी। लिहाजा फास्ट फूड के जमाने में विरोध प्रदर्शन का तरीका भी कैसे अछूता रह सकता था? अब नेक काम के लिए लोगों ने जूते का प्रयोग शुरू कर उसे सम्मानजनक स्थान पर बैठा दिया है।
सत्ता केंद्र के प्रति विरोध प्रकट करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। राजमहलों में राजा के प्रति रानियों के गरिमामय विरोध के लिए कोपभवन तक का प्रावधान रखना पड़ता था। गांधीजी इसे असहयोग और सत्याग्रह से प्रारंभ कर अनशन तक लाए जिसे बाद में निर्वाचित मुख्यमंत्री समर्थन देने वालों के खिलाफ ही धरने के नाम से आजमाने लग गए! लेकिन कई बार ये उपकरण फेल होते भी देखे गए तथा अखबारों की तलवार से भी तेज मानी जाने वाली कलम की स्याही भी फीकी पड़ने लगी। लिहाजा फास्ट फूड के जमाने में विरोध प्रदर्शन का तरीका भी कैसे अछूता रह सकता था? अब नेक काम के लिए लोगों ने जूते का प्रयोग शुरू कर उसे सम्मानजनक स्थान पर बैठा दिया है।
लिहाज़ा अब समय आ गया है कि प्रजातांत्रिक
देशों के राजनीतिक दल अपने चुनावी घोषणा पत्र, अपनी कार्य पद्धति या अपने अभ्यास सत्रों में विरोध प्रकट करने की इस नई
तकनीक पर चिंतन मनन करें। अब यह स्पष्ट घोषणा होनी चाहिए कि सत्ता में आने पर उनका
दल या उम्मीदवार कम से कम कितने जूते फेंके जाने या खाने के बाद ही किसी की बात
सुनेगा! यह भी स्पष्ट हो कि क्या सिर्फ जूता दिखाना भर पर्याप्त होगा आखिर उनके
कानों पर कम से कम कितने जूते खाने के बाद जूँ रेंगना प्रारंभ करेगी? यह भी हो सकता है कि कल से जूता फेकने वाले की ही बात हर हाल में मान ली
जाए या फिर जूता फेंकने वाले की हर हाल में अच्छी तरह से ‘खबर’ ले ली जाए! वैसे प्रहारक पर विभिन्न कानूनी धाराओं के तहत कार्रवाई भी की
जा सकती है। जैसे बिल प्रस्तुत न करने वाले विद्रोही पर उन्हें मंदिर या मस्जिद से
चुराए जाने का आरोप लगाया जा सकता है। प्रहारक ‘क’ संप्रदाय का हो और लक्ष्य ‘ख’
संप्रदाय का, तो सांप्रदायिकता फैलाने का आरोप, और हमारे देश में जैसा कि अक्सर होता आया है,
प्रहारक सवर्ण हो और लक्ष्य दलित वर्ग का, तो दलित उत्पीड़न
का प्रकरण! जूता यदि प्लास्टिक का था, तो पर्यावरण
एक्टिविस्ट आगे आ सकते हैं कि इससे पर्यावरण का क्षरण हुआ है, या कि जूते का मटेरियल ‘ईको फ्रैंडली’ नहीं है। चमड़े के जूते हों तो ‘पेटा’ वाले जीव उत्पीड़न का मामला बनाकर मैदान में कूद सकते हैं।
आशावादी अँधेरे में भी उजाले की किरण खोज़ लेता है। तो क्यों न जूता फेंकने वालों में
से ‘सही’ निशाना लगा पाने
वाले को चुनकर आगामी ओलिंपिक खेलों के लिए निशानेबाजी की तैयारी के लिए चुन लिया
जाए! आने वाले चुनाव में सभा या प्रेस वार्ता में उम्मीदवार राजनीतिक लाभ
लेने के लिए ‘पेड़
न्यूज़’ की तर्ज़ पर अपने ही आदमियों से भी यह काम करवा सकते
हैं। बहरहाल इतना तो तय है कि जॉर्ज बुश और ज़रदारी से लेकर भूपिंदरसिंह हुड्डा तक, जूतों को अस्त्र बनाने का कार्य यदि इसी रफ्तार से चलता रहा तो हो सकता
है कि भविष्य में चौथा विश्व युद्ध जूतों से ही लड़ा जाए! बाहुबलियों के परिवारों
में शस्त्र पूजन की तर्ज़ पर जूता पूजन भी शुरू हो सकता है! ओपिनियन पोल जैसी
विवादास्पद प्रक्रिया का स्थान जूता ले सकता है। जितने जूते,
उतने ‘लाइक्स’ या ‘अनलाइक्स’! एक जूता यानी दस सीट की बढ़त या दस का
नुकसान! वैसे जूते की अभिलाषा तो मात्र इतनी है कि वह न तो सम्राटों के पैरों की
शोभा बढ़ाना चाहता है, वह किसी बड़े शॉपिंग माल के शो केस में
बैठ कर अपने भाग्य पर इठलाना भी नहीं चाहता ...उसकी अभिलाषा तो मात्र इतनी है कि
उसे उसके मुँह पर मार दिया जाए जो देश को खाने या बेचने की राह पर चल पड़ा हो!
***
100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास
455001 (म.प्र.)
Wednesday, 26 February 2014
अंगुलिमाल, वाल्मीकि और
गुण्डा विरोधी अभियान !
ओम
वर्मा
चुनाव सर
पर हैं। ऊपर से आदेश हैं कि गुण्डों के खिलाफ़ सख़्त से सख़्त कार्रवाई की जाए। लिहाज़ा
हर कहीं गुण्डा विरोधी अभियान की धूम मची हुई है। गुण्डा चाहे छोटा हो या बड़ा, चाहे इस
पार्टी
का खास हो या उस पार्टी का, चाहे कल का गुमनाम, परसों का बदनाम
या आज का नाम वाला ही क्यों न हो ... गर्ज़ यह कि हर कोई खौफजदा है। पुलिस कब किसको
पकड़कर उसकी टंटफोर कर दे या कब किसका जुलूस निकालकर नागरिक अभिनंदन करवा दे, खुद नहीं जानती!
हाँ तो ऐसे ही एक सद्भावना मिशन के तहत एक
हाय वोल्टेज अभियान विशेष दर्जा दिए जाने की राजनीति कर रहे उस राज्य में जहाँ के
मुख्यमंत्री अब बाक़ायदा ‘सेकुलर’ घोषित
कर दिए गए हैं और जहाँ कट्टे खिलौनों की जगह ले चुके हैं,
में भी जारी था। यहाँ पुलिस जिस ‘गुण्डे’ को पकड़ कर पूजा करती हुई ले जा रही थी वह बार बार स्वयं को ‘बुद्धं शरणं गच्छामि’ हो जाने की दुहाई दे रहा था।
मगर पुलिस रेकॉर्ड में वह अंगुलिमाल नाम का ऐसा डाकू था जो अपने शिकार को न सिर्फ
लूटता है बल्कि बाद में हत्या करके उनकी ऊँगलियों की माला बनाकर पहन लेता है। उनके
लिए उसका बौद्ध भिक्षु बन जाना बिल्लियों के मूषक भक्षण की सेंचुरी के बाद की जा
रही हज़ यात्रा या किसी समुदाय के निर्दोषों के सामूहिक नरसंहार के कई वर्षों बाद
मनाए जा रहे क्षमापर्व में कोई फ़र्क़ नहीं था।
ऐसे ही एक अभियान में एक अन्य राज्य का
पुलिस दल अपने पूरे लाव लश्कर के साथ मैदान में था। मुखबिर से खबर मिली थी कि
रत्नाकर नाम का एक बदमाश घर में छिपा बैठा है।
“अबे ओ रत्नाकर... बाहर निकल !” उन्होंने ‘रत्नाकर निवास’ नामक पर्ण कुटीर के दरवाजे पर प्रहार
करते हुए दहाड़ लगाई।
“आया हुज़ूर...!” राम नाम की माला जपता हुआ
शुभ्र केशराशि एवं भगवा वस्त्रधारी अधेड़ प्रकट हुआ।
“अबे ढोंगी चल अंदर ! शहर में गुण्डा विरोधी
अभियान चल रहा है। हम तुझे अंदर करने आए हैं।“ दरोगा जी ने भद्रजनों के बीच इन
दिनों प्रयुक्त किए जा रहे कुछ और भी असंसदीय शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा।
“पर राम के बंदों, मैं रत्नाकर हूँ जरूर पर मैंने अब मैंने सारे काले धंधे बंद कर दिए हैं।
मैं प्रभु श्रीराम की शरण में चला गया हूँ और उनका चरित्र लिखने में लगा हूँ। मेरा
नाम भी रत्नाकर से बदल कर वाल्मीकि हो गया है।“ कल का दस पाँच सांसदों के दम पर
सरकार गिराने का दम रखने वाले जैसा ‘कठोर’ रत्नाकर इस समय सीबीआई के भूत से खौफ खाए ‘मुलायम’ वाल्मीकि में बदल चुका था।
“तुझे रामजी की शरण में नहीं, कृष्ण मंदिर में
जगह मिलेगी बेट्टा..!” दरोगा जी के एक गणवेशधारी सहयोगी वाल्मीकि...आय मीन रत्नाकर
को ‘उचित तरीके’ से अपने साथ ले जाते
हुए बोला। रास्ते भर वाल्मीकि ‘जंजीर’
फिल्म के शेर खान द्वारा इंस्पेक्टर विजय को सारे काले धंधे बंद कर खुद के
रूपांतरण व कायांतरण किए जाने जैसी दुहाई देता रहा...अपने द्वारा संस्कृत में
प्रभु श्रीराम पर रचे जा रहे ग्रंथ का हवाला देता रहा। मगर वाल्मीकि की एक न चली।
प्रशासन की नज़र में वह रत्नाकर ही था। इधर संकल्प का धनी वाल्मीकि था कि रत्नाकर
वाली पर आना नहीं चाहता था।
लगता है हमें पाप से चाहे घृणा हो न हो
पापियों से जरूर है। क्या आज हम किसी रत्नाकर में वाल्मीकि बनने की और किसी
अंगुलीमाल में भिक्षुक बनने की लेषमात्र संभावना भी नहीं रख छोड़ना चाहेंगे ?
***
100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास ,455001, मो. 9302379199
Sunday, 23 February 2014
व्यंग्य (नईदुनिया, 24.02.14.में प्रकाशित व्यंग्य)
ओपिनियन पोल यानी हँडिया का एक
दाना
ओम वर्मा
om.varma17@gmail.com
बिना स्वप्न आधारित या बिना पुरातत्वीय खुदाई के अपनी मातृभूमि को स्वर्णनगरी मेँ बदल देने वाले त्रिलोकपति लेकिन महाअहंकारी दशानन का वध तथा चौदह वर्ष का वनवास काट कर जब प्रभु श्रीराम अयोध्या लौटे तो इतिहास का पहला ओपिनियन पोल उनकी राह देख रहा था ।
बिना स्वप्न आधारित या बिना पुरातत्वीय खुदाई के अपनी मातृभूमि को स्वर्णनगरी मेँ बदल देने वाले त्रिलोकपति लेकिन महाअहंकारी दशानन का वध तथा चौदह वर्ष का वनवास काट कर जब प्रभु श्रीराम अयोध्या लौटे तो इतिहास का पहला ओपिनियन पोल उनकी राह देख रहा था ।
बाहरी व्यक्ति द्वारा अपहृत पत्नी को वापस उचित
स्थान दिए जाने का ‘अपराध’ करने पर हो रही लोकनिंदा व कानाफूसी से रामजी भी तंग आ गए थे! अब चूँकि
हर अयोध्यावासी से मिलना तो उनके लिए संभव नहीं था।लिहाजा उन्होंने स्वयं छद्म भेष
धारण कर ‘दलित के घर रात गुजारने’ वाली
स्टाइल मेँ एक लॉन्ड्री वाले के यहाँ व कुछ अन्य अड्डों पर कुछ समय व्यतीत कर
केजरीवाल स्टाइल में आम नागरिकों की राजा के आचरण पर प्रतिक्रिया जानी। जाहिर है
कि त्रेता युग के इस महान शासक ने किसी
संस्था से ‘फिक्स्ड सर्वे’ करवाने के
बजाय स्वयं एक सेंपल सर्वे कर पहले ओपिनियन पोल की विधिवत शुरुआत कर दी थी।
एक ओपिनियन पोल का उल्लेख मुगलकालीन इतिहास
मेँ भी मिलता है जो इससे थोड़ा भिन्न है। हुआ यूँ कि एक दिन बादशाह अकबर भरवां
बैंगन की शानदार सब्जी खाकर मस्त हो गए थे और उसका स्वाद मुँह मेँ देर तक बना रहा।
सभासदों के बीच मेँ उन्होंने सबसे पहले इसका जिक्र किया तो बीरबल ने तुरंत राजनीति
के ‘अनुशासित सिपाही’ की
तरह बयान जारी किया, “हुज़ूर बैंगन तो सब्जियों का राजा है।
उसका रंग शानदार, सर पर बादशाहों जैसा ताज! जहांपनाह का
हुक्म हो तो बैंगन को राजकीय सब्जी घोषित कर दिया जाए!”
बैंगन को राजकीय सब्जी घोषित करने की
प्रक्रिया चल ही रही थी कि एक दिन बादशाह अकबर ने फिर वही मसालेदार सब्जी और
ज्यादा खा ली। उन दिनों वहाँ न तो कोई जयराम रमेश थे और न कोई नरेंद्र मोदी, तब भी उन्हें शौचालय की महत्ता समझ मेँ आ
गई। अगले दिन उन्होंने दरबार मेँ बैंगन की सब्जी को कोसते हुए जैसे ही अपनी हालत
के बारे मेँ बताया कि चतुर सुजान बीरबल ने तुरंत अमेरिका द्वारा नरेंद्र मोदी के
बारे मेँ बदली गई राय की तरह बैंगन के बारे मेँ अपनी राय बदली, ”जी आलमपनाह! बैंगन भी कोई सब्जी है...काला कलूटा ...सिर
पर काँटों भरा ताज...कोई गोल तो कोई लंबा...! मेरी मानें तो हुज़ूर इसकी खेती पर ही
पाबंदी लगा दें ताकि कल कोई इसमें नस्लीय बदलाव (जेनेटिक माडिफिकेशन) न कर सके।“
प्रभु श्रीराम चक्रवर्ती
सम्राट व कानूनी तौर पर एक राज्य के राजा थे। राजतंत्र मेँ भी उन्हें ओपिनियन पोल
जैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था मेँ विश्वास था। मगर इधर लोकतंत्र मेँ दस वर्षों से सत्ता
सुख भोग रहे मित्रों को वर्तमान ओपिनियन पोल फूटी आँख नहीं सुहा रहे हैं। वे कभी
ओपिनियन पोल को कूड़ेदान में फेंकने लायक
बता देते हैं तो कभी मात्र हजार - दो हजार लोगों की राय बताकर खारिज कर देते हैं।
शायद वे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ द्वारा करवाए गए ओपिनियन पोल की जगह बीरबल द्वारा
बादशाह की स्तुति जैसा राजतंत्री ‘ओपिनियन पोल’ चाहते हैं। वे शायद यह भूल
रहे हैं कि बैंगन प्रकरण मेँ अपनी नीति
परिवर्तन पर बीरबल ने बादशाह सलामत को डिप्लोमेटिक जवाब देते हुए यह भी तो कहा था
कि “हुज़ूर गुलाम नमक आपका खाता है न कि बैंगन का!” आज के ‘बादशाहों’ को अब कौन समझाए कि जनता
तो अपनी ही गाढ़ी कमाई से खरीदा नमक खा रही है!
क्या
आज के हुक्मरान यह भूल गए कि बचपन में जब घर में प्रेशर कुकर की सीटी नहीं बजती थी
तब मांएं चावल का सिर्फ एक दाना देख कर मालूम कर लिया करती थीं कि हँडिया के बाकी दानों
का क्या मिजाज़ है।
***
100, रामनगर एक्सटेंशन,
देवास 455001 (म॰प्र॰)
-----------------------------------------------------------------------------------------------
Thursday, 20 February 2014
व्यंग्य
जरूरत है एक बज़टावतार की !
ओम वर्मा
भारतीय अर्थ-व्यवस्था के फ़लक पर एक बिंदु है ‘सरकारी बज़ट’। दूसरा बिंदु है ‘आम आदमी’। और तीसरा लास्ट बट नॉट द लीस्ट तथा अति विशिष्ट बिंदु है – ‘वित्त मंत्री’। भारतीय अर्थ व्यवस्था के फ़लक पर इन तीन बिन्दुओं के मिलन से जो रचना बनती है और वह है- ‘घाटे का त्रिकोण’। और इनके आंतरिक कोणों का योग कभी भी लाभ और समृद्धि के दो समकोणों के योग की बराबरी नहीं कर पाया है।
हाँ, यह बजट का सत्र यदि किसी के लिए खुशगवार साबित होता है तो वे हैं हमारे त्वरित टिप्पणी विशेषज्ञ, कार्टूनिस्ट, और टीवी चैनलों के सूत्रधार! और यदि कोई त्रिशंकु बन कर रह जाता है तो वह है हमारे प्रेमचंद का होरी और हमारे शिवपालगंज का शनीचर! हमारे यहाँ जन्में अर्थशास्त्री विदेशी छात्रों के लिए किताबें लिख सकते हैं, सालों तक रिज़र्व बैंक सम्हालने से लेकर लाल किले पर झण्डा फहराने का काम कर सकते हैं, तीस-बत्तीस रु. रोज में गरीबों को सुख से रहने का फरमान जारी कर सकते हैं, लेकिन बजट का घाटा कभी पूरा नहीं कर सके। होरी के सर पर कर्ज़ कल भी था तो आज भी है... लंगड़ फैसले की नकल के लिए कल भी अदालतों के चक्कर लगाता था और आज भी लगाता है। उधर शिवाजी पार्क में नानी पालखीवाला का बजट पर भाषण सुनने के लिए साल दर साल ज्यों ज्यों भीड़ बढ़ती गई थी त्यों त्यों बजट का घाटा और अमीरी गरीबी का फासला बढ़ता गया था।
जिस प्रकार मंचीय चुटकुलेबाजी, तुकबंदी और ज़ुल्फों के पेचो-खम के वर्णन में उम्र गुजार देने वाले ‘कवियों’ को समकालीन कविता और सिर्फ सुंदरियों के चित्र बनाने वाले को एक अमूर्त चित्र कभी समझ में नहीं आता, उसी प्रकार अपने राम को भी वित्तमंत्रियों का बजट भाषण आज तक कभी समझ में नहीं आया। मैंने एक त्वरित टिप्पणीकार अर्थशास्त्री से पूछा, “बजट आपकी राय में कैसा है?”
प्रतिक्रिया उनके मुखारविंद से इस्तीफा देने को उद्यत केजरीवाल की तरह तैयार बैठी थी। वे बोले, “बजट में डेफ़िसिट इतने से इतने परसेंट हो गया है, इससे इतने परसेंट इंफ्लेशन होगा और विकास की दर इतनी हो जाएगी... सेंसेक्स इतना गिर जाएगा...एनआरआई अपना निवेश...”
“शास्त्रीजी, आप सिर्फ यह बताइए कि इससे महँगाई और आम आदमी की जेब पर क्या फर्क पड़ेगा?” मैं अर्नब गोस्वामी का कांग्रेस उपाध्यक्ष से लिए गए अद्भुत इंटरव्यू की तरह सामने वाले की बालू में से तेल निकालने का प्रयास करने लगा।
“यह बजट थोड़ा अच्छा है और थोड़ा खराब!” एक डिप्लोमेटिक जवाब प्राप्त हुआ।
“एक बात कुछ बोलिए, अच्छा है या खराब?” मैंने चील के घोसले में माँस तलाशना चाहा।
“यार हम इतने सालों से त्वरित टिप्पणी कर रहे हैं, पर हमारी खुद समझ में नहीं आया कि हम बजट की तारीफ कर रहे हैं या आलोचना…”, चश्मा चढ़ाते हुए वे बोले, “आज तुम्हें क्या समझाएँ? चलो हटो! मुझे बजट पर परिचर्चा में भाग लेने के लिए स्टुडियो जाना है।“
तो आखिर बजट कैसा है? मैंने सड़क किनारे गड्ढा खोद रहे एक आदिवासी मजदूर से पूछा, “क्यों मामा, सरकार ने मोबाइल और शिक्षा ऋण के ब्याज पर छूट दी है… बीड़ी सिगरेट पर टैक्स नहीं बढ़ाए हैं ...”
“तमारी बात म्हारे कांई समझ में नी आवे, ठेकेदार से पूछी लो...” उसने आधी पीकर पहले बुझाई जा चुकी बीड़ी फिर से सुलगाई और अपने स्मार्ट फोन पर एफएम पर गाना सुनने लगा। मुझे बजट पर एक भी प्रतिक्रिया तीसरे मोर्चे की रीति - नीति से कोई कम उलझी हुई नहीं लगी।
संकट हल नहीं हुआ तो मन बैरागी हो उठा और प्रभु स्मरण कर बैठा। हे दीनबंधु! हे दीनानाथ!! जैसे तुमने रावण को मारने के लिए अवतार लिया, जैसे कंस का सँहार किया, वैसे ही गरीब जनता के लिए एक बार वित्तमंत्री का बजटावतार ले लो प्रभु! अब गीता वाला वचन निभाने का समय आ ही गया समझो !
------------------------------ ------------------------------ -----------------
100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001
Sunday, 9 February 2014
व्यंग्य (जनसत्ता, 09.02.14)
ज़हर
– तब और अब
ओम वर्मा
om.varma17@gmail.com
om.varma17@gmail.com
सृष्टि में अगर अंधेरा नहीं होता तो प्रकाश भी नहीं होता।
दरअसल रोशनी को मान्यता मिली ही इसलिए है कि हमें पहले अंधियारे का बोध हो चुका
है। और अंधियारे का खौफ़ या बदनामी होती ही इसलिए है कि हम प्रकाश का महत्व जानते
हैं या रोशनी के दौर से गुजर चुके होते हैं। इसी तरह दुनिया में अगर ज़हर नहीं होता
तो शायद अमृत भी नहीं होता। यानी ज़हर की पहचान अमृत के होने से और अमृत की सारी झाँकी, औकात या वीआयपीपना ज़हर के होने से ही है।
सत्ता संघर्ष में यही पहचान और अस्तित्व का
झंझट ज़हर को बार बार चर्चा के केंद्र में ले आता है। ज़हर का जिक्र हर सभा में इन
दिनों इतना प्रासंगिक हो गया है कि ज़हर ज़हर न हुआ मानों अमृत हो गया हो। समुद्र
मंथन से प्राप्त अमृत को चंद्रमा पर पहुँचाकर तब के एलीट वर्ग (श्रेष्ठजनों) ने
उसे अप्राप्य भले ही बना दिया हो मगर हमारे चंद्र अभियान उसकी खोज में आज भी लगे
हुए हैं। नील आर्मस्ट्रांग भी चंद्रमा से लौटे तो उनके हाथ में महज़ दो मुट्ठी ‘भूरी भूरी खाक़ धूल’ ही
थी, अमृत का घड़ा नहीं। वर्ना उन्हें क्या जल्दी या क्या
जरूरत थी इस नश्वर संसार से कूच करने की! जाहिर है कि अमृत किसी यूटोपियाई समाज की
वह वस्तु है जो आज तक अप्राप्य है। यह वह भाववाचक संज्ञा है जिस पर विमर्श करके
उसे राजनीति के बाज़ार में ‘ब्लू चिप’
शेअर की तरह भुनाया नहीं जा सकता।
मगर ज़हर की बात और है। जब यह देवों की संगत
में आता है तो उन्हें भी महादेव बना देता है। किसी सुपात्र प्राणी के फन में जब यह
स्थान ग्रहण करता है तो वह त्रिलोकपति का कंठहार बन जाता है। वास्तविक ज़हर किसमें
और कहाँ होता है यह एक आम आदमी तो खैर बिलकुल नहीं समझता इसलिए उसे रस्सी भी दिख
जाए तो वह या तो डर जाता है या किसी को उसकी सुपारी दे आता है। और आज यह समझना मुश्किल है कि इनके आरोपों
में ज्यादा ज़हर है या उनके जवाबों में। वैसे ज़हर हर युग में सत्ता संघर्ष का एक
उपकरण और कभी कभी सियासी जंग का एक गुप्त हथियार भी रहा है। हर युग में उसकी अलग
अलग भूमिका रही है। कभी किसी दार्शनिक को कट्टरपंथियों का विरोध करने के कारण इसे
ग्रहण करना पड़ा तो कभी यह किसी जोगन को परम पद पाने का प्रसाद भी बना। जब सौ कौरव और
एक शकुनि मामा, यानी पूरे एक सौ एक लोग
मिलकर भीम के बल का मुक़ाबला नहीं कर सके तो उन्हें उसे मारने के लिए ज़हर का सहारा
लेना पड़ा। मगर यही ज़हर इन दिनों इतना हैरान परेशान है कि अगर उसका बस चले तो स्वयं
ज़हर खाकर मर जाए। अभी कुछ साल पहले तक जो माँ बच्चों को गब्बर के नाम से डराया
करती थी, वह आज ज़हर के नाम से डराने लगी है। बेटा कुछ ऐसा डर
रहा है कि उसे अब हर सवाल में ज़हर की गंध महसूस होने लगती है। शायद इसी वज़ह से किसी
भी सवाल पर उसकी सुई एक ही जवाब पर अटकने लगती है। ज़हर की खेती की जा सकती है या
नहीं या ‘84 में काटी गई फसल और ’02
में काटी गई फसल में से किसका ज़हर अधिक घातक या अधिक लाभदायक था यह जनता तय करे
इससे पूर्व ही एक पक्ष दूसरे पक्ष को ज़हर को एंटीवीनम (ant venom) में बदल कर भुनाने की सुविधा मुफ्त उपहार में तो दे ही रहा है। हर ज़हर
की तासीर अलग अलग हुआ करती है जनाब! सुना है कि ज़हर ही ज़हर को मारता है। अब कौन सा
ज़हर किसको काटता या मारता है और सत्ता का पूरी तरह से ज़हरीकरण होता है या ज़हर का
सत्ताईकरण ... यही आने वाले चंद दिनों में देखेंगे हम लोग! ***
100, रामनगर एक्सटेंशन, देवास 455001
(म.प्र.)
Subscribe to:
Posts (Atom)